rapewasatullah khaan

अंग्रेजी में बलात्कार शब्द मौजूदा मायनों में पंद्रहवीं सदी से उपयोग होना शुरू हुआ. इससे पहले रेप मतलब लूट और शोषण आदि होता था. लेकिन आज बलात्कार का एक ही मतलब है यानी किसी के शरीर पर बल और हिंसा के माध्यम से यौन कब्जा . जरूरी नहीं कि यह शक्ति शारीरिक हो. मानसिक रूप से शिकार का मानसिक नियंत्रण करके उसकी सहमति के बिना या उसकी बेबसी का लाभ उठाते हुए यौन लक्ष्य पूरे करना रैप ही श्रेणी में आता है. जैसे किसी हम लिंग या लिंग प्रतिद्वंद्वी से दोस्ती करना और फिर नशे की हालत में या सोते हुए या बहला फुसला कर धौंस, धमकी और तस्वीरें सहित ब्लैकमेलिंग का कोई भी तरीका इस्तेमाल करते हुए शारीरिक शोषण करना.

बलात्कार के शिकार और शिकारी के लिए उम्र कैद नहीं. लेकिन आम तौर पर बलात्कार का शिकार कम सुन बच्चे या बच्ची से लेकर पचास वर्ष तक उम्र की महिलाओं होती हैं. जबकि शिकारी प्राथमिक स्कूल के शारीरिक रूप से शक्तिशाली बच्चे से लेकर साठ पीनसठ वर्ष तक आदमी कोई भी हो सकता है. जरूरी नहीं कि बलात्कार का शिकार पुरुष हो और शिकार महिला है. एक ही लिंग के लोग भी शिकार और शिकारी हो सकते हैं और पुरुष भी महिलाओं के हाथों बलात्कार हो सकता है.

ज्यादातर घटनाओं के अध्ययन से यह बात सामने आई है कि कम रीपसट या बलात्कार के शिकार एक दूसरे के लिए अजनबी हैं. अधिकांश जानने वाले ही शिकार और शिकारी बनते हैं. इनमें करीब रिश्तेदारों से लेकर मोहल्ले और शहर अधिकारियों तक कोई भी हो सकता है. इस तरह की घटनाओं से ज्यादातर छिपा रह जाती हैं या रखी जाती हैं और कुछ समाजों में तो इन घटनाओं को कवर अनुपात उसी से नब्बे प्रतिशत तक पाया जाता है.

जैसे बहुत कम घटनाएं सामने आने के कारण बहुत कम सजा मिलती है और बहुत कम घाव सुरदगान शारीरिक और मानसिक बहाली संभव होती है. लेकिन देखा गया है कि वारदातें छिपाने या अनदेखी या भूल जाने से बलात्कार कम नहीं होते बल्कि और बढ़ जाते हैं. लेकिन छुपाने और प्रदर्शित करने का दारोमदार भी है कि समाज के सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक संरचना है और कानून सामान्य प्रक्रिया हिस्सेदारी कितनी है या नहीं. आमतौर रीपसट तीन तरह के होते हैं. जो किसी क्रोध या बदले की भावना के तहत काम करते हैं. उनकी वारादत व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों तरह से हो सकता है. पाकिस्तान और हिंदुस्तान जैसे देशों में रेप की ज्यादातर वारदातों के पीछे यही प्रेरणा देखा गया है.

अन्य प्रकार के रीपसट को आप चाहें तो पावर रीपसट कह सकते हैं. उनमें पत्नी, प्रेमिका, घरेलू नौकरानी या कर्मचारी या किसी सहायक या बेबस नजर आने वाले विदेशी आदि अपनी शारीरिक, आर्थिक और सामाजिक शक्ति से हटाइये करने वालों से बच्चों और महिलाओं की रखवाली के ज़िम्मेदार कल्याण स्वयंसेवकों, शिक्षकों, जेल कैदियों, बावर्दी सरकारी अधिकारियों और कॉर्पोरेट और सरकारी बासज़ सहित कोई भी हो सकता है. थानों और सैन्य संस्थानों की हिरासत में आरोपियों के बलात्कार के लिए कानून की किताबों में कस्टोडील रैप शब्द मौजूद है.

रीपसट तीसरे प्रकार सीडस्टिक या शिकार यातना नाकी आनंद उठाने वालों पर होती है. आदमी पीड़ा पसंद क्यों बनता है? इस व्यक्तिगत और सामूहिक प्रेरणाएँ एक अलग मनोवैज्ञानिक और सामाजिक बहस के आवश्यकता है. ऐसे रीपसट अपने शिकार प्रकार की मनपसंद शारीरिक और मानसिक यातना नाकी से गुज़ार कर सेक्स तलज़ज़ प्राप्त करते हैं. वे मारपीट से लेकर शिकार संवेदनशील और नाजुक अंगों और चेहरे तक विकृत कर सकते हैं और हत्या भी कर सकते हैं और बाद से हत्या शरीर को विकृत कर सकते हैं. इन सब हरकतों से उन्हें एक तरह आराम मिलता है और अगर वह किसी की नजरों में न आएं तो अगले शिकार की तलाश में निकल पड़ते हैं. आमतौर सीडसट रीपसट अपना काम व्यक्तिगत रूप से करते हैं, लेकिन ऐसे भी उदाहरण हैं कि एक से अधिक पीड़ा पसंदीदा रीपसट समूह के रूप में घटना करते हैं, हालांकि ऐसे उदाहरण कम ही है.

प्रथम विश्व युद्ध के बाद से बीसवीं सदी के लगभग हर संकट में रैप बतौर हथियार इस्तेमाल हुआ. जापान के बारे में कहा जाता है कि उसने पिछली सदी के पहले छमाही में व्यवस्थित कोरिया और चीन क्षेत्र मनचोरिया और नानजिंग में औपनिवेशिक कब्जे दौरान लाखों स्थानीय महिलाओं हमलावर सेना यौन संतोष के लिए कहबह बक्से में बिठा दिया. इन महिलाओं के लिए” कमफरट महिला ‘शब्द तैयार की गई.

अजीब बात है कि वर्ष 1949 के जिनेवा कन्वेंशन से पहले रैप युद्ध अपराधों के सूची में नहीं था. इसलिए नाजियों के खिलाफ नोरम्बरग परीक्षण और जापानी युद्ध अपराधियों के खिलाफ टोक्यो परीक्षण में बलात्कार की अरोप लगाया नहीं हो सकी. लेकिन युद्ध अपराधों की अंतरराष्ट्रीय अदालत ने रवांडा में नरसंहार के परीक्षण के दौरान वर्ष ाठानवे में ऐतिहासिक रोलिंग दी कि दौरान युद्ध रैप भी मानवता के खिलाफ अपराधों की सूची में शामिल है.

आमतौर पर बलात्कार के शिकार के साथ समय सहानुभूति तो जाती है लेकिन उसे अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है. हालांकि जितनी मनोवैज्ञानिक मदद की उसे आवश्यकता है शायद ही किसी को हो. रैप अनुभव गुजरने वाला मानसिक और शारीरिक रूप पर बुरी तरह टूट फूट का शिकार होता है. इस पर कभी गुस्सा ग़ालिब आ जाता है, कभी दुश्मनी की भावना ावद कर आता है और कभी भ्रम तो कभी भय की स्थिति से ग्रस्त हो जाता है. वह अचानक चीख और धाड़ भी सकता है सकते हैं स्थिति में पीड़ित हो सकता है. उसे न तो अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रहता है न ही तंत्रिका तंत्र पर. उसकी भूख और नींद बुरी तरह प्रभावित होती है.

अगर उसे समय मनोवैज्ञानिक मदद और करीबी लोगों का ध्यान न मिले तो अपने जीवन से अलग करता चला जाता है और अत्यधिक कदम के रूप में अपनी जान भी ले सकता है. यह सभी समस्याओं बलात्कार के शिकार मानसिक और शारीरिक बेबसी से जन्म लेते हैं. और यही वह समय है जब उसके प्यारे उसे गले लगाकर और अपने पास रख के बताएँ कि जो कुछ भी हुआ वह निर्दोष है और इन परिस्थितियों में जो भी होता उसके साथ यही होता. उसे सख्त जरूरत होती है कि कोई हो जो जीवन पर विश्वास फिर से बहाल करे. इन परिस्थितियों में उसे अर्थपूर्ण निगाहों से देखना, रवैया बदल लेना, उसी को बार बार दोषी ठहराना और फिर कठघरे में खड़ा कर मजे ले लेकर सवाल और जवाब करने और उसके नाम का प्रचार करना. यह सब हरकतें वास्तव में एक और रेप के बराबर हैं.

रैप खत्म तो नहीं हो सकता लेकिन कम जरूर किया जा सकता है. इसके लिए नियमों को कागज पर कड़ी से अधिक उन पर यकीन क्रियान्वयन की जरूरत है. अपने बच्चों और बच्चों को यह बताने की जरूरत है कि वे घर के अंदर और बाहर किस किस हद तक संबंध रख सकते हैं और सीमा पार होने में कौन कौन से जोखिम पैदा हो सकते हैं. उन्हें उम्र के साथ बदलती शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तन के कारणों के बारे में बाातमाद बनाने की जरूरत है ताकि वह अज्ञानता और अंधेरे में किसी अपने या पराए का शिकार न बन जाएं.

उन्हें उनके लालची प्रोत्साहन के बारे में खुल के बताने की जरूरत है कि उनके लिए फंदा साबित हो सकती हैं. उन्हें यह बताने की जरूरत है कि जीवन न तो बिल्कुल अंधेरा है न ही पूर्ण रोशन. दुनिया नामक इस जंगल में सतर्क भी ​​रहना है , खूंखार जानवरों की पहचान रखनी है और जीवन का आनंद भी करना है. उन्हें यह बताने की जरूरत है कि आकस्मिक मुसीबत कभी भी किसी भी समय आ सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम धैर्य खो जाओ. हम हैं ना …

अनुवाद — अफ़ज़ल ख़ान