पिछड़ा हुआ नहीं हे मुस्लिम समुदाय !

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राज़ नाथ सिंह सूर्य

( ये लेख कुछ वर्ष पूर्व राज़ नाथ सिंह सूर्य जी वरिष्ठ स्तंभकार और पूर्व सांसद दुआरा सच्चर रिपोर्ट के समय अमर उजाला में लिखा गया था साभार )

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कहता हे की हिन्दुओ की उपेक्षा मुस्लिमो की माली हालात बेहतर हे . यह रिपोर्ट सच्चर आयोग के उस आकलन को नकारती हे की मुसलमान यहाँ दोयम दर्ज़े का नागरिक बनकर रह गया हे . ऐसे में किसे सही माना जाए ? सच्चर आयोग एक राज़नीतिक फैसला था जबकि नमूना सर्वेक्षण एक निरंतर प्रशासनिक पर्किर्या हे इसलिए विश्वसनीयता की कसौटी पर आर्थिक नमूनासर्वेक्षण के निष्कर्ष पर उंगली नहीं उठायी जा सकती . पर इसके बावजूद प्रधानमंत्री संसाधनो पर पहला हक़ मुसलमानो का होना की बात करते हे और बजट में उनके लिए 17000 करोड़ रूपये का प्रवाधान किया जाता हे तो क्या ये सोचना बेबुनियाद होगा की मुस्लिम तुष्टिकरण का प्रयास राज़नीतिक दलों का एकमात्र कल्याणकारी कार्यकर्म हो गया हे ?

ऐसे माहोल में मुसलमानो को अलपसंख्यक की श्रेणी से बाहर किये जाने का इलाहबाद उच्च न्यायलय का फैसला जिसे उसी न्यायलय की एक पीठ ने स्थगित कर दिया कैसे हज़म हो सकता हे होना ये चाहिए था की सेकुलर होने का दावा करने वाले अदालत के उस फैसले के परिप्रेक्ष्य में अवसर से लाभान्वित होने वाली साम्प्रदायिक ताकतों को रोकने का प्रयास करते . लेकिन हो रहा हे ठीक उसका उलट . क्या पंथ विशेष के प्रति तुष्टिकरण सेकुलरिज़म की अवधारणा के प्रतिकूल नहीं हे ?

हम शायद यह भूल रहे हे की मुसलमानो ने इस देश पर 700 वर्ष तक राज़ किया . नवाब जागीरदार जिन्हे बड़ी बड़ी जागीरे दी गयी थी . सभी मुसलमान थे उनके उत्तराधिकारी के रूप में उत्तरपदेश बिहार बंगाल गुजरात और आंध्रप्रदेश में आज भी मुस्लिम जागीरदारों का बोलबाला हे . राजस्थान में एक मुस्लिम परिवार के पास औसतन साढ़े तीन हेक्टेयर भूमि हे जबकि हिन्दुओ के पास लगभग पौने तीन हेक्टेयर . गुजरात में एक मुस्लिम परिवार के पास एक हेक्टेयर से ज़्यादा भूमि हे लेकिन सच्चर कमिटी ने अन्य तथ्यों के साथ इस तथ्य को भी नज़रअंदाज़ किया

फिर शिक्षा के क्षेत्र में मुसलमानो क्या सचमुच बहुत पीछे हे ? आंकड़े बताते हे की जहा आंध्र प्रदेश में शिक्षित हिन्दुओ का प्रतिशत 69.5 और मुस्लिमो का 76.5 % वाही गुजरात में यह 83 और 79 % हे . मुसलमानो में नौकरियों की संख्या में कम होने का आकलन जमीनी हकीकत नज़रअंदाज़ किये जाने के कारण हे क्योकि तुलना करते समय हम विभाजन के पूर्व की इस्तिति का संज्ञान लेकर आंकड़े गढ़ते हे विभाजन के पूर्व सेवाओ में मुस्लिमो का प्रतिनिधत्व आबादी के अनुपात में कही अधिक था जिनमे अधिकांश पाकिस्तान चले गए .देश के तमाम सर्वोच्च पद जैसे राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायलय के परधान न्यायाधीश सेना प्रमुख और प्रशासनिक प्रमुख के रूप में मुसलमानो का चयन अन्य वर्ग से अनुपात के अनुसार कही अधिक हुआ हे निश्चय ही यह चयन योग्यता पात्रता के आधार पर हुआ फिर शिक्षित होकर पात्र बनने की आकाँक्षा का यही मुस्लिम समुदाय में यदि अभाव हे तो उसका कारण भेद भाव नहीं कुछ और हे वह कुछ और आर्थिक कारण हे . आज मुस्लिम समुदाय को लगता हे की नौकरी से ज़्यादा लाभ रोजगार में हे . नाई धोबी बढाई मिस्त्री मांस विक्रेता आदि के रूप में काम करने वालो में .से सत्तर प्रतिशत मुसलमान यही कारण हे की या तो मुसलमान उच्च शिक्षा प्राप्त करके बड़ा अधिकारी बनता हे या फिर वह नौकरीपेशा वालो से अधिक धन कमाने के लिए नौकरी के लिए योग्य बनाने वाली पढ़ाई से मुह फेर कर कच्ची उम्र में ही सवरोजगारी बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त करना शुरू कर देता हे . पता नहीं हमारे देश के नेताओ को जमीनी हकीकत के आधार पर सर्वदेशिकता की भावना के साथ सोचने विचारने और आचरण करने की प्रेरणा कब और कैसे मिलेगी ? अभी तो जो सोच विचार और आचरण उसके कारण तो अलगाववाद और आतंक का प्रसार ही बढ़ रहा हे ——–

( प्रस्तुति- सिकंदर हयात )

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13 thoughts on “पिछड़ा हुआ नहीं हे मुस्लिम समुदाय !

  1. sumit

    मुस्लिमो का अनुपातिक प्रतिनिधित्व हर क्षेत्र मे इतना खराब नही है, जैसा की सिकंदर हयात साहब के लेख मे दिख रहा है, लेकिन कुछ क्षेत्रो मे बेहद खराब है, लेकिन क्या इसके लिये देश के बहुसंख्यक हिन्दू समाज या सरकारी नीतियो को दोष दिया जाना चाहिये, तो इसके लिये हमे मुस्लिमो के अनुपातिक प्रतिनिधित्व को पूरे विश्व के संदर्भ मे देखना चाहिये. 1. भारत मे मुस्लिम 15% के करीब है, जबकि पूरी दुनिया मे ये 20-25% के बीच. जिनमे से अधिकांशतया, मुस्लिम देशो मे ही रह रहे हैं. लेकिन क्रिटिकल थिंकिंग के मुख्य पैमाने यानि साइंस मे इनका प्रतिशत देखे तो 46 ओ आई सी मुल्को से 1.17% साइंस के लेख आते हैं, 20% आबादी के भारत से 1.66%, स्पेन (जहां 800 साल इस्लामी हुकूमत रही 1.48% और इजरायल से 0.8%) इजरायल और स्पेन बहुत छोटे मुल्क है. इनका हवाला इतिहास और भौगोलिक परिस्थितियो की समानता को बताने के लिये की. अगर स्पेन इस्लाम से मुक्त ना होता तो उसकी स्थिति पड़ोसी मुस्लिम मुल्को जैसी होती. इजरायल मध्य पूर्व का ही देश है. 2. अनुपातिक प्रतिनिधित्व को मुस्लिम समुदाय के भी विभिन्न फिरको यानी शीया, सुन्नी, अहमदी आदि या देवबंदी, बरेलवी मे भी बांट के देखो, (ये फिरके जाति-वाद से भिन्न है, ये विचारधारा के अधार पे है) एक अंतर दिखेगा. जो इस बात पे सोचने को मजबूर करता है की मजहब, क्रिटिकल थिंकिंग को प्रभावित करता है. इस बारे मे पाकिस्तान के नामी प्रोफेसर परवेज़ हूदबॉय का कहना है की पाकिस्तानी और अधिकांश मुस्लिम समुदायो मे तालीम का मकसद परलोक को संवरना है, ना की दुनिया मे बेहतरी. साथ ही साथ, मुस्लिम लालन पालन मे किताबो के बिना सवाल अनुपालन पे जोर दिया जाता है ना की समालोचना पे, और यही रवैया उनकी क्रिटिकल थिंकिंग को रोकता है. हिन्दू समाज भी इस मामले मे मुस्लिम समुदाय से कुछ ही बेहतर है, लेकिन इस मानसिक अवरोध को बनाये रखने का हिन्दू समुदाय के पास कोई सैद्धांतिक आधार नही है, जबकि इस्लाम मे यह है या कहे की अधिक स्पष्टता के साथ है. इसलिये अनुपातिक प्रतिनिधित्व या उच्च गुणवत्ता की शिक्षा की तस्वीर, मुस्लिम जगत मे कमोबेश एक जैसी है. हो सकता है, में अपनी बात को ठीक से ना समझा पाया हूँ, लेकिन मुझे संघी या मुस्लिमो से नफरत फैलाने वाला ना समझे. मेरी सोच परवेज़ हूदबॉय, हसन निसार, जावेद अख़्तर, वफ़ा सुल्तान के करीब है

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    1. सिकंदर हयात

      सुमित साहब लेख मेरा नहीं हे वरिष्ठ लेखक संपादक और शायद की भाजपा के ही सांसद रहे ? राज़नाथ सिंह सूर्य जी का हे

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      1. सिकंदर हयात

        राज़नाथ सिंह जी से में सहमत नहीं हु मगर सच्चर आयोग भी मुझे शरू से ही अविश्वसनीय लगा मुझे लगता हे की अतिश्योक्ति अलंकार का हम सभी इस्तेमाल करते ही हे अक्सर ही अपनी बात की तरफ विशेष ध्यान खीचने के लिए.तो ऐसे ही सच्चर साहब बहुत अच्छे आदमी हे लेकिन उन्होंने भी शायद अपनी बात में कुछ ज़्यादा ही अतिश्योक्ति अलंकार का इस्तेमाल कर दिया होगा

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        1. सिकंदर हयात

          sikander hayat
          August 10,2013 at 01:21 AM IST
          पार्ट – 2 सच्चर रिपोर्ट का जहा तक सवाल हे तो भारत में लोकतंत्र हे चुनावी राजनीति हे मुस्लिम वोटो का भारी महत्व हे नेताओ को किसी हालात में चुनाव जितना होता हे इस्तिती बड़ी ही पेचीदा हे सब अपने अपने हिस्से और मतलब का सच देखना चाहते हे खेर जहा तक य बात की हालात दलितों से भी ख़राब—– तो दलित आदिवासी इस देश के सबसे बड़े शोषित हे वो पिछले 2- 3 हज़ार से दबे कुचले रहे वो सत्ता में कभी नहीं रहे उनके पास जमीन कभी नहीं रही जबकि मुस्लिम इस देश पर पिछले ही 1 हज़ार मेसे 700 साल हुकूमत कर चुके हे जमीन का सवामितव बहुत रहा आज भी ठीक ठाक हे फिर दलितों से भी ख़राब हालत केसी हो गयी ? य संभव ही नहीं हे मेरे ख्याल से सच्चर साहब ने अपनी बात कहने के लिए यहाँ ”अतिश्योक्ति अलंकार ‘ का पर्योग किया हे जो की सव्भाविक हे अतिश्योक्ति का पर्योग सभी करते हे फाजिल भाई मुसलमानों की हालात दलितों से ख़राब होती तो हर शहर में मुस्लिम बहुल इलाके हे जिनके बाहरी हिस्सों को छोड़ दे तो इनमे शायद ही कोई गेर मुस्लिम संपत्ति मकान दूकान खरीदता हो अगर की मुसलमानों की हालात दलितों से ख़राब होती तो मुस्लिम बहुल इलाको में मकान दूकान आदि के दाम किराया आदि कम होने चाहिए थे क्योकि बाहर वाला कोई खरीदेगा नहीं और मुस्लिमो की हालात दलितों से भी ख़राब हे तो जाहिर हे फिर पैसा नहीं पैसा नहीं तो फिर खरीदार भी नहीं फिर रेट तो गिरने चाहिए ? तो क्या रेट गिर रहे हे गिरे छोडो क्या रेट रुके हुए है ? जी नहीं बाकि देश की तरह ही मुस्लिम बहुल इलाको में भी आज मकान दूकान सम्पति जमीन के रेट बढ़ते ही जा रहे हे इन्हें कोई गेर मुस्लिम नहीं मुस्लिम ही खरीद रहे हे ? कहा से खरीद रहे हे जब हालात दलितों से भी बदतर हे ? तो मेरे घर में 4 – 4 लोगो की सेलरी 50 हज़ार से ऊपर हे फिर भी हम मुस्लिम इलाके में फ्लेट नहीं ले सकते हे पिछले दिनों एक देखा था डेढ़ सो गजके फ्लेट के डेढ़ करोड़ मांगे गए किराय भी गेर मुस्लिम इलाको जेसे ही बढे हुए ——जारी
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  2. Deepak Saxena

    खुदा करे के कयामत हो और तू आये,,,,,,,,,,,,,, अगर यह जानकारी सही है तो अच्छा है………….

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  3. Indresh

    शहरों मे गरीब मुलसमान ही अच्छे कारीगर अधिक मिलते हैं. इसका कारण मेरी समझ मे यह है की वह बचपन से ही घर का खर्च चलाने मे सहयोग करने लगते है क्योंकि गरीबी के कारण उनके पास कोई अन्य उपाय नही होता. इसलिये समय के साथ अपने अनुभव से वह अच्छे कारीगर बन जाते हैं. पर यहाँ पर में एक खतरा मंडराते हुए देख रहा हूँ. चीनी सामान तो उपयोग करो और खराब होने पर फैंक दो वाला होता है. अतः इसतरह के कारीगरों पर रोजी रोटी का खतरा मंडरा रहा है. लगातार बदलती तकनीक से इन कारीगरों को अवगत कराना और प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये. फिर एक परेशानी यह है की यह संगठित क्षेत्र के मजदूर नही हैं. इसके लिये एक व्यापक योजना की आवश्यकता है.

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  4. सिकंदर हयात

    ” om Thanvi
    10 hrs ·
    जंग साहब ने केंद्र का हुक्म ख़ूब बजाया। दिल्ली की सरकार को अनवरत तंग करते रहे। हाईकोर्ट के आदेश के बाद तो उनके तेवर आसमान पर थे। फिर भी आख़िर वे आते शिक्षा और कला की दुनिया से हैं। केंद्र उन्हें और न गिरा सका। मगर सुना कि कोशिश की। जंग ने इस दफ़ा शायद अपने ज़मीर की सुनी। पहले सुने होते तो चैन से चले जाते, इस तरह झटके से नहीं। ” ” कुल मिलाकर जंग साहब ने वही सब किया जिस और भारत के सबसे ताकतवर आदमी से टक्कर लेने वाले आई पि एस संजीव भट्ट ने कहा था की” अधिकांश मुस्लिम अफसर निजाम के बेहद वफादार होते हे ये कभी भी व्यवस्था से नहीं टकराते हे ”

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  5. सिकंदर हयात

    Dilip C Mandal14 February at 16:29 · मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है -3भारतीय राष्ट्र राज्य में मुसलमानों को ख़ास कुछ देने की क्षमता नहीं है।
    नौकरियों और बैंक लोन जैसे आर्थिक समृद्धि के स्रोतों से लगभग वंचित मुसलमानों ने जीने के अपने तरीक़े निकाल लिए हैं। मुसलमान अपनी मेहनत और हुनर के दम पर जी रहा है। वह किसी सरकार के भरोसे नहीं है। वह आपस में ही एक दूसरे की मदद कर रहा है।
    वह अपने अल्लाह और अपने बाज़ू के भरोसे है।
    कोई भी सरकार उन्हें कुछ देकर बहुसंख्यकों को नाराज़ नहीं करेगी। यही भारतीय राजनीति का सच है। मुसलमानों को किसी सरकार से कुछ नहीं मिलने वाला।जो एक चीज़ सरकार उनके लिए कर सकती है वह है क़ानून का राज। यानी अमन चैन। यह तो वैसे भी सरकार का कर्तव्य है और हर नागरिक का अधिकार।क़ानून का राज दे दीजिए। मुसलमान अपनी ख़ुशहाली की इमारत ख़ुद बना लेगा। सरकारी मदद और उदारता के बिना जीना उसने सीख लिया है।Dilip C Mandal

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    1. सिकंदर हयात

      जितने पिछड़ेपन का रोना मुसलमानो के बीच रोया जाता हे अगर हम वो सब एकदम खरा सच मान ले तो समझने की बात हे की पिछड़े यानि की पैसा नहीं जब पैसा नहीं तो ग्राहक नहीं जब ग्राहक नहीं तो फिर मुस्लिम बहुल इलाको में मकान दुकान संपत्ति जमीन आदि के दाम और किराये बनिस्पत कम होने चाहिए थे बढ़ने नहीं चाहिए थे रुके हुए होने चाहिए थे ———–? लेकिन ऐसा कुछ नहीं हे मुस्लिम बहुल इलाको में भी दाम अधिक ही हे और बढ़ते ही जा रहे हे हे इसका या तो यही मतलब हे की मुस्लिम उतने पिछड़े नहीं हे जितना हम जतलाना चाहते हे या फिर बाकी देश की तरह ही मुसलमानो में भी भारी आर्थिक असमानता हे कुछ लोगो के पास बहुत पैसा हे जमीन हे बैंक बेलेन्स हे यही लोग और इनकी खरीद क्षमता इनकी ” जमाखोरी ” ही दाम कम नहीं होने देती हे और यही लोग और इनके लग्गू भग्गू ही सबसे अधिक हल्ला करते हे और सबसे अधिक मलाई भी यही चापते हे और यही लोग अपने ही हित को ” मुस्लिम हित ” कहकर प्रचारित करते हे उसके बाद फिर वही मेरे जीनियस बड़े भाई के शब्दो में की ” अपना घी दुसरो की खिचड़ी में कोई नहीं डालता हे ”

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  6. सिकंदर हयात

    Mohd Zahid हिन्दू तुष्टीकरण की पराकाष्ठा :-
    कांग्रेस से मेरी तमाम शिकायतों में से एक सबसे बड़ी और प्रमुख शिकायत यह है कि उसने इस देश में मुसलमानों को दलितों से भी बदतर बना दिया।
    उसने पिछले 70 साल में हिन्दुओं का जमकर तुष्टीकरण किया परन्तु तुष्टीकरण के नाम पर मुसलमानों को गाली खिलवाया।
    उसने तुष्टीकरण के नाम पर देश के मुसलमानों को धार्मिक लालीपाप दिए , जैसे कांग्रेस , प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा “अफ्तार का आयोजन” और उसमें “जालीदार गोल टोपी पहनना” या हज के नाम पर सब्सीडी आवंटित करके उसका लाभ “एयर इंडिया” को दे देना परन्तु जो मूलभूत रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाले मामले थे उसमें उसने कुछ नहीं किया बल्कि यह कहना सच होगा कि उसने मुसलमानों के लिए बाधाएँ ही खड़ी कीं।
    वह शासन व्यवस्था इस देश के लगभग 70% हिन्दुओं को आरक्षण तो देती है परन्तु मुसलमानों को इससे इस कारण वंचित करती है कि धर्म आधारित आरक्षण नहीं होगा।मेरी समझ में आजतक यह नहीं आया कि इस देश में आरक्षण पाते लोग क्या किसी धर्म के नहीं हैं ? क्या मुसलमान ही केवल इस देश में धर्म आधारित हैं ?ध्यान दीजिए कि मंडल आयोग में मुसलमानों को आरक्षण भी सिर्फ आँख में धूल झोंकने जैसा ही है।
    खैर , इसके अतिरिक्त हिन्दुओं के लिए धार्मिक तुष्टीकरण , आर्थिक तुष्टीकरण , और व्यवस्था में तुष्टीकरण का सारा खेल इस देश में पिछले 70 साल से हो रहा है परन्तु तुष्टीकरण के नाम पर संघ और भगवा लुच्चों से गाली मुसलमान खाता है जो जस्टिस सच्चर आयोग के अनुसार 70 साल की इसी तुष्टीकरण के कारण दलितों से भी बदतर स्थिति में चला गया।हिन्दू लोगों का एक महत्वपुर्ण आर्थिक तुष्टीकरण है “हिन्दू अविभाज्य परिवार” जिसे तकनीकी भाषा में “HUF”” Hindu Undevided Family कहते हैंदेश के तमाम विभागों में धर्म के आधार पर तमाम कर और नियम में यह छूट केवल हिन्दुओं (हिन्दू , सिख , बौध और जैन) को मिली है , और कोई धर्म का व्यक्ति इसका लाभ नहीं ले सकता।संविधान में ऐसी व्यवस्था की गयी कि धार्मिक आधार पर मुसलमानों को आरक्षण नहीं मिले और उसी धार्मिक आधार पर हिन्दुओं के लिए “कर और नियमों” में तमाम छूट और सुविधाएँ दी गयीं और उस नियम का नाम ही रखा “HUF” , हिन्दू के नाम पर , यह देश का शायद ऐसा इकलौता वित्तीय कानून होगा जो किसी धर्म के नाम पर होगा।क्या है HUF ?हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) बनाने के लिए (HUF) के नाम एक बैंक खाता खुलवाना होता है। यह खाता परिवार के मुखिया(कर्ता) के नाम होता है, लेकिन उसके नाम के बाद एचयूएफ शब्द जुड़ा होता है। उसके नाम के साथ एंड कंपनी या ऐंड संस जैसी तब्दीली संभव है जैसे (HUF) के मुखिया संदीप वर्मा हैं तो वह”संदीप वर्मा एंड संस (HUF)”
    के नाम से बैंक खाता खुलवा सकता है , इसके लिए बैंकों के पास अलग से सारी प्रक्रिया होती है। फर्म भी “संदीप वर्मा एंड संस” के नाम से होगी।
    इसके बाद (HUF) मुखिया “संदीप वर्मा” के पैन कार्ड के लिए आवेदन किया जाता है। पैन कार्ड भी परिवार के मुखिया “संदीप वर्मा” के नाम होता है, लेकिन उसके अंत में (HUF) शब्द जुड़ा होता है। यह हर जगह (HUF) सिस्टम को संदेश देने के लिए है कि यह विशेष श्रेणी के लोग हैं और इनको देश में तमाम छूट हासिल है। यह बन गयी एक HUF कंपनी।इनकम टैक्स एक्ट के मुताबिक परिवार में पिता या वरिष्ठ पुरुष सदस्य ही HUF का मुखिया होगा। मुखिया या कर्ता की भूमिका परिवार के मैनेजर की होती है और HUF के सारे सदस्य इसके पार्टनर की तरह होते हैं। कर्ता या मुखिया के लिए परिवार के साथ एक ही छत के नीचे रहना जरूरी नहीं है। जरूरी यह है कि वह परिवार के सारे मामलों की देखभाल करता हो। मल्लब सिर्फ कागज पर “संयुक्त”।जो शख्स (HUF) बनाना चाहता है, उसका शादीशुदा होना जरूरी है। कुंवारे लोग (HUF) नहीं बना सकते। (HUF) पर इनकम टैक्स में फायदा लेने के लिए घर में बच्चे का होना जरूरी है। अगर कोई पति-पत्नी मिलकर HUF बनाना चाहते हैं और उनके अभी कोई बच्चा नहीं है तो वे आने वाले बच्चे(😷) का जिक्र कर भी एचयूएफ बना सकते हैं। अर्थात जो बच्चा पैदा ही नहीं हुआ उसके नाम पर भी HUF बन जाएगा और वह बिना पैदा हुए उस HUF का सदस्य हो जाएगा।

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  7. सिकंदर हयात

    Ameeque Jamei
    9 hrs ·
    ऐजाज़ अशरफ़ कह रहे है की मुसलमानों मे जिग्नेश, अल्पेश या हार्दिक क्यों नहीं? क्यों भी हो भला जब मौलवियो ने क़ौम को बंधक बना डरा रखा हो, ऊपर से की नेता होने के लिये मंत्री/संत्री/मौलवी का बेटा या करोड़पति होना ज़रूरी है तो फिर यह उम्मीद क्यों? यूपी के नगर निकाय मे एक एक सीट पर अनगिनत लड़े करोड़ों ख़र्च किये है फिर क्यों हार्दिक चाहिये? वैसे भी तहरीक, दानिशनरी अवाम के लिये लड़ने वालों को यह ग़ुलाम क़ौम ज़लील ही समझती है फिर जिग्नेश क्यों चाहिये जनाब?

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  8. सिकंदर हयात

    भाजपा को मज़बूत करने में इन ज़ाहिदों का सबसे बड़ा हाथ रहा हे —————————————————————————————————- Mohd Zahid is with Mohd Zahid and 9 others.
    4 hrs ·
    FBP/17-262
    बराक ओबामा के अनकहे बोल :-
    पिछले दिनों अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति “बराक ओबामा” भारत के दौरे पर थे और एक समाचार हाऊस के कार्यक्रम में उन्होंने जो बातें कहीं वह देश और दुनिया को ध्यान से सुनने और समझने की ज़रूरत है।
    उन्होंने कहा कि
    “भारत को अपनी मुस्लिम आबादी की कद्र करनी चाहिए ,उन्होंने राष्ट्रपति रहते हुए निजी तौर पर पीएम नरेंद्र मोदी से कहा था कि धर्म के आधार पर भारत का विभाजन नहीं किया जाना चाहिए।”
    उन्होंने कहा कि “भारत को भारतीय मुसलमानों का ध्यान रखना चाहिए जो खुद को इस देश से जुड़ा हुआ और भारतीय मानते हैं।”
    ओबामा ने कहा, ‘मैंने पीएम मोदी से निजी तौर पर कहा था कि भारत को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि यहां मुसलमान अपनी पहचान एक भारतीय के रूप में कर सकें।
    ओबामा ने कहा, “‘खासतौर से भारत जैसे देश में जहां विशाल मुस्लिम आबादी है और जो सफल है, समाज का अविभाज्य अंग है तथा अपने आपको भारतीय मानता है, दुर्भाग्य से ऐसा अन्य देशों में नहीं है जहां अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय को ऐसी अनुभूति होती हो। मुझे लगता है कि यह ऐसा कुछ है जिसका ध्यान रखा जाना चाहिए, उसे संपोषित व विकसित करने की जरूरत है।”
    दरअसल बराक ओबामा इशारों इशारों में बहुत कुछ कह गये कि शेष देशों के अल्पसंख्यक अपने देश के प्रति वह मुहब्बत और जज़्बा नहीं रखते जो भारत के अल्पसंख्यक मुसलमान अपने देश के लिए रखते हैं।
    उदाहरण के लिए बहुत अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है , अपने पड़ोस के पाकिस्तान और बंग्लादेश के हिन्दू अल्पसंख्कों तथा श्रीलंका के अल्पसंख्यक तमिलों का उदाहरण सबके सामने है।
    एक आँकड़ों के अनुसार भारत में 1 लाख़ 20 हज़ार पाकिस्तानी हिंदू अपना देश छोड़ कर भारत में रहते हैं और औसतन हर साल एक हज़ार हिंदू पाकिस्तान से भारत आते हैं।
    http://www.bbc.com/…/160424_pakistan_hindu_migrants_gallery…
    वहाँ से आए यह पाकिस्तानी अल्पसंख्यक हिन्दू दक्षिण दिल्ली की संजय गांधी कॉलोनी में रहते हैं।
    ऐसे ही , बंग्लादेश के विभाजन के समय पाकिस्तान में रह रहे हिन्दू अल्पसंख्यक अपने देश से भाग कर बंग्लादेश के रास्ते भारत में प्रवेश कर जाते हैं जिनकी अधिकारिक संख्या लाखों में है , इसी कारण पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दुओं की संख्या कम होकर 6% रह गयी , और पाकिस्तानी हिन्दुओं की अपने देश से गद्दारी की यही प्रक्रिया जारी रही तो रही सही संख्या भी समाप्त हो जाएगी।
    श्रीलंका के अल्पसंख्यक तमिलों का अपने देश से गद्दारी का इतिहास कौन नहीं जानता ? प्रभाकरण की अलग देश की माँग और तमिलों का भारत से अधिक निकटता अपने देश से गद्दारी का उदाहरण ही तो है।
    यह है इन तीनों देशों के अल्पसंख्यकों का अपने देश के प्रति प्रेम , जबकि भारत के मुसलमान दो दो पड़ोसी मुस्लिम देशों के रहते उधर जाना तो छोड़िए एक हद तक उनसे नफरत करता है और अपने देश से बेइंतेहा मुहब्बत करता है।
    बराक ओबामा यही कह रहे थे , बस उदाहरण ना दे सके। बराक ओबामा अमेरिका के 8 साल तक राष्ट्रपति रहे हैं और सारी दुनिया के देशों के अलूपसंख्यक समुदाय के उस देश के प्रति भावना को समझते होंगे , मोटी मोटी रिपोर्टें पढ़ी होंगीं , यूँ ही नहीं उन्होंने भारतीय मुसलमानों के संदर्भ में इतनी महत्वपुर्ण बात कह दी।
    और सिर्फ़ बराक ओबामा ही क्युँ ?
    भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बयानों को भी इसी संदर्भ में रख कर देखिए कि भारत में इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी के बावजूद “आईएस” और “अल-कायदा” जैसे संगठन कभी सफल नहीं हुए।
    यह बयान भी यूँ ही नहीं है , क्युँकि भारत का मुसलमान अपने देश के लिए सदैव वफादार रहा है , ना वह “कालाधन” की लिस्ट में शामिल होता है ना “पनामा और पैराडाईज़” लीकेज लिस्ट में और ना भ्रष्टाचार के घालमेल में।
    ऐसा करने के लिए मुसलमानों को “कुरान” से सीख मिली है कि जिस देश में रहो उस देश के लिए वफादार रहो , ईमान की मज़बूती में देशप्रेम शामिल है।
    यही कारण है कि , आज़ादी के बाद तमाम सरकारी जेनोसाईड “हाशिमपुरा , मुरादाबाद ईदगाह , मुंबई , गुजरात , भागलपुर , वाराणसी , कानपुर , मेरठ , मलियाना , मुजफ्फरनगर , सूरत , 1992 मुम्बई , भिवंडी , बाबरी मस्जिद की शहादत ” इत्यादि के बावजूद भारत के मुसलमानों ने कभी देश छोड़कर पड़ोस के मुस्लिम देशों में जाने का सोचा तक नहीं और ना ही किसी “खालिस्तान” की तरह अलग देश की माँग की।
    ध्यान दीजिए कि “पाकिस्तान” भी भारत के मुसलमानों की माँग पर नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में नेहरू-जिन्ना-पटेल की सत्ता की बंदरबाँट में हुई विफलता के कारण बनाया गया।
    बराक ओबामा यही कहना चाह रहे थे जो वह खुल कर नहीं कह सके।
    देश के प्रति वफादारी दुनिया को भारत के अल्पसंख्यक मुसलमानों से सीखना चाहिए और उनको विशेष रूप से सीखना चाहिए जो अपने देश पाकिस्तान से भागकर भारत से वापस नहीं जाते।

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  9. सिकंदर हयात

    मुसलमानो में सारी सेकुलर आवाज़े या तो अधिकतर शिया हे या बरेलवी बोहरा अहमदी हे नहीं तो फिर कम्युनिस्ट टाइप हे , हमें देवबंदी रिलजियस भी और सेकुलर लिबरल भी दीन और दुनिया को साथ लेकर चलने वाली मुस्लिम सोच बढ़ानी होगी काम लगभग नामुमकिन हे इसलिए इस तरह की लिबरल आवाज़े नहीं हे खेर फिर भी उम्मीद रखनी चाहिए इससे ही बदलाव आएगा वार्ना नहीं हमारी तो यही कोशिश हे —————————————————
    Sheeba Aslam Fehmi42 mins · मेरे कम्युनिस्ट मां -बाप को इंदिरा गाँधी की एक ही बात पसंद थी और हमें बार बार बताई जाती थी की वो हरी सब्ज़ी और दाल शौक़ से खाती हैं. मेरे लिए उनकी यही बात सबसे ज़हर थी की क्यों? और अगर खाती भी हैं तो ये बात बाहर लाने की क्या ज़रुरत थी की मेरे पेरेंट्स तक पहुँच गयी? हमारा तो एक ही लॉजिक रहता था की वैसे तो वो आप लोगों के हिसाब से इतनी ज़ालिम हैं की कभी इमरजेंसी लगवाई थी, लेकिन हमारे मामले में उनको बड़ी इज़्ज़त से, सादा खाना खानेवाली बताया जाता है. अरे हमें नहीं बनना इंदिरा गाँधी बस.

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