PRIYANKA-AND-RAJIV-GANDHI

अगर संजय गांधी असमय मौत का शिकार न हुए होते तो उनके बड़े भाई राजीव गांधी क्या कभी राजनीति में आ पाते? शायद कभी नहीं? एक तो स्वयं उनकी रुचि राजनीति में नहीं थी, दूसरे यदि वे राजनीति में आना भी चाहते तो उनके लिए जगह खाली नहीं थी, क्योंकि संजय गांधी धुआंधार राजनीति कर रहे थे। बड़े भाई होने के नाते राजीव गांधी के लिए शीर्ष पद की ही जरूरत पड़ती और सभी जानते हैं कि संजय गांधी के रहते वहां “नो वैकेंसी” थी।
समय इतना बलवान है कि उसने कई दशकों बाद उसी गांधी परिवार में वैसी ही स्थिति पैदा कर दी है। इस बार बड़ी बहन (प्रियंका गांधी) राजनीति में आने को लगभग तैयार है। उसके व्यक्तित्व में “करिश्मा” और जनता से सफल संवाद की क्षमता भी है। अनेक कांग्रेसी भी उसे अपनी नेता के रूप में देखना चाहते हैं, मगर ऐसा नहीं हो पा रहा है, क्योंकि कांग्रेस में अभी “नो वैकेंसी” की स्थिति है। यह “नो वैकेंसी” राहुल गांधी की लगातार विफलताओं के बावजूद बनी हुई है।
इसका अर्थ यह है कि प्रियंका को अमेठी और राजबरेली से अलग सक्रिय राजनीति में हम तभी देख सकते हैं जब राहुल राजनीति से अलग या निष्क्रिय हो जाए। हालांकि सोनिया गांधी, राहुल गांधी की राजनीति के प्रति “ढिलाई और अरुचि” के बावजूद यह बिल्कुल नहीं चाहती हैं। वे राहुल को राजनीति में सफल होते देखना चाहती हैं और इसके लिए उन्हें समय और सुविधा भी देने को पूरी तरह तैयार हैं।
सोनिया गांधी इटली में जिस ईसाई समाज से आती हैं, वहां भारत की तरह बेटी के ऊपर बेटे को ही ज्यादा महत्व दिया जाता है। इसीलिए सोनिया गांधी को निकट से जानने वाले लोग जो संभावनाएं व्यक्त करते रहे हैं, उनके अनुसार सोनिया गांधी पूरी कोशिश करेंगी कि राहुल गांधी ही उनके राजनीतिक वारिस बनें और सफलता प्राप्त करें।
लेकिन क्या समय कुछ और चाहता है? क्या अपने पिता राजीव गांधी की तरह प्रियंका गांधी के लिए भी सक्रिय राजनीति का रास्ता अपने आप ही खुलेगा। इसका उत्तर तो भविष्य में ही मिलेगा, पर कुछ घटनाएं इसका संकेत दे रही हैं। ये संकेत इस प्रकार हैं:-
एक

राहुल गांधी राजनीति में लगातार विफल हो रहे हैं। इस बार के लोकसभा चुनाव में तो राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस की ऐतिहासिक पराजय हुई है। यहां तक कि राहुल अपनी अमेठी की सीट भी काफी मुश्किलों से बचा पाए। अगर वह जीते तो इसमें भी मुख्य भूमिका प्रियंका गांधी के सघन प्रचार और सोनिया गांधी की रैली की रही।

दो

लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की आक्रामकता का मुकाबला भी राहुल नहीं कर पाए। इसके उलट प्रियंका गांधी कम शब्दों में भी मोदी को जोरदार जवाब देती दिखाई दीं। अमेठी-रायबरेली मेें प्रियंका के तेवर देखकर हर व्यक्ति को लगा कि हां, इस .युवा महिला में कुछ अलग बात है।

तीन

प्रियंका गांधी अब एक परिपक्व युवा महिला हैं। उनकी अपनी घर-गृहस्थी है। उनके बच्चे बड़े हो गए हैं, जिससे उनके पास ज्यादा समय है। ऐसा सोचना नादानी होगी कि प्रियंका को अपनी क्षमताओं का अंदाजा नहीं है। उन्हें अवश्य ही पता होगा कि लोग उनमें इंदिरा गांधी की झलक देखते हैं। वे दोनों हाथों से पैसा बनाने वाले और आगे भी इसकी इच्छा रखने वाले एक पुरुष की पत्नी हैं। यह सोचना भी गलत नहीं है कि यह व्यक्ति निश्चित ही अपनी पत्नी को उसकी क्षमताओं का स्मरण कराता होगा।
कुल मिलाकर, प्रियंका की सोच में पहले के मुकाबले कुछ अंतर तो आना लाजिमी ही है। अगर इतना अंतर भी आ गया कि ठीक है, मैं राहुल की राह में बाधा नहीं बनूंगी, मगर यदि राहुल सफल होते नहीं दिखेंगे तो फिर मैं प्रयास करूंगी तो यह भी काफी बड़ा अंतर होगा।
इस सोच की एक झलक हमें हाल ही में देखने को मिली। जब कांग्रेस वाराणसी में नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रत्याशी के चुनाव को लेकर असमंजस में थी और प्रत्याशी की घोषणा में लगातार देर हो रही थी, तब कुछ कांग्रेसी मीडिया में यह कहते सुने गए कि कांग्रेस मोदी के खिलाफ ऐसा उम्मीदवार लाने जा रही है, जिसका नाम सुनकर विरोधियों में भगदड़ मच जाएगी। दरअसल, यह उम्मीदवार प्रियंका गांधी ही थीं। बाद में कुछ अखबारों में छपी खबर से इसकी पुष्टि भी हुई। हालांकि बाद में कांग्रेस की तरफ से खंडन भी किया गया, मगर वास्तविकता यही थी कि प्रियंका वाराणसी से मोदी के खिलाफ लड़ना चाहती थीं, मगर पार्टी (सोनियां गांधी) ने उन्हें मना कर दिया।
हो सकता है कि इसमें प्रियंका का अपना कोई दांव न हो और उन्होंने अपने भाई और कांग्रेस की मदद के लिए तैश में आकर ही वाराणसी से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई हो, लेकिन उन्हें मना कर दिया गया तो इसके कुछ कारण बिल्कुल स्पष्ट थे। ये कारण इस प्रकार थे:-

एक

नरेंद्र मोदी के खिलाफ यदि प्रियंका गांधी लड़तीं तो इससे सीधा संदेश यह जाता कि राहुल गांधी में ऐसा करने का दम नहीं है। यानी इससे यह भी झलकता कि कहीं न कहीं खुद कांग्रेस भी राहुल गांधी को कमजोर मानकर चल रही है।

दो

यदि संयोग से प्रियंका गांधी वाराणसी में नरेंद्र मोदी के खिलाफ जीत जातीं तो गजब ही हो जाता। सिर्फ एक सीट और एक चुनाव से वह कांग्रेस में शीर्ष पर आ जातीं। जहां अभी तक “नो वैकेंसी” का बोर्ड लगा है, वहां अपने आप वैकेंसी बन जाती। प्रियंकी की सिर्फ उस एक जीत से राहुल गांधी नेपथ्य में चले जाते। ऐसा अपने आप हो जाता, क्योंकि ऐसी स्थिति में कांग्रेस (और देश की राजनीति में भी) में मौजूदा लकीर (राहुल) के सामने एक बड़ी लकीर (प्रियंका) खिंच जाती।

तीन

कांग्रेस को यह भी लगा कि यदि प्रियंका वाराणसी में हार गईं तो यह अपने एक बहुत बड़े हथियार को नष्ट करने के समान होगा। प्रियंका कांग्रेस की ऐसी बंद मुट्ठी हैं जो अभी लाख की हैं। वाराणसी में कांग्रेस उस मुट्ठी को खोलकर खाक में मिलाने का जोखिम नहीं लेना चाहती थी।
कुल मिलाकर वाराणसी में भारतीय राजनीति की एक दिलचस्प घटना (मोदी की जीत और प्रधानमंत्री बनना) तो घटी पर उससे भी दिलचस्प घटना (प्रियंका का दांव) घटित होने से रह गई।
यदि राहुल गांधी भविष्य में भी उल्लेखनीय सफलता हासिल नहीं करते हैं तो हमें आगे भी राजनीति के क्षितिज पर प्रियंका रूपी चिंगारी की ऐसी छोटी-बड़ी झलकियां देखने को मिलती रहेंगी। यह भी हो सकता है कि आगे वाराणसी जैसे किसी अन्य प्रसंग या कांग्रेस की अभूतपूर्व पराजयों के बहाने यह चिंगारी सोनिया और राहुल के न चाहते हुए भी कांग्रेस में आग बनकर फैल जाए।
वैसे भी लोकसभा चुनाव की मतगणना के दिन यानी 16 मई को ही कई कांग्रेसी “प्रियंका लाओ कांग्रेस बचाओ” का नारा बुलंद करने लगे थे। बाद में विद्रोह के कई और स्वर भी उठे जिन्हें निलंबन आदि के जरिए दबाने का प्रयास किया गया। उधर, राहुल ने लोकसभा में नेता विपक्ष बनने से इनकार करके एक बार फिर लड़ाई में आने से इनकार कर दिया। अब तो उनके आंख-कान माने जाने वाले दिग्विजय सिंह तक ने कह दिया कि राहुल गांधी में शासक बनने के गुण नहीं हैं। …यानी समय खुद कांग्रेस में प्रियंका के लिए रास्ता बनाता दिखाई दे रहा है। आगामी कुछ साल इसका स्पष्ट खुलासा कर देंगे।