hydrइंदिरा गांधी हवाई अड्डे से स्पाइसजेट के तय्यारे ने हैदराबाद के लिए उड़ान भरी तो सुबह के सवा छह बजे थे। नींद हम सब की आंखों में उतरी हुई थी लेकिन ऊपर से दिल्ली को देखने की उमंग ने नींद को थोड़ी देर रुक जाने को कहा। नींद हौले से मुस्कराई, फिर कहा- ठीक है थोड़ा इंतज़ार कर लेती हूं। नींद ने बात मानी तो edसब आश्वस्त हुए। लेकिन हम सभों को पता था कि नींद कभी भी हमारी आंखों में पूरी तरह उतर कर हमें अपनी आग़ोश में ले लेगी। सुबह के इस सफ़र के लिए हम सब लगभग पूरी रात जागते रहे थे। हम सब यानी उत्तर क्षेत्र क्रिकेट टीम के सदस्य। अखिल भारतीय स्तर पर खेल पत्रकारों के लिए जेके बोस क्रिकेट टूर्नामेंट हर साल देश के विभिन्न हिस्सों में खेला जाता है। क़रीब सैंतीस साल से बाक़ायदा इसका आयोजन स्पोर्ट्स जर्निलस्ट फेडरेशन आफ इंडिया करवाता आरहा है। इस बार इसका आयोजन हैदराबाद में होना था और इस सिलसिले में खेल पत्रकारों की टोली हैदराबाद जारही थी। मेरे अलावा चंद्रशेखर लूथरा, राजेश राय, धर्मेंद्र पंत, सुधीर उपाध्याय, राकेश राव, अमित चौधरी, सिद्धार्थ शर्मा, चेतन शर्मा और अशोक रावल टीम के दूसरे सदस्य थे जो हैदराबाद जारहे थे। परविंदर शारदा टीम के कप्तान थे। वे दूसरे विामन से आने वाले थे। उत्तर क्षेत्र की टीम में पहली बार मुझे शामिल किया गया था। लेकिन इससे पहले जब कोलकाता में था तो पूर्व क्षेत्र की तरफ़ से जेके बोस क्रिकेट टूर्नामेंट में हिस्सा लेता रहा था। जेके बोस क्रिकेट टूर्नामेंट क्षेत्रीय आधार पर खेला जाता है और इसमें उत्तर, पूर्व, पश्चिम और दक्षिण की टीमें हिस्सा लेती हैं।

एक बात साफ़ कर दूं कि मैं बहुत अच्छा तो जानें दें, अच्छा क्रिकेट भी नहीं खेलता। स्कूल-कालेज के दिनों में बल्ला घुमा लेता था। थोड़ी बहुत गेंदबाज़ी भी कर लेता था और इसकी वजह से अपने इलाक़े में जिस तरह का क्रिकेट खेला जाता था उसमें अपना थोड़ा दबदबा था और तब कई टीमें मुझे खेलने की पेशकश भी करती रहतीं थीें। लेकिन वह क्रिकेट नहीं था, बस महज़ मनोरंजन का एक साधन था। उन दिनों क्रिकेट को कभी गंभीरता से नहीं लिया था, हां फ़ुटबाल ज़रूर खेलता था और औसत से थोड़ा बेहतर खिलाड़ी था। इसलिए पूर्व क्षेत्र की टीम में जब पहली बार शामिल किया गया तो शायद अख़बारों के कोटा सिस्टम ही इसकी वजह रही होगी। तब ‘ग़ालिब’ जवान था और इस वजह से थोड़ी दौड़भाग कर फील्डिंग ठीकठाक कर लेता था। टीम को मेरा इतना दौड़ना-भागना और रन बचाना ही काफ़ी लगा और कोलकाता में 1992 में पहली बार जेके बोस टूर्नामेंट में हिस्सा लिया तो अच्छा लगा। ईडन गार्डन पर हमने तीन मैच खेले और हम चैंपियन बने थे। फिर मुंबई, बंगलूर, मद्रास, दिल्ली और गुवाहटी में भी मैं टीम का हिस्सा था। दिल्ली में हम उत्तर क्षेत्र से हार गए। 1997 में अंतिम बार मद्रास गया था। दरअसल इस टूर्नामेंट के बहाने एक तो सय्याही हो जाती है और फिर कई पुराने दोस्तों से मिलना-मिलाना होता है और कुछ नए दोस्त बनने-बनाने का सिलसिला भी चलता है। मुंबई, चेन्नई, बंगलूर और गुवाहाटी में आयोजन के दौरान हम ख़ूब घूमे थे। गुवाहाटी रहते हुए कभी शिलांग नहीं जा पाया लेकिन जेके बोस ट्राफी के आयोजन के दौरान हम शिलागं की वादियों में ख़ूब घूमे थे। मुंबई में एलिफंटा, चेन्नई में समुद्री तटों का लुत्फ़ उठाया था तो बंगलूर में ऐतिहासिक इमारतों के दर्शन किए। ईडन गार्डन के अलावा वानखेड़े स्टेडियम, ब्रबोर्न स्टेडियम, चिन्नास्वामी स्टेडियम, एमए चिदंबरम स्टेडियम, फ़ीरोज़ शाह कोटला स्टेडियम, नेहरू स्टेडियम पर क्रिकेट खेलने का मौका मिला है। क्रिकेट की बहुत सारी जानकारी नहीं होने के बावजूद देश के कई प्रमुख स्टेडियमों में खेलना मेरे जैसे खिलंडर के लिए किसी सपने से कम नहीं है।

अब कोई सत्रह साल बाद जेके बोस टीम में मेरी वापसी हुई तो यह भी किसी सपने ही जैसा था। अख़बार में काम करते हुए किसी भी खिलाड़ी की टीम में वापसी पर हम सभी इसका ज़िक्र करना नहीं भूलते कि फ़लां खिलाड़ी ने इतने साल बाद टीम में वापसी की। लेकिन ख़बर लिखने वाला ख़बर कम ही बनता है। धर्मेंद्र पंत ने यह तो बताया था कि जेके बोस क्रिकेट टूर्नामेंट इस बार हैदराबाद में होगा। लेकिन टीम में चुने जाने या वहां जाने के लिए बहुत उत्साहित नहीं था। उम्र के जिस पड़ाव पर हूं वहां घर-परिवार के साथ रहना ज्Þयादा अच्छा लगता है। लेकिन हैदराबाद रवानगी से क़रीब हफ्Þते भर पहले राजेश राय का फ़ोन आया। उन्होंने कहा कि मुझे तीन से आठ जून तक आपका समय चाहिए और आपका जवाब हां में ही होना चाहिए। यानी उन्होंने मेरे लिए कोई रास्ता नहीं छोड़ा था। दरअसल जिस अधिकार के साथ उन्होंने यह कहा था उसके बाद आपके लिए किसी को भी न करना उसकी मोहब्बत, उसके ख़लूस और उसके यक़ीन को तोड़ने जैसा होता है। ज़ाहिर है कि इसके बाद मैंने राजेश भाई को अपनी स्वीकृति दे डाली। उन्होंने मेरे लिए कोई स्पेस नहीं छोड़ा था जहां से मैं निकल सकता था। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जहां एक अधिकार सामने वाले को भी मिला होता है और ज़ाहिर है कि राजेश भाई ने उस एक अधिकार का इस्तेमाल किया था। फिर घुमक्कड़ी पर निकले बहुत दिन हो गए थे। और शहर अगर हैदराबाद हो तो क्या कहने।

हैदराबाद हमारे इतिहास का एक हिस्सा रहा है। निज़ाम हैदराबाद के क़िस्से आज भी हमारे अतीत से जुड़ा है। उनके ज़ेवरात को लेकर भी ढेरों रोचक कहानियां मशहूर हैं। चारमीनार, हुसैन सागर झील, बिड़ला मंदिर लोगों को लुभाते रहे हैं। हैदराबादी बिरयानी का तस्सवुर ही मुंह में पानी भर देता है। फिर इन सबसे अलग हैदराबाद हमारे लिए इसलिए भी महत्त्वपूर्ण शहर है क्योंकि इस शहर ने देश के नामचीं फुटबाल खिलाड़ी पैदा किए। सैयद रहीम, नूर मोहम्मद, यूसुफ़ ख़ान, अज़ीमुद्दीन, सत्तार, जÞुलफ़िकार, सैयद शाहिद हकीम, मोहम्मद हबीब, अकबर, नईमुद्दीन, शब्बीर अली, अमलराज सहित सैंकड़ों खिलाड़ी हैदराबाद से निकले और अपने पैरों की कलाकारी से दुनिया को अपना मुरीद बनाया। यह बात दीगर है कि अब इस शहर से फुटबाल में कोई बड़ा नाम सामने नहीं आरहा है। क्रिकेट की बात करें तो एमएल जयसिम्हा, शिवलाल यादव के बाद अपनी कलाई की जादूगरी से मोहम्मद अज़हरुद्दीन ने पूरी दुनिया को सम्मोहन में जकड़े रखा। अज़हर ढलान पर पहुंचे तो भारतीय टीम के बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक वीवीएस लक्ष्मण ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाया और वही कलाई की जादूगरी से भारतीय क्रिकेट को शिखर पर पहुंचाया। लेकिन क्रिकेट की राजनीति उनके साथ लगी रही और मेरे जैसे कई खेल पत्रकारों की पहली पसंद रहे लक्ष्मण को समय से पहले ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह देना पड़ा। खेलों की विरासत को पुलेला गोपीचंद, साइना नेहवाली, बीपी सिंधू और ज्वाला गुट्टा ने आगे बढ़ाया। तो एक आकर्षण तो हैदराबाद का है। लेकिन इन वजहों से ही नहीं हैदराबाद का आकर्षण था। हैदराबाद इल्म-ओ-अदब का गहवारा भी रहा है। उत्तर भारत में उर्दू अगर फली-फूली है तो दक्षिण भारत ने उर्दू को समृद्ध किया है। उर्दू के कई कथाकार-शायरों के नाम ज़ेहन में उभरे थे। मख़दूम मोही उद्दीन, ख़्वाजा अब्दुल गÞफ़ूर, जलील नज़ामी, फ़ातिमा यज़दानी, डा राम प्रसाद, उमरान मुबारक, आग़ा सरोश, वली तनवीर, यासीन अहमद, ज़रार वासफ़ी, सैयद अली ज़हीर, सुलैमान ख़तीब, सिकंदर अली वज्द, रऊफ ख़ैर, राज बहादुर गौड़, रफ़ीया मंजूरुल अमीन, मुस्तफ़ा इक़बाल तौसीफ़ी, मोहम्मद अली असर, मोईद जावेद, मजÞहरु ज़मा ख़ान, मतीन सरोश, बेदिल हैदराबादी व असर ग़ौरी कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्हें मैं पढ़ता रहा था। देश में उर्दू का सबसे बड़ा अख़बार सियासत हैदराबाद से ही निकलता है। तो हैदराबाद से कई बातें जुड़ीं थीं जो उस शहर को हमारे लिए ख़ास बनाती हैं। लेकिन एक ख़ास वजह और भी थी। शुरुआती दिनों में जब लिखना शुरू किया था तब हैदराबाद की एक मोहतरमा मेरी रचनाओं पर फ़िदा थीं। तब कालेज में पढ़ा करता था। साहित्य से सरोकार बना। हिंदी के साथ-साथ उर्दू में भी लिखा करता ता। उर्दू की तमाम अच्छी पत्रिकाओं में तब छपा करता था। हैदराबाद की मोहतरमा ने किसी रिसाले में मेरी कहानी पढ़ी और मुझे ख़त लिख मारा। हैदराबाद के फ़लकनुमा में उनकी रिहाइश थी और उनका नाम कुबरा हुआ करता था। तब उम्र के जिस पड़ाव पर था वहां किसी लड़की का ख़त आना अच्छा लगा था। कई तरह के नीले-पीले ख़्वाब सजा डाले थे। ख़त का जवाब फ़ौरन ही दे डाला। फिर तो ख़तो-किताबत का सिलसिला शुरू हो गया। तब न तो मोबाइल था और न ही फ़ोन का चलन। ले-दे कर ख़त का ही सहारा था। ख़तो-किताबत का यह सिलसिला बरसों तक चलता रहा। जवानी तब दस्तक दे रही थी, इसलिए एक-दूसरे को बहुत कुछ न लिख कर भी हम बहुत कुछ लिख जाते थे। यह दिल का मामला नहीं था, लेकिन कुछ ऐसा था जो हम दोनों को अच्छा लगता था। इस रिश्ते को हमने कोई नाम नहीं दिया था। लेकिन कुबरा के ख़त का इंतज़ार रहता था। फिर अचानक ही यह सिलसिला टूट गया। कुबरा ने सिर्फÞ इतना बताया था कि उनकी शादी होने वाली है। इसके बाद न उन्होंने मुझे कभी ख़त लिखा और न ही मैंने उन्हें। लेकिन मुझे उनकी याद इसलिए भी है क्योंकि वे मेरी कहानियों को पसंद करने वाली पहली पाठक थीं, जिन्होंने तब मेरी कहानी की तारीफ़ की थी। पहली पाठक, पहली प्रशंसक, पहली लड़की और पहली महिला मित्र, कैसे कोई भूल सकता है। इसलिए जब हैदराबाद का नाम राजेश भाई ने लिया तो दिल के किसी कोने से अचानक कुबरा ने सर निकाला था और जैसे कहा था मेरे लिए ही सही हैदराबाद आ जाएं। तो हैदराबाद जाने की जो कई वजहें थीं, उनमें एक कुबरा भी थीं।

हैदराबाद का आकर्षण ही था कि दो दिन बाद जब टीम की सूची आई तो उसमें मेरा नाम भी था। यानी अब किसी तरह के अगर-मगर की गुंजाइश नहीं। तीन जून की सुबह हमें हैदराबाद के लिए रवाना होना था। सवा छह बजे की फ्लाइट थी इसलिए यह तो तय था कि रात सो नहीं पाएंगे। रात में ही राजेश राय से तय पा गया था कि मैं अपने निवास न्यू अशोक नगर से उनके पास लक्षमीनगर पहुंच जाऊं। दिल्ली खेल पत्रकार संघ के अध्यक्ष चंद्रशेखर लूथरा वसुंधरा में रहते हैं। वे हमें लेते हुए हवाई अड्डे चले चलेंगे। आफ़िस से छूट कर कमरे पर पहुंचा। सोने का सवाल ही कहां था। समय बिताता रहा। सोचा था कि तीन बजे के आसपास कमरे से निकलूंगा। इसलिए नींद को आंखों से दूर रखा। जानता था कि नींद आंखों में उतरी तो फिर समय पर उठ पाना मुश्किल है। जाने के लिए जो तैयारी करनी थी, वह भी इस बीच करता रहा। ध्यान से ज़रूरत के सारे सामान बैग में डाले। तीन बजा तो मुद्दसर को उठाया ताकि मेरे निकलने के बाद वह गेट में ताला लगा ले।

घर से बाहर सड़क पर आते ही आटो मिल गया और लगभग पंद्रह-बीस मिनट के बाद मैं लक्ष्मीनगर में था। राजेश राय ने जिस जगह की निशानदही की थी, वहां पहुंच कर उनका इंतज़ार करने लगा। थोड़ी देर के बाद वे सामानों से लदे-फंदे आते दिखाई दिए। उनके साथ एक किट बैग भी था, जिसमें क्रिकेट खेलने का सामान था। उनका थोड़ा सा बोझ साझा कर हम दोनों सड़क के उस पार चंद्रशेखर लूथरा का इंतज़ार करने लगे। वे बीच-बीच में मोबाइल पर हमें बता रहे थे कि वे कहां पहुंचे हैं। ख़ैर थोड़ी इंतड़ार के बाद वे पहुंचे। हम दोनों उनकी गाड़ी में लद गए। चंद्रशेखर लूथरा के साथ रस्मी मुलाक़ात रही थी, लेकिन कभी बेतकुल्लफ़ी नहीं रही। आमतौर पर हिंदी और अंग्रेज़ी पत्रकारों के बीच एक धारणा बनी रहती है। ज्Þयादातर अंग्रेज़ी पत्रकारों को यह भ्रम रहता है कि वे हिंदी के पत्रकारों से बेहतर होते हैं और कुछ तो हिंदी वालों के साथ ‘अछूतों’ सा व्यवहार करते हैं। इसलिए एक अनचाही दूरी हिंदी व अंग्रेज़ी के पत्रकारों के बीच अमूमन बनी रहती है। यह बात दीगर है कि हैदराबाद यात्रा के दौरान चंद्रशेखर लूथरा ने कम से कम इस धारणा को तोड़ा। इस पर बात आगे। तो रस्मी मुलाक़ात की वजह से उनसे रास्ते में बहुत ही औपचारिक बातें होती रहीं। एअरपोर्ट पर टीम के दूसरे साथी हमारा इंतज़ार कर रहे थे। धर्मेंद्र पंत, सुधीर उपाध्याय, सिद्धार्थ शर्मा, चेतन शर्मा, अमित चौधरी, राकेश राव और आकाश रावल पहले ही एअरपोर्ट पहुंच कर सारी औपचारिकताएं पूरी कर चुके थे। हम समय से ही थे। विमान उड़ने में क़रीब डेढ़ घंटा बाक़ी था। बोर्डिंग पास लेने के बाद एअरपोर्ट पर चहलक़दमी करने लगे। आंख हालांकि नींद से बोझिल हो रही थी। लेकिन हमें थोड़ी देर तक इंतजाÞर तो करना ही था। इस बीच राजेश राय ने अपने मोबाइल से मेरा एक फ़ोटो खींचा और फिर मैंने उनका। दरअसल यह फ़ोटोबाज़ी का शौक़ उन्हें तो था ही, मुझे भी कम नहीं था। तस्वीरें ही तो याद दिलाती हैं कि उम्र के किन-किन पड़ाव से हम कब-कब गुज़रे हैं।
थोड़ी देर बाद ही बोर्डिंग श्ुरू हुई और हम सब अपने-अपने सीटों पर जा बिराजे। धर्मेंद्र पंत और राजेश राय ने बेईमानी की और दोनों ने एक ‘साज़िश’ कर मुझे अपनी सीट से बेदख़ल कर दिया था। राजेश राय और धर्मेंद्र पंत को एक-दूसरे से गपें मारनी थी, इसलिए उन्होंने यह हेराफेरी की थी। वैसे इस खेल में लूथरा जी भी शामिल थे और तीनों मज़े ले रहे थे। मैं उनके साथ दूसरी क़तार में सुधीर के साथ था। सुधीर से पहली बार मिलना हो रहा था। विमान समय से उड़ा। नींद ने पलकों की झिर्रियों से आंखों में घुसपैठ की। फिर नींद आते देर नहीं लगी। लेकिन यह हालत मेरी ही नहीं सब की थी। नींद ने हौले-हौले सबको अपनी आगÞोश में ले लिया। आंख खुली तो उड़नपरियों (एअर होस्टस) में से एक ने बताया कि थोड़ी देर बाद विमान हैदराबाद हवाई अड्डे पर लैंड करने वाला है। बाहर का मौसम सुहाना लग रहा था। बादलों के टुकड़े आवारा घूम रहे थे। बादलों के बीच से हम विमान को गुज़रते देख रहे थे। यह दृश्य मनोरम था। बादलों के आवारा टुकड़े रूई की तरह इध्र-उधर उड़ रहे थे। मानो दावत दे रहे हों, मुझे पकड़ो। थोड़ी देर बाद विमान लैंड किया तो उड़नपरी ने जानकारी दी कि बाहर का तापमान 20 डिग्री था। दिल्ली की तपती गरमी को झेल कर आए हम लोगों को इस जानकारी ने बेतरह राहत दी। विमान ने हवाईअड्डे की पट्टी को छुआ तो ठीक दो घंटे हो गए थे। यानी हम यहां भी समय से थे।

हैदराबाद का हवाई अड्डा बहुत बड़ा नहीं था लेकिन ख़ूबसूरत था। अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं थीं। यहां से खाड़ी देशों में बड़ी तादाद में रोज़ी-रोटी के लिए लोग गए थे। विमान पट्टी पर खड़े सऊदी एअरलाइंस के विमान ने इसे और साफÞ कर दिया था। बाहर बड़ी तादाद में अपने लोगों का इंतजÞार करते मुसलमानों को देख कर मेरी धारणा और पुख़्ता हुई थी। हम लोग दो गाड़ियों में लद कर उप्पल के राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम के लिए निकले। हमारी गाड़ी में राजेश राय, धर्मेंद्र पंत और लूथरा थे। दिलचस्प बात यह थी कि हम लोगों ने जब हैदराबाद का टिकट कटवाया था तब हमें आंध्रप्रदेश आना था लेकिन जिस दिन हमने हैदराबाद की धरती पर पांव धरा, वह तेलंगाना का हिस्सा हो चुका था। एक दिन पहले ही यह नया राज्य वजूद में आया था और के चंद्रशेखर राव ने पहले मुख्यमंत्री के तौर पर यहां की सत्ता संभाल ली थी। रास्ते में हम इसका ज़िक्र कर रहे थे। पंत हैदराबाद में रह चुके थे इसलिए उन्होंने हमें कई बातें बताईं। हमारे लिए यह जानकारी नई थी। हवाई अड्डे से उप्पल के रास्ते में मुसलमानों का पूरा इलाक़ा आबाद था। ख़ास कर ढेरों रेस्तरां पूरे रास्ते में थे जहां बिरयानी का ज़िक्र ख़ासतौर से किया गया था। सियासी बदलाव की झलक भी साफ़ दिखाई दी। शहर टीआरएस के गुलाबी रंगों के झंडों से रंगा था। चंद्रशेखर राव के बड़े-बड़े कटआउटों से हैदराबाद अटा पड़ा था। हमारे साथ जो ड्राइवर थे, उनका नाम एजाज़ था। राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक और सजग। वे हमारी बातचीत में शामिल हो गए। एजाजÞ ने बताया कि जिस इलाक़े का आप ज़िक्र कर रहे हैं वह इलाक़ा एमआईएम यानी मजलिस इत्तहादुल मुसलमीन के प्रभाव वाला इलाक़ा है। ओवैसी ब्रादरान का यहां दबदबा है। एक भाई विधायक हैं तो दूसरे सांसद। एजाज़ हिंदी या कहें उर्दू ठीकठाक बोल लेते थे। उसमें हैदराबादी लहजे की झलक थी जो हमें अच्छा लग रहा था। तेलंगाना का जिÞक्र करते हुए एजाज़ ने कहा कि नए राज्य से लोगों को कोई फ़ायदा नहीं होगा। सियासी लोगां को ज़रूर फÞायदा होगा। हमने जब उनसे पूछा कि इतना जनसमर्थन फिर टीआरएस को क्यों मिला तो एजाज़ ने कहा कैसा समर्थन, लोगों ने नहीं दिया स्टूडेंट उनके साथ थे। इसका उन्हें फ़ायदा मिला। नहीं तो आम लोगां उनके साथ नहीं थे और हमारा कोई भला होने वाला भी नही। एजाज़ उसी गांव के रहने वाले हैं जहां के चंद्रशेखर राव हैं। एजाज़ बताते हैं कि तेलंगाना के हिस्से में हैदराबाद के अलावा कुछ नहीं आया है। कोई दूसरा विकसित शहर शहर नहीं है। करीमनगर और खम्मम में अभी बहुत विकास होना है। हैदराबाद से ही सटा सिंकदराबाद है। दोनों एक-दूसरे का हिस्सा। ठीक दिल्ली-नोएडा की तरह। यही वजह है कि दोनों को जुड़वां शहर कहा जाता है।

एजाज़ तेलंगाना की एक तस्वीर हमारे सामने रखते हैं। वह तस्वीर बहुत रौशन नहीं थी। उनकी बातों से जो लगा उसका लब्बोलुआब बस इतना था कि इस बंटवारे का फ़ायदा भी सियासी लोग ही उठाएंगे, आम लोगों के लिए तो ज़िंदगी वैसी ही रहेगी जो कल थी और जो आज है। उनके लिए तो सारी नदियां सूखी ही मिलेंगी और पानी सियासत की गलियों में इठलाता, बल खाता सियासी गलियों में रहने वालों को ही सींचता रहेगा और वे अपनी फ़सल काटते रहेंगे।

जाम, ट्रैफिक और लोगों का शोर हैदराबाद को देश के दूसरे शहरों से अलग नहीं कर रहा था। शहर में मेट्रो का काम चल रहा था, इसलिए भीड़ ज्Þयादा थी और गाड़ियों व दो पहैया वाहनों के बीच एक-दूसरे से निकलने की होड़ भी। एजाज़ बहुत सलीक़े से गाड़ी चला रहे थे। क़रीब चालीस-पचास मिनट के बाद उन्होंने गाड़ी रोकी तो सामने राजीव गांधी स्टेडियम की भव्य इमारत दिखाई दी। स्टेडियम किसी बड़े उद्योगपति ने बनाया है। वे विशाखा समूह के मालिक थे और क्रिकेट स्टेडियम उन्होंने शौक़ में ही बनाया था। लेकिन आंध्रप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के दबाव पर इस स्टेडियम का नाम राजीव गांधी के नाम पर रखा गया। यह बात दीगर है कि स्टेडियम के अंदर राजीव गांधी का नाम कहीं नहीं दिखाई देता है। अंदर विशाखा क्रिकेट स्टेडियम का ही बोर्ड लगा हुआ है।

स्टेडियम पहुंचे तो घड़ी सुबह के दस बजा रही थी। हम लोगों के ठहरने का इंतज़ाम स्टेडियम में ही बने कमरों में था। उन कमरों से कोई भी स्टेडियम का पूरा नज़ारा देख सकता है। कमरे इतने बड़े कि उतनी लंबाई चौड़ाई में दिल्ली में कई मकान बन जाते हैं। बाद में पता चला कि कारपोरेट घरानों को ध्यान में रख कर स्टेडियम में इन कमरों को बनाया गया है ताकि वे इन कमरों का इस्तेमाल मैच के दौरान अपनी सुख-सुविधा के लिए करें। हमें दूसरे तले पर कमरा मिला था। मेरे कमरे के साथी सुधीर उपाध्याय बने। राजेश राय और धर्मेंद्र पंत हमारे पड़ोसी बने तो चंद्रशेखर लूथरा और परविंदर शारदा को एक कमरे में ठहराया गया। टीम के दूसरे साथियों को भी उनकी पसंद के हिसाब से कमरे मिल गए। कमरों की कÞवायद ख़त्म हुई तो भूख सताने लगी। हम लोगों को चाय की भी तलब लग रही थी लेकिन तब तक न तो मेज़बानों का पता था और न ही चाय-नाश्ते का कहीं इंतज़ाम दिखाई दे रहा था। विमान में खाने की क़ीमत देख कर ही भूख ख़त्म हो गई थी। फिर भी धर्मेंद्र पंत से मैंने कहा कि कम से कम दो समोसे ही ले लेते प्यारे, हम ख़ुश हो लेते यह सोच कर कि आलू का एक टुकड़ा भी दस-बारह रुपए का हो सकता है। पूरे रास्ते मैं और राजेश राय आलू के इन टुकड़ों को लेकर धर्मेंद्र पंत की टांग खींचते रहे। तंग आकर उन्होंने कहा भी कि आपके दो समोसे उधार रहे। लेकिन हमें तो विमान का खाना था, कह कर उनके ‘दावत’ पर हम पानी फेरते रहे। बहरहाल इस चुहलबाज़ी के बीच ही हमारी तरह पत्रकारों की और टोली भी वहां पहुंच चुकी थी। कोलकाता और गुवाहटी के अपने पुराने साथियों को देख कर अच्छा लगा। नींद भी इस बीच दस्तक देने लगी थी। नहा-धो कर तैयार हुआ तो नाश्ते की बाट जोहता रहा लेकिन मेज़बानों ने चाय वगैरह का इंतज़ाम नहीं किया था। हां यह ज़रूर पता चला कि खाने का इंतज़ाम है। तसल्ली हुई और सोचा आधे दिन का रोज़ा ही सही। यों भी रमज़ान की आहट सुनाई देने लगी थी, तो सोचा चलो इसी बहाने अभ्यास हो जाएगा। बहुत देर तक हम गपबाजÞी करते रहे। नींद आकर सुलाने की कोशिश ज़रूर करती रही, लेकिन उससे कहा कि इतनी जल्दबाज़ी ठीक नहीं है। थोड़ा खा लेने दो फिर जो तेरी मजर्Þी। नींद को मेरी यह बात जंच गई। वह इत्मीनान से कमरे के एक कोने में जा बिराजी।

स्टेडियम ने हम सभों को प्रभावित किया था। देश में बेहतरीन स्टेडियमों इसका शुमार होना चहिए। सलीक़े से इस तरह बनाया गया कि कहीं भी बैठ जाएं, पूरे खेल का लुत्फ़ उठा सकते हैं। भव्यता के लिहाज़ से भी अनूठा। वास्तुशिल्प और कारीगरी भी प्रभाव छोड़ने वाला। नीचे बड़ा डाइनिंग हाल, उसके बग़ल में बार। रसरंजन के लिए बेहतरीन जगह। दीवारों पर उम्दा नक्Þक़ाशी। खाने का इंतज़ान नीचे डाइनिंग हाल में था। हम नीचे आए तो कमभख़्त नींद भी साथ हो ली। हालांकि उसे हमने कमरे में ही रहने को कहा लेकिन वह कंबख़्त कहां मानने वाली थी। उसे झिड़का तो वह धीरे से फुसफुसाई, मुझे कमरे में छोड़ कर तुम यह जा वह जा हो जाते तो क्या होगा। अब उसे कौन समझाए कि चाहता भी तो ऐसा नहीं कर सकता। एक तो नया शहर और फिर शहर से दूर। कहां जाता, किस से मिलता। उसे लाख समझाया लेकिन वह टस से मस नहीं हुई। ख़ैर नीचे आया तो बिरयानी की ख़ुश्बू ने भूख और बढ़ा दी। हैदराबाद बिरयानी के लिए मशहूर है। बहुतों से यहां की बिरयानी की शोहरत सुनी थी। बिरयानी के ज़ायक़े ने उस शोहरत को ग़लत साबित नहीं किया। लज़ीज़ बिरयानी के ज़ायक़े का मज़ा ले ही रहा था पंत ने कहा कि कर्ड राइस बहुत अच्छा बना है। कर्ड राइस इससे पहले कभी खाने का इत्तफ़ाक़ नहीं हुआ था। पंत ने कहा तो थोड़ा सा कर्ड राइस लिया। सचमुच अच्छा बना था। खाना खाने के बाद हम सभी कमरे में आए और फिर नींद ने हमें किसी तरह की मोहलत नहीं दी। दो-तीन घंटे हम जम कर सोए।

क़रीब पांच बजे के आसपास पंत ने हमें जगाया। स्टेडियम के ही सम्मेलन कक्ष में छह बजे एसजेएफआइ के इस सालाना समारोह का उद््घाटन होना था। थोड़ी देर में तैयार होकर हम सभी सम्मेलन कक्ष में पहुंच गए। खेलों से सरोकार रखने वाले कई लोग मौजूद थे। टेनिस के पूर्व राष्ट्रीय चैंपियन मुस्तफ़ा गौस को पहचानाता था। तब के कलकत्ता और आज के कोलकाता में उन्हें राष्ट्रीय चैंपियन बनते देखा था। वे फिÞलहाल आई लीग चैंपियन फ़ुटबाल क्लब बंगलूरू एफसी के सीईओ भी हैं। चारू शर्मा भी थे और क्रिकेट खिलाड़ी प्रज्ञान ओझा भी। खेलों से जुड़े और लोगों ने अपने विचार रखे। इस बीच भारतीय बैंडमिंटन में अपनी पहचान बना चुकी ज्वाला गुट्टा आर्इं तो लगा अंधेरे में चिराग़ झिलमिलाने लगे हैं। फ़ीरोज़ी साड़ी में वे सुंदर लग रहीं थीं। सुंदर तो वे हैं हीं, लेकिन उस दिन साड़ी में वे और भी सुंदर लग रहीं थीं। ऐसा नहीं था कि ज्वाला को हम कोई पहली बार देख रहे थे। उन्हें कोर्ट पर शटल काक की तरह उड़ते हुए भी देखा था। प्रेस कांफ्रेंसों में सवालों से उलझते हुए भी और सवालों से बचते हुए भी देखा था। लेकिन हैदराबाद में वे एक अलग ही अंदाज़ में दिखीं। थोड़ी देर बाद वे चलने को हुईं तो मैं और राजेश राय भी उनके साथ हो लिए। कुछ बातें हुर्इं। बुहत ही औपचारिक। राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी को लेकर। हैदराबाद के काशिफ़ मियां से इस बीच दोस्ती हो गई थी। वे तस्वीरें उतार रहे थे। उन्होंने हमें ज्वाला के साथ खड़ा कर दिया। दो-तीन तस्वीरें हमारी उनके साथ खींच ली। दिल्ली में उनसे कई बार मिलना हुए लेकिन कभी उनके साथ फ़ोटो खिंचवाने का ख़याल नहीं आया था लेकिन हैदराबाद में काशिफ़ ने कहा तो मेज़बान के साथ तस्वीरें खिंचवाना अच्छा लगा। ज़ोर काशिफ़ ने ज़रूर दिया लेकिन हैदराबाद की इस सुंदर बाला के साथ तस्वीर खिंचवाने की ललक तो एक पल को अंदर पनपी ही थी। यूं भी वह शाम ज्वाला के नाम ही रही। सम्मेलन देर तक चलता रहा। लेकिन ज्वाला के जाने के बाद मीर का एक शेर बार-बार याद आता रहा- ‘वह आए बज्Þम में इतना तो मीर ने देखा, फिर इसके बाद चिरागों में रोशनी न रही’। ज्वाला के जाने के बाद फिर कैसा सम्मेलन और कहां का सम्मेलन। कुछ देर हम बेमन से बैठे रहे। शाम भी धीरे-धीरे रात में ढलने लगी थी। इसलिए आयोजकों ने भी सम्मेलन को समेटना बेहतर समझा। सफ़र की थकान अभी उतरी नहीं थी और अगले दिन भिनसारे ही उठ जाना था। इसलिए हम सभी सीधे नीचे डाइनिंग हाल में पहुंचे। बग़ल में रसरंजन का सारा सामान था और पत्रकारों की पूरी टोली वहां जमी थी। डाइनिंग हाल में खाने का इंतज़ाम किया जारहा था। इसलिए हम भी बग़ल के ही हाल में चले गए। एक अलग तरह का माहौल। पत्रकारों के सम्मेलन में यह सब कुछ न हो तो भला पत्रकार होने का भी कोई मतलब रह जाता है। एक टेबल पर हम भी जम गए, शीतल पेय के साथ। अच्छी बात यह थी कि हमारी टोली में ‘सूफियों’ की तादाद ज्Þायादा थी। जिन्हें न तो रस में मज़ा आता था और न ही रंजन में। बस दूसरों को देख कर ही ख़ुश हो लेते थे। जो एकाध ‘काफ़िर’ थे भी तो बस इतना भर कि सुराही देख कर ही उनका गला तर हो जाता था। दूसरों की तरह नहीं कि मुफ्Þत की दारू मिली नहीं कि इतनी पी कि न अपनी फ़िक्र न ज़माने की। इसलिए हमें बहुत फ़िक्र नहीं थी किसी के गिरने की या होश खोने की। थोड़ी देर कोल्ड ड्रिंक से शग्Þल करने के बाद हम सभी खाने के लिए उठ गए। बिरयानी रात में भी था खाने में लेकिन चिकन के बजाय मटन की थी। कई तरह की सब्ज़ियां भी थीं। मिर्च का सालन भी था। मिर्च मैं कम खाता हूं। इसलिए मिर्च का सालन से बचता हुआ आगे बढ़ा तो परोसने वाले ने इसरार किया- और थोड़ा सा सालन मेरी प्लेट में डाल दिया। हैदराबाद की यह मख़सूस डिश है और बिरयानी के साथ लोग इसका लुत्फ़ लेते हैं। मुझे भी यह पसंद आई। मीठे में ख़ूबानी से बना एक डिश था जिसे आइस्क्रीम के साथ मिला कर खाया तो एक अलग तरह के ज़ायक़े ने दो-आत्शा का काम किया। खाने से फ़ारिग़ हो कर हम अपने कमरे में जा बिराजे। थोड़ी देर आराम करन के बाद राजेश राय के कमरे में हम गपें मारने लगे। हमें परविंदर शारदा का भी इंतज़ार था। वे टीम के कप्तान थे और किसी काम की वजह से हमारे साथ नहीं आ पाए थे। रात की फ्लाइट से उन्हें आना था इसलिए पंत ने कहा कि वे उनके आने के बाद ही सोएंगे। वे चंद्रशेखर लूथरा के कमरे में चले गए और मैं राजेश भाई के साथ गपें मारने लगा। लेकिन सुबह चूंकि जल्दी उठना था इसलिए थोड़ी देर बाद मैं भी अपने कमरे में आ गया। सुधीर तब तक सो चुके थे। नींद तो बेताब थी ही, बिस्तर पर लेटते ही कब वह आई पता भी नहीं चला। इस बीच अंग्रेज़ी पत्रकारों को लेकर जो धारणा थी चंद्रशेखर लूथरा ने उसे ग़लत साबित कर दिया। कुछ ही घंटों में पता चल गया कि वे तो बिल्कुल हमारे जैसे हैं। इसलिए उनसे ख़ूब छनी और फिर आप से वे तुम हुए फिर तू के उनवां हो गए। उनका ताल्लुक़ शिमला से था और बिटिया चूंकि शिमला में पढ़ रही है तो अचानक एक अनचाहे रिश्ते से जुड़ गया। शिमला की यादें और बातें तो हुर्इं ही राजनीति की बातें भी कम नहीं हुई।

अगले दिन सुबह ने बहुत जल्दी दस्तक दे दी। एक अलसाई-सी सुबह। दिल्ली में सात बजे कौन उठता है भला लेकिन सारा कार्यक्रम यहां तय था इसलिए उठना तो था ही। बिस्तर पर पड़ा नींद की ख़ुमार में डूबा उसका मज़ा ले रहा था कि पंत कमरे में आ गए। फिर कैसी ख़ुमारी और कैसा आलस। पंत कहां सुनने वाले थे भला। ख़ैर इसी में थी कि जल्दी से तैयार हो जाया जाए। और ऐसा ही किया। तैयार होकर हम नीचे उतरे और नाश्ते से फ़ारिग़ होकर स्टेडियम में जमा हुए। हमारे अलावा पश्चिम, पूर्व और मेजÞबाने दक्षिण क्षेत्र की टीम भी मौजूद थी। जेके बोस क्रिकेट टूर्नामेंट का औपचारिक उद््घाटन होना था। वीवीएस लक्ष्मण और पुलेला गोपीचंद को आना था। थोड़ी देर बाद ही दोनों आ पहुंचे। थोड़ी बहुत तक़रीर के बाद खिलाड़ियों से परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। हमारे लिए ही नहीं लक्ष्मण के लिए भी यह एक अनूठा क्षण रहा होगा जब वे पत्रकारों से इस तरह मैदान पर मिल रहे थे। क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद लक्ष्मण कमेंट्री करने लगे हैं। अंग्रेजी के अलावा हिंदी में भी वे कमेंट्री करते हैं। हमारे साथियों से हाथ मिलते हुए वे मेरे पास आए। मैंने हाथ मिला कर अपना नाम बताय, फिर कहा इन दिनों आपकी कमेंट्री सुनना अच्छा लगता है, ख़ास कर हिंदी कमेंट्री सुनना ज्Þयादा अच्छा लगता है। लक्ष्मण हंसे और कहा हिंदी नहीं आती है, अभी सीखनी है मुझे। कुछ दिनों में हिंदी अच्छा बोलने लगूंगा। मैंने उनसे उसी अंदाज़ में कहा नहीं आपको सीखने की ज़रूरत नहीं है आप मैदान पर भी नेचुरल खेलते थे और कमेंट्री बाक्स में भी बहुत ही अनूठे अंदाजÞ में कमेंट्री करते हैं। ख़ास कर आपका जो लहजा है वह ज़्यादा अच्छा लगता है। इसे ‘ख़ालिस’ मत बनाइए, इसी तरह रहने दें आपका नेचुरल तरीक़े से बोलना हमें ज्Þयादा भाता है। लक्ष्मण के चेहरे की हंसी और गहरी हो गई। इस क्लासिक खिलाड़ी को अपने बीच पाकर अच्छा लगा था। फिर गोपीचंद आए। उनसे बैडमिंटन को लेकर बातें हुर्इं। दोनों ने गेंदबाज़ी और बल्लेबाज़ी कर टूर्नामेंट का औपचारिक उद््घाटन किया। हम लोगों ने कुछ अकेले कुछ टीम के साथ तस्वीरें खिंचवाई और फिर अपने मैच के लिए निकल पड़े।

हमारा पहला मैच पूर्व क्षेत्र से था। मैच सिंकदराबाद के जिमख़ाना क्लब में था। स्टेडियम से क़रीब तीस-चालीस मिनट का रास्ता। दोनों टीमें बस से रवाना हुर्इं। हैदराबाद दूसरे शहरों से अलग नहीं लगा। वही जाम, उसी तरह लोगों का रेला, वाहनों के जल्दी निकलने की होड़। सिर्फÞ शहर और लोगों के चेहरे बदले दिखे, बाक़ी सब कुछ वैसा ही। हैदराबाद में गंदगी, झुग्गियां और अफ़लास में डूबे लोग यहां भी थे। दो पहैया वाहनों की भरमार लेकिन ज्Þयादातर हैलमेट से बेपरवाह। बहुत कम लोगों को हैलमेट पहने देखा, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए था। लेकिन यह शहर कुछ एक बातों के लिए हमारे शहरों से अलग ज़रूर है। एक तो पूरे शहर में फ़िल्मों के बड़े-बड़े पोस्टर दिखाई दिए, यानी सिनेमा हालों की संस्कृति बची हुई है। हमारे यहां सिनेमा के पोस्टर अब कम दिखाई देते हैं, जबकि पहले पूरा शहर पोस्टरों से पटा होता था। एक ख़ास चीज़ ने मेरा ध्यान खींचा था। यह इस शहर के चरित्र का हिस्सा-सा लगा। पूरे शहर में जगह-जगह मज़ारों जैसा कुछ बना है और हुजरे के ऊपर लगा चांद-सितारे वाला हरा झंडा बताने के लिए काफी है कि इसका ताल्लुक़ मुसलमानों से है। लेकिन यह हुजरा क्यों और किसलिए बनाया गया है, इसकी जानकारी कोई नहीं देता। बस सिर्फÞ इसके सिवा कि यह सालों से बने हैं और लोगों को इनसे अक़ीदत है लेकिन इस अक़ीदत के पीछे कोई तर्क नहीं। लेकिन दिलचस्प यह भी था कि मुसलमानों के इन ‘अक़ीदतगाहों’ से सटे ही मंदिरों की तादाद भी कम नहीं थी। इनमें हनुमान मंदिर की तादाद ज्Þयादा थी। कई मंदिर तो बहुत बड़े क्षेत्रफल में थे। कुछ मंदिर की दीवारें या इसे यों भी कहें कि मुसलमानों के अक़ीदतगाहों से गले मिलती नज़र आर्इं। यानी एक की दीवार ने दूसरे की दीवार को थाम रखा था। जीवन में बहुत कम ऐसा होता है। यहां एक दिल दूसरे दिल से जुड़ नहीं पाता, और इसी न जुड़ने की वजह से हम एक-दूसरे का गला काटने से भी गुरेज़ नहीं करते। लेकिन हैदराबाद में हिंदू-मुसलमानों के अक़ीदतगाहों का यह संगम एक नज़ीर है। हालांकि कभी-कभार देश के दूसरे हिस्सों की तरह हैदराबाद से भी तनाव की ख़बरें आती रही हैं। पता नहीं उस वक्Þत यहां के लोगों को सड़कों पर बने शिवाले और इबादतगाहें क्यों मोहब्बत के लिए प्रेरित नहीं करते, जबकि उन्हें बनाने वाले और देखरेख करने वाले हाथ तो इंसानों के ही होते हैं। इन सब के बीच ही एक और दिलचस्प चीज़ दिखाई दी। अमूमन उत्तर भारत में ऐसा कम देखने को मिलता है लेकिन हैदराबाद में यह देखने को मिला। मसजिदों के दरवाज़ों पर ‘अहले-सुन्नत, अहले हदीस या अहले जमाअत’ लिखा दिखाई पड़ा। यानी ख़ुदा के घर को भी हमने फ़िरकÞों में बांट डाला है। अल्लामा इक़बाल की पंक्तियां ‘मस्जिदें मर्सियांखां हैं कि नमाज़ी न रहे / यानी वह साहेब-ए-औसाफ़ हजाजÞी न रहे / यूं तो सैयद भी हो, मिजर्Þा भी हो, अफ़गÞां भी हो / तुम सभी कुछ हो, बताओ तो मुसलमां भी हो! / फ़िरक़ाबंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैं / क्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैं’ याद आ गर्इं। एक ख़ुदा और रसूल को मानने वाले आपस में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े दिखाई दे रहे हैं और वह भी मज़हब को ढाल बना कर। कौन इन्हें समझाए कि ख़ुदा का घर तो सबके लिए खुला होता है क्या सुन्नी, क्या शिया, क्या देवबंदी क्या बरेलवी। लेकिन अगर वे इन बातों को समझ जाएं तो उनकी दुकानदारी का क्या होगा।

बहरहाल शहर के कई हिस्सों से गुज़रते हुए हम जिमख़ान क्लब पहुंचे। जिमख़ाना क्लब परेड ग्राउंड (सुभाष मैदान) के पास ही था। परेड ग्राउंड के आसपास टीआरएस के गुलाबी रंगों के छोटे-छोटे पताकों की भरमार थी। फूल मालाओं का ढेर वहां लगा था। फूल मुर्झा ज़रूर गए थे लेकिन गेंदे के फूलों का रंग अभी भी फीका नहीं पड़ा था। दो दिन पहले इसी मैदान पर के चंद्रशेखर राव ने नए राज्य का झंडा फहराया था और इसके निशां अब तक यहां बाक़ी थे। जिमख़ाना मैदान पर खेले गए हमने पहले मैच में पूर्व क्षेत्र को बड़े अंतर से हराया। लेकिन इस बीच नुक़सान यह हुआ कि टीम के प्रमुख सदस्य चंद्रशेखर लूथरा ज़ख़्मी हो गए। रन आउट से बचने की चक्कर में उन्होंने डाइव लगाया और नतीजे में क्रैंप हुआ। क्रैंप की पीड़ा उनके चेहरे पर दिखाई दे रही थी। हालांकि मैदान पर मौजूद फीजियो ने उनकी देखभाल शुरू की और लगभग एकाध घंटे की मालिश के बाद वे चलने-फिरने के लायक़ हो गए। मैच के बाद उन्ही रास्तों से होते हुए हम स्टेडियम लौटे और खाना वगैरह से फ़ारिग़ होकर कमरे में आए। शाम में फिर सेमिनार था और इसमें और लोगों के अलावा राजेश चौधरी को भी हिस्सा लेना था। राजेश चौधरी अपने बेगुसराय के हैं और बादबानी यानी नौकायन के धुरंधर हैं। एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीत चुके हैं और वे पहले बिहारी हैं जिन्होंने यह करिश्मा एशियाई खेलों में कर दिखाया है इसलिए हम ‘उन्हें गर्व से बिहारी’ कहते हैं। यूं भी नदियों से राजेश का पुराना नाता रहा है। जिस इलाके से वे आते हैं वहां लहरों के साथ खेलते हुए ही उनका बचपन बीता था। तब लहरें उनसे खेलतीं थीं बाद में उन्होंने लहरों से खेलना सीख लिया और उसे फÞतह करने का गुर भी सीखा। भारत में भला कहां लहरों से खेलने वाले धुरंधरों को कोई जानता है। एशियाई खेलों में कांस्य पदक के अलावा वे कई अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में सुनहरे और सफ़ेद तमग़े भी जीत चुके हैं। लेकिन लहरों के इस खिलाड़ी को बहुत कम ही लोग जानते हैं। कलकत्ता में रहते हुए उनसे फ़ोन पर कई बार बात हुई थी। अब उनसे पहली बार मिलने का मौक़ा मिल रह था तो इसे हाथ से जाने नहीं देना चाहता था।

थोड़ी देर आराम और ज्Þयादा देर गपें मारने के बाद हम एकसाथ सेमिनार के लिए निकले। राजेश आ चुके थे। पीवी सिंधू भी थीं। बैडमिंटन में इस युवा खिलाड़ी ने भी अपनी धाक जमा रखी है। एथलेटिक संघ के अध्यक्ष आदिल सुमारिवाले भी थे। आदिल सुमारिवाला से कुछ दिन पहले ही हमारी (मेरी और राजेश राय की )मुलाक़ात सोनीपत के एक समारोह में हुई थी। हमने वहां उनका इंटरव्यू किया था। यानी थोड़ी सी शनासाई उनसे भी थी।

मैच की थकान हावी थी लेकिन हम जमे रहे। सूरज ढल चुका था और पत्रकारों की टोली इसी इंतज़ार में थी। एक-एक कर लोग सरकने लगे। सभागार ख़ाली होता इससे पहले ही सेमिनार ख़त्म हो गया। राजेश से मिलने की उत्सुकता थी। पहले वे पतले-दुबले हुआ करते थे लेकिन अब पहले से बदन थोड़ा भर गया है। क़रीब पंद्रह-सत्रह सालों के बाद उनसे मिलना हो रहा था। पहचान देनी पड़ी और फिर उस पहचान की उंगली पकड़े वे सत्रह साल पहले की पगडंडियों पर लौटे तो चेहरे पर शनासाई की चमक हिलोरें मारने लगीं, लहरों की तरह। लहरों के इस नायक से जब बात हुई थी तब उन्होंने एशियाई खेलों में अपने को साबित नहीं किया था। कई साल बाद उन्होंने बादबानी (जिसे अंग्रेज़ी में सेलिंग कहते हैं) में अपना परचम फहराया, आज उस जल यात्री को अपने साथ पाकर अच्छा लग रहा था। वे अपने बिहार से हैं इसलिए थोड़ा और अच्छा लग रहा था लेकिन वे बिहार से नहीं भी होते तो भी उनके लिए इज़्ज़त और सम्मान उतना ही रहता, जितना अब है क्योंकि देश में जिन खेलों को कोई बढ़ावा नहीं दे रहा है उस खेल में राजेश ने अपना दबदबा क़ायम किया है इसलिए उन्हें छूने का और सलाम करने का मन कर रहा था।

दूसरा दिन, दूसरा मैच। लेकिन दूसरा मैच पश्चिम क्षेत्र से हम हार गए। हालांकि उम्मीद नहीं थी कि हम हारेंगे लेकिन उस दिन हमने सचमुच अच्छा नहीं खेला। हारने का दुख तो ज़रूर था लेकिन ऐसा भी नहीं कि हम इसका सोग मनाने बैठ जाते क्योंकि खेल तो बहाना भर होता है, दरअसल इन चार-पांच दिनों में हम ख़बरों की दौड़भाग और आफ़िस के झमेलों से दूर आनंद उठाने के लिए जमा होते हैं। और फिर हार-जीत तो जीवन में लगा ही रहता है, ऐसे मौक़े पर यह शेर ज़ेहन में गूंजने लगता है ‘गिरते हैं शहसवार ही मैदान जंग में, वे तिफ़ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलें’। वैसे भी अभी आख़री मैच बाक़ी था। आख़री मैच में हमें दक्षिण क्षेत्र से दो-दो हाथ करना था। दक्षिण क्षेत्र अपने दोनों मैच जीत कर बमबम था। बहरहाल हार-जीत के इन तमाम लम्हों को पीछे छोड़ कर हम चुहलबाज़ी में लगे थे। हम लोगों के बीच सिर्फÞ एक महिला पत्रकार थीं। ज़ाहिर है कि उनकी चर्चा भी होनी ही थी। लेकिन उनकी चर्चा करते हुए भी हम अपनी सतह से नीचे नहीं उतरे। इस चर्चा में भी इश्क़-मोहब्बत का असर ही ज्Þयादा था। उनके गेसुओं के साथ-साथ उनकी आंखों के हम क़सीदे पढ़ते रहते। इन सबके बीच ही एक दिन उनसे बातचीत का मौक़ा हमने तलाश ही लिया। वे बंगलूर से थीं और एक अंग्रेज़ी अख़बार से जुड़ीं थीं। बस इसके अलावा, वही फ़ुल स्टाप। अब भला किसे फ़ुसर्त है इस उम्र में कि महबूबाओं के नाज़ उठाएं और फिर वे तो महबूबा थीं भी नहीं।

शाम को फ़ुटबाल पर चर्चा होनी थी और मोहम्मद हबीब और अमलराज भी इसमें शिरकत कर करने वाले थे। हबीब अपने ज़माने के मशहूर स्ट्राइकर रहे और कलकत्ता मैदान पर अपनी जादूगरी से लोगों को क़ायल किया। मोहम्मद अकबर उनके भाई थे और दोनों साथ खेला करता थे। मोहम्मडन स्पोर्टिंग, मोहन बागान और ईस्ट बंगाल की क्लब की तरफ़ से दोनों खेल चुके थे। भारतीय टीम की नुमाइंदगी भी दोनों ने की थी। पेले के नेतृत्व में कासमस क्लब की टीम कलकत्ता आई थी तब गोल करने वालों में मोहम्मद हबीब भी थे। अमलराज भी देश के लिए खेल चुके थे। कलकत्ता ने उन्हें शोहरत दिलाई। जिन दिनों कलकत्ता में था तब मोहम्मद हबीब मोहम्मडन स्पोर्टिंग के कोच बन कर भी आए थे। इसलिए थोड़ी पहचान थी। राजेश राय, धर्मेंद्र पंत को पहले ही कह दिया था कि इसमें हमें शिरकत करनी है। हम तीनों साथ कमरे से निकले तो चर्चा शुरू होने में देर थी। गेस्ट रूम में मोहम्मद हबीब और अमलराज थे। हबीब साहब ने मुझे पहचान लिया और छूटते ही पूछ बैठे तुम यहां कहां, कहां हो अभी। उनसे बातें होती रहीं। अमलराज से भी मिला और फ़ुटबाल पर ही बातें होती रहीं। फ़ुटबाल को लेकर उनकी चिंता थी। आई लीग के तजुर्बे को वे सही नहीं मान रहे थे। कमरे में ही एक बुज़ुर्ग शख़्स भी बैठे थे। बाद में पता चला कि वे ज़ुलफ़क्कार उद्दीन साहेब हैं 1956 में ओलंपिक में भारतीय फ़ुटबाल टीम की उन्होंने नुमाइंदगी की थी। उन यादों को उन्होंने साझा किया। तब भारत सेमीफाइनल में हंगरी से हार कर चौथे स्थान पर रहा था। हैदराबाद में फ़ुटबाल के ख़त्म होने की पीड़ा भी उन्हें थी। बहरहाल वह शाम यादगार रही थी। रात में सिकंदाराबद जिमख़ाना में दावत थी। बिरयानी ही नहीं हमने मुर्गÞ-मोसल्लम का लुत्फ़ भी उठाया। खाना ज़ायक़ेदार था और हैदराबाद की ख़ुश्बू उसमें रची-बसी थी।

तीसरे दिन क्रिकेट मैच नहीं था। लेकिन पेनल्टी शूटआउट और बास्केटबाल की फ्री थ्रू प्रतियोगिता थी। हम लोगों ने भी हिस्सा लिया। लेकिन ख़िताबी दौर तक नहीं पहुंच पाए। मनोरंजन हमने ख़ूब किया। सारी प्रतियोगिताएं सिकंदराबाद में आयोजित थीं। लौटते हुए ही तय हो गया था कि शाम में हम किसी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेंगे। सालारजंग म्युज़यम, निज़ाम का म्युज़ियम और चारमीनार देखने जाएंगे। आख़िर हैदराबाद आएं और चारमीनार नहीं देखें तो कैसा हैदराबाद और कैसा हमारा आना। थोड़ा आराम करने के बाद मैं, चंद्रशेखर लूथरा, राजेश राय, धर्मेंद्र पंत, परविंदर शारदा और सुधीर उपाध्याय स्टेडियम से निकल पड़े। हम सबने तय किया कि चारमीनार तक नगर बस से चला जाए। थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद बस आई और हम सभी को सीट मिल गई। शारदा जी आगे बैठे थे। बाद में पता चला कि वह सीट महिलाओं के लिए है। जिस पर बैठने से जुर्माना लगता है। बस की कंडक्टर महिला थीं। सलीक़े से टिकट काटतीं हुर्इं। हमें देख कर समझ गर्इं थी कि हम पर्यटक हैं। हमारे पास ही फ़लकनुमा इलाक़े के एक सज्जन बैठे थे। वे हमारे गाइड बन गए। जलाल उद्दीन पाशा नाम था उनका। रास्ते में वे हमें पूरे इलाके की जानकारी देते रहे। हम अंबरपीठ, चादरघाट, दारुलशफा इलाकों से होते हुए चारमीनार पहुंचे। रास्ते में कंडक्टर ने कुछ लड़कों को बुरी तरह डांटा था। पाशा साहब ने बताया कि बस में लड़के गुटका और पान खा कर सवार हुए थे इसलिए कडक्टर ने डांट पिलाई। उतरते वक्Þत मैंने उनसे पूछा कि आपको हिंदी आती है या नहीं तो वे बोलीं आती है न मियां। दुबली-पतली सी उस लड़की ने अपना नाम निर्मला बताया था। उनसे जब पूछा कि आपने तो उन बच्चों को बुरी तरह डांटा तो वे थोड़ा शर्मा-सी गर्इं फिर कहा वे बस में गुटका खा कर सवार हुए थे जो ठीक नहीं था। हमारे यहां महिलाओं की बात तो जाने दें पुरुष कंडक्टर में भी इतनी हिम्मत नहीं है कि सार्वजनिक परिवहन सेवा में किसी को डांट पिला दें। रास्ते में पाशा साहब ने ही मक्का मस्जिद की चर्चा की तो अचानक देश के इस सबसे बड़े मस्जिद का ख़याल आया। चारमीनार, चौमहल्ला पैलेस और लाड बाज़ार के बाज़ू में ही तो है मक्का मस्जिद। ग्रेनाइट से बनी यह मस्जिद अपने वास्तुकला के लिए दुनिया भर में मशहूर है। इसमें एक वक्Þत में दस हज़ार लोग नमाज़ अदा कर सकते हैं। गोलकुंडा के क़ुतबशाही वंश के पांचवें शासक मोहम्मद क़ुतुब क़ुली शाह ने इसकी बुनियाद रखी थी। कहा जाता है कि इसकी बुनियाद में मक्का से लाई मिट्टी का इस्तेमाल किया गया था। मस्जिद क़ुतबशाही और आसफÞजाही वास्तुकला का सुंदर नमूना है। मस्जिद के निर्माण में आठ हज़ार मजÞदूरों ने अपनी महारत दिखाई थी। हैदराबाद फ़तह करने के बाद मुग़ल शहंशाह औरंगज़ेब ने इस मस्जिद के निर्माण का काम पूरा किया था। मेहराबों और मीनारों की नक्क़ाशी देखने लायक़ है। इसकी वास्तुकला में चारमीनार और गोलकुंडा क़िले का मिलाजुला रूप देखने को मिलता है। 2007 में इसी मक्का मस्जिद में जुमा की नमाज के बाद विस्फोट हुआ था और कइयों की जान इसमें जान गई थी।

चारमीनार के पास बस हमें उतार कर अगे चली गई। सामने चारमीनार खड़ा जैसे हमें बाहों में भरने के लिए तैयार था। 1591 में चारमीनार का निर्माण हुआ और इसके निर्माण को लेकर यों तो कई कहानियां प्रचलित हैं लेकिन कहा जाता है कि शहर में प्लेग फैला था तब मोहम्मद क़ुली क़ुतुब शाह ने इबादत की थी और दुआ मांगी थी कि शहर से प्लेग ख़त्म हो जाए। अल्लाह ने उनकी यह दुआ क़बूल कर ली और उन्होंने उसी स्थान पर चारमीनार का निर्माण करवाया, जहां उन्होंने इबादत की थी। इस्लामी वास्तूकला का बेहतरीन नमूना है चारमीनार। लेकिन भीड़भाड़ ने इस इमारत की ख़ूबसूरती पर ग्रहण लगा दिया। चारमीनार इलाक़े को देख कर मुझे दिल्ली के जामा मस्जिद या पटना का सब्ज़ीबाग़ का इलाक़ा याद आ गया। जहां इसी तरह लोगों का रेला था। चारमीनार के आसपास ठेले-खोमचे वालों की भीड़, बाहर से आने वाले लोगों को लुभाते और भ्रमाने की कोशिश करते। चारमीनार के आसपास के इलाक़े पर सरकार थोड़ा ध्यान देती और इसके रख-रखाव को लेकर गंभीर रहती तो चारमीनार की ख़ूबसूरती दोबाला हो जाता। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। कई कारण हो सकते हैं, सियासी भी और सामाजिक भी। भीड़ का हिस्सा हम बन गए थे कि किसी ने कहा था ‘हल्लू-हल्लू चलो मियां, चारमीनारां हैं’। हम चारमीनार की ख़ूबसूरती को ठीक से निहार भी नहीं पाए थे कि परविंदर जी की तबियत ख़राब हो गई। थोड़ी देर बाद वे कुछ बेहतर हुए तो बग़ल के लाड बाज़ार की तरफ़ बढ़ चले। लाड बाज़ार मोतियों से बने जेÞवरात के लिए मशहूर है। देर तक हम ख़रीदारी करते रहे। मोतियों की ज्Þयाजातर दुकानें मुसलमानों की है। ख़रीदारी के दौरान ही राहो-रस्म बढ़ चुकी थी और निकलने लगे तो दुआ-सलाम हुआ और मैंने आदत के मुताबिक़ उनसे कहा कि ‘दुआओं में याद रखेंगे’। लूथरा भाई को यह वाक्य बहुत पसंद आया। उन्होंने कहा यार यह तो बहुत अच्छी बात है, चलते वक्Þत कहना कि दुआओं में याद रखें। दुकान से निकले तो शाम ढल चुकी थी। क़ुमक़ुमे जल उठे थे और चारमीनार लाल-पीली रोशनी में जगमगा रहा था। लौटते वक्Þत देखा कि चारमीनार में एक मंदिर भी है जहां पूजा हो रही थी। शंख भी बज रहे थे और कीर्तन भी हो रहा था। थोड़ी देर पहले मक्का मस्जिद से अज़ान की आवाज़ आरही थी। इसी गंगा-जमुनी संस्कृति से तो भारतीय समाज का तानाबाना बुना गया है। यह बात दीगर है कि कुछ लोग इस तानेबाने को हमेशा तार-तार करने की कोशिश में लगे रहते हैं। चारमीनार के पास ही ठेलों पर आम बिक रहे थे। आम तो आम है ख़ास को भी लुभाता है और आम को भी। चंद्रशेखर लूथरा का दिल आमों पर आ गया। जब दिल का मामला हो तो फिर क़ीमत क्या मानी रखते हैं। लेकिन क़ीमत ने हमें हैरत में डाल दिया। बीस से तीस रुपए किलो बिक रहे थे आम। हमारे यहां के लंगड़ा, मालदह या बीजू, बंबइया की तरह तो नहीं थे। कुछ-कुछ फ़जरी से मिलते-जुलते। लकिन मज़ा फ़जरी से बहुत अच्छा। आम खाने का मज़ा तो एकाध में होता ही नहीं इसलिए पांच किलो आम चंद्रशेखर भाई ने ख़रीद लिया।

उप्पल के लिए आटो काफ़ी मशक्Þक़त के बाद मिला। आटो चालक का नाम काशिफ़ था। राजनीति से जुड़े हुए। एमआइएम के समर्थक। उन्होंने भी कहा कि तेलंगाना से बहुत ज्यÞादा फ़यदा होने वाला नहीं है। काशिफÞ ने ही बताया कि खाड़ी देशों से यहां एक दिन पैसा नहीं आए तो प्रदेश की अर्थव्यवस्था उससे प्रभावित हो जाती है। हैदराबाद के हज़ारों लोग खाड़ी देशों में काम करते हैं। उन्होंने बिल्डर और ज़मीन माफ़िया की भी चर्चा की- देख लेना मियां हल्लू-हल्लू ये सारी जगह मकानों से भर जाएगी.., सड़कें छोटी पड़