draupdi

महाभारत की एक प्रमुख घटना है ‘द्रोपदी चीर हरण ” , यही वो घटना है जिसने कौरव और पांड्वो को युद्ध के मुहाने पर ला के खड़ा कर दिया था । इसी घंटना के कारण भीम दुर्योधन की जंघा उखाड़ने की प्रतिज्ञा करता है , यही वो घटना है जिसमें द्रोपदी की लाज रखने के लिए श्री कृष्ण उसकी साडी को लम्बा किये जाते हैं और उसकी भरी सभा में इज्जत बचते हैं ।

इस घटना के कारण श्री कृष्ण पांड्वो के और घनिष्ठ हो गए थे उनका कद भगवन के सामान हो गया था क्यों की उन्होंने एक अबला की लाज बचायी थी |

चलिए मुद्दे पर आते हैं , क्या आप जानते हैं की वास्तव में द्रोपदी का चीर हरण हुआ ही नहीं था ? मेरी नज़र में महाभारत तो यही कह रही है ।

जब पांडव जुए में राज्य के साथ साथ अपने आप को और द्रोपदी को हार गए तब पांड्वो की स्थिति दासों की तरह और द्रोपदी की स्थिति दासी की तरह रह गयी थी , अतः अब उन्हें राजाओ अथवा राजकुमारों जैसे वस्त्र धारण करने का कोई अधिकार नहीं रह गया था । यही दशा द्रोपदी की भी थी , पर जब द्रोपदी सभा में लाई गयी , उस समय न केवल द्रोपदी बल्कि पांडव भी उच्च कोटि और सज्जित वस्त्र धारण किये थे , अतः उनसे उनके वस्त्र उतर के दासो और दासी के परिधान पहन लेने के लिए यदि कहा गया हो तो क्या अस्चर्य है ?

जब युधिस्ठिर द्रोपदी भी हार गए , तब दुर्योधन कहता है ,” विदुर , यहाँ आओ , तुम जा कर पांड्वो की प्यारी पत्नी को यंहा ले कर आओ . वह पापाचारणी शीघ्र यहाँ आये और मेरे महलो में झाड़ू लगाये , उसे अब दसियों के साथ रहना होगा ( महाभारत -सभा पर्व , अध्याय 66 श्लोक 10 गीता प्रेस )

विदुर ने जब द्रोपदी को लेन से इंकार किया तब दुर्योधन प्रतिकामी को भेज , प्रतिकामी जा कर द्रोपदी से कहता है ” द्रुपद कुमारी , युधिस्ठिर जुए के मद में उन्मत्त हो कर अपना सर्वस्व हार गए और आपको भी दाव पर लगा दिया और हार गए । दुर्योधन ने आप को जीत लिया है . याज्ञसेनी! अब आप महाराज ध्रष्टराष्ट्र के महल में पधारे . मैं आपको वंहा दासी का कार्य करवाने के लिए ले चलता हूँ ( सभा पर्व, अध्याय 67, श्लोक 4)

इन शब्दों से क्या प्रतीत होता है? क्या दुर्योधन द्रोपदी से दासी पन के आलावा कुछ और अधिक करवाना चाहता था ?

रही बात द्रोपदी की साड़ी खीचने की तो , इस सन्दर्भ में सभा पर्व , अध्याय 68 श्लोक 38 का उद्धरण देखिये जिसमें स्वयं दुर्योधन कुछ नहीं कहता वह तो कर्ण दू:साशन से कहता है ” दु:शाशन ! यह विकर्ण अत्यंत मूढ़ है तथापि विद्वानों सी बाते बनता है , तुम पांड्वो और द्रोपदी के भी वस्त्र उतर लो ”
ध्यान देने की बात है की कर्ण केवल द्रोपदी के ही वस्त्र उतरने के लिए नहीं कहता वरन पांड्वो के भी वस्त्र उतरने के लिए कहता है ।

इस पर वैशपयन जी कहते हैं ” जनमेजय ! कर्ण की बात सुन के समस्त पांड्वो ने अपने अपने राजकीय वस्त्र उतर का सभा में बैठ गए ( सभा पर्व अध्याय 68, श्लोक 39)

पर द्रोपदी ने पांड्वो का अनुसरण नहीं किया , क्यों की वो अपने आप को हारी हुयी नहीं मानती थी , तब दु :शासन को हठ करना पड़ा होगा की वह अपने राजकीय वस्त्रो को उतर दासी के वस्त्र पहन ले । इसी घटना को इस रूप में पेश किया गया हो की मानो की दु:शासन द्रोपदी के वस्त्र खिंच कर उसे नंगी करना चाहता था , ताकि जनता में कौरवो के प्रति घृणा पैदा हो और पांडवों के प्रति सहन भूति पैदा हो और कृष्ण कौरव-पांड्वो में युद्ध करा के कौरव वंश को नष्ट कर के अपना यदु वंश की सत्ता स्थापित कर सके ।

द्रोपदी की जि के आगे दु :शासन अपनी जिद छोड़ कर बैठ गया हो तो इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं । इसे यह कह कर प्रचलित किया गया हो की कृष्ण की कृपया से द्रोपदी की साड़ी बढती गयी तो कोई अस्चर्य नहीं । अन्यथा यदि वो चाहता तो क्या वो द्रोपदी को नंगी नहीं कर सकता था ? फिर यदि दुर्योधन ये चाहता तो क्या वो स्वयं दु : शासन के बाद साडी खीचने का प्रयत्न नहीं कर सकता था ?

फिर भी यदि कृष्ण ने ये चमत्कार दिखाया होता तो इस घटना के पश्चात दु :शासन ये पुन: कर्ण की ये कहने की हिम्मत होती की ‘ इस दासी द्रोपदी को अपने घर ले जाओ “(सभा पर्व , अध्याय 68, श्लोक 89)

इसी लिए ये कहा जा सकता है की द्रोपदी के चीर हरण हुआ ही नहीं था बल्कि केवल कौरवो को बदनाम करने के लिए ऐसा किया गया था ।

सभा पर्व, अध्याय 70 के श्लोक 3 से 6 तक में दुर्योधन ये कहता है की यदि अर्जुन , भीम , नकुल और सहदेव ये कह दे की युधिस्ठिर को द्रोपदी को हारने का कोई अधिकार नहीं था तो वो द्रोपदी को तुरंत दासीपन से मुक्त कर देगा ” इस पर सभी युधिष्ठर , अर्जुन और बाकि के भाई स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कह पाते।

फिर भी देखा जाये तो गलती किसकी थी ? दुर्योधन की या द्रोपदी जिसने दुर्योधन को “अंधे का पुत्र अँधा होता है” कह कर न सिर्फ दुर्योधन का ही अपमान किया बल्कि पिता तुल्य ध्रष्टराष्ट्र का भी अपमान किया जिसने पांड्वो को अपने पुत्रो जैसा समझा , जिन्होंने बिना भेद किये उन्हें कौरव राजकुमारों के सामान उच्च और आधुनिक शिक्षा दिलाई , जिसने पांड्वो का कभी भी अनिष्ट नहीं चाहा ।

कृष्ण जो हमेशा न्याय की तरफ होने का दावा करते थे उन्होंने भी एक बार भी द्रोपदी के इस गलत व्यवहार के लिए दोष दिया जबकि वो उनकी मुंहबोली बहन थी , शायद वो चाहते थे की कौरव और पांड्वो में कटुता और बढे ।

भारतीय संस्कृति के पतन का मुख्य कारण सदा से ये रहा है की उसने सत्ताधारी और विजेता के ही गुण गए हैं फिर चाहे वो अनैतिक तरह से विजयी हुआ क्यों न हो । पांडवो और कृष्ण ने सदा ही अनैतिक तरीके से युद्ध को जीता , युधिस्थर का द्रोपदी को ” पांच” पत्नी बनाना और जुए में उसके साथ साथ राज पाठ का भी हार जाना , उसके चरित्र पर दो ऐसे कलां हैं जिसने आर्यधर्म की नीव को ही खोखला कर दिया फिर भी हम ने उसे धर्मराज की दे दी ।