modi

तेईस साल पहले बीज काँग्रेस ने बोया था, फल आज मोदी खा रहे हैं! खेती बाज़ार की हुई, फ़सल राजनीति की काटी गयी! जय बाज़ारवाद! जय उपभोक्तावाद! तेईस साल पहले जो पहली बार वोटर बने थे, वह बाज़ार के दौर में गृहस्थ हुए और तेईस साल बाद अभी जो पहली बार वोटर बने हैं, वह बाज़ार के दौर में जवान हुए! मोदी और उनके मैनेजरों ने बख़ूबी इस बात को पकड़ा! बाज़ार में पले-बढ़े, जिये, जवान हुए वोटर को क्या चीज़ कैसे बेची जा सकती है? कैसे नारे, कैसे पोस्टर, कैसे भाषण, कैसे विज्ञापन, कैसी चाल, कैसी ढाल, कैसी बोली, कैसी शैली, कैसी स्टाइल, कैसी प्रोफ़ाइल! नतीजा सामने है! राजनीति की एक बिलकुल नयी क़िस्म, जो बाज़ार के नियमों से बनती है और चलती है! ब्राँडिंग, पैकेजिंग, मार्केटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन! यहाँ नीति और विचारधारा अकसर नेपत्थ्य में रहती है, रणनीति और ‘परसेप्शन’ से जीत-हार तय होती है!

इसलिए इस विधानसभा चुनाव में भी ठीक-ठीक वही हुआ, जो सबने लोकसभा चुनाव में देखा था! मोदी और उनकी टीम ने यह चुनाव भी ठीक वैसे ही लड़ा, जैसे उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा था! वैसी ही धुँआधार रैलियाँ, वैसा ही आक्रामक प्रहार, वैसा ही ‘परसेप्शन’ का युद्ध, वैसा ही प्रचार, सब कुछ इतना तूफ़ानी, ऐसा सुनामी जैसा कि दूसरा कोई दूर-दूर तक दिख ही नहीं पाये! आज से पहले कब किस प्रधानमंत्री ने विधानसभा चुनावों में अपने आपको इस तरह झोंका है! दोनों राज्यों में मोदी ने 38 रैलियाँ कीं. लोग आलोचना करते रहे कि सीमा पर पाकिस्तान की लगातार गोलाबारी और हुदहुद के ख़तरों से बेफ़िक्र प्रधानमंत्री दिल्ली छोड़ कर दिन-रात चुनाव-प्रचार में लगे हुए हैं! देश पर संकट है और प्रधानमंत्री विधानसभा चुनाव जैसी छोटी चीज़ में उलझे हुए हैं! पर मोदी को ऐसी बातों की फ़िक्र कहाँ कि सामान्य स्थिति में भी किसी प्रधानमंत्री ने कभी अपने आपको राज्यों के चुनाव में ऐसे नही उलझाया! अटल बिहारी वाजपेयी ने भी नहीं, जो बड़े अच्छे वक्ता थे!

ख़ूबसूरत पैकेजिंग

और फिर नारा! पिछली बार नारा चला–अबकी बार, मोदी सरकार. इस बार नारा चुना– चलो मोदी के साथ! सटीक, बिलकुल निशाने पर, सन्देश साफ़ कि मोदी के साथ चलोगे तो मौज करोगे! मार्केटिंग विकास की हुई तो छत्रपति शिवाजी को अपना बना कर शिव सेना के सबसे बड़े प्रतीक पर क़ब्ज़ा भी जमा लिया, साथ ही अपनी हिन्दुत्व की ब्रांडिंग भी चुपके से स्थापित कर दी. विकास, तरक़्क़ी, गवर्नेन्स और कर्मठ नेतृत्व की पैकेजिंग के पीछे राजनीति के सारे मसालों को, सारी तिकड़मों को, सारी जोड़-तोड़ को बिना हिचके, बिना झिझके वैसे ही चलाया गया, जैसा कि राजनीति में आम रिवाज है! और बात वोट की है तो खाप पंचायतों और डेरा सच्चा सौदा से भी परहेज़ क्यों? और विज्ञापन युद्ध का कमाल यह कि इधर पृथ्वीराज चव्हाण का इंटरव्यू एक अख़बार में छपा और उधर आनन-फ़ानन में बीजेपी मैनेजरों ने अपनी विज्ञापन एजेन्सी को काम पर लगाया और धड़ाधड़ विज्ञापन तैयार हो कर छप गया, बँट गया कि देखिए कैसे चव्हाण जी ने मान लिया कि वह भ्रष्ट नेताओं के ख़िलाफ़ क्यों कोई कार्रवाई नहीं कर पाये!

यानी कुल मिला कर मोदी ने एक बार फिर साफ़ कर दिया है कि वह राजनीति की घिसी-पिटी राह पर न तो चले हैं और न भविष्य में चलेंगे! आज के वोटर को बाज़ार के फ़ंडों से ही जीता जा सकता है! विचारधारा उसके काम की नहीं! विचारधारा वह जीता नहीं! वह उपभोक्ता है. बाज़ार में खड़ा है! जो ‘प्रोडक्ट’ देखने में आकर्षक लगेगा, जिसमें ज़्यादा ‘फ़ीचर्स’ होंगे, जिसमें ज़्यादा ‘वैल्यू फ़ार मनी’ दिखायी दे, जिसमें कोई लुभावनी ‘यूएसपी’ हो, जो सबसे ज़्यादा काम का लगे, जिसके लिए बाज़ार में ‘क्रेज़’ हो, जो थोड़ा ‘ट्रेंडी’ हो और जो आकर्षक ‘डिस्काउंट’ पर या किसी ‘एक ख़रीदो, एक पाओ’ जैसे ‘आॅफ़र’ के साथ हो, उसे वह लपक कर ख़रीदता है! ‘ब्रांड मोदी’ ने ऐसे ही फंडों से ख़ूबसूरती से अपनी पैकेजिंग की है और दूसरी तरफ़ वह अपने मुख्य प्रतिद्वन्द्वियों के ख़िलाफ़ बेहद ‘निगेटिव परसेप्शन’ भी चतुराई से खड़ा कर देने में माहिर हैं. इसलिए आगे की राजनीति अब जो भी दल अपने अब तक के आलसी और घिसे-पिटे तरीक़ों से करते आयेंगे, वह मुँह की खाते रहेंगे!

गठबन्धन की राजनीति नहीं!

इन विधानसभा चुनावों के बाद अब एक और बात पक्की है. वह यह कि मोदी अब गठबन्धन की राजनीति शायद नहीं ही करना चाहें. और अगर करेंगे भी तो उनकी रणनीति होगी कि वह गठबन्धन छोटी-छोटी पार्टियों से हो, जो पिछलग्गू की तरह उनके साथ चलते रहने को मजबूर हों! जैसे बिहार और महाराष्ट्र में कई छोटी पार्टियों का बीजेपी से गठबन्धन है.

वैसे चुनावी नतीजे अभी आये नहीं हैं, लेकिन इस बात में अब कोई सन्देह नहीं रह गया है कि दोनों राज्यों में बीजेपी के नेतृत्व में ही सरकार बनेगी. ज़्यादा उम्मीद यही की जा रही है कि बीजेपी शायद अकेले अपने बूते ही सरकार बनाने की स्थिति में आ जायेगी. अगर ऐसा न भी हुआ तो उसे थोड़े ही समर्थन की ज़रूरत पड़ेगी. बहरहाल नतीजे जो भी हों, यह बात तो तय है कि दोनों राज्यों में काँग्रेस की लुटिया डूबी हुई है और मोदी ‘काँग्रेसमुक्त भारत’ के अपने लक्ष्य के और क़रीब आ गये हैं! इसलिए इन चुनावों के बाद मोदी की रणनीति पूरे देश में बीजेपी का ‘एकछत्र’ राज्य स्थापित करने की होगी! जैसे कभी काँग्रेस पूरे देश पर राज किया करती थी, ठीक वैसे ही वह बीजेपी को बनाना चाहेंगे.

देश के नक्शे से काँग्रेस ग़ायब!

और मोदी ऐसा क्यों न सोचें? काँग्रेस को देश के नक्शे पर देखिए! देश के भूगोल में वह बीच में कहीं नज़र नहीं आती और राजनीति में वह इतिहास बन जाने की ओर उन्मुख है. वह देश के दूरदराज़ किनारों पर ही नज़र आती है. दक्षिण में केरल और कर्नाटक, उत्तर में हिमाचल और उत्तराखंड और फिर उत्तर-पूर्व में असम समेत पाँच छोटे-छोटे राज्यों में उसकी सरकारें बची हैं! इनमें से भी कई राज्यों में वह लोकसभा चुनाव में बिलकुल साफ़ हो चुकी है. पार्टी ने अब तक अपने आपको दुबारा खड़ा करने की कोई कोशिश नहीं की है. कम से कम महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव उसने जिस अनमने तरीक़े से लड़े, उससे लगता नहीं कि काँग्रेस को वर्तमान संकट से उबरने का कोई रास्ता सूझ रहा है. इन विधानसभा चुनाव में भी दोनों राज्यों में पार्टी की बुरी हार तय है. इसके बाद काँग्रेस आगे क्या राह पकड़ेगी, कह नहीं सकते!

उधर, बीजेपी बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में पूरा ज़ोर लगा रही है. दक्षिण में वह तमिलनाडु पर ध्यान लगा रही है. सज़ा के बाद जयललिता के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग जाने और करुणानिधि की बढ़ती उम्र और उनके परिवार में चल रही सिर फुटव्वल के कारण बीजेपी को तमिलनाडु में पैर जमा पाना अपेक्षाकृत आसान दिख रहा है. काँग्रेस की लुँजपुँज हालत के कारण वह उड़ीसा जैसे उन राज्यों में अपने आपको बड़ी भूमिका में लाने की रणनीति पर काम करेगी, जहाँ अभी वह गिनती में नहीं है. असम समेत उत्तर-पूर्व के राज्यों में वह लगातार अपनी स्थिति मज़बूत करती जा रही है.

कुल मिला कर जो तस्वीर उभर रही है, उसमें बीजेपी एक आक्रामक योजना के साथ आगे बढ़ती नज़र आती है. उसने वोटरों की नयी पीढ़ी के लिए नये मुहावरे गढ़े हैं और राजनीति को वह एक ‘प्रोडक्ट’ की तरह देखती है. उसने बड़ी चतुराई से दूसरे दलों के नायकों को हथिया लेने की मुहिम शुरू की है. गाँधी के ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ का इस्तेमाल वह कभी करेगी, इसमें सन्देह है, लेकिन गाँधी के ‘स्वच्छता मिशन’ को उसने बड़े सयाने ढंग से लपक लिया. नेहरू और इन्दिरा को भुनाने की तैयारी में वह है ही. सर्वोदय वाले जेपी और समाजवादी लोहिया भी उसके अपने हो चुके हैं! टैगोर भी उसके प्रेरणास्रोत बन चुके हैं. इसलिए बीजेपी अब अपनी पैकेजिंग राष्ट्रव्यापी सर्वस्वीकार्यता और सबका विकास, सबका साथ के आवरण से करना चाहती है, क्योंकि देश भर में अपने आपको आकर्षक और ग्राह्य बनाये रहने के लिए यह ज़रूरी है. पैकेजिंग के पीछे प्रोडक्ट भले ही संघ के ‘हिन्दू राष्ट्र’ के एजेंडे का हो, जब उसका समय आयेगा, तब देखा जायेगा! (वैसे संघ प्रमुख मोहन भागवत बाक़ायदा इसका एलान कर चुके हैं कि भारत अगले तीस वर्षों में ‘हिन्दू राष्ट्र’ बन जायेगा). कुछ साल पहले जब एक लोकप्रिय कोल्ड ड्रिंक कम्पनी भारत आयी तो उसने यहाँ अपने मिक्सचर को कुछ मीठा कर दिया, क्योंकि भारतीयों को मिठास ज़्यादा भाती है. बीजेपी भी बाज़ार के इसी फ़ंडे पर चल रही है!