ऑक्सीजन की कमी से मरने वाले लोग आख़िर ‘काल्पनिक पात्र’ कैसे बन गए?

by–कीर्ति दुबे- बीबीसी संवाददाता

‘श्रीराम अस्पताल के गेट पर ही मैं कुछ देर तक इसी आस में गिड़गिड़ा रही थी कि क्या पता तरस खाकर भर्ती कर लें लेकिन तब तक मेरे पति बेहोश हो चुके थे. मैं अकेली थी कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने उनका मुंह खोला और सांस देने लगी लेकिन वो नहीं बचे.”

”मेरा मन नहीं मान रहा था इसलिए मैं उन्हें लेकर सरकारी अस्पताल पहुँची तो वहां डॉक्टर ने कहा अब कुछ नहीं बचा है. उस दिन के बाद से मेरी बेटी और मैं यही बात करते हैं कि क्या हम कुछ करके उन्हें बचा सकते थे? लेकिन क्या करते जब ऑक्सीज़न ही नहीं दी अस्पताल ने तो…”

आगरा की रहने वाले रेणु सिंघल अपनी बात पूरी भी नहीं कर पातीं और रोने लगती हैं. फ़ोन पर चुप्पी है, कुछ पल बाद वह खुद को संभालती हैं और कहती हैं, “सरकार तो अब कुछ भी कहे लेकिन मेरे पति चले गए मुझे और मेरी 16 साल की बेटी को छोड़कर और ऑक्सीज़न न मिलना ही उनकी मौत का कारण बना.”

लेकिन मंगलवार को स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया से जब ऑक्सीजन की कमी से सड़कों और फुटपाथों पर हुई मौतों के बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने इसका लिखित जवाब राज्यसभा में दिया.

ताज़ा मंत्रिमंडल बदलाव में डॉ. हर्षवर्धन की जगह स्वास्थ्य मंत्री मांडविया ने कहा, “किसी भी राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था का काम राज्य सरकार देखती है, स्वास्थ्य मंत्रालय की गाइडलाइन का अनुपालन करते हुए सभी राज्य और केंद्र शासित राज्य रोज़ाना कोरोना के केस और इससे होने वाली मौतों की जानकारी मंत्रालय को देते रहे हैं. हालांकि किसी भी राज्य और केंद्र शासित राज्य में ऑक्सीज़न की कमी से एक भी मौत की जानकारी नहीं मिली है.”

ये जवाब सुनकर ज़्यादातर लोग अवाक हैं जिन्होंने अपनों को ऑक्सीजन न मिलने की वजह से खोया है, या अपने आस-पास के लोगों की मौत के सामने बेबसी देखी है लेकिन सरकार का जवाब स्पष्ट है, राज्य सरकारों ने किसी एक मामले में मौत की वजह में ‘ऑक्सीजन न मिलना’ नहीं लिखा है इसलिए तकनीकी तौर पर ऑक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा है.

अपने 47 वर्षीय पति को खो चुकी रेणु सिंघल सरकार के इस बयान पर कहती हैं, “कुछ हो तो अस्पताल जाना चाहिए, यही कहा जाता रहा, हमेशा लेकिन जब अस्पताल कह दे कि हम नहीं देख पाएँगे क्योंकि ऑक्सीजन वाला बेड नहीं है, तो कोई और कहां जाएगा?”

एक मई को दिल्ली के बत्रा अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर एससीएल गुप्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा था, “हमें ऑक्सीज़न वक्त पर नहीं मिली, 12 बजे दोपहर में ऑक्सीज़न ख़त्म हो गई, हम मरीज़ों को नहीं बचा सके, जिसमें हमारे एक डॉक्टर भी शामिल थे. शनिवार (30 अप्रैल) को हमने लगभग एक घंटे अस्पताल बिना ऑक्सीज़न के चलाया.”

30 अप्रैल को दिल्ली के बत्रा अस्पताल में 12 लोगों की मौत इसलिए हो गई क्योंकि अस्पताल में ऑक्सीज़न खत्म हो गई थी. अस्पताल ने इमरजेंसी मैसेज भी जारी किया था कि 326 मरीज़ अस्पताल में भर्ती हैं और ऑक्सीज़न सिर्फ़ 10 मिनट ही चल सकेगी लेकिन इस अपील के बाद भी अस्पताल को ऑक्सीज़न वक़्त पर नहीं मिली.

27 अप्रैल को दिल्ली के जयपुर गोल्डन अस्पताल ने बताया कि 22 अप्रैल की शाम 5 बजे ऑक्सीज़न की सप्लाई मिली लेकिन 23 अप्रैल ऑक्सीज़न 10-15 मिनट देरी से मिली और इसके लिए कई इमरजेंसी मैसेज जारी किए गए तब जाकर एम्स अस्पताल से कुछ ऑक्सीज़न डायवर्ट की गई. लेकिन 10-15 मिनट की देरी में 20 लोगों की मौत हो गई और कुछ मिनटों की देरी से ये परिवार उजड़ गए.

ऑक्सीज़न की कमी के कारण अपनों को खोने वालों में एक हैं गुरुग्राम की रहने वाली निरूपमा.

30 अप्रैल की रात गुरूग्राम के कीर्ति अस्पताल में छह लोगों की मौत हो गई, बताया गया कि देर रात अस्पताल में ऑक्सीज़न सप्लाई बंद हो गई और अस्पताल के सभी कर्मचारी भाग गए. इस घटना का वीडियो खूब वायरल हुआ. उस रात जिन छह लोगों की मौत हुई उनमें एक निरूपमा की मां भी थीं.

बीबीसी से बात करते हुए निरूपमा बताती हैं, “जब ये घटना हुई तो अस्पताल में कोई नहीं था, हम सभी लोग अपने मरीज़ों के लिए इधर-उधर भाग रहे थे ताकि कोई अस्पताल का कर्मचारी मिल जाए लेकिन कोई नहीं था. अस्पताल से किसी ने हमें नहीं बताया कि ऑक्सीज़न खत्म हो गई है. यहां तक कि मेरी मां के लिए हम रिलिविंग चिट्ठी चाहते थे ताकि उन्हें दूसरे अस्पताल में ले जाया जा सके, इस चिट्ठी में उनका ऑक्सीज़न लेवल 37 लिखा गया था. हालांकि मौत के बाद अस्पताल से जो दस्तावेज़ मिले उसमें मेरी मां की मौत का कारण हार्ट अटैक लिखा गया था जबकि वजह ये थी कि मेरी माँ को ऑक्सीज़न नहीं मिला.”

11 मई, मंगलवार को गोवा मेडिकल कॉलेज में रात 2 बजे से लेकर सुबह 6 बजे के बीच 26 लोगों की मौत हो गई थी जिस पर गोवा के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा था, “देर रात ऑक्सीज़न की सप्लाई रुकने के कारण लोगों की मौत हुई है. इस मामले में हाईकोर्ट को एक कमेटी बनाकर जांच करनी चाहिए. सोमवार को हमने 1200 ऑक्सीज़न सिलेंडरों की मांग की थी लेकिन हमें 400 सिलेंडर ही मिले. अस्पलातों पर काफ़ी दबाव है और उन्हें ज़रूरत भर ऑक्सीज़न नहीं मिल रही है”.

तीन मई को कर्नाटक के चामराजनगर में मेडिकल ऑक्सीजन के लो-प्रेशर की वजह से एक अस्पताल में भर्ती 12 मरीज़ों की मौत हो गई. यह सभी कोरोना के मरीज़ थे.

चामराजनगर इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइसेंज के डीन डॉ. जीएम संजीव ने कहा, “इंस्टीट्यूट के अस्पताल में रात 12 बजे से तड़के दो बजे तक ऑक्सीजन का प्रेशर कम था. यहाँ ऑक्सीजन पर 122 मरीज़ थे. इनमें से जिन 12 कोविड मरीज़ों की मौत हुई है, हमने ज़रूरी ऑक्सीजन लेवल को बरक़रार रखने की काफ़ी कोशिश की, लेकिन सुबह तक 12 मरीज़ों की मौत हो गई.”

इसी तरह, 11 मई को आंध्र प्रदेश में तिरुपति के एक सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से 11 कोविड मरीज़ों की मौत हो गई. ये सारे मरीज़ आईसीयू वार्ड में भर्ती थे. खुद अस्पताल के सुपरिटेंडेंट डॉक्टर भारती ने बताया कि “ये हादसा ऑक्सीजन सप्लाई के प्रेशर में कमी आने के कारण हुआ.”

एक स्वतंत्र कम्युनिटी डेटाबेस प्रोजेक्ट डेटामीट को देश में कोरोना महामारी के दौरान बनाया गया है और जो कोरोना से जुड़े मामलों का डेटा रखता है. इस डेटाबेस में ऑक्सीज़न हुई मौत के आंकड़ों की जानकारी देते हुए बताया गया है कि देश में ऑक्सीज़न की कमी से 619 मौतें हुई हैं, ये आंकड़ा 27 मई, 2021 को आखिरी बार अपडेट किया गया है हालांकि बीबीसी इन आंकड़ों की पुष्टि नहीं कर सका है.

link- https://www.bbc.com/hindi/india-57915829

(Visited 597 times, 1 visits today)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *