sai-baba

शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद की इस राय को तर्कसम्मत ही माना जाएगा कि शिरडीवाले साईं बाबा को भगवान मानकर पूजना गलत है। उनका यह कहना भी सही है कि हिंदुओं के धर्मशास्त्रों में साईं बाबा का कहीं नामो-निशान तक नहीं है लेकिन उनका यह कहना विवादास्पद है कि साईं बाबा मुसलमान थे, इसलिए हिंदुओं को उनकी पूजा नहीं करनी चाहिए। वे मुसलमान थे, या नहीं, इस पर कोई पक्की राय किसी की नहीं है। हां, वे महाराष्ट्र के शिरडी नामक स्थान में रहते थे, एक टूटी मस्जिद में। वे कहा करते थे, ‘अल्लाह सबका मालिक है’। उनकी दाढ़ी और पहनावा भी सूफी संतों की तरह था लेकिन यदि वे वास्तव में मुसलमान थे तो उनकी पूजा तो न मुसलमानों को करनी चाहिए और न ही हिंदुओं को। इस्लाम में तो कहा गया है कि अल्लाह तो एक ही है। कोई दूसरा नहीं। यदि कोई दूसरा खुद को अल्लाह कहे तो यह शैतानियत है।

जहां तक हिंदुओं का सवाल है, शिरडीवाले साईं के लाखों भक्त हैं। वे भारत और भारत के बाहर भी फैले हुए हैं। उन्हें शंकराचार्य के बयान से काफी चोट पहुंची है और वे शंकराचार्यजी के भक्तों पर टूट पड़े हैं। इसे ही कहते हैं, अंधभक्ति। यदि स्वरुपानंदजी ने वैसा बयान दे दिया तो दे दिया, उस पर उबले बिना भी आप साईं बाबा के प्रति अपना भक्तिभाव बनाए रख सकते हैं लेकिन हमारे देश में व्यक्ति-पूजा चरमोत्कर्ष पर है, धार्मिक और राजनीतिक, दोनों क्षेत्रों में!

हालांकि भारतीय धर्मग्रंथों, खासकर वेदों और दर्शनशास्त्रों में कहीं भी व्यक्ति-पूजा और जड़-पूजा का विधान नहीं है। व्यक्ति-पूजा दुनिया के दूसरे देशों में भी है लेकिन भारत दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है, जहां मूर्ति-पूजा होती है। यहां करोड़ों लोग पत्थर को भगवान मानकर पूजते हैं। ऐसे देश में साईं बाबा जैसे लोगों को भगवान मान लिया गया तो आश्चर्य क्या है? इसी अंधविश्वास के कारण साईं के भक्त हर साल करोड़ों रुपया दान-धर्म में जमा कर लेते हैं। दूसरे संप्रदायों के मंहतों को इससे ईर्ष्या-द्वेष होना स्वाभाविक है। आजकल पूजा-पाठ अपने आप में बहुत बड़ा व्यवसाय बन गया है। इसलिए बड़े-बड़े साधु-संतों में प्रतिस्पर्धा होती रहती है। इस व्यापार में अंधविश्वास ही सबसे बड़ा विश्वास होता है।

यह कोरा अंधविश्वास है, इसमें ज़रा भी शक नहीं है लेकिन मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि गहरा विश्वास या अंधविश्वास कई बीमारियों को ठीक कर देता है, कई अंधेरों में से रास्ते निकाल देता है, संकट में बल प्रदान करता है लेकिन यह भी सत्य है कि अंधविश्वास मनुष्य और समाज को अकर्मण्य बना देता है, उसकी बुद्धि को ठस कर देता है और आदमी को अपनी कर्म की बजाय किसी की कृपा के सहारे पर जीने को मजबूर कर देता है।