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लोकतंत्र को भीड़तंत्र बनाने वालों पर कानून का हंटर कौन चलाएगा?

by – अजीत अंजुम “मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है क्या मिरे हक में फैसला देगा” देश के किसी भी कोने में भीड़तंत्र के शिकार किसी शख्स की तस्वीरें देखता हूं, तो मुझे सुदर्शन फाकिर का ये मशहूर शेर याद आ जाता है. सत्ताधारी दल के कथित बेलगाम समर्थकों के हाथों पिटे आर्यसमाजी नेता स्वामी अग्निवेश अब फरियाद करें भी तो किससे करें? देश और प्रदेश में जिस दल की सरकार है, उसी दल के शोहदों ने झारखंड के पाकुड़ में जय श्रीराम के नारे लगाते हुए स्वामी अग्निवेश को बुरी तरह पीटा है. कपड़े फाड़े, जमीन पर गिराकर...

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निष्पक्ष लोग आज सबसे ज्यादा खतरे में क्यों दिख रहे हैं?

निष्पक्ष लोगों के ऊपर खतरा बढ़ने का मतलब यह भी है कि हमारी राजनीति और समाज पर खतरा बढ़ गया है ‘राइजिंग कश्मीर’ के संपादक शुजात बुखारी की हत्या पर भारत सरकार के एक मंत्री का कहना है कि वे इसलिए मारे गए क्योंकि उन्होंने मध्य मार्ग तलाशने की कोशिश की थी. इस बात और स्पष्ट करके कहा जाए, तो यह कहा जाएगा कि शुजात बुखारी ने विभिन्न परस्पर-विरोधी पक्षों में किसी एक की बात को सही मानने के बजाय तटस्थता से काम लिया था. उन्होंने संवाद और सामंजस्य के जरिए सर्वमान्य समाधान की ओर बढ़ने की हिमायत की...

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राम पुनियानी का लेख: आपातकाल के दिनों से भी ज्यादा आज मुश्किल में है देश और लोकतंत्र!

राम पुनियानी आपातकाल की हिटलर से तुलना अतार्किक आज हम देख रहे हैं कि सत्ताधारी दल और उसके गुर्गे, नागरिक स्वतंत्रताओं और प्रजातांत्रिक अधिकारों के लिए खतरा बन गए हैं। उन्हें फ्रिन्ज एलीमेंटस कहकर नजरअंदाज करने की बात कही जा रही है जबकि सच यह है कि वे सत्ताधारी दल के वैचारिक आका द्वारा किए गए कार्यविभाजन के अंतर्गत यह सब कर रहे हैं। सन् 1975 में आपातकाल लागू होने के 43 वर्ष पूरे होने के अवसर पर बीजेपी ने आपातकाल के विरोध में कई बातें कहीं। अखबारों में आधे पृष्ठ के विज्ञापन जारी किए गए और मोदी ने...

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प्रधानमंत्री जी आप भारत को विश्व गुरु बना रहे हैं या बेवकूफ बना रहे हैं ?

by — रविश कुमार स्वीस नेशनल बैंक ने अपनी सालाना रिपोर्ट में बताया है कि 2017 में उसके यहां जमा भारतीयों का पैसा 50 प्रतिशत बढ़ गया है। नोटबंदी के एक साल बाद यह कमाल हुआ है। ज़रूरी नहीं कि स्विस बैंक में रखा हर पैसा काला ही हो लेकिन काला धन नहीं होगा, यह क्लिन चिट तो मोदी सरकार ही दे सकती है। मोदी सरकार को यह समझदारी की बात तब नहीं सूझी जब ख़ुद नरेंद्र मोदी अपने ट्विटर हैंडल से ट्विट किया करते थे कि स्विस बैंक में जमा काला धन को वापस लाने के लिए वोट...

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महमूद जैसा दूजा न हुआ !

by -वीर विनोद छाबड़ा महमूद साठ और सत्तर के दशक के दौर की फिल्मों की कॉमेडी के बेताज बादशाह थे। पिता मुमताज़ अली प्रसिद्ध डांसर और चरित्र अभिनेता। बाल कलाकार के रूप में महमूद ने कई फिल्मों में काम किया। लेकिन जवान हुए तो फ़िल्में रास नहीं आईं। कई छोटे-मोटे काम किये। निर्माता-निर्देशक प्यारे लाल संतोषी की ड्राईवरी की। भाग्य का खेल है कि संतोषी के पुत्र राजकुमार संतोषी ने महमूद को ‘अंदाज़ अपना में’ (1993) में प्रोड्यूसर की भूमिका में कास्ट किया। बहरहाल, महमूद ने ज़िंदा रहने के लिये मीना कुमारी को टेबल-टेनिस की ट्रेनिंग दी। बाद में...

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