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अनिल यादव

जो लोकसभा देश के विकास में एक अहम् भूमिका निभाती है, जनप्रतिनिधियों द्वारा जहां देश हित के कार्यों को अंजाम दिया जाता है, जो लोकतंत्र की गरिमा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से बनाए हुए है. वो लोकसभा जहां जनता के प्रतिनिधि बैठकर देश के लिए कानूनी का निर्माण करते हैं, कुछ पुराने कानूनों में संशोधन किया जाता है. देश के हित में चर्चाएं की जाती हैं, अगर वहीँ हंगामे और दलों के झगड़े होते रहे तो कैसे देश के हित में कार्य हो सकेंगे? कैसे जनता का भला हो सकेगा? अगर इस ओर गहराई से देखा जाए तो संविधान निर्माताओं ने यह देखा था कि देश की समस्याओं को संसदीय कानूनों से हल किया जा सकता है. और इसके द्वारा कार्यपालिका पर भी नज़र रखी जा सकती है. इसी को ध्यान में रखते हुए 1952 से 1967 तक तीन लोकसभाओं ने औसतन 600 दिन यानी 3700 घंटे तक काम किया है, और इसी दौरान लगभग 250 विधेयक भी पारित किये गए हैं, अनगिनत मुद्दों पर चर्चाएं की गयी है, जबकि अगर हम ‘पीआरएस’ के आंकड़ों के माध्यम से अपनी वर्तमान लोकसभा यानी 15वीं लोकसभा पर नज़र डालें तो यह लोकसभा महज 345 दिन यानी 1335 घंटे ही चली. 15वीं लोकसभा का लगभग 35 फीसदी समय हंगामे के कारण व्यर्थ चला गया. तो साफ़ तौर पर कहा जा सकता है कि इस लोकसभा का 40 फीसदी से भी कम समय ही जनकल्याणकारी कार्यों में हो सका, जिस काम को जोरों से किया जाना चाहिये था वह न जाने कितने ही हंगामों के कारण बेकार की बहस में गवां दिया गया. इसके अलावा संसद में आज भी 126 विधेयक बगैर चर्चा के विचाराधीन पड़े हैं. साफ़ तौर पर कहा जा सकता है कि यूपीए-2 की मंशा नहीं थी काम करने की, और उसकी की ढिलाई के कारण ये सब हुआ. क्योंकि संसद को सुचारू रूप से चलाने का काम यूपीए-2 का ही था, विपक्ष के हंगामे के बाद भी सदन को चलाने का जिम्मा कांग्रेस की गठबंधन सरकार यूपीए-2 का था जो उसने सही तरीके से नहीं किया. अगर हम तुलना करें तो 15वीं लोकसभा का कार्यकाल पिछली यानि 14वीं लोकसभा से भी ख़राब रहा, जहां यूपीए-1 के कार्यकाल में 248 विधेयक पारित किये गए थे वहीँ यूपीए-2 के कार्यकाल के यह आंकड़ा महज 170 विधेयकों में ही सीमट गया है. 16वीं लोकसभा के लिए चुनाव सर पर हैं. नए साल का आगाज़ हो चुका है. केवल एक सालाना बजट पेश किया गया, और एक मामूली से लेखानुदान के अलावा कुछ नहीं हुआ. इसके अलावा संसदीय रिकार्ड्स तो यह भी दर्शा रहे हैं कि इस लोकसभा में सांसद की उपस्थिति इस बार सबसे कम रही है. अगर इस लोकसभा का काम सुचारू रूप से चलता तो देश का लगभग करोड़ों रुपयों का ह्राश न हुआ होता क्योंकि संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल कि माने तो संसद को चलाने पर एक मिनट का लगभग 2.5 लाख रुपया खर्च होता है. यहाँ हम कह सकते हैं कि अगर विधेयकों पर गहन चर्चा होती तो यह पैसा व्यर्थ नहीं हुआ होता परन्तु अब यह कहना जरुरी है कि हमारी इतनी बड़ी रकम केवल आपसी बहस की ही भेंट चढ़ कर रह गई, जिसका परिणाम कुछ भी नहीं निकला. तो अगर अब यह कहे कि जनता की कमाई से लिए गए करों का अपव्यय हुआ है तो कोई भी अतिश्योक्ति नहीं है. साथ ही इस लोकसभा में इस धन के बड़े अपव्यय के साथ संसदीय साख और विश्वसनीयता का जो नुक्सान हुआ है, वह अतुलनीय और अद्वितीय है. एक और तो जनता चुनावों में अपने प्रतिनिधि चुनने के प्रति आस्था का प्रदर्शन कर रही है वहीँ हमारे जनप्रतिनिधि हैं जो जनता की भावनाओं को सदन में हंगामे की भेंट चढ़ा रहे हैं. अगर सांसदों का व्यवहार और कार्य इसी तरह चलते रहे तो यह लोकतंत्र के लिए बड़ी चिंता का विषय है. अब यहाँ सवाल यह खड़ा हो जाता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ है जो संसदीय इतिहास में यह 15वीं लोकसभा सबसे कमजोर साबित हुई है. या यह भी हो सकता है कि इस बार की लोकसभा के सामने बहुत से ऐसे असाधारण मुद्दे और चुनौतियां थी कि बार-बार सदन स्थगित होता रहा. इसके अलावा इस लोकसभा के सबसे कमजोर रहने के पीछे जो सबसे बड़ा कारण जगत जाहिर है, वह है घोटाले- टू जी घोटाला, कोयला घोटाला, राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ा घोटाला और इसरो घोटाला भी किसी से छिपा नहीं है, इतना ही नहीं और भी बहुत से घोटाले हैं जो सरकार की साख को धक्का पहुंचाते रहे हैं. इस कारण भी संसद सुचारू रूप से नहीं चल पायी है. ऐसा भी नहीं है कि इस बार संसद में काम हुआ ही नहीं कई बड़े विधेयकों को पारित किया गया है जिनसे देशवासियों को लाभ होगा, इनमे लोकपाल, खाद्य सुरक्षा क़ानून के साथ अगर देखें तो स�