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हमारे देश के नेतागण अक्सर अपने विरोधियों को मात देने के लिए तमाम तरह के पैंतरे अपनाते रहते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि किसी भी तरह से उनकी नाक ऊंची रहे और उनके विरोधियों को मुंह की खानी पड़े। इन प्रयासों के बीच में वे भूल जाते हैं कि विरोधियों से ज्यादा खतरा तो उन्हें अपनों से ही होता है। अपनों में भी सबसे ज्यादा खतरा अपनी औलादों से होता है। इस लापरवाही का नतीजा यह होता है कि अपने पिताओं को उल्टे-सीधे काम करते देखते बड़ी हुईं या सब कुछ हासिल कर पाने की छूट पाती रहीं नेताओं की औलादें अचानक कुछ ऐसा कर डालती हैं कि नेताओं की सारी कथित प्रतिष्ठा एक क्षण में मिट्टी में मिल जाती है।

ऐसा नहीं है कि नेताओं को अपने बेटों के स्वभाव का अंदाजा नहीं होता है। वास्तव में तो राज्य और जिला स्तर के ज्यादातर नेताओं की यही इच्छा होती है कि उनका बेटा बिल्कुल दबंग बनकर उभरे, उसे राजनीति की सभी तिकड़में आनी चाहिए। उन्हें दुराचार, भ्रष्टाचार से भी परहेज नहीं होता, क्योंकि उनमें से कई स्वयं जवानी से अब तक ये काम करते आए हैं। उन्हें तो बस यही कामना होती है कि बेटा सारे छंद-फंद सीख जाए और वह सब कुछ करे, लेकिन बस पकड़ा न जाए। लेकिन जब ऐसा नहीं हो पाता तो वे आसमान से जमीन पर आ गिरते हैं।

हालांकि राष्ट्रीय स्तर के अनेक नेता अपनी औलादों को लेकर कुछ संजीदा रहते हैं मगर पिछले दिनों रेलमंत्री सदानंद गौड़ा के बेटे कार्तिक गौड़ा पर जब बेंगलुरू में एक अभिनेत्री ने रेप और धोखाधाड़ी का आरोप लगाया और उसकी शिकायत पर पुलिस ने कार्तिक के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया तो राष्ट्रीय और स्थानीय नेताओं का स्तर एक ही नजर आया। बुलेट ट्रेन दौड़ाने की योजना में लगे सदानंद गौड़ा के लिए ऐसा महसूस हुआ मानो किसी ने उन्हें बुलेट ट्रेन से मालगाड़ी की छत पर फेंक दिया हो। हालांकि बेटे की करतूत से उनका कोई लेना-देना नहीं था और इसीलिए उनकी गद्दी पर भी कोई आंच नहीं आई, मगर प्रतिष्ठा का क्या कहें, वह तो मिट्टी में मिल ही गई।

नेता पुत्रों के बेलगाम होेने के किस्सों की भरमार है। इस मामले में कोई पार्टी अछूती नहीं है। बहुत ज्यादा पीछे न जाएं तो भी इसी साल जुलाई में यूपी के अंबेडकरनगर जिले में समाजवादी पार्टी के विधायक भीम प्रसाद सोनकर के बेटे राजेश सोनकर पर थाने में घुसकर थानेदार को चप्पल फेंककर मारने का आरोप लगा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि एसओ ने एक जमीन विवाद में विधायक की पैरवी नहीं सुनी। विधायक ने अपने बेटे का बचाव करते हुए पूरे मामले में पुलिस को ही दोषी ठहरा दिया।

इसी साल तीन सितंबर को राजस्थान के दो भाजपा नेताओं जोगराज सिंह और रूप सिंह के बेटे एक वीडियो में बाड़मेर स्थित बीएसएफ के फायरिंग कैंप में बीएसएफ के हथियारों से निशानेबाजी करते देखे गए। इस वीडियो ने वहां की राजनीति को गरमा दिया। बीएसएफ ने नेता पुत्रों की मदद करने वाले डिप्टी कमांडेंट को नोटिस जारी करके जांच बैठा दी। जोगराज सिंह तो बाड़मेर से दो बार भाजपा के टिकट पर चुनाव भी लड़ चुके हैं। यहां भी दोनों नेताओं ने अपने पुत्रों का बचाव ही किया और बडे़ भोलेपन से कहा कि बीएसएफ को ऐसी अनुमति नहीं देनी चाहिए थी।

इसी साल मध्य जुलाई में बेंगलुरू में बसपा की बेंगलुरू इकाई के नेता के 24 साल के बेटे नासिर हैदर और उसके साथियों को एक स्नातकोत्तर छात्रा के अपहरण और यौन हमला करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। हैदर ने बाकायदा एक गैंग की तरह घर के बाहर अपने मित्र के साथ खड़ी छात्रा का अपहरण किया, उस पर यौन हमला किया और लड़की को छोड़ने के बदले में भारीभरकम रकम की भी मांग की।

4 सितंबर 2014 को केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता पी जयरंजन के बेटे जयराज के खिलाफ एक आरएसएस कार्यकर्ता मनोज की हत्या के बाद फेसबुक पर बाकायदा खुशी जताने के कारण मुकदमा दर्ज किया गया।

पिछले साल यानी 2013 में 17 अप्रैल को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एनसीपी नेता अब्दुल कादिर के 17 साल के पुत्र ने लापरवाही से ड्राइविंग करते हुए दो अवयस्क लड़कियों और उनके चाचा पर गाड़ी चढ़ा दी। एक लड़की की मौके पर ही मौत हो गई।

19 सितंबर 2013 को लखनऊ में बलिया के सपा नेता कमल सिंह के पुत्र और गनर को एक इंजीनियरिंग छात्र को पीटने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इंजीनियरिंग के छात्र वरुण ने लखनऊ स्थित संस्थान में पढ़ाई के दौरान सपा नेता पुत्र दुर्गेश सिंह का प्रभुत्व स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। दुर्गेश सिंह ने भी इसी संस्थान से कुछ साल पहले पास आउट किया था। उल्लेखनीय है कि वरुण भी बलिया का ही रहना वाला था।

इसके अलावा नेता पुत्रों से जुड़े ढेरों ऐसे वाकये होते हैं जो राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर नहीं उभर पाते, मगर उनकी तपिश स्थानीय स्तर पर खूब महसूस होती है। यह हर जिले मेें होता है। उदाहरण के रूप में मेरठ को ही लें तो जब प्रदेश में बसपा का शासन होता है तो मायावती के एक करीबी नेता पुत्र की भागीदारी जिले में होने वाली कई घटनाओं में दिखने लगती है। जब मुलायम-अखिलेश की सरकार आती है तो यही स्थान एक दूसरा नेता पुत्र ले लेता है। जिले में जमीन का कोई बड़ा विवाद होता हो या अपहरण, बलात्कार का कोई बड़ा मामला सामने आता हो, इन नेता पुत्रों के नाम अक्सर स्थानीय मीडिया में उछलते हैं। हालांकि सुबूतों के अभाव में या प्रशासन के ऊपर दबाव के कारण इनके खिलाफ कभी भी कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है।