Reservation-for-muslims

राज़ नाथ सिंह सूर्य

( ये लेख कुछ वर्ष पूर्व राज़ नाथ सिंह सूर्य जी वरिष्ठ स्तंभकार और पूर्व सांसद दुआरा सच्चर रिपोर्ट के समय अमर उजाला में लिखा गया था साभार )

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कहता हे की हिन्दुओ की उपेक्षा मुस्लिमो की माली हालात बेहतर हे . यह रिपोर्ट सच्चर आयोग के उस आकलन को नकारती हे की मुसलमान यहाँ दोयम दर्ज़े का नागरिक बनकर रह गया हे . ऐसे में किसे सही माना जाए ? सच्चर आयोग एक राज़नीतिक फैसला था जबकि नमूना सर्वेक्षण एक निरंतर प्रशासनिक पर्किर्या हे इसलिए विश्वसनीयता की कसौटी पर आर्थिक नमूनासर्वेक्षण के निष्कर्ष पर उंगली नहीं उठायी जा सकती . पर इसके बावजूद प्रधानमंत्री संसाधनो पर पहला हक़ मुसलमानो का होना की बात करते हे और बजट में उनके लिए 17000 करोड़ रूपये का प्रवाधान किया जाता हे तो क्या ये सोचना बेबुनियाद होगा की मुस्लिम तुष्टिकरण का प्रयास राज़नीतिक दलों का एकमात्र कल्याणकारी कार्यकर्म हो गया हे ?

ऐसे माहोल में मुसलमानो को अलपसंख्यक की श्रेणी से बाहर किये जाने का इलाहबाद उच्च न्यायलय का फैसला जिसे उसी न्यायलय की एक पीठ ने स्थगित कर दिया कैसे हज़म हो सकता हे होना ये चाहिए था की सेकुलर होने का दावा करने वाले अदालत के उस फैसले के परिप्रेक्ष्य में अवसर से लाभान्वित होने वाली साम्प्रदायिक ताकतों को रोकने का प्रयास करते . लेकिन हो रहा हे ठीक उसका उलट . क्या पंथ विशेष के प्रति तुष्टिकरण सेकुलरिज़म की अवधारणा के प्रतिकूल नहीं हे ?

हम शायद यह भूल रहे हे की मुसलमानो ने इस देश पर 700 वर्ष तक राज़ किया . नवाब जागीरदार जिन्हे बड़ी बड़ी जागीरे दी गयी थी . सभी मुसलमान थे उनके उत्तराधिकारी के रूप में उत्तरपदेश बिहार बंगाल गुजरात और आंध्रप्रदेश में आज भी मुस्लिम जागीरदारों का बोलबाला हे . राजस्थान में एक मुस्लिम परिवार के पास औसतन साढ़े तीन हेक्टेयर भूमि हे जबकि हिन्दुओ के पास लगभग पौने तीन हेक्टेयर . गुजरात में एक मुस्लिम परिवार के पास एक हेक्टेयर से ज़्यादा भूमि हे लेकिन सच्चर कमिटी ने अन्य तथ्यों के साथ इस तथ्य को भी नज़रअंदाज़ किया

फिर शिक्षा के क्षेत्र में मुसलमानो क्या सचमुच बहुत पीछे हे ? आंकड़े बताते हे की जहा आंध्र प्रदेश में शिक्षित हिन्दुओ का प्रतिशत 69.5 और मुस्लिमो का 76.5 % वाही गुजरात में यह 83 और 79 % हे . मुसलमानो में नौकरियों की संख्या में कम होने का आकलन जमीनी हकीकत नज़रअंदाज़ किये जाने के कारण हे क्योकि तुलना करते समय हम विभाजन के पूर्व की इस्तिति का संज्ञान लेकर आंकड़े गढ़ते हे विभाजन के पूर्व सेवाओ में मुस्लिमो का प्रतिनिधत्व आबादी के अनुपात में कही अधिक था जिनमे अधिकांश पाकिस्तान चले गए .देश के तमाम सर्वोच्च पद जैसे राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायलय के परधान न्यायाधीश सेना प्रमुख और प्रशासनिक प्रमुख के रूप में मुसलमानो का चयन अन्य वर्ग से अनुपात के अनुसार कही अधिक हुआ हे निश्चय ही यह चयन योग्यता पात्रता के आधार पर हुआ फिर शिक्षित होकर पात्र बनने की आकाँक्षा का यही मुस्लिम समुदाय में यदि अभाव हे तो उसका कारण भेद भाव नहीं कुछ और हे वह कुछ और आर्थिक कारण हे . आज मुस्लिम समुदाय को लगता हे की नौकरी से ज़्यादा लाभ रोजगार में हे . नाई धोबी बढाई मिस्त्री मांस विक्रेता आदि के रूप में काम करने वालो में .से सत्तर प्रतिशत मुसलमान यही कारण हे की या तो मुसलमान उच्च शिक्षा प्राप्त करके बड़ा अधिकारी बनता हे या फिर वह नौकरीपेशा वालो से अधिक धन कमाने के लिए नौकरी के लिए योग्य बनाने वाली पढ़ाई से मुह फेर कर कच्ची उम्र में ही सवरोजगारी बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त करना शुरू कर देता हे . पता नहीं हमारे देश के नेताओ को जमीनी हकीकत के आधार पर सर्वदेशिकता की भावना के साथ सोचने विचारने और आचरण करने की प्रेरणा कब और कैसे मिलेगी ? अभी तो जो सोच विचार और आचरण उसके कारण तो अलगाववाद और आतंक का प्रसार ही बढ़ रहा हे ——–

( प्रस्तुति- सिकंदर हयात )