sania

टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा को तेलंगाना राज्य का ब्रांड एम्बेसडर बनाये जाने पर जो विवाद उठा है वह इसलिए निरर्थक है क्योंकि सानिया मूलत: भारतीय हैं और उनके पुरखे भारतीय हैं। यह विवाद भी निरर्थक है कि वह मूल रूप से तेलंगाना की हैं या नहीं। हैदराबाद में पली-बढ़ी सानिया को अगर हम तेलंगाना की निवासी नहीं मानेंगे तो किसे मानेंगे क्योंकि हैदराबाद पर हक तो तेलंगाना का ही बनता है। कुछ लोगों को दिक्कत यह है कि उन्होंने पाकिस्तान के खिलाड़ी से विवाह किया है। इसमें भी भारत के लोगों को कोई परेशानी नहीं है। यदि कोई भारतीय पाकिस्तान मूल की कन्या से विवाह करता है तो हम किस प्रकार उसे नकार सकते हैं। हमारे भारत के संविधान में प्रत्येक वयस्क को अपनी मर्जी का जीवन साथी चुनने का अधिकार है। देश की नई पीढ़ी के लिए इस बात के कोई मायने नहीं हैं कि कौन किस देश का निवासी है। उसके लिए जीवन साथी की ईमानदारी मायने रखती है। जिस दौर में पूरा विश्व आर्थिक उदारीकरण के माध्यम से एक अन्तर्राष्ट्रीय कस्बा बनता जा रहा है उस दौर में यह सोचना सिर्फ मध्यकालीन युग में लौटने जैसा है मगर भारत के लोग तो उस दौर में भी अपनी विशाल हृदयता के मालिक रहे हैं जब चयनित आधार पर विभिन्न देशों के बीच कारोबार होता था। एक किस्सा कालाकांकर के महाराज कुमार ब्रजेश सिंह का साठ के दशक में भारत के बच्चे-बच्चे की जुबान पर रहता था। वह रूसी महिला स्वेतलाना का था। स्वेतलाना सोवियत संघ के शासक रहे जोसेफ स्टालिन की पुत्री थीं और कुंवर ब्रजेश सिंह के प्रेम पाश में तब बन्ध गई थीं जबकि वह पहले से ही शादीशुदा थे। ब्रजेश सिंह सोवियत संघ में जब दमे की बीमारी का अपना इलाज करा रहे थे तो वह उनके सम्पर्क में आयी थीं और उनके साथ ही रहने लगी थीं मगर 1966 में ब्रजेश सिंह की मृत्यु के बाद वह उनकी अस्थियों को भारत लाना चाहती थीं। उस पर भारत की संसद से लेकर अखबारों में जबर्दस्त विवाद छिड़ा था मगर वह उनकी अस्थियां लेकर भारत के कालाकांकर पहुंची थीं और उन्हें गंगा में प्रवाहित किया था। उसके बाद स्वेतलाना स्वदेश नहीं गईं और 1967 में अमरीका चली गईं और मृत्यु पर्यन्त उसी देश में रहीं। तीन वर्ष पहले 2011 में ही उनकी मृत्यु हुई। सोवियत संघ की सरकार स्वेतलाना को भारत आने की इजाजत नहीं देना चाहती थी मगर स्वेतलाना कुंवर ब्रजेश सिंह की अंतिम इच्छा को पूरा करने की जिद पर अड़ी हुई थीं और तत्कालीन भारत की सरकार ने उनकी यह इच्छा पूरी कराई थी। स्वेतलाना का वैधानिक रूप से ब्रजेश सिंह से विवाह भी नहीं हुआ था मगर उन्होंने उनकी मृत्यु के बाद पत्नी धर्म निभाया था। यदि इस रूप में हम देखें तो सानिया मिर्जा पर अन्तत: पाकिस्तान का पहला हक बनेगा क्योंकि वह उस देश की बहू हैं। स्वेतलाना को भारत में बसाने में तब की इंदिरा सरकार ने इसलिए अनिच्छा जताई थी क्योंकि हमारे सम्बन्ध सोवियत संघ से बहुत आत्मीय थे और जोसेफ स्टालिन की पुत्री होने के कारण स्वेतलाना की वजह से दोनों देशों के बीच के सम्बन्धों में खटास आ सकती थी मगर सानिया मिर्जा के मामले में सब कुछ उन पर ही निर्भर करता है कि वह अपनी ससुराल और मायके में से किसको प्राथमिकता देती हैं। सानिया मिर्जा ने जब यह साफ कह दिया है कि वह हिन्दोस्तानी ही रहेंगी तो संशय खत्म हो जाना चाहिए। सानिया रहेंगी तो भारत की बेटी ही। वैसे भी ब्रांड एम्बेसडर का क्या मतलब होता है। यह विशुद्ध रूप से व्यापारी सोच है। किसी राज्य विशेष के व्यापारिक हितों को बढ़ावा देने में यदि किसी खेल विधा की शख्सियत का सहयोग लिया जाता है तो यह शुद्ध रूप से वाणिज्यिक आधार पर लिया जाता है और बदले में ब्रांड एम्बेसडर को लाखों रुपये मिलते हैं। असल में आपत्ति तो भारत रत्न जैसा सम्मान प्राप्त करने वाले उन लोगों द्वारा किसी कम्पनी के व्यापारिक हितों के संवर्धन करने पर होनी चाहिए जो राष्ट्र के गौरव को व्यापार पर कुर्बान कर देते हैं। इतना ही नहीं संसद में बैठने वाले कितने ही सांसद भी यह काम करते हैं। यह पूरी तरह अनुचित है और प्रमुख प्रजातान्त्रिक देशों में संसद सदस्यों द्वारा ऐसी व्यापारिक गतिविधियां प्रतिबन्धित हैं। हमें जरा ऊपर उठकर सोचना चाहिए, अपना दिमाग खोल कर सोचना चाहिए। भाजपा ने सानिया के विवाद से पल्ला झाड़ कर अच्छा ही किया है बल्कि पाकिस्तान को अपनी बन्द सोच से बाहर निकालने के लिए हम सानिया मिर्जा के उदाहरण को पूरी दुनिया के सामने नजीर की तरह पेश कर सकते हैं कि हम किसी भी रूप में अपने नागरिकों के बीच उनके धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करते बल्कि उनकी प्रतिभा को नमस्कार करते हैं। यही तो भारत की विशेषता है।