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कभी अमरीका में शिक्षाविद् रहे अशरफ गनी ने अफगानिस्तान के नए राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ग्रहण करते ही 13 वर्ष के युद्ध के बाद तालिबान उग्रवादियों से शांति वार्ता में शामिल होने का आह्वान किया है। सन् 2009 में अमरीकी नेतृत्व में तालिबान को सत्ता से उखाड़ फैंकने और हामिद करजई के शासन के बाद देश की सत्ता का पहली बार लोकतांत्रिक हस्तांतरण हुआ है। राष्ट्रपति चुनावों के दौरान धांधली के आरोपों के कारण उठे विवाद के 6 माह बाद अमरीका की मध्यस्थता में हुए समझौते के तहत अशरफ गनी राष्ट्रपति बन गए जबकि अब्दुल्ला-अब्दुल्ला प्रधानमंत्री के बराबर अधिकार रखने वाला एक कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करेंगे।

अफगानिस्तान में नई गठबंधन सरकार के गठन का भारत सहित अनेक देशों ने स्वागत किया है। यद्यपि राष्ट्रीय एकता की सरकार बनने के साथ अफगानिस्तान में एक नए दौर की शुरूआत होगी लेकिन नए प्रशासन के समक्ष गम्भीर चुनौतियां भी हैं। वर्षों से अमरीकी सेना की उपस्थिति और सैन्य कार्रवाई के बावजूद तालिबान का आतंक खत्म नहीं हुआ है। अमरीका की अगुवाई में नाटो का आतंकवाद के खिलाफ अभियान तीन माह में खत्म हो जाएगा लेकिन राष्ट्रीय स्थिरता के लिए तालिबान अब भी खतरा बना हुआ है। हाल ही के दिनों में तालिबान ने लगातार हमले किए हैं।

अफगानिस्तान में अमरीका को वांछित सफलता न मिलने के पीछे अगर सबसे बड़ा जिम्मेदार है तो वह पाकिस्तान है। पाकिस्तान नहीं चाहता कि वहां अमरीका का वर्चस्व कायम हो। वह भारत की अफगानिस्तान में मौजूदगी भी नहीं चाहता। भारत कई वर्षों के युद्ध में जर्जर हो चुके अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में लगा हुआ है और अनेक परियोजनाओं में उसने काफी निवेश कर रखा है। पाक सेना और आईएसआई की साजिशों के चलते काबुल में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर आतंकी हमले भी किए गए और वहां काम कर रहे भारतीयों को भी निशाना बनाया गया। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अफगानिस्तान में मौजूद अन्तर्राष्ट्रीय सेना इस साल के अंत तक वापस लौट जाएगी। अब तक आधुनिक हथियारों से लैस लगभग डेढ़ लाख नाटो सैनिक तालिबान से लड़ रहे थे, लेकिन इनकी वापसी के बाद साढ़े तीन लाख अफगान सेना के लिए तालिबान का सामना करना मुश्किल होगा क्योंकि उनके पास न तो आधुनिक हथियार हैं और न ही कोई खास प्रशिक्षण। नए राष्ट्रपति के लिए आम नागरिकों को सुरक्षा देना मुश्किल काम होगा। पूरी स्थिति का आकलन करने के बाद ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमरीकी राष्ट्रपति से कहा है कि अफगानिस्तान से नाटो सैनिकों की वापसी अत्यंत धीमी गति से हो ताकि जरूरत पडऩे पर तालिबान का मुकाबला किया जा सके। पहले तो पाक खुफिया एजैंसी आईएसआई और उसके रक्षा प्रतिष्ठानों ने तालिबान के लड़ाकों का इस्तेमाल अपने नापाक इरादे पूरे करने के लिए किया, जब उनकी छाया पाक पर पडऩे लगी तो अब पाक सेना ने पाक-अफगान सीमावर्ती इलाकों से तालिबान के लड़ाकों को अफगानिस्तान की सीमा में खदेड़ दिया।

6 माह से चले आ रहे राजनीतिक गतिरोध के कारण अफगानिस्तान का कामकाज पूरी तरह ठप्प पड़ा हुआ है। विश्व बैंक के अर्थशास्त्री होने के नाते राष्ट्रपति गनी आर्थिक हालात सुधारने की क्षमता तो रखते हैं लेकिन इस राह में सबसे बड़ी रुकावट व्यापक भ्रष्टाचार है। साधनहीन सरकार क्या कर सकेगी, यह कहना कठिन है। यद्यपि राष्ट्रपति ने तालिबान से शांति वार्ता की अपील की है लेकिन शांति वार्ता में सफलता हासिल करना आसान नहीं है। करजई भी तालिबान के साथ शांति वार्ता कर रहे थे लेकिन पिछले वर्ष शुरूआती प्रयास उस समय खत्म हो गए जब कतर में खोले गए तालिबान के एक कार्यालय को निर्वासन की सरकार के लिए दूतावास के तौर पर पेश किया गया। सच तो यह है कि अशरफ गनी और अब्दुल्ला अब्दुल्ला में कई मामलों पर गहरे मतभेद हैं। गठबंधन बरकरार रखना सबसे बड़ी चुनौती है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि सत्ता में भागीदारी के समझौते से इस देश में एकता और स्थायित्व का अवसर मौजूद हुआ है परन्तु जनता को इसमें महत्वपूर्ण योगदान देना होगा, तभी वहां शांति स्थापित हो सकती है। अफगानिस्तान जातीय और कबीलों में बंटा समूह है। इनमें कड़ी प्रतिद्वंद्विता है और इनके बीच खूनी संघर्ष चलता रहता है। पाकिस्तान के हस्तक्षेप का खतरा नाटो सैनिकों की वापसी के बाद बढ़ सकता है। पाकिस्तान अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए हर साजिश करेगा। अमरीका की अधिकांश सेना की वापसी के बाद भी आंशिक रूप से अमरीकी सैनिक वहां बने रहेंगे, इस संबंध में समझौता काफी महत्वपूर्ण है। देखना है अफगानिस्तान कौन सी राह पकड़ता है।