hmtकोई वक्त था जब पूरा देश एचएमटी की घडिय़ों का दीवाना था, हर कोई इन्हीं घडिय़ों से वक्त देखता था। जिसकी कलाई में एचएमटी की घड़ी बंधी होती थी लोग उसे दो बार पूछते थे। शादियां हों या जन्मदिन या कोई पारिवारिक समारोह, लोग शान से एचएमटी की घडिय़ां उपहार में देते थे। इसे सम्मान के साथ टाइम कीपर्स आफ द नेशन भी कहा जाता था। 1961 में भारत सरकार ने इस ब्रांड को लांच किया था ताकि देश में घडिय़ों का निर्माण हो सके। इस कम्पनी ने सबसे पहले जनता घडिय़ां पेश कीं। कम दाम होने के कारण जनता घडिय़ां काफी पसंद की गईं। इसके बाद कम्पनी ने कई ब्रांड पेश किए। पुरुषों के लिए अलग डिजाइन तो महिलाओं के लिए अलग डिजाइन। बाजार में एचएमटी की घडिय़ों का ही सिक्का चलता था। पहले ब्रांड जनता घडिय़ों को जनता का नाम तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने दिया था। बाद में कम्पनी ने गोल्ड प्लेटेड घडिय़ां भी बनाईं और पायलट ब्रांड की घडिय़ां भी मार्किट में पेश कीं।

यह विडम्बना ही रही कि 1999 के बाद जब देश में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों ने जोर पकड़ा तो इस कम्पनी के बुरे दिन आ गए। इसकी बिक्री कम होने लगी। विदेशी कम्पनियों की नई-नई घडिय़ां मार्किट में आने लगीं। कम्पनी का घाटा बढऩे लगा। इस दौर में सबसे बुरी बात यह रही कि देश के सार्वजनिक उपक्रमों को नौकरशाहों ने जमकर लूटा और भ्रष्टाचार के बढऩे तथा कुशल प्रबंध के अभाव में सार्वजनिक उपक्रम रुग्ण होते गए। इन रुग्ण उपक्रमों का उपचार करने की कोशिश नहीं की गई। बीमार उपक्रम भारी घाटे का शिकार होने लगे, सरकार निजीकरण को बढ़ावा देने लगी। उदारवादी नीतियों के जनक यह खुद भी महसूस करते रहे कि निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। निजी क्षेत्र के उद्योगपतियों का धन और रुतबा बढ़ता चला गया, लेकिन जिन कम्पनियों में भारत सरकार का पैसा लगा था उनकी कोई निगरानी नहीं की गई। अंतत: वक्त से हार गई कम्पनी। हालत यह हो गई कि एचएमटी ने पिछले वर्ष 11 करोड़ रुपए का कुल कारोबार किया था, लेकिन घाटा 242 करोड़ रुपए का रहा। कम्पनी में 1,105 कर्मचारी काम करते हैं, जिनमें से 181 एक्जीक्यूटिव हैं। न तो यह कम्पनी प्राइवेट कम्पनियों का मुकाबला कर पाई और न ही विदेशी कम्पनियों का। अब तो विश्व के नामी ब्रांडों की घडिय़ां बाजार में उपलब्ध हैं। एचएमटी के कदम ऐसे ठिठके कि सरकारी संस्थान होने के कारण इसमें फैसले लेने में विलम्ब हुआ।

मार्च 2012 में कम्पनी का सरकारी कर्ज बढ़कर 694 करोड़ हो गया तो सरकार ने एचएमटी वॉचेस और एचएमटी चिनार वॉचेस को बंद करने का फैसला किया। 2006 में कम्पनी की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए एक योजना बनाई गई थी, जिसे बीआरपीएसई की मंजूरी तो मिल गई लेकिन योजना आयोग ने साथ नहीं दिया। फिर लम्बे विचार-विमर्श के बाद 252.70 करोड़ की आर्थिक तथा 1247 करोड़ की गैर आर्थिक मदद का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा गया, लेकिन कम्पनी की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। पिछले वर्ष जब कम्पनी को बंद करने की खबर फैली तो एचएमटी की घडिय़ां दोगुने दाम पर भी बिकीं। कम्पनी बंद होने की खबर से इसकी घडिय़ों की मांग बढ़ गई। कम्पनी के एक अधिकारी का कहना है कि एचएमटी की तुमुकर (कर्नाटक) इकाई को चालू रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह ईकाई अभी तक बची हुई है और यह इकाई अपने चुनींदा ब्रांडों पर ध्यान केन्द्रित करेगी ताकि लोग एचएमटी घडिय़ां खरीद सकें। समय की दौड़ से हारी एचएमटी की घडिय़ों की टिकटिक जारी रहे, वर्तमान भाजपा सरकार को इस गौरवमयी संस्थान को बचाने के भगीरथ प्रयास करने के बारे में सोचना होगा। एचएमटी का दम तोडऩा उदारवादी आर्थिक नीतियों पर कई सवाल खड़े करता रहेगा।