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किसका तिलिस्म पहले टूटेगा : नरेन्द्र मोदी या प्रियंका गांधी ?

पुण्य प्रसून बाजपेयी नरेन्द्र मोदी और प्रियंका गांधी। मौजूदा राजनीति के यही दो चेहरे हैं जो अपने अपने ‘औरा’ को लेकर टकरा रहे हैं। और दोनों का ही तिलिस्म बरकरार है। दोनों की राजनीतिक मुठ्टी अभी तक बंद है। लेकिन दोनों ही लीक तोड़कर राजनीतिक पहचान बनाने में माहिर हैं। लेकिन दोनों के तिलिस्म के पीछे दोनों के हालात अलग अलग हैं। प्रियंका इसलिये चमक रही हैं क्योंकि चमकदार राहुल गांधी फीके पड़ चुके हैं। मोदी इसलिये धूमकेतू की तरह नजर आ रहे हैं क्योकि बीजेपी अमावस में खो चुकी है। प्रियंका का औरा इसलिये बरकरार है क्योंकि इंदिरा...

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कहानी : खोल दो

सआदत हसन मंटो अमृतसर से स्पेशल ट्रेन दोपहर दो बजे चली और आठ घंटों के बाद मुगलपुरा पहुंची। रास्ते में कई आदमी मारे गए। अनेक जख्मी हुए और कुछ इधर-उधर भटक गए। सुबह दस बजे कैंप की ठंडी जमीन पर जब सिराजुद्दीन ने आंखें खोलीं और अपने चारों तरफ मर्दों, औरतों और बच्चों का एक उमड़ता समुद्र देखा तो उसकी सोचने-समझने की शक्तियां और भी बूढ़ी हो गईं। वह देर तक गंदले आसमान को टकटकी बांधे देखता रहा। यूं ते कैंप में शोर मचा हुआ था, लेकिन बूढ़े सिराजुद्दीन के कान तो जैसे बंद थे। उसे कुछ सुनाई नहीं...

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शोषित नारी की कथाएँ

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु आदिम काल से नारी शोषण का शिकार रही है। नारी की नारी सुलभ संवेदनाओं की हर युग में उपेक्षा हुई है। समाज का कोई भी वर्ग रहा हो, वह नारी देह के भूगोल की ही व्याख्या करता रहा है। समाज का कोई भी रिश्ता स्त्री को सुरक्षा–कवच प्रदान नहीं कर पाया है। सुरक्षा का नाजुक घेरा टूटते ही नारी केवल शरीर नज़र आती है और पुरुष उपभोक्ता मात्र। इस दयनीय स्थिति के पीछे कई कारण हैं। साहनी जी इन विभिन्न कारणों को विभिन्न लघुकथाओं के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। स्त्री के देह–व्यापार के कारणों में...

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लोकमन को जीतने की विधा “नारे”

सुरेन्द्र अग्निहोत्री लोकमन को जीतने की विधा नारे सभी को लगते है प्यारे यह बात सिर्फ आज के चुनावी युग और प्रचार युग में ही नही प्राचीन काल में भी नारे लोकमन की बात और लोकमन के बीच में अपनी बात को पहुॅचाने की एक सशक्त विधा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है। संस्कृत के ‘सुभाषित’ नीति कथनों से भी नारों का काम लिया जाता रहा है। वीर रासो काव्य को भी इसी रुप में ले सकते है जब युद्ध के तौर पर वीरता के लिए लोगों के मन में ललक पैदा करने की कोशिश की जाती...

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जीवन में साहित्य का महत्व : प्रेमचंद

सिकंदर हयात अपने एक लेख में प्रेमचंद बताते हे की जीवन में साहित्य का क्या महत्व हे ? क्या स्थान हे क्यों हे ? आज की भागती दौड़ती जिंदगी में इंसान किसी चीज़ से सबसे ज़्यादा दूर हो रहा हे तो साहित्य भी हे इसके दुष्परिणाम भी साफ़ तौर पर देखे जा सकते हे लोगो की अच्छा कहने सुनने की एक दुसरे को समझने की रोचक बातचीत की क्षमता कम हो रही हे कारण साफ़ हे की दिमाग और मन दोनों की ही खुराक पढ़ना और साहित्य होता ही हे टी वी इंटरनेट और दुसरे माध्यम जीवन में साहित्य...

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