Mahavir-tyagi

सवतंत्रता सेनानी महावीर त्यागी ( 1899 – 1980 ) एक अनूठे इंसान थे वे 1919 में जलियावाला बाग़ हत्या कांड के बाद बिर्टिश सेना के इमरजेंसी कमीशन से त्यागपत्र देकर सवतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े जेल जीवन , सविधान सभा , लोकसभा राज्य सभा , में रहते हमेशा अपने आदर्शो पर अडिग रहे . सवतंत्रता सेनानियों में त्यागी जी का व्यक्तित्व बड़ा ही रोचक और चित्ताकर्षक था वे भावुक सच्चे बागी ईमानदार और निडर थे हाज़िर जवाबी में ये माहिर थे उत्तर प्रदेश में देहरादून इलाके में इनका कोई सानी नहीं था सारा जिला त्यागी जी का अपना घर था और ये देहरादून के सुल्तान या डिक्टेटर कहलाते थे महात्मा गांधी मोतीलालनेहरु और रफ़ी अहमद किदवई के अत्यंत प्रिय महावीर त्यागी जी को जो अनुचित लगता उसे निस्वार्थ भाव से विरोध भी करते थे मगर किसी से देष नहीं रखते 1947 – 48 के साम्प्रदायिक दंगो को रोकने में इन्होने ज़बरदस्त भूमिका निभाई थी यु पी इन्होने कुछ स्वयसेवको को एकत्र करके उनके साथ पुलिस की वर्दी धारण की और एक विशेष बल का संघटन किया जो दंगो में अपनी जान की परवाह कियते बिना शांति स्थापित करता था जो त्यागी पुलिस कहलाता था लीग के बड़े नेता खलीकुज्जमा ने पाकिस्तान जाकर इस विषय पर जो संस्मरण लिखे उसमे त्यागी जी की जमकर प्रशंसा की . उनके राज़नीतिक व् सामाजिक जीवन के के कुछ संस्मरण कुछ पात्र पत्रिकाओ में समय समय पर प्रकाशित हुए वे अपने रोचक शैली के कारण इतने लोकप्रिय हुए की पाठको के आग्रह पर उनको 2 पुस्तको के रूप में छपवाया गया क्रांति के वे दिन और मेरी कोन सुनेगा ” पेश हे महावीर त्यागी जी के लाजवाब संस्मरणों के कुछ अंश ” लोगो का ख्याल हे की गहरी मनोकामनाओ की पूर्ति हो जाने पर मनुष्य को असीम आनंद और संतुष्टि मिल जाती हे . एक सीमा तक ये बात ठीक भी हे , पर इसमें प्रशन यह उठता हे की लक्ष्य की प्राप्ति के बाद क्या हो ? या तो कोई दूसरा लक्ष्य ढूँढना पड़ेगा या मेरी तरह अपने नातियों के साथ आँख मिचोली खेल कर ज़ी बहलाना होगा कोठी बंगले और हलवा पूरी जिन किन्ही को प्राप्त हे वो धन्य हे पर संसार का वास्तविक आनंद लूटने के लिए तो कोठी से बहार निकल कर किसी गैर पर आँख टिकानी पड़ेगी और अपनी हलवा पूरी के साझीदार भी ढूंढने पड़ेंगे ”

” पंडित मोती लाल नेहरू को अपने हाथ से सब्ज़ी तरकारी पकाने का और विशेष अनुपात की चाय बनाने का शौक था . सन 1922 की बात हे जब वे लखनऊ जेल की दीवानी बैरक में बंद थे तो में कभी कभी सब्ज़ी आदि छील दिया करता था एक दिन दम आलू बनाने बैठे थे . में किसी दूसरी बैरक में गप शप के लिए चला गया . लौटने पर मेने पूछा सब्ज़ी ठंडी हो रखी हे भाई जी आपने खाई क्यों नहीं बोले ”इतने शौक से बनाई थी तुम हेंचो मटर गश्ती को चले गए क्या में अकेला खाओ क्योकि दाद देने वाले न मिले तो ग़ज़ल सुनाना बेकार हे ” सुख का असली मज़ा तो साझेदारी में ही हे ”

”फटी आस्तीन और नंगे सर तपती धुप में साइकिल पर 14 मील का सफर करके एक घने जंगल से गुजर रहा था की पेड़ो की छाया में एक ठन्डे पानी का झरना दिखाई दिया बस प्यास भड़क उठी उतरा और दोनों हाथो की खिंच भर भर के अपनी थकी आत्मा को ढांढस देने लगा केसा फरिश्ता सा लगता था में . आज मिनिस्ट्री की कुर्सी पर बैठ कर जब कभी शीशे के गिलास में बर्फ का पानी पीता हु तो ठंडी साँस लेकर पुरानी गरीबी के मज़े याद आते -ओक हाथो के ( चुल्लू ) से पिए पानी का मज़ा गिलासों में कहा हे ”
”आजकल की दुनिया इस पर यकीन न करेगी पर मेरे यह निजी अनुभव की बात हे की एक समय ऐसा था जब मेरे जिले देहरादून की सारी जनता एक सामूहिक परिवार की तरह से रहती थी सारे अमीर गरीब हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई एक दूसरे से पूरी अपनावट मानते थे और सच्ची सुहानुभूति रखते थे मकानो और दुकानो पर अधिकतर ताले भी नहीं लगते थे अक्योकि बईमानी चोरी और धोखाधड़ी नहीं होती थी ” ” 1974 सच बात तो ये हे की सवराज होने से हम अधिकांश कांग्रेस वाले बेरोजगार और निठल्ले हो गए हे अब आनंद रुपी मज़दूरी मिलती नहीं हे जिस मालिक ( महात्मा गांधी ) ने हमें पाला वह मर गया उसी चुटकी पर कान खड़े करते और उसी की सीटी पर कूदते फांदते और शिकार करते थे उसी की मुस्कराहट पर पर लट्टू बने घूमते थे . अब हमारे गले का पट्टा निकल गया हे और लावारिस बने इधर उधर पुंछ हिलाते फिर रहे हे अब कोई चुटकी बजाता नहीं और न कोई मुस्कुराता हे गिन गिन कर हर नेता का दरवाज़ा खटखटा चुके की कोई मदद लगावे तो हम भी काम में लग जावे पर नेताओ के पास उपाधिया तो बहुत हे वज़ीफ़े ओहदे परमिट और लाइसेंस आदि भी बहुत हे चाय के प्याले भी हे पर काम नहीं हे ”

” हम खूब बढ़ बढ़ कर बात करते थे और गांधी जी की बात बताते बताते थकते नहीं थे . लेक्चर भी हम इसलिए थोड़े ही देते थे की हम जनसाधारण से अधिक जानते थे बल्कि इसलिए की हम इनमे वही मज़ा आता था जो की कुत्ते को भोकने और में और शोर मचने में आता हे पर अब वह सारी बाते सवपन हो गयी हे . अब हमें सचमुच अंग्रेज़ो की याद सताने लगी हे वह हमसे लड़ता था लाठीचार्ज करता था हथकड़ी डालता था और जेल भेज़ता था था पर जब जेल से छूट कर आते तो बड़े शौक से हाथ मिला लेता था . उसके रहते रहते हमने 29 वर्ष पूर्ण सवराज और स्वछँदता का मज़ा लूटा उसके चले जाने से जैसे बेरे खानसामे बेरोजगार हो गए – वैसे ही कांग्रेस कार्यकर्त्ता भी बेकार हो गए बापू की कमाई तो ख़त्म हो रही हे बेटो को खुद भी तो कुछ कमाई करनी चाहिए ”

बापू की उस दिन की डांट याद करके प्यार उमड़ आता हे . आजकल के गुलाबी लीडर तो आप आप करके बोलते हे माँ बाप गुरु और बड़े भाई की डांट धमकी गली चपतबाज़ी की तह में जितना अपनापन और प्यार हे उसका सोवा हिसा भी आजकल के प्यार दुलार और चुमकार में नहीं मिलता हे ” 1929 महात्मा गांधी देहरादून क्या आये मेरी उम्र 30 वर्ष से घटकर 15 की रह गयी और सर पर स्कूल के बच्चो वाली शैतानी सवार हो गयी मुह आई बकने लगा और मनमानी करने लगा . न जाने किस नशे में चूर था में , मेरी चालढाल बातचीत कहना सुनना और उठना बैठना सब ऐसा बदला मानो औलिया हो गया हु करता भी क्या शहर वालो ने पागल बना रखा था में तो फिर भी एक छोटा सा आदमी था अच्छो अच्छो के दिमाग फिर जाते हे जब चारो और से लोग उनका नाम ले ले कर पुकारने लगते हे मांग बढ़ जाने पर तो मेथी पालक के भी भाव बढ़ जाते हे ” एक दिन जब बापू सेवाग्राम में टहल रहे थे की रास्ते में एक 2 इंच लम्बा एक पूनी ( चरखे काटने की रुई ) का एक टुकड़ा पड़ा दिखाई दे गया बापू ने उसे उठा लिया और आश्रमवासियों से कहा की देश की संपत्ति को इस लापरवाही से नहीं फेकना चाहिए ”

”उन दिनों कांग्रेस संस्था का रूप एक परिवार के जैसा था जिसमे एक दुसरे की डांट डपट भी होती और रूठो हुओ की खुशामद भी होती थी असल में उनदिनों हमारा सपना साझे का था सभी अपनी अपनी शक्ति के अनुसार उसमे रंग भरते थे इसलिए आपस में ईर्ष्या नहीं थी स्पर्धा थी आज की संतति उन दिनों का चित्रण पूरी तरह से नहीं कर सकते हे क्योकि अब वे सपने फूटकर टुकड़े टुकड़े हो गए हे अब तो हम सब व्यक्तिगत सपने देख रहे हे और अपने अपने निजी सपनो में रंग भरने की चिंता करते हे ” महत्मा गांधी ने मुझे मुनादी का काम सौपा सवतंत्रता संग्राम के दिनों में लाखो साथियो ने न जाने किस किस तरह से पेट जून बाँध कर अपने अपने परिवार का गुजारा चलाया था महात्मा गांधी ने कुछ ऐसा जादू सा कर दिया था की हमें अपनी गरीबी में शान और अपनी अमीरी में शर्म लगने लगी थी और हमारे बाल बच्चे भी परिवार की निर्धनता या सादगी पर नाज़ करते थे हममे से कुछ ऐसे भी थे जिन्हे किसी चीज़ की कमी नहीं थी पर वे भी फटे कुर्तो में सीधा सादा जीवन वयतीत करते थे ” ” जब से मेने मुनादी का काम शुरू किया तब से मुनादी के काम में महत्व आ गया हर चौराहे पर एक मूढा कुर्सी और उस पर खड़ा होकर या तो ढोल बजा कर या घंटा बिगुल दुआरा एक भीड़ इकट्ठी कर ली और मातम गांधी के आदर्शो का प्रचार आरम्भ कर दिया जब भीड़ ज़्यादा होने लगी तो एक भोपू खरीद लिया ताकि उसके दुआरा दूर दूर तक आवाज़ पहुंच जाए इस तरह से थोड़े ही दिनों में में शहर के लोग मुझे पहचान गए . आज तो में भारत का रक्षा संघटन मंत्री हु फिर भी दो तीन दिन हुए की में देहरादून में ढोल लेकर जगह जगह ऐलान कर आया हु की जवाहर लाल नेहरू हमारे नगर में पधार रहे हे सभी भाई बहनो को चाहिए की उनका स्वागत और दर्शन करने के लिए पुष्प मलाय लेकर सड़क के दोनों और खड़े हो जाए में उनकी मोटर को धीरे धीरे चलाऊंगा ताकि आप लोग जी भर के दर्शन कर सके ” मेरी धारणा ये हे की मुनादी का काम में जीवन भर करूँगा . मुनादी महात्मा गांधी का दिया हुआ पोर्टफोलियो हे मिनिस्ट्री का पोर्टफोलियो जवाहर लाल जी का अगर दोनों में झगड़ा आएगा तो में नेहरू जी का पोर्टफोलियो छोड़ दूंगा गांधी जी में नही छोडोंगा ”