Mulayam-Amarविनम्र

मैं करीब 35 साल पहले दिल्ली आया था। एक बार जूते खरीदने के लिए करोलबाग गया। वहां दुकानदार ने स्वागत करते हुए जूते दिखाए और उनकी तारीफ करने लगा। जूते के तमाम गुणों का वर्णन करने के साथ ही उसने कहा कि इसकी दो साल की गारंटी है। जब उसे पूछा कि क्या वह यह गारंटी लिख कर देगा तो उसने मुझसे मुस्करा कर कहा कि बाबूजी क्या आदमी की जुबान से बढ़कर कोई गारंटी हो सकती है? अगर एक कील लगाने की नौबत भी आ गई तो नया जूता दे दूंगा। उसकी बातों में आकर मैंने जूता खरीद लिया। अगले दिन जब जूता पहनकर स्कूटर में किक मारी तो दूसरी ही किक में उसका तल्ला अलग हो गया। यह देखकर बहुत गुस्सा आया।

जूता लेकर उसकी दुकान पर पहुंचा तो उसने मुझे व जूते दोनों को ही पहचानने से इंकार कर दिया। वह बोला कि यह तो मेरी दुकान का है ही नहीं। जब मैंने उसकी जुबानी गारंटी की याद दिलवायी तो वह बढ़ी बेहयाई से हंसते हुए कहने लगा कि आप तो समझदार है। जब जिंदा इंसान की चमड़े की जबान की कोई गारंटी नहीं होती तो मरे हुए जानवर के चमड़े की कौन गारंटी ले सकता है। तब बहुत गुस्सा आया था पर अब लगता है कि उसने कुछ सौ रुपयों में एक ऐसी सीख दी थी जो कि पंचतंत्र की कहानियों की सीख से भी बढ़कर थी। खासतौर पर जब भी अमर सिंह को कुछ बोलते हुए सुनता हूं तो उसकी वह सीख याद आ जाती है।

अमर सिंह अपने को राजपूत नेता कहते हैं। उन्होंने मुलायम सिंह यादव से अलग होने के बाद ठाकुरों का संगठन बनाया था। जिसके वे स्वयंभू अध्यक्ष थे। संयोग से महाराणा प्रताप के बड़े भाई का नाम भी अमर सिंह था, राजपूत जबान के पक्के होते हैं। अमर सिंह में ठाकुरों वाले तमाम शौक तो है पर उनकी जबान के बारे में कुछ न कहना ही बेहतर होगा। शायद यही वजह है कि वे हमेशा अपनी मूंछे नीची रखते हैं ताकि मूंछ नीची होने का खतरा न रहे। इस आजाद विचारों वाले नेता की जबान और दिमाग दोनों ही स्वतंत्र हैं। दोनों का एक दूसरे के साथ कोई संबंध नहीं है। न तो दिमाग का जबान पर नियंत्रण रहता है और न ही जबान कुछ कहने के पहले दिमाग की सेवाएं लेती है।

करीब चार साल पहले जब उन्हें समाजवादी पार्टी से निकाला गया था तो उन्होंने कहा था कि मैं मुलायमवादी नहीं बल्कि समाजवादी हूं। जब हाल ही में वे लखनऊ में सपा के मंच पर उनके साथ बैठे नजर आए तो उन्होंने बड़े गर्व से जनेश्वर मिश्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि वे समाजवादी नहीं बल्कि मुलायमवादी है। अमर सिंह एक ऐसे व्यक्ति है जो कि मान, सम्मान, जबान, सब कुछ छोड़कर राजनीति में आए थे। उन्हें नेता इसलिए नहीं कहा जा सकता है क्योंकि वे खुद को देश का सबसे बड़ा फिक्सर व दलाल घोषित कर चुके हैं। उन्हें दलाल पुकारे जाने पर उन्हे उसी तरह के गर्व की अनुभूति होती है जो कि दाऊद को आतंकवादी कहलाए जाने पर। समाजवाद व समाजवादियों को उनका अहसानमंद होना चाहिए क्योंकि उन्होंने उसे नए सिरे से परिभाषित किया। उन्होंने समाजवादी पार्टी व देश को मुलायमवादी समाजवाद दिया है। जिसमें अय्याशी के वे सभी नुस्खे मौजूद थे जो कि पूंजीवाद में देखने को मिलते हैं।

अमर सिंह ने अपनी राजनीतिक यात्रा कांग्रेस से वीरबाहुदर के रास्ते माधवराव सिंधिया के साथ शुरु की थी। उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि व समस्या उनकी जबान है। इसी जबान के चलते जहां उन्होंने परमेश्वर गोदरेज से लेकर अमिताभ बच्चन तक को अपने काबू में लिया वहीं दूसरी ओर इसी के बेजा इस्तेमाल के कारण आज लतियाएं जा रहे हैं। उनकी जबान से ही प्रभावित होकर हिंदुस्तान टाइम्स की मालकिन शोभना भरतिया ने उन्हें अपनी कंपनी का निदेशक बनाया। अमिताभ बच्चन ने तो उनके बारे में यह तक कहा कि अगर अमर सिंह न होते तो शायद वे मुंबई में टैक्सी चला रहे होते।

जया बच्चन उनकी बीमारी के दौरान अपोलो अस्पताल में उनके बिस्तर के निकट बैठकर उन्हें संतरा छीलकर खिलाती थीं। अनिल अंबानी उन्हें अपना बड़ा भाई मानते थे। बकौल अमरसिंह वे हर हफ्ते उनसे मिलने के लिए अपने निजी विमान से दिल्ली आते थे और घंटों उनके परिवार के साथ बिताकर उनकी बेटियों को राजकुमारियां करार देते थे। एक वह भी समय था जब उन्होंने अमेरिका के साथ परमाणु करार के मुद्दे पर वामपंथी दलों द्वारा यूपीए-1 सरकार से समर्थन वापिस ले लिए जाने पर, मनमोहन सिंह सरकार को सपा के 39 सांसदों का समर्थन देकर उसे बचाया था। हालांकि बदले में उन्हें कुछ नहीं मिला और तो और वे ऐसे हनुमान साबित हुए जिसने किसी और की बीवी को बचाने के लिए अपनी पूंछ जलवा डाली। सांसदों को रिश्वत देने के चक्कर में उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी।
उन्हें शेरो शायरी का बहुत शौक है। एक समय उन पर यह शेर एकदम फिट बैठता था कि ‘आजकल पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे, बोलो देखा है तुमने मुझे उड़ते हुए?’ यह वह समय था जब मुलायम सिंह उनसे पूछकर पानी पीते थे, टायलट जाते थे। रामगोपाल यादव व अखिलेश यादव को उनकी सरकार में काम करवाने के लिए अमर सिंह की चिरौली करनी पड़ती थी। अमर सिंह को सुरा सुंदरियों का भी काफी शौक रहा। निजी क्षणों में उनकी भाषा तो बिपाशा बसु के कपड़ों जैसी ही होती थी।

बिपाशा बसु के साथ उनकी बातचीत का एक टेप जब सार्वजनिक हुआ तो उसे सुनकर आगरा के पीले सैलीफीन पेपर में बंद पत्रिकाएं प्रकाशित करने वलो प्रकाशक भी शर्मा गए। कुछ समय तक अमर सिंह ने सुप्रीम कोर्ट की मदद से इसके सार्वजनिक होने पर रोक लगवा दी थी। ऐसी भाषा का इस्तेमाल तो प्रापर्टी डीलर व ट्रांसपोर्टर शराब में टुल्ल हो जाने के बाद भी नहीं करते हैं।

उन्होंने अपनी भाषायी बदजुबानी में सोनिया गांधी तक को नहीं बख्शा। इतनी गंदी बात कही कि उसे लिखना संभव नहीं है। मुलायम सिंह के बारे में कहा कि अगर इनके बारे में मुंह खोल दूं तो यह जेल में दिखाई देंगे। अमिताभ बच्चन के बारे में कहा कि उसकी रीढ़ में हड्डी ही नहीं है। शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जिसके खिलाफ उन्होने कुछ न कहा हो। उन्होंने कांग्रेस से अपना सफर शुरु किया था व सपा से होते हुए अपनी पार्टी बनाईं फिर राष्ट्रीय लोकदल में शामिल हुए। जब सड़क पर आए तो सोनिया गांधी से लेकर मायावती और राहुल गांधी तक की तारीफों के पुल बांधे।

खुद अपना नाम ‘अ’ से शुरु होने के बावजूद उन्हें ‘अ’ नाम के लोगों से ही निराशा हुई। इनमें अमिताभ बच्चन, अनिल अंबानी, आजम खान से लेकर अजीत सिंह तक शामिल हैं। इस समय वह राजपूत राजनीतिक शरण की तलाश में जयप्रदा के साथ धक्के खाते घूम रहा है। नवंबर में उनका राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त होने वाला है। कुछ समय पहले राहुल गांधी ने कहा था कि उत्तरप्रदेश सरकार दलाल चला रहे हैं। इससे उन्हें बहुत दुख पहुंचा। उन्होंने कहा कि अगर उत्तर प्रदेश की सरकार मेरे जैसे असली दलाल चला रहे होते तो वहां के हालत कुछ और ही होते। मैं दलालों की ओर से युवराज से मांग करता हूं कि वे अपने इस बयान के लिए मांफी मांगे। –