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फतवे जो समय के साथ गलत साबित हुए

अफ़ज़ल ख़ान जब भी किसी धार्मिक व्यक्ति को सुनने का अवसर मिलता है उन साहब के मुंह से फलजड़िय अवश्य निकलती है कि हमारी समस्याओं यहूदी और ईसाइयो की साजिशों का नतीजा है. हमारे और यूरोप में एक बड़ा अंतर यह है कि यूरोप के विद्वानों और ज्ञान को अपने लोगों के प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ता था और कभी कभी उन्हें गंभीर सजा भी भुगतनी पड़ी . लेकिन हमारे समाज में अब सभी अविष्कारों और खोजों पश्चिम से आती हैं और उलेमा उनके विरोध तो बड़े जोर और शोर करते हैं अविश्वास और कुफ़्र के फतवे भी सादर...

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विशव के ऐसे 25 मुल्क जहां फ़ौज नही है

अफ़ज़ल ख़ान जर्मनी के एक पत्रिका ने दुनिया के 25 ऐसे मुल्क की सूची जारी की है जिन के पस फ़ौज नही है.ये सभी देश अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया और युरोप के आस पास है.इन देश मेइंदोरा,बारबाडोस,कोस्टारिका,डोमेंकेन,ग्रेंडा,हैटी,आइस्लॅंड,कैर्बै,लॅकटन स्टेन,मिकरोनेसिया,मोनाकाओ,पनामा,तुवालो,वेटिकन सिटी, समउवा आदि. जब मे ने यह खबर पढी तो मे ने इन देशो का डाटा जमा करना शुरु किया तो मालूम हुआ के सभी मुल्क फ़ौज के बिना भी अपना वजूद बरकरार रखे हुए है और साथ साथ तरक्की भी कर रहे है. छोटे मुल्क होने के उपरान्त भी कुछ ऐसी विशेस्ता है जो और किसी मुल्क के पस नही है. सब से...

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अच्‍छे दिन तो आ गये, मगर किसके?

आनंद सिंह आखिर वो दिन आ ही गये जिनका उन्‍हें बेसब्री से इन्‍तज़ार था। लेकिन वो कौन लोग थे जो इन दिनों के इन्‍तज़ार में इतने दिनों से आंखे गड़ाये बैठे थे? क्‍या वे भांति-भांति के ओपिनियन पोल और एग्‍िज़ट पोल करने वाले चुनावी विश्‍लेषक और टीवी एंकर थे? वो तो थे ही लेकिन कुछ ऐसे भी लोग थे जो उनसे भी ज्‍़यादा बेसब्री से इन्‍तज़ार कर रहे थे इन दिनों का। तो क्‍या वो टीवी के दर्शक थे? वो भी थे, लेकिन वो तो महज़ कन्‍ज्‍़यूमर थे अच्‍छे दिनों के सपनों के प्रोडक्‍ट के। तो फिर भला सपनों...

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हाथी,घोड़ा पालकी

ओम थानवी न कांग्रेस को इस पतन की उम्मीद थी, न भाजपा को ऐसे आरोहण की। जनता भी कभी छप्पर फाड़ कर देती है। पहली बार भाजपा को अपने बूते पूर्ण बहुमत मिला है। और कांग्रेस को अपूर्व विमत। पंद्रह साल पहले सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं। पार्टी के इतिहास में उसकी वह न्यूनतम उपलब्धि थी। इस दफा, जब चुनाव की कमान राहुल गांधी के हाथों में रही, कांग्रेस को 43 सीटें मिली हैं। यारो, कैसा गिरने में गिरना है! भाजपा ने राजग गठबंधन में चुनाव लड़ा। लेकिन जनता ने राजग की 336...

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कोमल मनोभावों की हत्या सेक्सुआलिटी का विकृत रुप

सैयद एस. तौहीद सातवें दशक की शुरूआत में बीआर इशारा की बोल्ड फ़िल्मों ने धूम मचा दी थी । उनकी पहली फ़िल्मों ने नई बहसों को जन्म दिया था । इशारा की फिल्में सतही व्यस्क खुलेपन से काफी आगे थी। इस साहसी फिल्मकार ने मुख्यधारा में रहकर ही व्यस्क किस्म की फिल्में बनाई। रामसे की हारर फिल्मों में मौजूद टाईप आफ सेक्सुआलिटी में सतहीपन –फेड अप कर देता है। उन फिल्मों में विमर्श को तलाशना व्यर्थ ? दशकों पूर्व ‘कर्म’ में देविका रानी-हिमांशु राय बीच चुंबन सीन को लेकर काफी तर्क-वितर्क हुआ, लेकिन भारतीय सिनेमा में सेक्सुआलिटी कंटेंट नहीं...

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