Author: admin

अखबार मुस्कुरा रहा था, लोकतंत्र घबड़ा रहा था

नीरज तिवारी ठंड की सुगबुगाहट होते ही माहौल रूमानी सा हो जाता है। जाड़े के मौसम की सुबह अनायास ही खिड़की से बाहर झांकने को मजबूर कर देती है। हल्की ओस की बूंदों के पार देखने का मजा और हल्की सांस छोड़ते हुए मुंह और नाक से भाप निकलने का एहसास यकायक ही दिल को रोमांचित कर देता है। ऐसी ही एक सुबह दिल घर के बाहर चहलकदमी करने को मजबूर करने लगा। हमने भी अपने ट्रैक शूट का जोड़ा निकाला और किरमिच के जूतों को सलीके से बांधते हुए पास की मुख्य सड़क पर जाना तय कर लिया।...

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बाल श्रमिक पर सायरा क़ुरैशी की एक कविता !

वो कृष्णा, थक जाता होगा सारा दिन … सर पे बोझ उठता होगा , मेरा घर कब बनपायेगा ??ऐसा ख़्वाब सजाता होगा !! चन्दू,चाय की दूकान से थक के घर जाता होगा यकीनन खुद को सब से बड़ा पता होगा जबदो जून की रोटी कमा के लाता होगा, बेला,का बच्पन जल जाता होगा जब कोई खिलौना छीन लिया जाता होगा …बर्तन क्यों साफ़ नहीं हैकह के कोई मालिक जब चिलाता होगा … रहीम ,फूल बेचता फिरता है कभी पेन किताब दिखता है सडको पे , यकीन उसका मन भी कुछ लिखने कोकर जाता होगा ! खेल का मैदान नहीं...

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पीएम पद की ताकत से टकरा रहा है प्रचारक का आदर्शवाद

पुण्य प्रसून बाजपेयी आजादी के बाद पहली बार प्रचारक का आदर्शवाद प्रधानमंत्री की ताकत से टकरा रहा है। देखना यही होगा कि प्रचारक का राष्ट्वाद प्रधानमंत्री की ताकत के सामने घुटने टेकता है या फिर प्रधानमंत्री की ताकत का इस्तेमाल प्रचारक के राष्ट्रवाद को ही लागू कराने की दिशा में बढता है । नेहरु के दौर से राजनीति को देकते आये संघ के एक सक्रिय बुजुर्ग स्वयंसेवक की यह राय यह समझने के लिये काफी है कि आखिर क्यों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसद में दिया गया पहला भाषण राजनीतिज्ञो को लफ्फाजी और आरएसएस को अच्छा लगा होगा। संघ...

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इस्लामी कानून सजा तक ही सीमित क्यों?

अफ़ज़ल ख़ान खबर है कि ब्रुनेई दारुसलाम के सुल्तान ने इस्लामी सजाओ के क़ानून के इस्तमाल का ऐलान किया है. जिसके तहत चोरी की सजा हाथ काटना और बलात्कार के दोषी लोगों को पत्थरवाह किया जा सकेगा जबकि गर्भपात और शराब पर कोड़ों सजा होगी , जिसका कार्यान्वयन आईनदा 6 महीनों हो जाएगा . इस्लाम से प्यार और चाहने वालों के लिये एक अच्छी खबर हो सकती है. सवाल दिमाग में घूम रहा है और यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि आखिर इस्लामी क़ानून को सिर्फ सजाओ तक ही क्यो सीमित रखा गया है ? इस्लाम तो...

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इब्ने सफी – जासूसी साइंस फिक्शन का महान उपन्यासकार

ज़ीशान ज़ैदी इब्ने सफी के नाम से मेरी मुलाकात पहली बार उस समय हुई जब मैं कक्षा पाँच में पढ़ता था। और कामिक्सों की दुनिया छोड़कर उपन्यासों के पाठक वर्ग में अपनी जगह बना रहा था। बाल उपन्यासों से उठकर बड़ों के उपन्यासों में शुरूआत हुई इब्ने सफी से, जो चाचा के यहाँ पूरे चाव से पढ़े जाते थे। वहीं से मुझे भी चस्का लग गया और इब्ने सफी की जासूसी दुनिया की हम दिन रात सैर करने लगे। ये सैर पूरी तरह घरवालों को बताये बिना चोरी छुपे होती थी क्योंकि कक्षा पाँच का छात्र और जासूसी उपन्यास!...

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