modi

मोदी विरोधियों में इन दिनों बड़ा ही अजीब तरह का, बेमतलब सा खौफ और आशंकाएं हैं। कोई मोदी के हिटलर बनने की आशंका जता रहा है तो कोई कयामत आने का अंदेशा जता रहा है। कोई कह रहा है ऐसा हो जाएगा, वैसा हो जाएगा। इसके चलते विरोधी, मोदी और भाजपा की जीत का सही तरह से विश्लेषण भी नहीं कर पा रहे हैं। अंध विरोध के चलते वे देश के लोकतंत्र और यहां की परंपराओं को भी भूल गए हैं। इस देश के सहिष्णु चरित्र को भी वे भूल गए हैं। रोचक बात यह है कि मोदी या भाजपा की जीत का आकलन सांप्रदायिक आधार पर जिस तरह से विरोधी कर रहे हैं, लगभग वैसा ही आकलन करने की कोशिश आरएसएस और भाजपा का भी एक हिस्सा कर रहा है।

आइए कुछ ऐसे तथ्यों पर नजर डालते हैं, जिनके जरिये यह पता लगेगा कि मोदी विरोधी क्या गलती कर रहे हैं और जिनके आधार पर मैं कह सकता हूं कि हमें, आपको या किसी को भी मोदी से बिल्कुल भी नहीं डरना चाहिए।

– जरा ठंडे दिमाग से सोचिए कि यदि लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट देने वाले सभी मतदाता आरएसएस या भाजपा के कार्यकर्ता होते याउनके समर्थक होते तो भाजपा इतने सालों तक सत्ता से दूर रहती और कांग्रेस इतने दिनों तक इस देश पर राज करती?

– आपने कहावत सुनी होगी- बेपैंदी का लोटा। यह कहावत किसी व्यक्तित का नकारात्मक लक्षण बताती है, मगर यहां मैं इसे सकारात्मक रूप में लेने कीगुस्ताखी करना चाहूंगा। राजनीतिक सत्ता में जब भी बदलाव होता है तो उसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका वे मतदाता निभाते हैं जो बेपैंदी के लोटे होते हैं। जीहां, कम्युनिष्ट मानसिकता वाला मतदाता कम्युनिस्ट पार्टी को वोट देगा, संघी मतदाता भाजपा को वोट देगा, कांग्रेसी या बसपाई मतदाता भी ऐसा हीव्यवहार करेगा तो फिर अंतर कौन पैदा करेगा? अंतर यही बेपैंदी का लोटा पैदा करता है और आपको इतना तो समझना ही होगा कि धातु का लोटा बेशककिधर भी लुढ़क जाए मगर आदमी की देह वाला लोटा यूं ही किसी दल की तरफ नहीं लुढ़कता है। वास्तव में लोकसभा चुनाव में मतदान करते समय इसतरह के असंख्य मतदाताओं के दिमाग में केवल कांग्रेस की कमजोर और भ्रष्ट सरकार थी और अकर्मण्यता की एक गहरी खाई को तेजी से पाटने को उत्सुकदिख रहे मोदी थे। मोदी का दूर-दूर तक कहीं कोई विकल्प दिखाई नहीं दे रहा था।

– मेरा मानना है कि यदि इस देश के बहुसंख्यक लोग कांग्रेसी या भाजपाई या कम्युनिष्ट या कट्टरवादी हिंदू या कट्टरवादी मुस्लिम हो जाते तो यह देश कब का तानाशाही में बदल जाता या टूट जाता। यहां समय-समय पर अच्छाई की ओर लुढ़कने वाले बेपैंदी के लोटे ही बहुसंख्यक हैं और ये इस देश के लिए बहुत जरूरी हैं। मैं स्थानीय स्तर यानी मेरठ की ही बात करूं तो ऐसे दर्जनों लोगों को जानता हूं, जिनका भाजपा से कोई संबंध नहींहै। भाजपा के पार्षद तक का चेहरा उन्होंने नहीं देखा। मेरठ में मोदी की रैली हुई तो वे वहां झांके तक नहीं, मगर उन्होंने फिर भी मोदी के नाम पर वोट दिया, क्योंकि उन्हें उस वक्त वे सही विकल्प लगे। इससे पहले ये लोग कांग्रेस को भी वोट देते रहे हैं और विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव को भी वोट दिया है। आगे भी ये लोग अपनी समझ और परिस्थिति के हिसाब से किसी को भी वोट दे सकते हैं। इनका वोट मोदी के पास बंधक नहीं बना है।

– मोदी विरोधी कह सकते हैं कि नहीं, लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट देने वाले सारे वोटर कट्टर सोच वाले हो गए। आरएसएस और भाजपा के एकहिस्से ने भी ऐसा ही सोचा। यदि ऐसा ही था तो बताइए कि उत्तर प्रदेश के उप चुनाव में योगी आदित्यनाथ और भाजपा की हवा क्यों निकल गई ? यह तोआप जानते ही हैं कि इस उप चुनाव में भाजपा ने न तो विकास की बात प्रमुखता से की और न ही अखिलेश सरकार की नाकामियों को प्रमुखता से उठाया।बस “लव जेहाद” की रट लगा दी। मतदाता ने उनकी बोलती बंद कर दी।

– मोदी विरोधी (जी हां, गौर चाहूंगा मोदी समर्थक नहीं) इस तरह से व्यवहार कर रहे हैं जैसे इस देश ने भाजपा को पूरे जीवन के लिए चुन लिया है। अब आगे कभी चुनाव नहीं होगा। भारत बस अगले पांच साल तक ही रहेगा। क्या भारत इतना कमजोर है ? क्या यहां का लोकतंत्र इतना कमजोर है ?

– मोदी विरोधी कह रहे हैं कि वह बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं, सबके विकास की बात कर रहे हैं। अविश्वसनीय बातें कह रहे हैं। झूठ बोल रहे हैं, सपने दिखा रहे हैं। यह करेंगे कुछ नहीं। आप बताइए कि अगर यह आदमी कुछ भी नहीं कर पाएगा और अपने वादों को पूरा करने में विफल रहेगा तो किसका फायदा होगा और किसका नुकसान होगा? यह तो मोदी विरोधियों के लिए फायदे का ही सौदा है कि मोदी बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं, जिनका विरोधियों के अनुसार पूरा होना संभव नहीं है। इसका मतलब साफ है कि यदि मोदी अपना कहा नहीं कर पाए तो अगली बार वे और उनका दल सत्ता में नहीं आएगा। फिर डर की कोई वजह क्यों होनी चाहिए ?

– यह हकीकत है कि इस देश के लोगों में बहुत कम धैर्य है। वे तुरंत नतीजा चाहते हैं। तभी तो वे तीन-चार महीने में ही मोदी से ऐसे जवाब मांगने लगे हैं, जैसे मोदी को शासन करते हुए कई साल गुजर गए हों। मोदी ने तीन शब्दों के रूप में बहुत बड़ा दांव खेला है- अच्छे दिन आएंगे। अगर आप ठंडे दिमाग से विचार करें तो ये शब्द और ये वाक्य बोलने में बहुत आसान हैं, मगर असर में बहुत ही भारीभरकरम हैं। हिमालय से भी भारी। अच्छे दिन के लिए जरा सा कुछ करने से काम नहीं चलेगा। मोदी को बहुत-बहुत ज्यादा करना होगा। लगभग असंभव को संभव करना होगा। नहीं होगा तो वह उम्मीद के इस पहाड़ के नीचे स्वतः ही दब जाएंगे। तब फिर विरोधियों को मोदी से क्यों डरना चाहिए ?

– हम और आप देख ही चुके हैं कि इस देश के मतदाता एक अच्छी-भली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का क्या हश्र कर चुके हैं। कारण केवल वाजपेयी का एक नारा था- शाइनिंग इंडिया। वाजपेयी की सरकार ने शोर मचाकर कहा, लोगों को हजम नहीं हुआ। गलत बात हजम होती भी नहीं है। वे इंडिया विल शाइनिंग कहते तो एक बार को चल जाता, मगर कुछ लोगों की शाइनिंग को वाजपेयी सरकार ने सब पर थोप दिया और लोगों ने उन्हें सत्ता से बाहर फेंक दिया। यानी जो ज्यादा चिल्लाएगा तो उसे शुरुआती फायदा तो होगा, मगर यदि उसका चिल्लाना वाजिब नहीं पाया गया तो उसे उल्टा नुकसान होना तय है। फिर मोदी से किसी को क्यों डरना चाहिए?

– अब बात सांप्रदायिकता की। मोदी विरोधियों का कहना है कि मोदी मुस्लिम विरोधी हैं, आगे-आगे हिंदू कट्टरपन हावी होगा, मोदी अपना छिपा एजेंडा लागू करेंगे और मुस्लिमों की मुश्किलें बढ़ेंगी। ध्यान रहे कि इस बात को कहने से पहले मोदी विरोधी विश्लेषक स्पष्ट रूप से यह भी कहते हैं कि मोदी, मनमोहन सिहं द्वारा बोई गई बाजारवाद की फसल को काट रहे हैं। वे कहते हैं कि मोदी इसलिए उभरे हैं क्योंकि वे मुक्त बाजार के हिमायतियों और कॉरपोरेट के अलावा उन असंख्य उपभोक्तावादी युवाओं को पसंद आ रहे हैं जो उदारवाद के बाद पहली बार वोटर बने थे या जो उदारवाद लागू होने के समय पैदा होकर मोदी के उभार के समय वोटर बने हैं। अब आप ही बताएं कि क्या यह सुविधाभोगी, फेसबुकी, हिंदू-मुस्लिम के पचड़े में न पड़ने वाला, पैसे को अहमियत देने वाला, किसी भी धर्म के व्यक्ति से प्रेम की पींगे बढ़ाने को उत्सुक युवा अपनी शांति में कोई खलल चाहेगा? क्या बाजार और कॉरपोरेट समाज में ऐसा संघर्ष चाहेगा जो बाजार को ही ले डूबे? हरगिज नहीं, इसलिए यह तय मानिए कि जिस दिन मोदी की गाड़ी विकास की पटरी से उतरकर किसी और पटरी पर चढ़ने की कोशिश करेगी, उस दिन यह गाड़ी सत्ता की पटरी पर से भी उतर जाएगी।

– मोदी विरोधियों की चिंता यह भी है कि लोकसभा में विपक्ष मजबूत नहीं है। ऐसे में मोदी अपनी मनमानी करेंगे। आप अतीत में झांककर देखिए कि कितनी बार विपक्ष ने सरकार के खिलाफ पुरजोर आंदोलन छेड़ा है? जो कुछ किया है जनता ने ही किया है। पिछली बार का ही हाल देख लीजिए। क्या विपक्ष में बैठी भाजपा ने कोई बड़ा आंदोलन किया? जो कुछ किया वो अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों की अगुआई में जनता ने ही किया। अभी भी कालेधन को लेकर मोदी सरकारी की हीलाहवाली पर अन्ना की चेतावनी आ गई है। यानी गलत काम पर सरकार को हिलाने के लिए विपक्षी दल के संख्या बल से ज्यादा अंतर नहीं पड़ता। विपक्षी दल को तो सरकार साध लेती है, जनता को ही साधना मुश्किल होता है। जनता सब देखती और जानती है। इसीलिए कमजोर विपक्ष के कारण भी मोदी से मत डरिये।

– इन सब कारणों से स्पष्ट हो जाता है कि या तो अच्छे दिन आएंगे, नहीं तो मोदी जाएंगे। इस तरह मोदी विरोधियों के तो दोनों हाथों में लड्डू हैं। अच्छे दिन आए तो भी उनका कुछ फायदा ही हो जाएगा और मोदी सत्ता से दूर गए तो भी उनका ही फायदा है। दोनों ही स्थितियों में मोदी विरोधी घाटे में नहीं रहेंगे। इसलिए मोदी से बिल्कुल मत डरिये।