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बिहार का रंगमंच

संपर्क- अनीश अंकुर बिहार में रंगमंच लंबे समय से संकट के दौर सेगुजररहाहै। पटना,आरा,गया,बेगूसराय,मधुबनी,कटिहार एवं सहरसा, के अलावा मसौढ़ी जैसे एकाघ षहर व कस्बे ही ऐसे हैं जहंॉं नियमित रंगमंच हो रहा है। बिहार जैसे पिछड़े समाज में भी रंगमंच,विषेषकर पिछले दो-तीन दषकों से, अपनी स्थायी जगह बनाता जा रहा है।तमाम कठिनाईयों व दुष्वारियों के बावजूद रंगमंच हो रहा है।बगैर राज्य के समर्थन के,बगैर समाज के सहयोग के,हर वर्ष बड़ी संख्या में रंगकर्मियों के पलायन के बावजूद बिहार में नाटक निरंतर किया जा रहा है।नाटकों के महोत्सव आयोजित हो रहे हैं।पूर्णकालिक रंगकर्मियों की इतनी बड़ी संख्या, जितनी आज है,...

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हमने ध्यानचंद को खेलते हुये नहीं देखा

पुण्य प्रसून बाजपेयी जरा कल्पना कीजिये सौ बरस बाद जब भारत के इतिहास के पन्नों को कोई पलटेगा तो मौजूदा दौर को कैसे याद करेगा। नेहरु-गांधी परिवार का जिम्मेदारी से मुक्त हो सत्ता चलाना-भोगना। मनमोहन सिंह का बिना चुनाव लड़े बतौर प्रधानमंत्री भारत को दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश से दुनिया के सबसे बड़े बाजार में बदलना। आरएसएस का हिन्दुत्व का एकला चलो का राग छोड़ मुस्लिम प्रेम जागना। संघ के स्वयंसेवक नरेन्द्र मोदी का देश में सबसे लोकप्रिय होकर भी धर्मनिरपेक्षता की परछाई से भी दूर रहना। या फिर कारपोरेट और अंडरवर्ल्ड के शिकंजे में फंसे जेंटलमैन...

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अशिक्षा के खड़ाऊ पर कब तक चलता रहेगा दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र

प्रदीप दुबे देश का एक समर्पित युवा नागरिग होने के नाते मेरे मन में बहुत दिनों से भारतीय राजनीती को लेकर , मंत्रीशाही को लेकर कई शवाल कौंध रहे है , आज जब देश में आम चुनाव का माहौल है ऐसे में मै अपने इन सवालो को जनता के सामने रखना चाहता हूँ जैसे – – क्या भारतीय संविधान में नेता के लिए कोई मानक नहीं है , – क्या भारतीय राजनीती में सक्रिय होने के लिए नेता का शिक्षित होना जरुरी नहीं , – क्या नेता के लिए उम्र की कोई बाध्यता नहीं है , – क्या नेता...

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