narendra-modi-and-amit-shahby—- -अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी अब मोदी-शाह प्राइवेट लिमिटेड बनती जा रही है। यह दोनों जिस तरह चाहते हैं वैसे ही सरकार और पार्टी चल रही है। भाजपा संसदीय बोर्ड के पुनर्गठन पर इस तरह की चर्चा स्वाभाविक ही है। जिस तरह अटल जी, आडवाणी जी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी को संसदीय बोर्ड में न शामिल कर मार्गदर्शक मंडल में रखा गया है उससे नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की मंशा पर सवाल उठने लगे हैं। भाजपा का कहना है कि वह बुजुर्ग नेताओं की बजाय युवा नेतृत्व को जिम्मेदारी सौंपने की नीति पर चल रही है। मगर इतना होता तो शायद किसी को आलोचना का मौका नहीं मिलता। जिस तरीके से अमित शाह ने बागडोर संभाली उसी से लग गया था कि यह दोनों मिलकर सबसे पहले उन नेताओं को पार्टी मामलों से हटाएंगे जिनसे इनको खतरा है। पहले विपक्ष को समाप्त किया और अब पार्टी के अंदर किसी भी तरह की चुनौती देने वालों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। नरेन्द्र मोदी ने उन लाल कृष्ण आडवाणी को अपमानित किया है जिन्होंने मोदी को हाथ पकड़ कर राजनीति सिखाई। अमित शाह ने भाजपा की डोर संभाली तभी तय हो गया था कि पार्टी के फैसले गुजरात मॉडल की तर्ज पर होंगे। इन दोनों ने गुजरात में भी यही किया। सबसे पहला काम गुजरात में यह किया कि भाजपा-संघ के उन नेताओं को हटाया जो मोदी की राय से सहमत नहीं थे। अटल जी का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वे पार्टी की गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी नहीं कर पाते मगर यह बात लाल कृष्ण आडवाणी और डॉ. जोशी के मामले में सही नहीं है। उनकी उम्र जरूर अधिक हो चली है पर पार्टी में उनकी सक्रियता लगातार बनी रही है। मैं आडवाणी जी के साथ कई यात्राओं पर गया हूं, दोनों विदेश और देश में। मैं दावे से कह सकता हूं कि आडवाणी जी युवाओं से भी ज्यादा फिट हैं। हमसे पहले वह तैयार खड़े हो जाते थे, हम नींद और थकान के कारण उन जैसी चुस्ती नहीं दिखा सकते थे। चाहे वह आडवाणी हों, चाहे मुरली मनोहर जोशी, दोनों पार्टी के गठन से महत्वपूर्ण फैसलों में साझीदार रहे हैं। इस बार भी वे लोकसभा चुनाव जीत कर आए हैं इसलिए उन्हें संसदीय बोर्ड से बाहर रखना चौंकाता है। साफ है कि आडवाणी और डॉ. जोशी द्वारा मोदी को कुछ समझाना उसे उन्होंने अपना विरोध समझा और दोनों को निकाल बाहर किया। आडवाणी इसी हिटलर शाही प्रवृत्ति का विरोध कर रहे थे। वह मोदी के प्रधानमंत्री बनने का विरोध नहीं कर रहे थे पर उनके काम करने और बदला लेने की प्रवृत्ति का विरोध कर रहे थे। वह पार्टी जनों को यह समझा रहे थे कि मोदी को इतना फ्री हैंड न दो कि पछताना पड़े पर उस समय किसी ने आडवाणी के विरोध का कारण नहीं समझा और यह कहकर बात टाल दी कि चूंकि वह प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं इसलिए वह मोदी का विरोध कर रहे हैं। आज मोदी जी का क्या हाल है। आते ही उन्होंने सबसे पहला काम मीडिया से दूरी बनाई। वह न तो मीडिया से मिलते हैं और न ही मीडिया को कहीं ले जाते हैं। साधारण कार्यकर्ता तो दूर मंत्री तक प्रधानमंत्री से नहीं मिल सकते। अगर मंत्रियों को पीएम से कुछ जरूरी बात करनी है तो उन्हें अमित शाह को बताना पड़ता है। जहां तक डॉ. जोशी का सवाल है उन्हें इसलिए अपमानित किया जा रहा है क्योंकि उन्होंने नरेन्द्र मोदी के लिए अपनी बनारस की लोकसभा सीट छोड़ने से मना कर दिया था। इसकी खुन्नस नरेन्द्र मोदी को होगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। सरकार बनने के बाद इसके संकेत मिलने लगे थे। डॉ. जोशी एक सफल मानव संसाधन विकास मंत्री रहने के बावजूद उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई है और उनको अपमानित करने,जख्म पर नमक छिड़कने के लिए एक नौसिखिया स्मृति ईरानी को कैबिनेट मंत्री बना दिया गया। आडवाणी को लोकसभा अध्यक्ष बना सकते थे। उनका राजनीतिक अनुभव, तजुर्बा पार्टी व सरकार के काम आता और फिर जहां तक मुझे याद है कि आडवाणी ने कभी भी मोदी की नीतियों का विरोध नहीं किया। पार्टी में वरिष्ठतम नेता होने के बावजूद उन्हें लोकसभा में प्रधानमंत्री के पास वाली सीट पर नहीं बैठने दिया गया। यह सब उन्हें सम्मान देने का सूचक तो नहीं कहा जा सकता। अब यह बात छिपी नहीं है कि नरेन्द्र मोदी अपनी परिधि में ऐसे किसी भी व्यक्ति को नहीं रखना चाहते जो उनका विरोधी रहा हो या विरोध कर सकता है। इस बात में भी दम लगता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी आडवाणी के विद्रोही तेवरों से नाराज चल रहा था और वह उन्हें किनारे करने का मौका तलाश रहा था, सो अमित शाह ने इसके लिए सही मौका तलाश कर लिया और अपने `साहेब’ की इच्छा पूरी कर दी। आडवाणी-जोशी के आंसू पोंछने के लिए उन्हें मार्गदर्शक मंडल में भेजकर नीति-निर्धारण संबंधी अधिकारों से दूर कर दिया गया। मार्गदर्शक मंडल जैसी कोई व्यवस्था भाजपा के संविधान में नहीं है, इसलिए उनसे कितना मार्गदर्शन लिया जाएगा, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। कांग्रेस के राशिद अल्वी ने चुटकी लेते हुए कहा कि मार्गदर्शक मंडल नहीं, यह तो मूकदर्शक मंडल और ओल्ड एज होम है। 34 साल की भाजपा में पहली बार मार्गदर्शक मंडल जैसी समिति बनाई गई है। इसे तीनों बुजुर्ग नेताओं की सम्मानजनक विदाई के मंच के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल भाजपा यह संदेश नहीं देना चाहती कि उसने पार्टी के तीनों संस्थापकों को दरकिनार कर दिया। भाजपा ने मार्गदर्शक मंडल की जानकारी वाली जो विज्ञप्ति भी जारी की है जिसमें जिन पांच नामों की सूची दी गई है उसमें आडवाणी से पहले नरेन्द्र मोदी का नाम है। सूची का क्रम हैö1. अटल बिहारी वाजपेयी, 2. नरेन्द्र मोदी, 3. लाल कृष्ण आडवाणी, 4. मुरली मनोहर जोशी, 5.राजनाथ सिंह। आडवाणी-जोशी के बाद अब नम्बर है राम लाल का। साफ है कि मोदी-शाह प्राइवेट लिमिटेड ही अब भारत पर राज करेगी।