ebola

इन दिनों पश्चिमी अफ्रीकी देश गिनी, लाइबेरिया, सिएरा लियोन, नाइजीरिया आदि में इबोला वायरस बुखार की महामारी फैली है। हजार से ज्यादा लोग इस बीमारी से मौत के मुंह में जा चुके हैं और सैकड़ों बीमार हैं। गंभीर हालात को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे वैश्विक संकट घोषित कर दिया है। दुनियाभर में अफरातफरी मची है। भारत में भी सरकार ने हेल्पलाइन शुरू करके दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल को इलाज के लिए तैयार किया है। इन सब हलचलों के बीच यह सवाल प्रमुखता से उठ रहे हैं कि आखिर पश्चिमी अफ्रीका के इन देशों में ही यह महामारी क्यों फैलती है, क्या यह बीमारी बाकी दुनिया को भी अपनी चपेट में ले लेगी और यदि बीमारी सारी दुनिया में फैली तो क्या दुनिया इसकी रोकथाम के लिए तैयार है?

पहले सवाल का जवाब मिलता है- भयंकर गरीबी और उस पर वहां निरंतर चल रहे गृह युद्ध। यानी करेला और नीम चढ़ा।
दूसरे सवाल का जवाब है- हां, क्योंकि अफ्रीका में भी यह वायरस नए इलाकों में पहुंच रहा है। ऐसे में अचरज नहीं होगा यदि यह वायरस बाकी दुनिया में भी पहुंच जाए। वैसे भी आज दुनिया हर रोज पहले के मुकाबले ज्यादा निकट आती जा रही है।
तीसरे सवाल का जवाब है- नहीं, दुनिया इबोला से मुकाबले के लिए तैयार नहीं है।

76 में मिला था पहला केस

उल्लेखनीय है कि इबोला का पहला केस 1976 में मध्य अफ्रीका में स्थित कांगो में पाया गया था। तब कांगों का नाम जायरे था और इबोला नदी से इस देश के जुड़े होने से वायरस का नाम इबोला पड़ा था। 76 के बाद से कई बार इबोला वायरस का खतरनाक बुखार महामारी के रूप में फैल चुका है। आधा दर्जन से ज्यादा बार यह वायरस कांगों के साथ ही उंगाडा, सूडान में भी कोहराम मचा चुका है। लेकिन इस बार का हमला बड़ा है और साथ ही नए इलाके यानी पश्चिमी अफ्रीका में है।

दुनियाभर में छप रहीं रिपोर्टों के अनुसार ताजा महामारी का पहला केस दिसंबर 2013 में मध्य अफ्रीका के बजाय पश्चिमी अफीक्रा में स्थित गिनी में मिला था। कांगो से हजारों मील दूर। वैज्ञानिकों ने इसमें कांगो में मिले वायरस जैसे ही लक्षण पाए थे। वैज्ञानिक सोच रहे हैं कि यह वायरस मध्य से पश्चिमी अफ्रीका कैसे पहुंचा? पहली संभावना तो यह जताई जा रही है कि यह कांगो वाला वायरस नहीं है, बल्कि इसका छठा वर्जन है। हालांकि छठा वर्जन होने के बावजूद यह मूल वायरस से 97 फीसदी समान है।

दूसरी संभावना किसी रोगी के जरिये इसके पश्चिमी अफ्रीका पहुंचने की है। लेकिन कहा जाता है कि इबोला वायरस बुखार के लक्षण उभरने के एक हफ्ते के अंदर रोगी की मृत्यु हो जाती है, इसलिए किसी रोगी के मध्य अफ्रीका से लंबी दूरी तय करके गिनी पहुंच पाना संभव नहीं लगता।

चमगादड़ हैं सबसे बड़े कैरियर

सबसे ज्यादा संभावना चमगादड़ों के जरिये इस बीमारी के गिनी पहुंचने की है, क्योंकि चमगादड़ काफी लंबी दूरी तक उड़ान भरते हैं। फल खाने वाले चमगादड़ इस वायरस के मूल वाहक माने जाते हैं। फलों को आधा-अधूरा खाकर ये जमीन पर गिरा देते हैं। उन फलों को बंदर, चिम्पैजी, गोरिल्ला, कंगारू जैसे जानवर खाते हैं और इबोला वायरस की गिरफ्त में आ जाते हैं। इसके बाद इन जानवरों के संपर्क में आने वाले लोगों में यह बीमारी आसानी से फैल जाती है। इस बीमारी से पीड़ित अफ्रीका के इन देशों में तो चमगादड़ को भी खाया जाता है, इसलिए इस बीमारी का यहां होना लाजिमी है।

खाने के अयोग्य चीजें भी इन देशों में इसलिए खायी जाती हैं क्योंकि ये दुनिया के सबसे गरीब देशों में शामिल हैं। लोग भूख के मारे हैं। इसके अलावा जितने भी देशों में यह बीमारी फैली है, वहां गृह युद्ध के कारण भी हालात बहुत बदतर बने हुए हैं। भयानक संघर्ष के हालातों में इन देशों के लोग तुरंत जरूरत के लिए जंगलों को काटते हैं, जो भी पशु-पक्षी दिखाई देता है, उसका शिकार करते हैं और गुफाओं में शरण लेते हैं। नतीजतन जंगली जानवरों के संपर्क में आकर ये आसानी से इबोला वायरस के शिकार बन जाते हैं।

बदतर स्वास्थ्य सेवाएं आसान कर देती हैं संक्रमण

खतरनाक इबोला बीमारी को लेकर गनीमत यह है कि यह एकदम यानी तेजी से नहीं फैलती। यह आसानी से भी नहीं फैलती यानी हवा से नहीं फैलती, बल्कि मरीज के बिल्कुल निकट संपर्क में आने से ही फैलती है। निकट संपर्क यानी खून, पसीना, लार, त्वचा संपर्क, संभोग आदि के जरिये। मगर गरीबी के स्वाभाविक नतीजे के रूप में मौजूद बदतर स्वास्थ्य सेवाएं अफ्रीकी देशों में इस बीमारी को आसानी से फैला देती हैं।

इबोला वायरस बुखार का मरीज तो छोड़िए, यदि किसी विकसित देश के अस्पताल में कोई व्यक्ति उल्टी करता हुआ या शरीर से खून बहता हुआ भी प्रवेश करेगा तो अस्पताल का स्टाफ दस्ताने और रोग प्रतिरोधी कपड़ों के साथ उसे हैंडल करेगा, लेकिन इससे भी गंभीर इबोला वायरस बुखार का मरीज जब किसी अफ्रीकी देश के अस्पताल में आता है तो दस्तानों तक से महरूम वहां के डॉक्टर और नर्सें बड़ी आसानी से बीमारी की चपेट में आ जाती हैं। इनसे यह बीमारी बाकी लोगों में भी फैल जाती है।

50 हजार भारतीय रहते हैं प्रभावित इलाकों में

जहां तक भारत का सवाल है तो मुश्किल यह है कि इबोला से प्रभावित इलाकों में करीब 50 हजार भारतीय रह रहे हैं। महामारी के बाद इनमें से अनेक भारत लौटने की कोशिश हैं, जिसके फलस्वरूप ये इस वायरस को स्वदेश में ला सकते हैं। भारत समेत अनेक देशों ने हवाई अड्डों पर स्वदेश लौटने वाले यात्रियों की गहन जांच की व्यवस्था की है। अब देखना यह होगा कि यह जांच कितनी गंभीरता से होती है। जांच की गंभीरता और बनाए गए कंट्रोल रूम की सक्रियता ही बीमारी को भारत से दूर रखने में मदद कर सकेगी। खुद गिनी ने सिएरा लियोन और लाइबेरिया से लगी सीमाएं बंद कर दी हैं ताकि लोग एक देश से दूसरे देश न जा सकें।

टीका और कारगर दवाएं अभी परीक्षण के चरण में

इबोला की रोकथाम के लिए अभी कोई टीका विकसित नहीं हो सका है। यह अभी परीक्षण की स्थिति में ही है। बीमारी के इलाज के लिए अभी मरीज को अलग रखने, डिहाइड्रेशन के मुकाबले के लिए उसे ज्यादा से ज्यादा तरल पदार्थ जैसे इलेक्ट्रोलाइट या मीठे और नमकीन पाने का घोल देने और कुछ दवाओं का इस्तेमाल करने का तरीका ही अपनाया जाता है। संक्रमण की शुरुआत में खून को जमने से रोकने की दवा दी जाती है तो बाद में ब्लीडिंग को रोकने की दवा इस्तेमाल होती है। ऑक्सीजन का स्तर बनाए रखने और दर्द को कम करने की दवाएं दी जाती हैं। इलाज जितना जल्दी शुरू हो जाता है, उतनी ही मरीज के बचने की संभावना भी बढ़ जाती है।

कुछ उम्मीद जगाने वाली दवाएं भी अभी परीक्षण की स्थिति में ही हैं। जैसे कि जमैप नाम की दवा पहली बार जुलाई 2014 में उन दो अमेरिकियो को दी गई जो इबालो वायरस की चपेट में आ गए थे। इस दवा के सुखद नतीजे सामने आए हैं। कुछ दवाओं का परीक्षण चूहों पर सफल रहा है। लेकिन कुल मिलाकर दवाओं का मामला अभी परीक्षण के चरण में ही है।

सबसे दुखद यह है कि भारी मुनाफा कमाने वाली दुनिया भर की दवा कंपनियां इबोला को काबू में करने वाली दवाओं के लिए निवेश करने में हिचक रही हैं। यदि बीमारी बड़े पैमाने पर फैल गई तो पहले से दी जा रही दवाओं का भी पर्याप्त स्टॉक मौजूद नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि इन कंपनियों को इस दिशा में आगे बढ़ने पर मुनाफा नजर नहीं आता है। अफ्रीकी देशों की गरीबी यहां भी बीमारी पर काबू पाने में आड़े आ रही है।

कुल मिलाकर इबोला यदि बाकी दुनिया में आकर भी बोलने लगा तो दुनिया त्राहि त्राहि करने लगेगी क्योंकि डॉक्टरों के पास इसकी रोकथाम के बहुत सीमित साधन ही मौजूद हैं।
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इबोला वायरस बुखार के बारे में कुछ और जरूरी तथ्य

1- इसके लक्षण कुछ-कुछ मलेरिया, फ्लू, कॉलरा और वायरल हेमरेजिक बुखार जैसे होते हैं, इसलिए अक्सर रोग की पहचान में देरी हो जाती है। खून के नमूने से ही इस रोग की पहचान की जाती है।

2- इसके मुख्य लक्षण हैं बुखार, थकान, मांसपेशियों, जोड़ों और सिर में दर्द, भूख न लगना गले में खरास, आंखें लाल हो जाना, उल्टी-दस्त और त्वचा का गलने लगना। इसी के साथ ही लिवर और किडनी की कार्यक्षमता भी कमजोर पड़ जाती है। इस स्थिति तक आते-आते व्यक्ति के शरीर से ब्लीडिंग भी होने लगती है। खून नाक से, मसूड़ों से, उल्टी के दौरान मुंह से, गुदा से या योनि से आ सकता है। त्वचा में इंजेक्शन लगने वाले स्थान से भी खून आ सकता है।

3- वायरस की गिरफ्त में आने के बाद व्यक्ति में रोग के लक्षण प्रकट होने में दो दिन से तीन हफ्ते तक का समय लग सकता है।

4- चमगादड़ इबोला वायरस को फैलाते हैं मगर खुद इससे प्रभावित नहीं होते हैं। इबोला वायरस के छह प्रजातियों की पहचान की जा चुकी है।

5- पुरुष मरीज का वीर्य दो महीने तक रोग को दूसरे व्यक्ति में फैलाने की क्षमता रखता है।

6- बचाव का सबसे अच्छा तरीका यही है कि मरीज के निकट संपर्क से बचा जाए। खुले अंगों से उसकी त्वचा न छूने पाए। उसका पसीना, लार आपके शरीर से न लगे। इसके लिए पूरे शरीर पर कपड़े होने चाहिए और यदि आसपास ऐसा मरीज हो तो हमेशा कुछ खाने से पहले हाथों को अच्छी तरह धोना चाहिए। मरीज को कमरे में अलग और अकेला रखा जाए। इलाज करने वाले स्टाफ को मास्क, ग्लव्ज, गाउन और गॉगल पहनना जरूरी होता है।

7- इस बीमारी से मरे व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी बहुत सावधानी से मेडिकल देखरेख में करना होता है, वरना संक्रमण की पूरी आशंका रहती है।

8- यह वायरस खतरनाक इसलिए है क्योंकि इसकी चपेट में आने वाले लोगों में 50 से 90 फीसदी लोगों की मौत हो जाती है।