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‘ना गुजरात दंगों में बीजेपी थी ना सिख दंगों में कांग्रेस रही”

by–पुण्य प्रसून बाजपेयी बात 28 फरवरी 2002 की है । बजट का दिन था । हर रिपोर्टर बजट के मद्देनजर बरों को कवर करने दफ्तर से निकल चुका था। मेरे पास कोई काम नहीं था तो मैं झंडेवालान में वीडियोकान टॉवर के अपने दफ्तर आजतक से टहलते हुये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हेडक्वार्टर पहुंच गया, जो 10 मिनट का रास्ता थ। मिलने पहुंचा था आरएसएस के तब के प्रवक्ता एमजी वैद्य से। नागपुर में काम करते वक्त से ही परीचित था तो निकटता थी । निकटता थी तो हर बात खुलकर होती थी । उन्होंने मुझे देखा हाल पूछा...

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तो ऐसे थे अटल जी

अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक जीवन कई मायनों में खास रहा। वे ब्राह्मण थे, और नहीं भी थे; दक्षिणपंथी थे,और नहीं भी थे; काम भर कवि भी थे, और राजनीतिक आलोचक भी; लेकिन न कवि थे, न आलोचक; अविवाहित थे, लेकिन उनके ही शब्दों में ब्रह्मचारी नहीं थे; लोग जब समाजवाद को मार्क्सवाद से जोड़ रहे थे, तब उन्होंने उसे गांधीवाद से जोड़ दिया। उन्हें याद कर रहे हैं प्रेमकुमार मणि By प्रेमकुमार मणि (अटल बिहारी वाजपेयी : 25 दिसंबर 1924 – 16 अगस्त 2018) अंततः अटलबिहारी वाजपेयी नहीं रहे। यही होता है। जो भी आता है एक दिन...

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बहारों फूल बरसाओ मेरा कांवड़िया आया है !

by — हेमंत मालवीय बहारों फूल बरसाओ मेरा कांवड़िया आया है – (२) स्पीकरों डीजे बजवाओ मेरा कांवड़िया आया है – (२) ओ साली जरा टक्कर तो लगा तेरे इन गोरे हाथों से उतर आऐ धर्म नाम गुंडे ,लाठी तलवार लिए हाथों में, सड़क पे कारे पलटाओ मेरा कांवड़िया आया है – (२) नेताओ हर तरफ़ तान दो स्वागत अभिनंदन के पोस्टर बडा भोला दिलबर है, भक्त जायेगा इनपे हग मूत कर ज़रा तुम गांजा दारू पिलवाओ मेरा कांवड़िया आया है – (२) सजाई है बदमाश लफंगों ने अब ये कांवड़ नफरत की इन्हें मालूम था आएगी इक दिन...

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71 बरस बाद भी क्यों लगते हैं, “हमें चाहिए आजादी” के नारे

by — पुण्य प्रसून बाजपेयी आजादी के 71 बरस पूरे होंगे और इस दौर में भी कोई ये कहे , हमें चाहिये आजादी । या फिर कोई पूछे, कितनी है आजादी। या फिर कानून का राज है कि नहीं। या फिर भीडतंत्र ही न्यायिक तंत्र हो जाए। और संविधान की शपथ लेकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदो में बैठी सत्ता कहे भीडतंत्र की जिम्मेदारी हमारी कहा वह तो अलग अलग राज्यों में संविधान की शपथ लेकर चल रही सरकारों की है। यानी संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी भीड़ का ही हिस्सा लगे। संवैधानिक संस्थायें बेमानी लगने लगे और...

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राजकिशोर जी की स्मृति में एक लेख- ‘कथादेश’ के नए अंक में।

by — प्रिय दर्शन जब पत्रकारिता में वैचारिक चमक और साहस दोनों कम होते जा रहे हैं, उस दौर में राजकिशोर का जाना हिंदी के बौद्धिक समाज के लिए एक बड़ा हादसा है। कम से कम चार दशकों से वे भारतीय समाज की विराट उथल-पुथल और सार्वजनिक जीवन में बढ़ते अंधेरे के बीच जैसे एक प्रकाश-स्तंभ का काम कर रहे थे- अपने नियमित लेखन से सबको रास्ता और रोशनी दिखाते हुए। ‘रोशनी यहां है’ कहने को उनकी एक किताब का नाम है, लेकिन यह उनके पूरे लेखन का रूपक भी है। राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी के अलावा वे...

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