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अल्लाह का प्रकोप मुसलमानो पे चंगेज़,हलाकू की शकल मे

अफ़ज़ल ख़ान क़ुरान की एक आयत है जिस का मतलब है के ” अगर तुम अल्लाह के बताये रास्ते से भटक जाओ गे तो हम तुम्हारे उपर एक जालिम क़ौम मुसललत कर दे गे.” 13वी सदी मे जिस तरह का नरसंहार हुआ ,इतिहास ने इस तरह का नरसंहार कभी नही देखा .तेरहवीं सदी में तबाही का एक ज्वार की लहर मुस्लिम दुनिया भर में बह. शहर के बाद शहर, क्षेत्र के बाद क्षेत्र, मुल्क का मुल्क खत्म हो गया. मरने वालों की संख्या अविश्वसनीय था.जिस तरह का प्रकोप मुसलमानो पे तातारी या मोंगोलो की तरफ से आया था और...

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अनहोनी को होनी कर दे…..!!

तारकेश कुमार ओझा तब मेहमानों के स्वागत में शरबत ही पेश किया जाता था। किसी के दरवाजे पहुंचने पर पानी के साथ चीनी या गुड़ मिल जाए तो यही बहुत माना जाता था। बहुत हुआ तो घर वालों से मेहमान के लिए रस यानी शरबत बना कर लाने का आदेश होता। खास मेहमानों के लिए नींबूयुक्त शरबत पेश किया जाता । लेकिन इस बीच बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शीतल पेय ने भी देश में दस्तक देनी शुरू कर दी थी। गांव जाने को ट्रेन पकड़ने के लिए कोलकाता जाना होता. तब हावड़ा रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर हाकरों द्वारा पैदा...

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लघु कथा- कछुवा और खरगोश

राम आत्रे कछुए और खरगोश की दौड़ समाप्त हो चुकी थी। बहुत से पत्रकार और रिपोर्टर वहां उपस्थित थे, उन्होंने इस जीत पर कछुए से उसका विचार जानना चाहा। कछुए ने कहा, ‘मुझे तो मालूम ही नहीं कि मैं जीता हूं या हारा। आप कह रहे हैं तो ठीक ही कह रहे होंगे। फिर भी अगर मे जीता हूं तो ये जीत दलितों और पिछडों की जीत है- जिन्हें ऊंची जात वाले शुरू से ही उनका मजाक और मनोरंजन का सामान समझते रहे है। एक बात और वह ये कि मैंने जीतने के लिए दौड़ मे हिस्सा नही लिया...

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भारतीय राजनेताओ के अनैतिक प्रेम प्रसंग

लव कुमार सिंह अभी तक की भारतीय राजनीति और राजनेताओं में एक गजब की प्रवृत्ति रही है। वह है राजनीतिक मंच पर महिलाओं को ज्यादा तव्वजो न देना, मगर मंच के पीछे यानी नेपथ्य में महिलाओं में जबरदस्त दिलचस्पी दिखाना। इस प्रवृत्ति को भारतीय राजनीति के एक और मिजाज से बढ़ावा मिलता रहा है और वो मिजाज यह है कि यहां नेता, दूसरे नेता के गुप्त संबंधों पर ज्यादा हो-हल्ला नहीं मचाते। इसके बदले में वे आशा रखते हैं कि दूसरे नेता भी उनके संबंधों पर चिल्ल-पौं नहीं करेंगे। एकाध मामलों को छोड़ दें तो नेताओं ने इस तरह...

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हबीब तनवीर साहेब को याद करते हुए

सैयद एस.तौहीद उन दिनों दिल्ली के नाटय-उत्सवों में कालेज की नाटय-मंडलियों व शौकिया कलाकारों का एकाधिकार था। यह मंडलियां प्रमुख रूप से अंग्रेजी प्रस्तुतियां दे रहे थे, कुछ लोग मूल युरोपीय नाटकों का हिन्दी रूपांतरण प्रस्तुत कर रहे थे । एक तरह से दिल्ली का रंगमंच युरोपीय प्रभाव में आकार ले रहा था | इसमें रंगमंच की अवधारणा, अभिनय,प्रस्तुति और अन्य तत्व ‘युरोपीय माडल’ से प्रेरित थे । इस चलन को तनवीर के ‘आगरा बाज़ार’ ने चुनौती दी । आपके आगरा बाज़ार से पहले परंपरागत भारतीय तत्वों को दिल्ली के रंगमंच से बेगाना सा कर दिया गया था ।...

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