kashmir
अफ़ज़ल ख़ान

अविभाजित भारत 1946 ई.मे अंग्रेजों द्वारा पेशकश कैबिनेट मिशन प्लान के तहत कांग्रेस और मुस्लिम लीग की गठबंधन सरकार बनाए जाने पर दोनों पक्षों में सहमति हो गई. कांग्रेस की मंजूरी के बावजूद पंडित नेहरू ने इस योजना को खारिज कर भारतीय विभाजन का रास्ता खोला. नेहरू ने ऐसा क्यों किया? इसकी सबसे बड़ी वजह नेहरू सत्ता मे भागीदारी नही चाहते थे और जो दूसरी वजह सामने आती है वह यह है कि नेहरू कृषि सुधार के माध्यम से हिंदुस्तान से जागीरदार प्रणाली का अंत चाहता था. लेकिन जमींदारों पे शामिल मुस्लिम लीग को यह मंजूर नहीं था. इन्हीं मतभेदों में यह मतभेद था कि नेहरू की इच्छा थी कि Princely States की जनता यह फैसला करेगी कि क्या यह एक स्वतंत्र राज्य के रूप पर रहना है या हिंदुस्तान में विलय करना है. जबकि औपनिवेशिक ब्रिटेन अधिकार राज्य के नवाब या राजा को देना चाहता था जो मुस्लिम लीग की पुरजोर समर्थन प्राप्त था. बहरहाल इण्डिपेंडेंस ऑफ इंडिया 1947 के अधिनियम में इस बात पर सहमति हुई कि नवाबी राज्य यारजवाड़े का शासक ही स्वतंत्र रहने या भारत और पाकिस्तान में से किसी एक राज्य के साथ विलय का फैसला करेगा.जिन्ना इस के जबरदस्त समर्थक थे. इसी अधिनियम के तहत कश्मीर के राजा ने कश्मीर को एक स्वतंत्र राज्य रखने का फैसला किया. इसी तरह हैदराबाद की धनी राज्य भी स्वतंत्र रहने का फैसला किया.

लेकिन पाकिस्तान बने कुछ महीने ही हुए थे कि पाकिस्तान की ओर से जनजातीय लश्कर ने कश्मीर कमजोर राज्य पर हमला कर दिया जिसे जिहाद कश्मीर का नाम दिया गया. जनरल अकबर ने अपनी पुस्तक “Raiders of Kashmir” में बात खुल के स्वीकार किया है कि वास्तव में इस आदिवासी लश्कर को सेना के नेतृत्व और ररहनमाई प्राप्त था. आप उन्हें समय तालिबान समझ सकते हैं. उसी समय से पाकिस्तानी स्थापना और कबाइली मुजाहिदीन का गठबंधन शुरू हुआ जो आज तक जारी है. अक्सर पाकिस्तानी विचारक और इतिहास दान अमेरिका 1979-1988 ई. के अफगान जिहाद के दौरान मुजाहिदीन और तालिबान के निर्माता बताते हैं. लेकिन सच तो यह है कि पाकिस्तान के प्रोरदा आदिवासी मुजाहिदीन का इतिहास बहुत पुराना है. यह तभी शुरू होती है जब पाकिस्तान का अस्तित्व प्रक्रिया में आया और जब कि उस समय पाकिस्तान अमेरिका के साथ किसी प्रकार के अंतरराष्ट्रीय गठबंधन जैसे Seato या Cento साझा तक न था. जब राज्य कश्मीर के शासक हरि सिंह ने यह देखा कि उसकी कमजोर राज्य एक बड़े देश की Proxy सेना से तुलना के सकत नहीं रखती तो वह भारत से मदद मांगी ली. भारत ने इस मौके का फायदा उठाया और रनारो भारतीय सेना की मदद कश्मीर के भारत के साथ विलय के अधीन किया. नाचार हरी सिंह को भारत की यह शर्त माननी पड़ी.यूं इण्डिपेंडेंस ऑफ इंडिया 1947 के एकट की अंतर्गत भारत राज्य कश्मीर को अपने देश में जोड़ने का कानूनी अधिकार मिल गया. भारतीय सेना ने आदिवासी लश्कर पीछे धकेल शुरू किया लेकिन संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी सेज़ फायर के तहत उसे बंद होना पड़ा और कश्मीरी राज्य के एक बड़े हिस्से को वह वापस लेने में कामयाब न हो सका. यही हिस्सा अब पाकिस्तान में ‘स्वतंत्र कश्मीर’ कहलाता है जबकि भारत में यह पाक अधिकृत कश्मीर के नाम से जाना जाता है.

दरअसल पाकिस्तान ने इण्डिपेंडेंस ऑफ इंडिया 1947 के एकटकी पालन में दुर्भावनापूर्ण से काम लिया. दोनों दुनिया का मज़ा लौटना चाहता था. एक तरफ तो उसका ख्याल था कि हैदराबाद डेक्कन के शासक ब्रिटेन से अपने मजबूत संबंधों के आधार पर राज्य को मुक्त रखने में सफल हो जाएगा. इसलिए जिन्ना ब्रिटेन की पेशकश प्रस्ताव का समर्थन किया जिसके तहत नवाबी राज्य के शासक को राज्य के भाग्य का फैसला करना था. हैदराबाद डेक्कन अपनी बेपनाह दौलत से नवजात पाकिस्तान के प्रायोजन कर रहा था. इसलिए पाकिस्तान हैदराबाद मुक्त राज्य के तरीके देखना चाहता था. दूसरी ओर पाकिस्तान का मानना था कि वह पड़ोसी राज्य कश्मीर बज़ोर शमशेर कब्जा हो जाएगा. लेकिन हुआ इसके बिल्कुल विपरीत. एक ओर तो पाकिस्तान ने कश्मीर में सेना क्षय कर खुद इसे भारत में शामिल होने पर मजबूर किया. दूसरी ओर भारत ने अपने ताकत के बल पर इसी तरह हैदराबाद-डेक्कन कब्जा कर लिया जैसे पाकिस्तान कलात राज्य पर कब्जा. इसे कहते हैं न खुद ही मिला न वेसाल सनम.अगर हम ध्यान दे तो सॉफ पता चलता है के भारत और पाकिस्तान दोनो के नजरे आज़ाद राज्यो पे थी और अपने मुल्क मे विलय करने का कोई न कोई बहना खोज ही रहे थे.

भारत की ब्लैकमेलिंग के तहत कश्मीर के विलय पर कश्मीरी जनता में आक्रोश पाया गया. उन्हें इस बात पर गुस्सा था कि कश्मीर पाकिस्तान और भारत के बीच एक लूट माल बन गया था. इसलिए कश्मीर में राज्य की स्वतंत्रता के लिए एक राष्ट्रीयता वाले, लोकतांत्रिक और राजनैतिक संघर्ष शुरू हुआ जिसमें कश्मीरी मुसलमान तथा हिन्दू कंधे से कंधे मिला कर शामिल थे. जबकि पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जे के सपने को कभी भी भुला नही पाया इसलिये वहाँ पाई जाने वाली राजनीतिक अशांति से लाभ उठाने के लिए पाकिस्तान ने एक बार फिर 1965 में कश्मीर पर हमला किया. इस बार पाकिस्तान ने सोचा कि क्योंकि नियंत्रण रेखा एक विवादास्पद सीमा है इसलिए यहां हमले के परिणाम में युद्ध यहाँ तक सीमित रहेगी. लेकिन इस बार भी अनुमान में गलती हुई और भारत ने पाकिस्तान को जबरदस्त टाक्कार दी. पाकिस्तान को भारी नुकसान उठाना पड़ा. पाकिस्तान ने कश्मीरियों के राष्ट्रीय संघर्ष (राष्ट्रवादी मूवमेंट) को धार्मिक संघर्ष में बदल कर अपने नुक़सान का भरपाई किया. तब से लेकर आज तक पाकिस्तानी स्थापना प्रोरदा जिहादी संगठन लगातार पाकिस्तानी युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण देकर कश्मीर में घुसपैठ के लिए भेजती रही हैं. इस बाहरी हस्तक्षेप कारण भारत सरकार को कश्मीर में बुनियादी नागरिक अधिकार निलंबित करने का औचित्य मिल गया जिसकी चपेट में कश्मीर के नागरिक भी आ गए. यह एक त्रासदी था कि कश्मीर की स्वतंत्रता के नाम पर गैर कश्मीरियों ने कश्मीरियों का नरसंहार किया.