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कोच्चि की आशांका धर्मशाला में सच साबित हो गई। वेस्ट इंडीज के खिलाड़ियों ने आखिरकार अपने क्रिकेट बोर्ड के साथ मौजूदा भुगतान विवाद को लेकर भारत का दौरा बीच में ही छोड़ कर वतन लौटने का फैसला कर लिया। कोच्चि में पहले वनडे से ठीक पहले यह मामला उठा और तभी यह कहा जा रहा था कि वेस्ट इंडीज टीम दौरा रद्द कर सकती है। लेकिन कुछ यकीनदहानी के बाद वेस्ट इंडीज ने कोच्चि वनडे खेला और भारतीय टीम पर शानदार जीत दर्ज की। लेकिन दौरा आगे बढ़ा तो विवाद ने भी और तूल पकड़ा। वेस्ट इंडीज क्रिकेट बोर्ड और प्लेयर्स एसोसिएशन के रवैये से दौरे पर आए खिलाड़ी मायूस तो थे ही. गुस्से में भी थे। धर्मशाला में यह गुस्सा सार्वजनिक हुआ और वेस्ट इंडीज टीम के कप्तान ड्वान ब्रावो ने कहा- हम दौरा छोड़ कर वौट रहे हैं। हमारे खिलाड़ी एकजुट हैं। दरअसल वेतन विवाद का मामला लंबे अरसे से वेस्ट इंडीज क्रिकेट को प्रभावित कर रहा है। इसे सुलझाने की कभी कोई गंभीर पहल नहीं की गई। नतीजा आज सामने है।

वेस्ट इंडीज की टीम ने कोच्चि में हड़ताल के फैसले को टाला जरूर था लेकिन उनका गुस्सा दिल्ली में भी दिखाई पड़ा था। खिलाड़ियों ने वेस्ट इंडीज खिलाड़ी संघ (डब्ल्यूआइपीए) के साथ वेतन विवाद पर विरोध जारी रखा था और फीरोज शाह कोटला मैदान पर भी भारत के खिलाफ दूसरे वनडे में काली पट्टी बांध कर मैदान में उतर कर अपना विरोध जारी रखा था। ड्वेन ब्रावो की अगुआई वाली टीम ने कोच्चि में पहले वनडे से पूर्व पांच मैचों की शृंखला से हटने की धमकी दी थी लेकिन बीसीसीआइ के हस्तक्षेप के बाद खिलाड़ियों में शृंखला में खेलने का फैसला किया है।
वेस्ट इंडीज टीम के सदस्य भुगतान विवाद को लेकर अपने प्लेयर्स एसोसिएशन से खफा थे और उसने क्रिकेट बोर्ड से तुरंत दखल देकर इसे भंग करने की मांग भी की थी क्योंकि उसने खिलाड़ियों के हितों को लेकर चुप्पी साध ली थी। भारत दौरे पर आई वेस्ट इंडीज टीम को नया अनुबंध करना था। इस नए अनुबंध को खिलाड़ी मानने को तैयार नहीं थे और उन्होंने हड़ताल पर जाने की धमकी तक दे डाली थी। इस नए करार के तहत उनकी तनख्वाह में पचहत्तर फीसद तक की कटौती की जा रही थी। जाहिर है कि खिलाड़ी इसके लिए तैयार नहीं हुए। लेकिन बोर्ड इसके लिए अड़ा था और प्लेयर्स एसोसिएशन ने इस मामले को सुलझाने के लिए किसी तरह की कोशिश नहीं की।

प्लेयर्स एसोसिएशन के रवैये से भी वेस्ट इंडीज टीम के खिलाड़ी आहत थे। इन सब को देखते हुए ही ड्वेन ब्रावो ने वेस्ट इंडीज क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष डेव कैमरन को पत्र लिख कर कहा था कि प्लेयर्स एसोसिएशन को भंग किया जाए, क्योंकि टीम का मानना है कि खिलाड़ियों से सलाह लिए बगैर नए अनुबंध पर मंजूरी जताकर उनके साथ छल किया गया है। खिलाड़ियों का कहना है कि इस करार को जिस तरीके से तैयार किया गया और उस पर मंजूरी जताई गई, प्लेयर्स एसोसिएशन को इस्तीफा दे देना चाहिए और वेस्ट इंडीज प्लेयर्स एसोसिएशन को हमारी ओर से बात करने का कोई अधिकार नहीं है।

ब्रावो ने पत्र में कहा था कि जैसा कि आपको पता है कि हमने इस मामले में बहुत संयम दिखाया है। हम कोशिश में थे कि हमारे पूर्व प्रतिनिधि इस मामले का हल निकालें लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। हमें उम्मीद है कि आपके दखल से मामला सुलझ जाएगा। इस बीच हम सलाह लेते रहेंगे। ब्रावो ने साफ कर दिया था कि अगर भारत में उनकी अगुआई में टीम खेल रही है तो इसका यह मतलब नही हैं कि टीम ने उनकी शर्तों को मान लिया है।

यह पहला मौका है जब कोई टीम इस तरह के विवाद के बीच दौरा अधूरा छोड़ कर स्वदेश लौट गई हो। इससे पहले टीमों ने दौरा अधूरा छोड़ा था लेकिन वजहें दूसरीं थीं। कभी आतंकवादी घटनाओं की वजह से या नेताओं के निधन से टीमें दौरा अधूरा छोड़ कर लौटीं हैं। लेकिन पैसे के विवाद को लेकर वेस्ट इंडीज टीम का दौरा अधूरा छोड़ कर लौटना अपने आप में नई नजीर है। लेकिन यह संकट सिर्फ वेस्ट इंडीज का नहीं है, बल्कि यह संकट क्रिकेट का ज्यादा है।

वेस्ट इंडीज के खिलाड़ियों का यह फैसला भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को भी कम हैरान नहीं कर गया होगा। यह तो बोर्ड की धमकी काम आई नहीं तो वेस्ट इंडीज की टीम चौथा वनडे भी खेलने नहीं उतरती। लेकिन किसी भी टीम को धमका कर कोई कितने मैच खिलवा सकता है। इसलिए सवाल सिर्फ वेस्ट इंडीज का नहीं है। इसे किसी एक देश के क्रिकेट से जोड़ कर देखना सही नहीं होगा। क्रिकेट को बेहतर बनाना है और इसका विस्तार करना है तो वेस्ट इंडीज टीम के इस कदम को क्रिकेट से जुड़े अधिकारियों को मिल-बैठ कर इस पर गहन चर्चा करनी होगी। ऐसा नहीं है कि वेतन का विवाद सिर्फ वेस्ट इंडीज में है। क्रिकेट खेलने वाले ज्यादातर देश का क्रिकेट बोर्ड कंगाल है या कंगाली के मुहाने पर खड़ा है। इसलिए अब इस पर गंभीर चर्चा होनी जरूरी है नहीं तो इस तरह की नौबत बार-बार आएगी। वेस्ट इंडीज ही नहीं जिंब्बावे, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका जैसी टीमों के साथ भी इसी तरह की परेशानी कई बार पनपी है। हाल ही में यह खबर आई थी कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) ने हाल में भारत में खेले गए चैंपियंस लीग के दौरान लाहौर लायंस को टूर्नामेंट में शामिल होने के लिए मिली रकम का करीब साठ फीसद हिस्सा ले लिया है जिससे टीम को मिले पांच लाख डालर (करीब तीन करोड़ रुपए) की कमाई से केवल एक लाख डालर ही मिले। इसे लेकर खिलाड़ियों और पीसीबी के बीच विवाद की एक लकीर खिंच गई है और यह पहला मौका नहीं है। इससे पहले भी सियालकोट स्टालियंस और फैसलाबाद वोल्व्स की टीमें चैंपियंस लीग में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं और उनका भी पीसीबी के साथ टूर्नामेंट के पैसे को लेकर विवाद हो चुका है।

वेस्ट इंडीज खिलाड़ियों के इस विद्रोह को भविष्य के संकेत के तौर पर देखना चाहिए। भारत सहित दो तीन देश ही ऐसे हैं जो पैसे को लेकर मालामाल है, बाकी क्रिकेट बोर्ड तो तंगहाल ही है। इसलिए अगर खिलाड़ियों और बोर्ड के बीच पैसों को लेकर तनतनी बराकरार रही तो हर दौरा और हर टूर्नामेंट पर संकट मंडराता रहेगा। समय रहते इस मसले को सुलझा लिया जाए तो ही क्रिकेट के लिए बेहतर है।