ramzan
मंज़ूर एहतेशाम

असद मियां की आंखें बंद थी। एक पल के लिए मैंने सोंचा,वापस चला जाऊं।
दूसरे पल असद मियां आंखें खोले देख रहे थे। उन आंखों में कोहरा भरी सुबह सी रोशनी थी।
—खुदा के लिए अयाज़…सीना दर्द से टूटा जा रहा है!
सुहेला भाभी आईने के सामने खडी हुयी डेबिंग करके चेहरे के धब्बे मिटा रही
थी। कमरे में जलते हुए बल्ब कि रोशनी धीरे-धीरे बाहर फैलते अंधेरे के साथ
उभरने लगी थी। सूरज डूबने में कुछ ही देर थी।
—जमील ! अरे जमील ! सुहेला भाभी ने आवाज दी।
जफर भाई आ रहे हैं, मैंने असद मियां से आंखें बचाते हुए कहना चाहा। लेकिन
फिर मैंने देखा, आंखें तो वह खुद बंद कर चुके थे, सुहेला भाभी ने मजाक
उडाती हुई-सी नजरों से मेरी तरफ देखा और फिर आवाज़ देने लगी—- जमील…अरे,
कहां गारत हो गया?
—अरे आ रहा हूं ! कहीं बाहर से आवाज़ आयी।
दूर आसमान में चमक-सी फैली। एक सकते के बाद धमाका हुआ।
असद मिया की आंखों के पपोटे हलके से हिले, लेकिन आंखें बंद ही रहीं।
—लेकिन यार, तोपें ही क्यों ? यह तो बिल्कुल ऐसा लगता है, जैसे किसी को
सलामी दी रही हो। सायरन भी तो बजाया जा सकता है! एक बार मेरे दोस्त ने
मुझसे पूछा था और मैं हंस कर रह गया था।
—-अगर खुद साफ नहीं रह सकते, तो दूसरों को तो चैन से मरने दें ! खुद
पलंग पर नहीं लेट सके, सारी चादर का सत्यानाश कर दिया ! सुहेला भाभी खुद
को एक खूबसुरत सिंगार-मेज से लगे आईने में देखते हुए बुदबुदा रही थी—और
अगर चांद दिख गया, तो कल ईद है……कोई धुली चादर भी न होगी !
मैंने देखा, आईना बिल्कुल बेदाग था, लेकिन लकडी के बने मेज़ के फ्रेम की
पालिश जगह-जगह उड गयी थी और कई जगह पडे हुए गड्ढों से लकडी का अपना रंग
झांकने लगा था। आईने के नीचे बेगिनती शीशियां रखीं हुयी थीं।
जमील तेजी से कमरे में दाखिल हुआ। हांथ उठाकर उसने सलाम किया। फिर अजीब
तरह से मुस्करा कर अपने बाप असद मियां की तरफ देखने लगा।
—क्या कह रही थी, अम्मी ? फिर जैसे मुझसे छुपाते हुए, असद मिंयां की
तरफ इशारा करके उसने आंखों –ही-आंखों में कोई सवाल अपनी मां से पूछाअ।
सुहेला भाभी ने होंठ सिकोड कर गरदन हिला दी—बुलाने के लिए तुम्हें
घंटों आवाजें देनी पडी थीं ! उनके लहज़े में तेजी थी।
—मुझे क्या मालूम, आप आ गयीं ! बगैर कहे तो चली गयीं थीं ! जमील ने
दूबदू जवाब दिया।
–चांद दिखा ?
–ऊंहूं ।
—देखो, तुम कहीं जाना मत । अभी थोडी देर बाद तुम्हें मेरे साथ चलना है ।
—अम्मी ! जमील ने शिकायती स्वर में कहा—शन्नी और दूसरे लडके मेरा
इंतज़ार कर रहे हैं। मुझे उनके साथ जाना है।
—जाना वाना कहीं नहीं है, आप मेरा इंतज़ार कीजिए ! यह कहते हुए सुहेला
भाभी भीतरी कमरे में चली गयीं।

सिर्फ असद मियां के सांस लेने की आवाज़। जफर मियां अभी तक नहीं आए थे।
क्या वो आएंगे ?
—यार, तुम चलो, मैंने इफ्तार पर कुछ दोस्तों को बुलाया है। असद मियां
के तीसरे बुलावे पर उन्होंने कहा था । मैं शहनाज़ आपा के पास बैठा ईद के
शीर-खुर्मे की लिस्ट बना रहा था—तुम चलो मै आता हूं।
असद मियां के सिरहाने कैलेंडर के पन्ने कई महीनों से नहीं बदले गए थे।
कमरे के एक हिस्से में काली अपहोलस्ट्री के गहरे सोफे बिछे हुए थे। कोने
में लंबे से बुकशेल्फ पर तरतीब और बेतरतीबी के साथ बहुत सी किताबें थीं…।
दायी तरफ दीवार पर बिदकते हुए घोडे की पेंटिंग टंगी हुयी थी ।
—जफर नहीं आए अब तक ? असद मियां की झिलमिलाती-सी आंखें मेरी तरफ देख रही थीं।
—कुछ दोस्तों को खाने पर बुलाया है। आते ही होंगे। मैंने धीरे से
कहा—-कब से तबीयत खराब है ?
ऐं ? तबीयत…? चार-पांच दिन से खराब है। सीने में सख्त दर्द है। दिल
बिल्कुल बैठा जा रहा है। उनकी सांस ऊपर- नीचे हो रही थी।
—तमाशबाजी है ! निरी एक्टिंग ! और सारे मरजों की एक ही दवा है……पैथिडीन
! असद मियां के दूसरे बुलाने पर जफर मियां ने झुंझला कर कहा था—कुछ और
काम भी करने हैं । चांद दिख गया, तो कल ईद है। मजाक बना लिया है उन्होनें
तो !
उस समय मुझे गांव से आए कोई एक घंटा हुआ था।
—किसी डाक्टर को दिखाया ? मैंने असद मियां कि कलाई थमाते हुए पूछा।
सब कुछ फिर से खामोशी में डूब गया। असद मियां छत की तरफ मुस्कुराती- सी
नजरों से देख रहे थे। उनकी निगाहें, जाने या अनजाने, छत के उसी हिस्से पर
टिकी थीं, जहां पंखा लगाने का हुक था। बिजली की फिटिंग वहां तक बाकायदगी
से जा कर एकदम दो नंगे वायरों की आंखों से झांकने लगी थी।
तुम मेरा एक काम कर दो।
जी।
—मेरी तबीयत ठीक नहीं है, और मैंने कल से से इंजेक्शन भी नहीं लिया
है। कल दोपहर से। शायद उससे तबीयत कुछ बेहतर हो जाए । उनके सवर में बला
की मिन्नत थी—तीन इंजेक्शन पैथिडीन के। मदन के यहां मिल जाएंगे।
मैने धीरे से ठंडी सांस ली। असद मियां बना पलकें झपकाए उन्हीं मिन्नत भरी
नज़रों से मेरी ओर देख रहे थे। उसी वक्त सुहेला भाभी कमरे में दाखिल
हुयीं।
—मुझे जरा बाहर जाना है ! जैसे उन्होंने अपने आप से कहा—यह जमील कहां
चला गया ? फिर बिना किसी जवाब का इंतज़ार किए वह परदा उठा कर बाहर निकल
गयी।

सीढियां उतरते-उतरते मैं, ना चाहते हुए भी जफर मियां के घर की ओर मुड
गया। फलक मंजिल के बाहरी हिस्से में जफर मियां और उसके पीछे उनकी छोटी
बहन शहिदा रहती थी। पिछले टुकडे में सबसे बडे भाई असद मियां का खानदान
था। घूम कर मैं जफर मियां के कमरे में पहुंचा।
शहनाज़ आपा तन्नु को उसका ईद का जूता दिखा रही थीं।
—मामू आ गए ! देखिए मामू, अब्बू हमारा नया जूता लाए ! तन्नू बहुत खुश था।
—और बेटा, मामू को नहीं बताया कि तुमने शेर कैसे मारा था ? और
तुम्हारी बंदूक कहां है ? जफर मियां बहर के कमरे से अंदर आ गए थे। तन्नू
नकल करके बता रहा था कि झाडी में से हाऊ करता कैसे शेर निकला और कैसे
उसने अपनी कार्क वाली बंदूक से उसे ढेर कर दिया। फिर दीवान पर बिछी शेर
की खाल की तरफ इशारा उसने ठेठ शिकारियों वाले लहजे में कहा—-उसी की खाल
है। जफर मियां हंस-हंस कर लोटे जा रहे थे।
भैई, खाना तैयार हो गया ? रियाज का तो रोज़ा था, सूख गए होंगे ! उन्होंने
शहनाज़ आपा से कहा और दोनों बवारचीखाने की तरफ चले गए।
तन्नू अपनी बंदूक लटकाए शायद दादी मां को शेर का शिकार सुनाने चला गया और
मैं अकेला दीवान पर बैठा रह गया।
नहीं जफर मियां भूल नहीं सकते थे। फिर क्या जान कर वह असद मियां के जिक्र
को टाल गए थे ? पंद्रह दिन पहले भी जब मैं गांव से आया था, असद मियां की
तबीयत खराब चल रही थी । बल्कि रमज़ान से पहले तो एक दिन अचानक हालत नाज़ुक
हो गयी थी तब मैंने जफर मियां से कहा था —किसी डाक्टर को दिखा दें ?
—तुम भी यार कमाल करते हो ! हर तीसरे दिन किसी डाक्टर को दिखाया जा
सकता है ? कुछ बिमारी हो, तब ना ! सडक पर कोई पहचान वाला मिल जाए, तो
टांग में चोट लगने से फ्रैकचर तक की कहानी उसे सुना देते हैं। दवा के
पैसे मांग लेते हैं और जाकर वही पैथिडीन ! किसी जान-पहचान वाले के यहां
अगर मुर्गियां पली हैं, तो जा कर कहेंगे—बच्चों ने बहुत दिनों से अंडे
नहीं खाए हैं। जो कुछ मिल गया, सिंधी को बेच देंगे और फिर वही पैथिडीन !
जीना हराम कर दिया है ! इंश्योरेंस वालों से जो कुछ मकान का का किराया
मिलता है, वह भी इन्हीं घपलों में उडाते हैं। जमील चोरी के अलावा अब
सट्टे से भी शौक करने लगे हैं ! इधर भाभी की हरकतें देखो ! नसीरन भी
उन्हीं के रास्ते पर जा रही है ! पता नहीं, किन किन हरामजादों के साथ
खुली हुयी जीपों में घूमती फिरती है ! यही सब दोनों छोटी बेटियां भी
करेंगी ! वह तो बहुत गनीमत है कि साराह और समीना की शादियां हो गयीं।
मियां, हमने तो ऊपर फटकना छोड दिया । अम्मी की जिंदगी तो हराम हो ही गयी।
तुम खुद सुनते रहते हो, दुनिया की कौन सी जलालत बची है, जो अब फलक मंजिल
के नाम से न जोडी जा सके ? और फिर मेरी अपनी प्राब्लम्स हैं। आखिर कब तक
?
—-और असद मियां की मां ?
—-बदनसीब हैं ! उन्होंने फूट-फूट कर रोते हुए कहा था—जिंदगी और मौत,
दोनों की तरफ से बदनसीब ! जैसे जिया है, वैसे ही मरेगा ! रमज़ान के मुबारक
महीने में तो उस गुनाहगार को मौत तक नसीब नहीं हो सकती……!
मैं जफर मियां से कुछ कहे बगैर कमरे और फिर फलक मंजिल से बाहर आ गया।
—-जिंदगी में लेन-देन के कुछ कानून शायद लिखे ही नहीं गए ! यह भी क्या
कि जो कुछ हमें तर्के-विर्से से मिल जाए, हम उसे अपना समझ, जरब देने के
तरीके ढूंढने लगें। वे न लिखे गए कानून उन लोगों के लिए हैं, जो सिर्फ उस
चीज को छूते हैं, जिस पर अपना हक़ तसलीम करते हों, जो उन्होंने दांव पर
लगा कर वसूल की हो। बाकी सब तो जमाने की तरफ से लादा गया बोझ है ! एक बार
काफी ज्यादा शराब पीने के बाद मेरे सामने असद मियां ने लोगों से कहा था,
उस रात जुए में वह कोई बीस हजार रूपया हारे थे। तब जफर मियां और शहनाज़
आपा की शादी को दो साल हो गए थे और मैं अलीगढ से छुटटियों के कुछ दिन के
लिए शहनाज़ आपा के पास ठहरा हुआ था। मुझे पता नहीं क्यों असद मियां अच्छे
लगते थे। मेरे उनसे ज्यादा मेल-मिलाप को देखते हुए शहनाज़ आपा ने समझाया
था कि मैं उनके पास जाया करूं, क्योंकि वहां लोग जुआ खेलने और शराब पीने
के लिए इकटठे होते थे।

फिर तो धीरे-धीरे सब सामने आ गया था। असद मियां ने फलक मंजिल दो-तीन
अलग-अलग पार्टियों को रेहन रख दी थी…इंश्योरेंस कंपनी और कुछ दूसरे
मालदार सेठों को। देखते-ही-देखते डिग्रियां आने लगी थीं और फलक मंजिल के
एक बडे हिस्से को फ्लैटों में तब्दील करके किराए पर उठा दिया गया
था……उधार वालों की किस्तें चुकाने के लिए असद मियां की मां ने पहले काफी
बर्दाश्त किया,क्योंकि असद मियां कैसे भी थे, उनके सबसे लाडले बेटे
थे—नवाबों से ज्यादा लाड से पाला है मैंने इसे ! आंखों में आंसू भर कर वह
कहा करती थी। लेकिन फिर उन्होने इस बात को लेकर मुकदमा दायर क्रर दिया था
कि जायदाद क्योंकि उनके नाम थी, इसलिए उनके जीते जी उसे रेहन रखने का हक
असद मियां को नहीं था। हाईकोर्ट में मुकदमा चल रहा था और उम्मीद थी कि
असद मियां के हिस्से को छोडकर जफर मियां और शाहिदा को उनका हक मिल जाएगा।

शाहिदा के ख्याल से मेरे मुंह में कडवाहट फैल गयी। अलीगढ जाने के पहले
मैं शहीदा के बहुत करीब आ गया था और मेरी आने वाली जिंदगी के ज्यादातर
प्लानों में मैंने शाहिदा को शामिल समझ लिया था। मैं प्रि-मेडिकल में
इतने नंबर नहीं ला पाया था कि किसी मेडिकल कालेज में मेरा दाखिला हो
पाता। जब तीन साल बाद मैं मुस्तकिल तौर पर शहर लौटा था, तो शाहिदा घर में
बच्चों को पढाने वाले एक मास्टर, साजिद से शादी कर चुकी थी। साजिद एक
गरीब घर का लडका था और खानदान के उन तेजी से बिगडते हालात में शायद
शाहिदा को वही एक सहारा नजर आया था। बहरहाल इस बात को भी अब पांच साल हो
चुके थे। शाहिदा और साजिद को बच्चा था और अब असद और जफर मियां की मां भी
अपनी बेटी और दामाद के साथ ही रहती थी।
जफर मियां ने हालात से लडने के लिए हांथ-पैर मारे थे। अब उनके दोस्तों की
महफिलें कम हो गयी थीं। तफरीहें कम हो गयी थी, यहां तक कि कभी-कभी तो
ब्युक में पेट्रोल डलवाना भी मुश्किल हो जाता था। शहनाज आपा अच्छे कल की
ख्वाहिश में लाटरियों के टिकट खरीदती थीं, लेकिन फिर भी उनकी बदहाली एक
खास स्टेज तक आकर रूक गयी थीं। शाहिदा भी हरी-भरी बेल की तरह अपने सबसे
करीब की दीवार का सहारा लेने पर मजबूर हो गयी थीं। लेकिन असद मियां बिना
किसी तबदीली के, वक्त के साथ-साथ नीचे बैठते गए थे, जैसे उनकी नजरों में
जो कुछ हो रहा था, सिर्फ वही हो सकता था, शहर के विभिन्न हिस्सों में न
जाने कितने लोगों से उन्होंने झूठ बोल कर पैसे लिए थे……किसी को नायाब
कारतूस लाकर देने और किसी को कोई जरूरी चीज दिलाने के बहाने, किसी से
बिमारी, किसी से भूख का बहाना करके, लेकिन किसी शर्म का ताअस्सर उनके
चेहरे पर कभी नहीं रहा था। यहां तक कि पिछले दिनों तो वह पीर-फकीरों की
मजारों में बैठने लगे थे……नजर और चढावे मिल जाने की उम्मीद में। जमील
चोरी करना सीख गया था। लेकिन उसके चोरी करने पर मियां ने कभी कोई एतराज
नहीं किया था। सारा घर उनको भूल कर, उनकी तबीयत की तरफ आंखें बंद कर ईद
की तैयारियों में लगा हुआ था। जफर मियां के यहां एक हफ्ते से घर की लिपाई
–पुताई चल रही थी। शाहिदा और जफर मियां के यहां बच्चों के कपडे सिले जा
रहे थे। बादाम-पिस्ते काट-धो कर सुखाए जा रहे थे।
असद मियां को इन सब लोगों—बहन, भाई और दोस्तों के बीच देख कर पता नहीं
क्यों मुझे हमेशा ऐसा लगता था, जैसे सिर्फ एक असद मियां ही अपने मुकाम पर
थे, और सारी दुनिया बदल गयी थी।

फलक मंजिल का बाहरी हिस्सा गहरे अंधेरे में डूबा हुआ था। चारदीवारी में
जगह-जगह रखने पड गए थे और कई जगह आसानी के ख्याल से लोगों ने दाखिले के
लिए दीवार को तोड डाला था। दाखिले के दरवाजे की जगह दोनों तरफ सिर्फ
सिमेंट के पिलर्स रह गए थे। सामने पोर्च में जफर मियां की ब्यूक खडी हुयी
थी। पोर्च से गुजर कर घुसने बाद फलक मंजिल का वह हिस्सा था, जहां असद
मियां रहते थे। उनके कमरे की हलकी सी रोशनी मुझे दूर से ही नजर आ रही थी।
दूर, सामने लगभग पचास फीट नीचे लहरे मारता हुआ तालाब था। कमरे के बाहर
लगे युकिलिपटस के नीचे खडे होकर बरसात की खामोश तेज हवा की रातों में
मैंने अक्सर पानी को लहरों और युकिलिपटस की पत्तियों का मिलाजुला कोरस
सुना था। इस वक्त दोनों चीजें चुप थीं।
सीढियां चढने से पहले एक लम्हे के लिए रूका। दूर, दायीं तरफ दरख्तों और
जंगली घास में घिरे लकडी के अध-टूटे शेड्स नजर आ रहे थे। असद मियां के
बाप अपने जमाने में सूबे के सबसे बडे लकडी के व्यापारी और फर्नीचर डीलर
थे। एक ही वक्त में कोई डेढ सौ कारीगर उनके शेड में काम किया करते थे।
दरवाजा खुला हुआ था। असद मियां की बेचैन निगाहें मुझ पर ठहर गयीं। वह
बिस्तर पर उठ कर बैठ गए थे। एक पल के लिए वह कुछ सोचते से रहे, फिर
उन्होंने इंजेक्शन मेरे हांथ से ले लिए।
—लगाएगा कौन? मैंने थोडी हिम्मत करके पूछा।
जवाब में असद मियां मुस्कराते हुए बिस्तर से उठे। खडे होने की कोशिश में
पहले तो डगमगाए, फिर संभल कर नंगे पैर ही अंदर कमरे में चले गए। थोडी देर
बाद वह सिरिंज हाथ में लिए वापस आए और देखते-देखते वे तीनों इंजेक्शन
उन्हीं के हांथों उनके खून में दाखिल हो गए।
मुझे एकदम लगा, जैसे मैं किसी चीज का इंतज़ार कर रहा हूं…किसी ऐसी चीज का,
जो मैं चाहता था कि न हो, लेकिन फिर भी उसका इंतज़ार था……असद मियां के
अगले सवाल का।
—यार, क्या किसी के पास तीन सौ बोर के कारतूस मिल सकते हैं? आबिद मियां
को चाहिए। सुना है, पीस-कोर में कोई आदमी बेच रहा है। इसके बाद थोडी देर
के लिए खामोशी रही। असद मियां अब बिस्तर पर लेट कर मेरी तरफ करवट ले चुके
थे। मैंने पहली बार देखा कि असद मियां के सिर पर बाल बहुत कम रह गए थे।
—और तुम्हारी खेती के क्या हाल हैं ? मुझे लगा, जैसे लहजे में कुछ छिपा
हुआ था। मजाक, तंज या कुछ और, लेकिन क्या, मैं समझ नहीं पाया ?
—ठीक है। ट्रैक्टर चल रहा है। मैंने जवाब दिया।
—मेरा मशविरा तो यह है कि अब भी संजीदगी के साथ पढ डालो। क्या रखा है
इस तरह की खेती-वेती में ! आज तो बहन है। कल भांजे बडे हो जाएंगे, तो
क्या करोगे। यह सब तुम्हारे बस का नहीं है। अभी तो सब खुश हैं कि बहनोई
की मौत के बाद भाई, बहन और भांजों के लिए कितना कर रहा है, लेकिन
धीरे-धीरे सब बदल जाएगा। अरे हां, यह तो बताओ, क्या तुमने कभी किसी जिन
को देखा है ?
—जी ? मुझे यकीन नहीं आया।
—जिन ……मेरा मतलब जिन्नातों से है।लोग नमाजे-वजीफे पढ कर जिनों को अपने
कब्जे में कर लेते हैं। क्या कहते हैं उन्हें ? मवक्किल जिसके कब्जे में
हो, उसकी हर ख्वाहिश पूरी करता है। हर काम करता है। किसी भी तरह । आज एक
साहब कह रहे थे कि उन्होंने एक जमाने में जिनों को देखने और कब्जे में
करने के लिए बडे जतन किए । वीरानों मे जा जा कर इबादतें कीं, उजाड और गैर
आबाद मसजिदों में अजानें दीं, लेकिन उन्हें कभी कोई जिन इनसानी शक्ल में
नजर नहीं आ सका। हां, एक सांप के रूप में जरूर नजर आया। कोई डेढ बालिश्त
लंबा, बहुत ही खूबसुरत लाल रंग का। वैसे खुदा मालूम उन्हें यह कैसे पता
चला कि वह जिन ही था। कभी तुम्हारा दिल भी चाहता है जिनों को देखने के
लिए ?
–जी नहीं। मुझे झुरमुरी- सी आ रही थी।
—एक जमाने में शहर में ए पहुंची हुयी औरत हुआ करती थी। सुना है, उसके
कब्जे में मवक्किल था। जाहिर है, वह उसकी ख्वाहिशों को पूरा कर सकता था।
लेकिन बेचारी मरी बहुत गरीबी में। क्या पता, कभी कब्जे में आए, तो पता
चले ! और असद मियां हंसने लगे—तुम गांव कब वापस जाओगे ? उन्होंने पूछा।
—बासी ईद को, या उसके अगले दिन ।
–खेतों के लिए खाद का कोई इंतजाम हुआ ?
–अभी तक तो नहीं।
–ओह हां, वो फर्टलाईजर कारपोरेशन के शर्मा जी मेरी पहचान के हैं। एकदम
असद मियां मेरे चेहरे की बजाए कहीं और देखने लगे थे, जैसे उनकी आंखें
मुझसे बचना चाह रही थीं—मैंने युं ही बताया। तुम चाहो, तो मैं खाद
दिलवा…और उन्होंने जुमला पूरा नहीं किया। अब सद मियां छत की तरफ देखने
लगे थे। फिर एक ठंडी सांस लेकर वह बडी थकी आवाज में बोले—बस, अब तुम जाओ।
मैं बिल्कुल ठीक हूं। और उनकी आंखें झिलमिला गयीं।

सब लोग जैसे अपने आपको इस हादसे के लिए तैयार कर चुके थे। कमरे में पूरी
फलक मंजिल जमा थी।
असद मियां के हलक से अजीब-सी आवाज़ें निकल रही थीं और उनका मुंह फट कर खुल
गया था। गरदन और माथे की रगें खिंच कर उभर आयी थीं और चेहरे पर नीलाहट
दौडने लगी थी…बिल्कुल वैसी ही नीलाहट, जैसी बर्फ में दबे गोश्त में पैदा
हो जाती है। सुहेला भाभी उसी प्याजी साडी में उनका सर अपनी गोद में रखे
बैठी थीं और चेहरे पर एक अजीब-सी विरानी घिर आयी थी। उनकी खुबसुरत साडी
में असद मियां का मैला चेहरा बडा आउट आफ प्लेस लग रहा था।
–यासीन शरीफ पढो,मियां ! सैयदानी बुआ ने जफर मियां से कहा और जफर मियां
झपट कर भागे। कुछ ही लम्हे बाद वह पंचसुरा हांथ में लिए कमरे में लौटे।
असद मियां के सिरहाने बैठकर वह धीमी-धीमी आवाज में यासीन शुरू कर चुके
थे……मौत की तकलीफ को कम करने के लिए। कहीं से किसी की हिचकियों की आवाज़
उभर रही थी। मैंने देखा, असद मियां की मां अपना सर उनके पैरों पर रखे रो
रही थी।
पल भर के लिए मानो सब कुछ रूक गया । असद मियां का जिस्म बेहरकत हो गया
था। लेकिन सुहेला भाभी की चीख के पहले ही शायद असद मियां ने आंखें खोल
दीं और बडे मासूमाना अंदाज़ में उन्होण्मे अपने चारों तरफ इकटठी भीड पर
नज़र डाली। जफर मियां याशीन शरीफ पढना बंद कर चुके थे। सुहेला भाभी के
चेहरे पर वही तंजिया-सी मुस्क्रराहट फिर खेलने लगी थी। वह एक चमचे से असद
मियां के हलक में पानी टपका रही थी। मैंने घडी की तरफ देखा, रात के साढे
बारह नज चुके थे।
–कुछ बोलो,बेटा……? कैसी तबीयत है …? क्या हो गया था ? असद मियां की मां
कह रही थीं। उनकी आवाज ऐसी लग रही थी, जैसे किसी ग्रामोफोन रिकार्ड को कम
स्पीड पर बजा दिया गया हो। आंखों से आंसू बहे जा रहे थे, जिन्हें वह
दोपटटे के पल्लू से पोंछ रही थी। मैंने देखा, उनके एक जमाने के नरम और
नाजुक हांथों में खुरदरापन आ गया था।

जफर मियां खडे हुए सर पर टोपी के एंगिल को लगातार बदल रहे थे। पंचसूरा अब
भी उनके हांथ में ही दबा हुआ था। फिर सुहेला भाभी ने असद मियां का सिर
तकियों पर रख दिया। असद मियां चारों तरफ गर्दिश कर रही थीं। सब कुछ गहरी
खामोशी में डूब गया था। सिर्फ असद मियां की मां की सिसकियां थीं, जो
धीरे-धीरे धीमी होती जा रही थीं।

असद मियां थोडी कोशिश के बाद तकियों के सहारे बैठ् गए। उनके चेहरे की
मुस्कुराहट हर पल गहरी होती जा रही थी। क्मरे में कोई अपनी जगह से हिला
तक नहीं । अचानक, अपने कमजोर जिस्म के बावजूद असद मियां ने खनकती आवाज़
में कहा……नहीं, मैं बिल्कुल ठीक हूं ! घबराइए मत, कुछ नहीं होगा…कम से-कम
रमजान की कल शाम तक तो नहीं ! आप यकीन कीजिए ? खुदा मालूम, असद मियां
किससे कह रहे थे, लेकिन उनकी उस मुस्कराहट में मुझे लगा, ह्जारों कहकहे
घिर आए थे।

फिर धीरे-धीरे लोग असद मियां के कमरे से रुकसत होने लगे। थोडी देर बाद
मैं अकेला वहां रह गया था। सुहेला भाभी शायद अंदर कपडे बदल रही थीं और
बच्चे सोने के लिए लेट चुके थे।
उठते वक्त मैं सोंच रहा था कि उस रात असद मियां के कमरे से शायद हर आदमी
मायूस हो कर वापस लौटा था।

अगली शाम साढे चार बजे मैं जफर मियां के कमरे मेण बैठा ईद की खरीददारी का
बजट सोंच रहा था। शहनाज़ आपा और जफर मियां आखिरी रोजे के इफतार पर कहीं
इनवाईटेड थे और तन्नू शाहिदा के यहां चला गया था। सवेरे मैं असद मियां
को देखने गया था और खिडकी में से उन्हें कोई किताब पढते देख कर वापस आ
गया था। मैं लिस्ट बना ही रहा था कि जमील भागता हुआ कमरे में दाखिल हुआ।
—आपको अब्बू बुला रहे हैं ! उसकी सांस फूल रही थी।
—अम्मी घर पर हैं ? मैंने पूछा ।
—कोई भी नहीं है !
–तबीयत कैसी है उनकी ?
—वैसी ही है। सीने में दर्द हो रहा है। आपको जल्दी से बुलाया है। जमील
मेरे जवाब का इंतज़ार कर रहा था।
–तुम चलो, मैं आ रहा हूं। मैं जानता था, वह किस लिए बुला रहे थे।
पैथिडीन ! मैंने पांच रूपए का नोट जेब में रख लिया।
असद मियां की हालत फिर रात जैसी हो रही थी। रंग नीला पड गया था, आंखों की
पुतलियां फिर गयीं थी और सांस बहुत तकलीफ से आ रही थी। एकदम, पता नहीं
क्यों, मुझे डर सा लगा, जैसे किसी सुनसान सडक पर मैं अकेला खडा रह गया
हूं।

थोडी देर में कमरे में लोग इकटठे होना शुरू हो गए और मैं भागता हुआ
डाक्टर को बुलाने के ख्याल से बाहर आ गया। काफी पैदल दौडने के बाद मुझे
एक टैक्सी मिली। जब डाक्टर के साथ टैक्सी फलक मंजिल में दाखिल हुई, तो
बहुत देर हो चुकी थी।
शाम के लंबे साए जमीन पर फैलने लगे थे।
कमरे में सिसकियां –ही-सिसकियां सुनायी दे रही थीं।
असद मियां की आंखें खुली हुई, अजीब ढंग से कहीं देख रही थीं। कम रोशनी
में लग रहा था, जैसे उन आंखों में मिला-जुला गुस्सा और मुस्कुराहट अब भी
थी। सकते के आलम में मैं उनके चेहरे को देखता रहा, फिर आगे बढ कर उन खुली
आंखों को बंद कर दिया। डाक्टर ने उनका जिस्म सफएद चादर से ढक दिया।
एकदम किसी चीज ने मेरा ख्याल असद मियां के मुर्दा चेहरे से अपनी तरफ
खींच लिया, जैसे दरोदीवार हिल गए थे। कोई गोला फलक मंजिल के ऊपर आ कर
फूटा था।
……दो, तीन,चार…तोंपें चल रही थीं। रोजे के इफ्तार की……ईद के चांद की।
रमजान अब खत्म हो रहे थे।