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कॉरपोरेट फंडिंग के आसरे महंगे होते लोकतंत्र में जनता कहीं नहीं

by — पुण्य प्रसून बाजपेयी तो कॉरपोरेट देश चलाता है या कॉरपोरेट से सांठगांठ के बगैर देश चल नहीं सकता। या फिर सत्ता में आना हो तो कॉरपोरेट की जरुरत पड़ेगी ही । और कॉरपोरेट को सत्ता से लाभ मिले तो फिर कॉरपोरेट भी सत्ता के लिये अपना खजाना खोल देता है। ये सारे सवाल हैं। और सवालों से पहले एक हकीकत तो यही है कि 2015-17 के बीच कॉरपोरेट फंडिग होती है 6 अरब 36 करोड 88 लाख रुपये की । और सत्ता कॉरपोरेट को डायरेक्ट या इन डायरेक्ट टैक्स में रियायत दे देती है 60 खरब 54अरब...

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स्मृति : गोपाल दास नीरज

by – संतोष अर्श ‘गीत एक और ज़रा झूम के गा लूँ तो चलूं..’ हिंदी के प्रसिद्ध गीतकार ९३ वर्षीय गोपाल दास नीरज (४/जनवरी १९२५- १९ जुलाई २०१८) के न रहने से लोकप्रिय हिंदी कविता की परम्परा ठिठक सी गयी है, मंच पर उसके पास ऐसा कोई स्तरीय कवि अब नहीं बचा है. नीरज जैसे कवि जनमानस का रंजन करते हुए उसे कविता के लिए भी तैयार करते हैं, इन्हीं गीतों से साहित्य का अंकुरण होता है और पाठक धीरे–धीरे परिपक्व बनता चलता है. कवि संतोष अर्श ने क्या बेहतरीन ढंग से नीरज को याद किया है. यह स्मृति...

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लोकतंत्र को भीड़तंत्र बनाने वालों पर कानून का हंटर कौन चलाएगा?

by – अजीत अंजुम “मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है क्या मिरे हक में फैसला देगा” देश के किसी भी कोने में भीड़तंत्र के शिकार किसी शख्स की तस्वीरें देखता हूं, तो मुझे सुदर्शन फाकिर का ये मशहूर शेर याद आ जाता है. सत्ताधारी दल के कथित बेलगाम समर्थकों के हाथों पिटे आर्यसमाजी नेता स्वामी अग्निवेश अब फरियाद करें भी तो किससे करें? देश और प्रदेश में जिस दल की सरकार है, उसी दल के शोहदों ने झारखंड के पाकुड़ में जय श्रीराम के नारे लगाते हुए स्वामी अग्निवेश को बुरी तरह पीटा है. कपड़े फाड़े, जमीन पर गिराकर...

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निष्पक्ष लोग आज सबसे ज्यादा खतरे में क्यों दिख रहे हैं?

निष्पक्ष लोगों के ऊपर खतरा बढ़ने का मतलब यह भी है कि हमारी राजनीति और समाज पर खतरा बढ़ गया है ‘राइजिंग कश्मीर’ के संपादक शुजात बुखारी की हत्या पर भारत सरकार के एक मंत्री का कहना है कि वे इसलिए मारे गए क्योंकि उन्होंने मध्य मार्ग तलाशने की कोशिश की थी. इस बात और स्पष्ट करके कहा जाए, तो यह कहा जाएगा कि शुजात बुखारी ने विभिन्न परस्पर-विरोधी पक्षों में किसी एक की बात को सही मानने के बजाय तटस्थता से काम लिया था. उन्होंने संवाद और सामंजस्य के जरिए सर्वमान्य समाधान की ओर बढ़ने की हिमायत की...

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राम पुनियानी का लेख: आपातकाल के दिनों से भी ज्यादा आज मुश्किल में है देश और लोकतंत्र!

राम पुनियानी आपातकाल की हिटलर से तुलना अतार्किक आज हम देख रहे हैं कि सत्ताधारी दल और उसके गुर्गे, नागरिक स्वतंत्रताओं और प्रजातांत्रिक अधिकारों के लिए खतरा बन गए हैं। उन्हें फ्रिन्ज एलीमेंटस कहकर नजरअंदाज करने की बात कही जा रही है जबकि सच यह है कि वे सत्ताधारी दल के वैचारिक आका द्वारा किए गए कार्यविभाजन के अंतर्गत यह सब कर रहे हैं। सन् 1975 में आपातकाल लागू होने के 43 वर्ष पूरे होने के अवसर पर बीजेपी ने आपातकाल के विरोध में कई बातें कहीं। अखबारों में आधे पृष्ठ के विज्ञापन जारी किए गए और मोदी ने...

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