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ग़ज़ल की मलिका, महान गायिका बेगम अख्तर की जन्मशती मनाई जा रही है। सरकार ने उनकी याद में सौ रुपये का सिक्का जारी किया है। इसके अलावा भी कई आयोजनों की गहमागहमी है। बेहद साफ आवाज और शुद्ध उर्दू उच्चारण रखने वाली बेगम अख्तरदादरा और ठुमरी की भी साम्राज्ञी थीं। इस अनूठी गायिका के गायन को लेकर तो काफी कुछ लिखा और पढ़ा गया है, मगर उनके जीवन और व्यक्तित्व के बारे में लोग बहुत ज्यादा नहीं जानते हैं। बेगम अख्तर जितनी अनूठी गायिका थीं, उतनी ही अनूठा उनका जीवन और व्यक्तित्व था। आइए उनके इस अलग तरह के जीवन और व्यक्तित्व के कुछ खास, कुछ स्तब्धकारी और कुछ रोचक पहलुओं को साझा कर लेते हैं।

बेगम अख्तर के बचपन का नाम बिब्बी था, छुटपन का अख्तरी, शोहरत पाने के बाद का नाम अख्तरी बाई फैजाबादी और निकाह के बाद का नाम बेगम अख्तर या इश्तियाक अख्तर था।
बिब्बी यानी बेगम अख्तर, फैजाबाद के शादीशुदा वकील असगर हुसैन और एक गायिका और गायिका व तवायफ मुश्तरीबाई के प्रेम के फलस्वरूप सात अक्तूबर 1914 को इस दुनिया में आई थीं। वे अकेली नहीं आईं बल्कि अपने साथ जुड़वां बहन जोहरा को भी लाई थीं।
चार साल की उम्र में दोनों बहनों ने कोई विषाक्त मिठाई खा ली। बिब्बी तो बच गई, मगर जोहरा को नहीं बचाया जा सका। इससे पहले असगर हुसैन ने भी दो बेटियां पैदा होने के बाद दूसरी बेगम के रूप में अपनाई मुश्तरीबाई को छोड़ दिया था। इस प्रकार बिब्बी और मुश्तरी इस दुनिया में संघर्ष करने के लिए अकेली रह गई थीं।
बिब्बी बहुत चुलबुले मिजाज की बच्ची थी। उसका पढ़ने-लिखने में ज्यादा मन नहीं लगता था। एक बार तो शरारत करते हुए उसने एक मास्टर की चोटी काट ली थी। मामूली पढ़ाई के बावजूद उर्दू शायरों और उनकी शायरी के बारे में उसने अच्छी जानकारी हासिल की थी।
सात साल की कच्ची उम्र में ही बिब्बी ने गायिका बनने का फैसला कर लिया था और चंद्राबाई के थिएटर ग्रुप में शामिल हो गई थीं। हालांकि मां मुश्तरी इसके लिए राजी नहीं थी, मगर चाचा ने प्रेरित किया। इसी के साथ संगीत की तालीम का एक लंबा सफ़र शुरू हो गया। कई उस्तादों से सीखा मगर संगीत की तालीम का यह सफर कोई सुखद सफर नहीं था। सात साल की उम्र में बिब्बो के एक उस्ताद ने गायकी की बारीकियां सिखाने के बहाने उनकी पोशाक उठाकर अपना हाथ उनकी जांघ पर सरका दिया। इस प्रसंग के बहाने बताते चलें कि बेगम अख्तर पर किताब लिखने वाली रीता गांगुली ने एक जगह कहा है कि संगीत सीखने वाली करीब 200 लड़कियों से उन्होंने बात की और लगभग सभी ने अपने उस्तादों को लेकर इस प्रकार की शिकायत की।
तेरह साल की उम्र में बिब्बो, अख्तरी बाई हो गई थीं। तब बिहार की एक रियासत के राजा ने उनका कद्रदान बनने के बहाने उनकी अस्मत लूट ली। इस क्रूर हादसे को क्रूर कुदरत ने जिंदगी भर न भूलने का इंतजाम भी कर दिया और अख्तरी को एक बेटी सन्नो या शमीमा की मां बना दिया। दुनिया के डर से इस बेटी को वह अपनी छोटी बहन बताया करती थीं। बाद में दुनिया को पता चला कि यह उनकी बहन नहीं बल्कि बेटी है।
15 साल की उम्र में अख्तरी बाई फैजाबादी के नाम से पहली बार मंच पर उतरीं और जैसे अपनी जिंदगी के सारे दर्द को आवाज के जरिये बाहर निकाल दिया। यह कार्यक्रम बिहार के भूकंप पीड़ितों के लिए चंदा इकट्ठा करने के वास्ते कोलकाता में हुआ था। कार्यक्रम में भारत कोकिला सरोजनी नायडू भी मौजूद थीं। वे अख्तरी बाई के गायन से बहुत प्रभावित हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। बाद में नायडू ने एक खादी की साड़ी भी उन्हें भेंट में भिजवाई। बेगम अख्तर की शिष्या रीता गांगुली पहले प्रदर्शन के वक्त उनकी उम्र 11 साल बताती हैं।
जब अख्तरी बाई गाती थीं तो उनकी आवाज में वो दर्द छलकता था जो सीधा सुनने वाले के दिल में उतर जाता था। उन्हें रूबरू सुनने वालों ने लिखा है कि श्रोताओं में से अनेक की आंखें नम हो जाती थीं।
इस बात को लेकर भी काफी विवाद रहा है कि अख्तरी बाई यानी बेगम अख्तर तवायफ थीं या नहीं। बाकी लोग कुछ भी कहें मगर बेगम अख्तर की 73 साल की शिष्या और उन पर किताब लिख चुकी, उनके साथ रह चुकीं रीता गांगुली ने एक इंटरव्यू में इससे साफ इंकार किया है और साथ में यह भी बताया है कि मुंबई के तवायफ समाज ने अख्तरी बाई की मां मुश्तरी बाई से अपनी बेटी को उन्हें सौंपने का अनुरोध जरूर किया था और बदले में उस जमाने के हिसाब से भारी रकम के रूप में एक लाख रुपये देने का प्रस्ताव रखा था, मगर मुश्तरी और अख्तरीबाई, दोनों ने इस पेशकश को ठुकरा दिया था।
जैसे-जैसे शोहरत बढ़ती गई, अख्तरी बाई प्रशंसकों से तो घिरती गईं, मगर अंदर से अकेली होती गईं। अकेलेपन से वे बहुत घबराती थीं। बचपन की मुश्किल जिंदगी और किशोरावस्था की त्रासदी के कारण स्टेज पर गाने के बाद वे अपने होटल के कमरे में भी जाने से घबराती थीं, क्योंकि अकेला होते ही उन्हें अतीत की पीड़ा घेर लेती थी।
हां, वे अब ज्यादा सतर्क भी हो गई थीं। कई राजा-महाराजा उनका साथ पाने के लिए आगे पीछे घूमते थे, लेकिन वे उन्हें कोई छूट नहीं देती थीं। उन्होंने रामपुर के नवाब रजा अली खां का निकाह प्रस्ताव भी ठुकरा दिया था। उन्होंने अपने अकेलेपन का साथी बनाया सिगरेट और शराब को। गायकी पहले से ही उनकी साथी थी। इन साथियों को वह एक साथ भी रखती थीं या फिर किसी साथी का साथ छूटने पर दूसरे का साथ बढ़ा देती थीं। जैसे शराब उन्होंने तब ज्यादा कर दी जब परदे में रहने के दौरान गायन से उनका साथ छूट गया।
बेगम अख्तर को सिगरेट की तलब इतनी ज्यादा थी कि रमज़ान में वे केवल आठ या नौ रोज़े ही रख पाती थीं। वे चेन स्मोकर थीं। एक बार वे ट्रेन में सफर कर रही थीं। उस दौरान रात में एक स्टेशन पर गाड़ी रुकने पर जब उन्हें प्लेटफ़ॉर्म पर सिगरेट नहीं दिखाई दी तो उन्होंने गार्ड से सिगरेट मंगाने के लिए उसकी लालटेन और झंडा छीन लिया था। तब गार्ड उनके दिए सौ रुपये से सिगरेट का पैकेट लाया और उसी के बाद ट्रेन स्टेशन से रुखसत हुई। सिगरेट के कारण ही बेगम अख्तर ने ‘पाकीज़ा’ फ़िल्म छह बार देखी थी। दरअसल सिगरेट पीने के लिए उन्हें सिनेमाहाल से बाहर जाना पड़ता था और वापस लौटने तक फिल्म आगे बढ़ चुकी होती थी। इस पर वे दोबारा फिल्म देखने जातीं और इस प्रकार पूरी फिल्म वे छह बार में देख सकीं।सिगरेट के कारण ही वह 60 साल की उम्र में लाखों प्रशंसकों को निराश करके इस दुनिया से रुखसत कर गईं।
अख्तरी बाई ने नाटकों के साथ ही कई फिल्मों में भी अभिनय और गायन किया। मगर 1939 में वे नाटकों और फिल्मों की दुनिया को छोड़कर लखनऊ लौट आईं। यहां आकर उन्हें उनका प्यार मिला और 1945 में जब उनकी शौहरत चरम सीमा पर थी तो उन्होंने काकोरी के जमींदार घराने के बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी से घर व खानदान के बंधन तोड़कर परिजनों की नाराजगी के बावजूद शादी कर ली। अब वे अख्तरी बाई फ़ैजाबादी से बेगम अख्तर बन गईं। शादी के बाद वे लखनऊ में हैवलॉक रोड स्थित बंगले में आईं तो पति की इच्छा के चलते गाना बंद कर दिया और पर्दानशीं हो गईं। कई लोगों ने उन पर “सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली” जैसे जुमने भी कसे, मगर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की और पांच साल तक बाहर की दुनिया में झांककर भी नहीं देखा।
गाना छोड़ देने को लेकर अनेक लोग इश्तियाक अहमद अब्बासी को जिम्मेदार ठहराते हैं, मगर बेगम अख्तर की शिष्या रीता गांगुली इससे इत्तेफाक नहीं रखतीं। उनका कहना है कि यह खुद बेगम अख्तर का फैसला था, क्योंकि वह घर बसाना चाहती थीं।
देश के बंटवारे के समय बेगम अख्तर के पति इश्तियाक अहमद अब्बासी पाकिस्तान जाना चाहते थे। वे मुस्लिम लीग के तत्कालीन नेता खलीक उज्जमां के भांजे थे। लेकिन बेगम अख्तर ने उनसे कहा कि वह संगीत और हिंदुस्तान के बिना नहीं जी सकेंगी। अंततः अब्बासी ने भारत में ही रहने का फैसला किया।
गाना छोड़कर शायद बेगम अख्तर ने अपनी जान को छोड़ दिया था, इसीलिए वे बीमार रहने लगीं। उन्हें फेफड़े की बीमारी के साथ ही डिप्रेशन की समस्या भी थी। डिप्रेशन का कारण गायन छोड़ना तो था ही, प्रिय मां की मौत और संतान पैदा करने की कोशिश में बेगम अख्तर के गर्भ का छह बार गिरना भी था। डॉक्टरों ने सलाह दी कि गाने से बीमारी दूर हो सकती है। आखिर पति की रजामंदी के बाद 1949 में वे ऑल इंडिया रेडियो लखनऊ से जुड़कर गायन की दुनिया में वापस आ गईं। उन्होंने न सिर्फ़ संगीत की दुनिया में वापस कदम रखा बल्कि हिंदी फ़िल्मों में गायन के साथ अभिनय भी शुरू कर दिया। नाटकों से उनका रिश्ता 20 के दशक और हिंदी फ़िल्मों से 30 के दशक में ही जुड़ गया था। अदाकारा के रूप में उनकी आखिरी पेशकश थी सत्यजीत रे की बंगाली फ़िल्म ‘जलसा घर’ जिसमें उन्होंने शास्त्रीय गायिका का किरदार निभाया था। उन्होंने करीब 400 रचनाओं को अपना स्वर दिया।
ढेरों पुरस्कार मिलने और असंख्य प्रशंसक हासिल करने के बावजूद बेगम अख्तर में लेशमात्र भी घमंड नहीं था। वे पूरी उम्र मशहूर उस्तादों से सीखती रहीं। उनकी इच्छा थी कि केवल अच्छा ही नहीं गाना है, बल्कि बेहतर से बेहतर भी होते जाना है।
पांच फ़ुट तीन इंच लंबी बेगम अख़्तर हाई हील की चप्पलें पहनने की शौक़ीन थीं। यहां तक कि वे घर में भी ऊँची एड़ी की चप्पलें पहना करती थीं। घर पर उनकी पसंदीदा पोशाक होती थी मर्दों का कुर्ता, लुंगी और उससे मैच करता हुआ दुपट्टा।
बेगम अख्तर को खाना बनाने और लिहाफ़ में गांठे लगाने का भी शौक था।
एक बार बेगम अख्तर एक संगीत सभा में भाग लेने मुंबई गईं। वहीं उन्होंने अचानक तय किया कि वे हज करने मक्का जाएंगी। इसी के साथ वे टिकट खरीदकर वहीं से मक्का चली गईं। जब तक वे मदीना पहुंची, उनके सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे। उन्होंने ज़मीन पर बैठकर नात पढ़ना शुरू कर दिया। लोगों की भीड़ लग गई और लोगों को पता चल गया कि वे कौन हैं। स्थानीय रेडियो स्टेशन ने उन्हें न्योता दिया और रेडियो के लिए उनके नात को रिकॉर्ड किया।
हज से आने के बाद दो साल तक बेगम अख्तर ने शराब को हाथ नहीं लगाया, मगर धीरे-धीरे फिर से पीना शुरू कर दिया।
उर्दू के मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी से बेगम अख़्तर की गहरी दोस्ती थी। बेगम अख्तर के नजदीक रहे लोगों के अनुसार एक बार मज़ाक में उन्होंने जिगर से कह दिया था कि अगर हमारी और आपकी शादी हो जाती तो सोचिए कि हमारे बच्चे कैसे होते। उनमें मेरी आवाज और आपकी शायरी का जोरदार मेल होता। इस पर जिगर मुरादाबादी ने हंसते हुए कहा था कि अगर बच्चों की शक्ल मेरी तरह निकल आती तो क्या होता। उल्लेखनीय है कि जिगर मुरादाबादी बहुत अच्छी शक्ल-सूरत के स्वामी नहीं थे। कुमार गंधर्व, संगीतकार मदनमोहन, गीतकार शकील बदायूंनी, शायर फिराक गोरखपुरी से भी उनकी अच्छी बनती थी।
बेगम अख्तर ने 1961 में पाकिस्तान, 1963 में अफगानिस्तान और 1967 में तत्कालीन सोवियत संघ में भी अपने सुरों का जादू बिखेरा। भारत सरकार ने इस सुर साम्राज्ञी को पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित किया था। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था।
30 अक्तूबर 1974 को बेगम अख्तर अहमदाबाद में मंच पर गा रही थीं। तबीयत खराब थी। अच्छा नहीं गाया जा रहा था। ज्यादा बेहतर की चाह में उन्होंने खुद पर इतना जोर डाला कि उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा, जहां से वे वापस नहीं लौटीं। हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया। लखनऊ के बसंत बाग में उन्हें सुपुर्दे-खाक किया गया। उनकी मां मुश्तरी बाई की कब्र भी उनके बगल में ही थी।
बैरिस्टर अब्बासी और बेगम अख्तर की कोई संतान नहीं हुई। बेगम अख्तर छह बार गर्भवती हुईं मगर हर बार समय से गर्भ गिर गया। 1978 में अब्बासी भी इस दुनिया से चले गए। बेगम अख्तर अपना सब कुछ रिश्तेदार शमीम बानो के पास छोड़ गई थीं। लोगों के साथ ही उनके रिश्तेदारों ने भी बेगम अख्तर को जल्द ही भुला दिया। उनकी यादों को पुख्ता करने के कोई इंतजाम नहीं किए गए। उनकी कोठी और उनकी मजार की बदहाली के समाचार बीच-बीच में मिलते रहे। उम्मीद की जानी चाहिए कि जन्मशती के बहाने इस महान गायिका को इस प्रकार से श्रद्धांजलि दी जाएगी कि आगे आने वाली पीढ़ियां उन्हें भूल नहीं पाएंगी।