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मुहब्बत और इन्क़लाब के शायर स्व. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की कहानी, उन्हीं की ज़बानी!

(हाल ही में फ़ैज़ का जन्मशती वर्ष खत्म हुआ है इस मौके पर हिन्दी में जनवादी लेखक संघ की पत्रिका नयापथ ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर विशेषांक निकाला है,यह अंश उससे साभार लिया है। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने 7 मार्च 1984 ई. को अपनी मृत्यु से आठ महीने पहले एशियन स्टडी ग्रुप के निमंत्रण पर इस्लामाबाद के एक सम्मेलन में बेबाक अंदाज़ में अपनी ज़िंदगी के लंबे सफ़र को जिस तरह बयान किया था, उसे पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है; ज़िंदगी के इस सफ़र को ‘पाकिस्तान टाइम्स’ ने दो किस्तों में फ़ैज़ की सालगिरह के अवसर...

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द वायर एक्सक्लूसिव: भाजपा ने ‘टेरर फंडिंग’ मामले में जांच का सामना कर रही कंपनी से बड़ा चंदा लिया

By रोहिणी सिंह चुनाव आयोग को मिली जानकारी के अनुसार आरकेडब्ल्यू डेवलपर्स लिमिटेड नाम की कंपनी ने चंदे के रूप में भाजपा को बड़ी धनराशि दी है. 1993 मुंबई बम धमाकों के आरोपी इकबाल मेमन उर्फ इकबाल मिर्ची से संपत्ति खरीदने और लेनदेन के मामले में ईडी इस कंपनी की जांच कर रही है. नई दिल्लीः भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक ऐसी कंपनी से चंदे की बड़ी राशि ली है, जिसकी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) आतंकी फंडिंग के संबंध में जांच कर रहा है. भाजपा ने चुनाव आयोग को यह जानकारी दी है. चुनाव आयोग के समक्ष किए गए...

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बीएचयू में संस्कृत प्रोफ़ेसर विवाद: ऐसे में फ़िरोज़ ख़ान तो मुसलमान ही नहीं होंगे

by — रजनीश कुमार बीबीसी संवाददाता”बनारस इतिहास से भी प्राचीन है, परंपरा से भी पुराना है और मिथकों से भी पहले से है. इतिहास, परंपरा और मिथ को साथ मिला दें तो बनारस और प्राचीन लगने लगता है.” लेकिन बनारस अब नया हो चुका है. इस नए बनारस के छात्रों को किसी फ़िरोज़ ख़ान का संस्कृत पढ़ाना नहीं रास आ रहा. ये अड़े हुए हैं कि फ़िरोज़ ख़ान मुसलमान हैं और एक मुसलमान संस्कृत कैसे पढ़ा सकता है? एक मुसलमान गीता और वेद कैसे पढ़ा सकता है? फ़िरोज़ ख़ान कहते हैं. ”तीन-चार साल की उम्र में मैं पास के...

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मूर्खता के इस गणराज्य में वशिष्ठ बाबू को पागल होना ही बदा था!

अभिषेक श्रीवास्तव इस देश में कोई नेता मरता है तो हम तुरंत गूगल कर के उसके किए काम और पद देखते हैं. कोई लेखक मरता है तो हम तुरंत उसकी लिखी किताबों के नाम खोजते हैं. कोई अभिनेता गुज़र जाए तो हम उसकी क्लासिक फिल्मों को गिनवाते हैं. कोई वैज्ञानिक नहीं रहता तो हम उसे मिले पुरस्कारों के नाम खोजते हैं. किसी शख्सियत के निधन पर कुछ न कुछ मिल ही जाता है हमें लिखने को. यह दिखाने को, कि हम भी उसके बारे में थोड़ा-बहुत जानते थे. वशिष्ठ नारायण सिंह की मौत पर महज एक विशेषण और दो...

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हिंदी वैचारिकी की हत्या ” ये भी राज़ हे मोदी की ज़बर्दस्त कामयाबी का भी ”

by — सिकंदर हयात विवाह समाज विचार से जुड़े तीन लेख लिखे लिखे हे पाठको . इन्ही तीनो लेखो में मोदी की भी ज़बर्दस्त कामयाबी का भी राज़ मिलता हे . ये समाज विचारो से नफरत करता हे , खासकर हिंदी विचारो या हिंदी में विचारो से खास कर हिंदी से बहुत नफरत करता हे . हिंदी से ये समाज और समाज की स्मार्ट लड़कियाँ इतनी नफरत करती हे इतनी नफरत करती हे की वो अनपढ़ को भी कह सकती हे ” वॉव पढ़ना लिखना नहीं जानते बिलकुल अनपढ़ सो क्यूट ” मगर हिंदी से गहरी चिढ हे खुद...

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