BGKrishnaArjuna

टेलीविजन पर महाभारत समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। युद्ध के पीछे के अनेक कारणों, संदेशों, निहितार्थों और उपदेशों के बीच जो एक बात बड़ी गहराई से महसूस होती है, वो यह कि यदि दुर्याेधन के पक्ष में भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण नहीं खड़े होते तो दुर्याेधन कृष्ण के शांति प्रस्ताव को मान लेता और युद्ध करने की हिम्मत नहीं कर पाता। उसे विश्वास था कि भीष्म को कोई मार नहीं सकता और भीष्म के रहते उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उसे विश्वास था कि द्रोणाचार्य को कोई पराजित नहीं कर सकता और उसे यह भी विश्वास था कि उसका मित्र कर्ण निश्चित ही अर्जुन का वध कर देगा, जो पांडवों की सबसे बड़ी ताकत था।

इसका यह मतलब निकलता है कि कहीं से हासिल ताकत (सामाजिक, आर्थिक, नैतिक या सैनिक ताकत) विशेष रूप से उस व्यक्ति या व्यक्तियों को लड़ाई, संघर्ष और अत्याचार की तरफ ले जाती है, जो स्वभाव से उग्र, अधर्मी, उदंडी और दूसरों को दबाने की प्रवृत्ति रखते हैं। अगर ऐसे व्यक्तियों को समाज से सहयोग और समर्थन न मिले तो समाज में खूनखराबा करने की उनकी हिम्मत नहीं होगी और समाज में शांति रहेगी। इसी बात को हम आज के हालातों के संदर्भ में भी लागू कर सकते हैं और इससे कुछ सीख सकते हैं।

राष्ट्रीय परिदृश्य

उत्तर प्रदेश में मुलायम, आजम और अखिलेश की सरकार में अल्पसंख्यकों और पिछड़ी जातियों का कोई भला भले न होता हो, मगर इन समाजों में मौजूद दुर्याेधनों (अराजक तत्वों) को जरूर अवांछित सहारा मिल जाता है। ऐसे ही तत्व शासन-प्रशासन में अपना काम करवाने में सफल रहते हैं और बुलंद हौसलों के कारण मौका पड़ने पर महाभारत (दंगा), छेड़खानी और बलात्कार भी कर या करवा डालते हैं। उधर, तोहमत पूरे अल्पसंख्यक और पिछड़े समाज पर लग जाती है कि यह सरकार तो इनकी तरफदारी कर रही है, जबकि वास्तव में दोनों ही समाजों की बड़ी जनसंख्या को ऐसी सरकार से जरा भी लाभ हासिल नहीं हो पाता है।

जिस तरह महाभारत में भीष्म, द्रोण और कर्ण यह नहीं पहचान सके कि उनकी वास्तविक भूमिका क्या होनी चाहिए, उसी तरह सपा के महारथी भी कई बार सरकार बनाने के बावजूद यह नहीं जान पाए हैं कि समाज के सभी वर्गों के प्रति उनका वास्तव में कर्तव्य क्या है। यदि सपा के महारथी, आधुनिक दुर्याेधनों को प्रश्रय देना बंद कर देते और वास्तव में अल्पसंख्यकों और पिछड़ों के कल्याण के लिए काम करते तो आज वे सबसे ज्यादा दंगे और बलात्कार के बजाय, सबसे अच्छी सरकार का रिकार्ड बना सकते थे।

गुजरात के दंगों में भी मुख्य आरोप तो यही है कि भीष्म और अन्य (सरकार और उसके कारिंदे), दुर्याेधनों (दंगाइयों) के साथ खड़े थे। केंद्र में मोदी की सरकार बनने पर ऐसे दुर्याेधनों को फिर से प्रश्रय मिलने की भारी आशंका जताई जा रही थी। पुणे में साफ्टवेयर इंजीनियर कांड इसका संकेत भी दे गया, मगर फिलहाल मोदी सरकार अतिरिक्त रूप से सतर्क थी, इसलिए पुणे का विस्तार नहीं हो सका, लेकिन खतरा बना हुआ है। मोदी के महारथियों ने यदि दुर्याेधनों को जरा भी यह अहसास करा दिया कि वे उनके पीछे खड़े हैं तो ये दुर्याेधन अपनी हरकतों से बाज नहीं आएंगे।

अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजराइल और फिलिस्तीन विवाद में भी यही स्थिति है। यदि अमेरिका-यूरोप रूपी भीष्म और द्रोण इजराइल का साथ न दें तो इजराइल की इतनी हिम्मत न बढ़े कि वह सीधे नरसंहार पर उतर आए। अमेरिका तो इस हद तक खुराफाती है कि एक तरफ वह इजराइल से युद्ध विराम की अपील करता है और उसी दिन हथियारों की भारी खेप भी इजराइल के लिए रवाना कर देता है।

इराक में हो रहे संघर्ष में भी आईएसआईएस एक ऐसा दुर्याेधन है जिसे दुनियाभर के अनेक भीष्म और द्रोणाचार्याें (सुन्नी मुसलमानों के अनेक नेता) का समर्थन मिल रहा है। वास्तव में आईएसआईएस न केवल बाकी दुनिया के लिए बल्कि स्वयं इस्लाम के लिए भी भस्मासुर की तरह है, जिसका समर्थन भारत और बाकी दुनिया के सुन्नी मुसलमानों को नहीं करना चाहिए। यदि आईएसआईएस को बाहरी दुनिया का समर्थन न मिले और उसके कामों की तीखी निंदा हो तो उसकी ताकत बहुत कम हो जाएगी।

कुल मिलाकर जब हम समाज में अत्याचार, अपराध, लड़ाई, संघर्ष, युद्ध आदि पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि दुर्याेधन (अराजक तत्व) तो दोषी हैं ही, मगर उनसे भी ज्यादा ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका भीष्म, द्रोण और कर्ण (समाज और उसके पुरोधा) की हो जाती है। समाज में दुर्याेधन तो हमेशा रहे हैं और हमेशा रहेंगे, असल बात यह है कि समाज और उसके पुरोधा इन दुर्याेधनों के प्रति क्या रुख अपनाते हैं।

समाज के पुरोधाओं की तरफ से नरमाई का जरा सा संकेत ही दुर्याेधनों की बांछें खिला देता है। इसीलिए समाजवादी, समतामूलक और अपराध-भय से मुक्त समाज चाहते हैं तो आज ही दुर्याेधनों को प्रश्रय देना बंद कर दीजिए। दुर्याेधन वो शख्स है जो खुद सबसे बाद में मरता है, पर उससे पहले अपने सारे पक्ष की बलि ले लेता है और अपनी तरफ खड़े लोगों के बलिदान का अहसान भी नहीं मानता।

कुछ विद्वान कहते हैं कि महाभारत जैसा कुछ हुआ ही नहीं। महाभारत हुआ, नहीं हुआ, इस बहस से कुछ हासिल नहीं होने वाला, लेकिन इस बेहद रोचक और हृदयस्पर्शी कहानी से हम सबक तो ले ही सकते हैं। इन्हीं सबकों के कारण महाभारत की महत्ता भी है।