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लगभग सभी समाजों में महिलाओं पर किसी न किसी प्रकार के अत्याचार होते रहे हैं और आज भी हो रहे हैं। इन्हीं अत्याचारों में से एक है महिलाओं का खतना करना। यहां मुद्दा किसी समाज की कमियां या अच्छाइयां गिनाने का नहीं है। अगर हम इस बहस में न पड़ें कि किस धर्म में किस चीज को ठीक ठहराया गया है और किस चीज को गलत और केवल आज के संदर्भ में, मानवीय पहलू से विचार करें तो केवल यही महसूस होगा कि महिलाओं का खतना उनके प्रति पुरुषों का एक बहुत ही बर्बर, वीभत्स, असभ्य और अमानुषिक व्यवहार है। इसीलिए हमें इराक में आईएसआईएस संगठन की तरफ से बच्चियों और महिलाओं का खतना करने के फतवे को घृणा की दृष्टि से देखना चाहिए और इसकी निंदा करनी चाहिए।

हमें इस बात पर संतोष और खुशी होनी चाहिए कि भारत में महिलाएं और बच्चियां इस अत्याचार की शिकार नहीं हैं। खुद दारुल उलूम देवबंद ने फतवे पर अपनी प्रतिक्रिया में यह जानकारी दी है कि इस्लाम में महिला खतने को गलत नहीं माना गया है, लेकिन इसके बावजूद यह चीज भारत में नहीं है। इसका सीधा सा मतलब यह निकलता है कि इस्लाम को मानने वालों के बीच भी अव्यावहारिक प्रथाओं या प्रवृत्तियों को नहीं अपनाने या समय के साथ उनसे पीछा छुड़ा लेने के उदाहरण मौजूद हैं।

भारत में समय-समय पर विधवा विवाह की मनाही, सती प्रथा, बाल विवाह (अभी पूरी तरह समाप्त नहीं), महिलाओं के पढ़ने पर रोक आदि कुप्रथाओं से किनारा किया जाता रहा है। यानी हिंदू-मुस्लिम या किसी भी अन्य समाज में मौजूद उन प्राचीन प्रथाओं और प्रवृत्तियों में से कुछ को अतीत में छोड़ा गया है, जो मानवता की दृष्टि से बिल्कुल भी सही नहीं थी। इसीलिए आज के समय में भी बाकी बची ऐसी कुरीतियों को छोड़ा जा सकता है और छोड़ देना चाहिए, जो प्रथा के नाम पर केवल अत्याचार हैं या फिर शोषण का जरिया। अनेक प्रथाएं, प्रवृत्तियां तो ऐसी हैं जिनका कोई धर्म भी समर्थन नहीं करता, मगर हम फिर भी उन्हें जारी रखे हुए हैं।

किन कुप्रथाओं, कुप्रवृत्तियों को छोड़ सकते हैं हम

सभ्य मानव के रूप में हमें निम्नलिखित कुप्रथाओं, कुरीतियों या कुप्रवत्तियों को तो छोड़ ही देना चाहिए। इनमें से कुछ हिंदुओं में हैं तो कुछ मुस्लिमों में। कुछ दोनों समाजों में हैं। कुछ काफी काफी हद तक खत्म भी हो गई हैं, मगर देश के कुछ हिस्सों में उनका अस्तित्व बना हुआ है।

1- कन्या भ्रूण हत्या यानी बेटियों को जन्म से पहले ही मार देना।

2- बाल विवाह कराना।

3- दहेज लेना और न मिलने पर महिलाओं को प्रताड़ित करना।

4- महिलाओं से जबरदस्ती करना और उन पर जबरदस्ती अधिकार जमाना।

5- घर में पत्नियों और अन्य महिलाओं को पीटना, उन पर अत्याचार करना।

6- केवल तीन बार तलाक कहकर पत्नी को छोड़ देना और फिर दोबारा पत्नी के रूप में अपनाने के लिए भी पत्नी को ही शारीरिक और मानसिक कष्ट देना।

7- पुरुष का चार पत्नियां तक रख लेना, जबकि महिला के किसी गैर पुरुष से बात तक कर लेने पर कहर ढा देना।

8- बलात्कार को साबित करने के लिए चार पुरुष गवाहों का जरूरी होना आदि।

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महिला खतना में क्या होता है

महिलाओं के खतने में महिला जननांग में क्लिटोरिस का हिस्सा काट दिया जाता है। मोटे रूप में कहें तो महिला जननांग का बाहर रहनेवाला सारा हिस्सा काट दिया जाता है। जननांग के रास्ते को भी काफी हद तक बंद कर दिया जाता है और मासिक स्राव के लिए बस छोटा सा रास्ता छोड़ा जाता है।

उल्लेखनीय है कि महिला जननांग में ऊपरी हिस्से में मटर के दाने जैसी बाहर को ऊभरी एक रचना होती है, जिसे क्लिटोरिस कहते हैं। दरअसल यह इसका सिर होता है, जो दिखाई देता है, जबकि वास्तविक रचना अंदर काफी बड़ी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह महिलाओं में पुरुष यौनांग के समानधर्मी रचना होती है। समानधर्मी इस तरह कि जिस प्रकार पुरुष यौनांग का अग्रभाग सहलाने या घर्षण पर उत्तेजित होता है, उसी प्रकार की प्रतिक्रिया क्लिटोरिस भी दिखाती है। इसमें बहुत सारी संवेदनशील नर्व एंडिंग (करीब आठ हजार) होती हैं जिससे इसमें किसी भी प्रकार का घर्षण या दबाव स्त्री को आनंद देता है।

क्लिटोरिस के टिश्यू जननांग के साथ टिश्यू का एक समूह सा बना देते हैं, जो हर स्त्री में अलग-अलग आकार का होता है। क्लिटोरिस जननांग की ओपनिंग (छिद्र) से दूर होता है, लेकिन यह मोंस प्यूबिस और लेबिया जैसी रचनाओं से जननांग से जुड़ा रहता है। इसी वजह से जब क्लिटोरिस में उत्तेजना होती है तो जननांग की दीवारें गीली हो जाती हैं।

सहवास के दौरान क्लिटोरिस के साथ पुरुष के अंग का कोई सीधा मिलन या किसी प्रकार का घर्षण नहीं हो पाता, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि क्लिटोरिस का त्वचा में दबा हुआ भाग पीछे की तरफ से जननांग के अंदर उसकी दीवारों में कहीं खत्म होता है और उसी स्थान पर पुरुष के अंग का दबाव पड़ने पर महिला को आनंद की अनूभूति होती है।

महिला खतने का उद्देश्य

खतना हो जाने के बाद जब महिला सहवास में भाग लेती है या बच्चा पैदा करती है तो भयंकर यंत्रणा सहती है। जाहिर है कि जब महिला सहवास में भारी दर्द सहेगी तो सहवास के प्रति हतोत्साहित होगी। किसी जमाने में यही पुरुषों का उद्देश्य भी था कि महिला सहवास के प्रति हतोत्साहित रहेगी तो विवाहेत्तर संबंध या विवाह से पहले संबंध बनाने की नहीं सोचेगी। यानी वे संबंध बनाने का जिम्मेदार महिला को ही मानते थे और इस तरह के संबंध में पड़ने वाले पुरुषों को पूरी तरह पाक-साफ मानते थे। कहा यह भी जाता है कि कई पत्नियां होने के कारण पुरुष उन्हें संतुष्ट करने को लेकर आशंकित रहते थे, इसलिए इस उपाय के जरिये वे पत्नियों की यौन इच्छा को नियंत्रित करते थे।

महिला खतने का परिणाम

पता नहीं इस उपाय से पुरुषों ने अपना उद्देश्य कितना हासिल किया मगर बच्चियों और महिलाओं को जीवनभर का कष्ट जरूर दे डाला।
– सबसे पहले तो खतने की पूरी प्रक्रिया ही भयानक कष्टकारी है। प्रक्रिया बहुत जटिल और तकलीफदेह होने से मौत भी हो सकती है।
– दूसरे महिला के लिए पहला सहवास वैसे ही कष्टदायक होता है, इस उपाय से उसे और भी पीड़ादायक बना दिया गया।
– मासिक स्राव के पूरी तरह शरीर से बाहर न आने से तमाम इन्फेक्शन और बीमारियां का खतरा भी बढ़ जाता है।
– बच्चा पैदा करना भी एक महिला के लिए दूसरा जन्म लेने जैसा होता है। खतने के उपाय से बच्चा पैदा करने को और भी ज्यादा कष्टदायक बना दिया गया।

प्रथा और प्रतिबंध

अफ्रीका, मध्य-पूर्व और एशिया के कई हिस्सों में यह प्रथा अभी भी जारी है। कई स्थानों पर इसके लिए विशेष रूप से आयोजन होते हैं और सामूहिक रूप से खतना किया जाता है। यूरोप में भी ऐसी महिलाओं की संख्या हजारों में पाई गई है। ये वे महिलाएं हैं जो अफ्रीका या मध्य-पूर्व से आकर यूरोप में प्रवास कर रहे समूहों की सदस्य हैं और उनके समूह में यह प्रथा यूरोप में भी जारी है। इनमें वे महिलाएं भी हैं, जिन्होंने अपनी बच्चियों को खतने से बचाने के इरादे से ही वहां राजनीतिक शरण ली है। मीडिया के साथ बातचीत में इनमें से कई महिलाओं ने इस बात की पुष्टि की है कि खतना के बाद पति के साथ शारीरिक संबंध के दौरान इतना दर्द झेलना पड़ता है कि उतना दर्द तो बच्चा पैदा करने में भी नहीं होता।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 2012 में एक प्रस्ताव पारित करके कहा था कि सभी सदस्य देशों को इस अमानवीय प्रथा पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। ब्रिटेन और फ्रांस में तो खतने को 80 के दशक में ही अवैध घोषित कर दिया गया था। फ्रांस में तो यह व्यवस्था भी की गई है कि माताओं और बच्चियों को छह वर्ष की आयु तक विशेष चिकित्सालयों में जाना पड़ता है, जहां बच्चियों के जननांगों की नियमित जाँच की जाती है। छह साल के बाद ये ज़िम्मेदारी स्कूल के चिकित्सकों को दे दी जाती है जो निगरानी करते रहते हैं।

खतने से पहले की स्थिति वापस

यूरोप में डॉक्टर इस तरह के ऑपेरशन भी कर रहे हैं जिनमें महिला के जननांगों को खतना से पहले वाली स्थिति में ला दिया जाता है। यानी उनके जननांग में क्लिटोरिस और लेबिया वाले हिस्सों को फिर से स्थापित किया जा सकता है। ऑपरेशन के दौरान महिला की क्लिटोरिस के दबे हुए हिस्से को बाहर निकाला जाता है जो खतना करने के दौरान बचा रह जाता है। बताया जाता है कि इस काम में केवल आधा घंटे का समय लगता है। ऑपरेशन के बाद महिला एक दिन या रात अस्पताल में रहती है और घर चली जाती है। इस ऑपरेशन के बाद स्वस्थ होने पर महिला सामान्य ढंग से शारीरिक संबंध बना सकती है और बच्चे पैदा कर सकती है।

अनेक विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि ये ऑपरेशन सफल नहीं रहते। इनका कहना है कि जब क्लिटोरिस को हटा दिया जाता है तब इससे जुड़ी न्यूरोवेस्कुलर संरचना भी सुरक्षित नहीं रहती है। लेकिन खतना को ठीक करने के समर्थक डॉक्टरों का दावा है कि उन्होंने खतने की शिकार ऐसी एक भी महिला नहीं देखी है जिसकी क्लिटोरिस का कुछ हिस्सा बचा न हो। कैंसर जैसे मामले में भी जब क्लिटोरिस को पूरी तरह हटाया जाता है, तब भी वह पूरी तरह नष्ट नहीं होता है। इसलिए क्लिटोरिस को खतना से पहले वाली स्थिति में लाना संभव है।