dharm-shashtra
केशव

मित्रो, आप सबको बहुत से ऐसे लेख पढने को मिल जायेंगे जिनमे धर्म ग्रंथो को वैज्ञानिक होने का दावा किया जाता है , उनके लेखो में जनमानस को ये बताने की कोशिश की जाती है विमान से लेके रोकेट तक के निर्माण सामग्री उनकी धर्म पुस्तको में उपलब्ध है । इस पर मैंने पहले भी लेख ” क्या धार्मिक पुस्तके वैज्ञानिक हैं ” बताया था की विज्ञानं और धर्म दोनों एक दुसरे के विपरीत हैं , दोनों कभी भी एक नहीं हो सकते |
बेशक आज अधिकतर हिन्दू इन ग्रंथो में लिखे तथाकथित विज्ञानं को लेके गर्व करते पर ये हकीकत है की हिन्दू इन शास्त्रों से कोई भी अविष्कार नहीं कर पाए उल्टा अपने को “सर्वज्ञ ” समझने के कारण हजारो साल तक विदेशियों द्वारा गुलाम और बने रहे ।

प्रथम शताब्दी के ग्रीक इतिहास कार स्ट्रेबो ने अपनी पुस्तक दा ज्योग्राफी आफ स्ट्रेबो , अनु होरेस लेनार्ड जोनिस vii पेज 61 में लिखा है “हिन्दुओं का सैन्य विज्ञानं का अर्थ केवल सीधे-सीधे लड़ना मरना रहा है , हिन्दू लोग विज्ञानों की सही सही जानकारी प्राप्त करने की ओर ध्यान नहीं देते , कुछ विज्ञानों जैसे सैन्य विज्ञानं में ज्यादा प्रशिक्षण प्राप्त करने को पाप समझते हैं ”

स्ट्रेबो ने जो कुछ लिखा वो प्रथम द्रष्टि से बिलकुल सही है क्यों की क्यों की नीतिशास्त्रो के लेखक ब्राह्मण थे जो युद्ध में शामिल नहीं होते थे , उन्हें युद्ध क्षेत्र के विभिन्न एवं आकस्मिक जरुरतो और विशेष सामरिक स्थितियों का सीधे ज्ञान नहीं था । अतः वे पुराणी व घिसीपिटी व्यूह रचनायों को दोहरा सकते थे जिन्हें दुनिया के दुसरे देश बहुत पहले ही छोड़ चुके थे ।

उधर , क्षत्रियों को युद्ध क्षेत्र में मात्र लड़ने का अधिकार था ना की विद्या का , विद्या पर तो ब्राह्मण का एक क्षत्र अधिकार था इस के कारण सैन्य विज्ञानं समय के मुताबिक विकसित नहीं हो पाया , जबकि दुसरे देश के लोगो ने अपने अनुभव के आधार पर और परस्थितियों के अनुरूप सैन्य विज्ञानं का खूब उन्नत किया । परिणाम ये हुआ की भारत के लोग आसानी से विदेशियों के आधुनिक हथियारों के आगे घुटने टेक देते थे , हिन्दु सैनिक( सैनिक नहीं भीड़ कहिये) संख्या में ज्यादा होने के बाद भी मुट्ठी भर विदेशियों के सामने टिक नहीं पाते थे ।

हथियारों के क्षेत्र में आस पास के देश प्रतिदिन प्रगति करते रहे , अपने हथियारों को ज्यादा कारगर और उन्नत करते रहे , पर हिन्दू इन सबसे आँखे मूँद कर अपने धर्म शास्त्रों में लिखे अलौकिक हथियारों को ही सर्व श्रेष्ठ समझते रहे ।

1- 326 ईसा पूर्व में जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया उस के पास “बैलिस्ट ” और “कैटेपल्ट ” जो 300 गज तक की दुरी तक पत्थर, बरछी, तीर आदि फेंक सकते थे , जिस कारण वो भारत के एक के बाद एक राजाओं को आसानी से जीतता चला गया । लेकिन भारत में ऐसा कुछ सदियों तक नहीं बन सका ।

2- 1398 वे में जब तैमूर लंग ने दिल्ली को घेर तो दिल्ली के सुल्तान वजीर मल्लू खां के भारतियों सैनिकों के पास हथियार के नाम पर जंग लगी तलवारे और बांस के डंडे थे ।

3- 1526 में जब पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ तो भी भारतीय सैनिको के पास बांस के धनुष और भाले थे जबकि विदेशियों के पास बंदूके थी ।

4- 1527 में जब खानवा के युद्ध में राजपूतों के परखच्चे उड़ गए , बाबर के पास तोपे और बंदूके थी जबकि “वीर” राजपूतो के पास हथियारों के नाम पर भाले. और जंग लगी तलवारे थी, कईयों के पास तो केवल लाठियां थी। बाबर की तोपों न देखते ही देखते राजपूतो की विशाल भीड़ को गाजर मूली की तरह काट दिया । एक लाख से अधिक राजपूतों की भीड़ मात्र बीस हज़ार से भी कम बाबर के सैनिकों के सामने नहीं टिक पाई , जबकि 500 से अधिक हाथियों की फौजे भी थी सांगा के पास ।

प्रशिद्ध इतिहासकार यदुनाथ सरदार ने लिखा है” जैसे ही प्रचंड कोलाहल करती राजपूतों की विशाल भीड़ बाबर की और बढ़ी उन्होंने बिजली का सा प्रकाश होते हुए देखा , फिर भयानक गर्जना होते सुनी और अंत में धूमकेतु सा कुछ हवा में होता हुआ विशाल गर्म पत्थर उनके मध्य में आके गिरा , उस पत्थर के रस्ते में जो कुछ भी आया उसके परखच्चे उड़ गए , यंहा तक की उसके सामने हाथी भी नहीं टिक पाए ….ये उस्ताद अली कुली की बड़ी तोप का पहला गोल था ।

जो घुड़सवार बाबर के निकट पहुच गए थे वे छोटे अग्नि स्फुरण से मारे गए , ये अग्नि स्फुरण भारतीय सैनिको को छर्रों के समान तितरबितर कर रहे थे …ये बन्दुक की गोलियां थी . राजपूतो ने ऐसे हथियार पहले कभी नहीं देखे थे , देखते ही देखते लाखो राजपूतों की भीड़ इन हथियारों के सामने ढेर हो गई( भारत का सैन्य इतिहास, पेज 66) ।

सोचिये क्या दशा रही होगी राजपूतो की जब उन्होंने पहली बार तोपों और बंदूकों को देखा और उसके गोले और गोलियां खा के मरे होंगे? क्या असर पड़ा होगा हाथियों और घोड़ो पर जब उनके बीच तोप का गोला फटा होगा?

5- विडंबना देखिये , पिछली हारो से कोई सबक न लेके राजपूत आगे भी अन्धविश्वास के कारण वाही गलतियाँ जो सिकंदर से लेके अब तक करते रहे वाही दोहराते रहे ,1576 में हल्दी घाटी के युद्ध में भी महाराणा प्रताप और अकबर के युद्ध में महाराणा प्रताप के पास न तो कोई बन्दुक थी और न ही कोई तोप जबकि अकबर के पास आधुनिक बंदूके और तोपे थी ।

तो कहने का मतलब ये है की अगर हिन्दू अपने धर्म ग्रंथो को “सर्वज्ञ” और “वैज्ञानिक” के झूठे घमंड में न रहते तो वो भी आधुनिक हथियार बना के दुश्मनों को उनके मांद तक खदेड़ और मार कर आते, और देश गुलाम होने से बच जाता, पर हिन्दू अपने झूठे अभिमान के कारण न कर सका और अपने धर्मग्रंथो में लिखी बातो से ही चिपटा रहा।

इसके आलावा एक और कारण था जिसको नाकारा नहीं जा सकता और वो है आपस में लड़ना मरना , जिसका फायदा दुश्मनों ने खूब उठाया और इसका कारण भी ये धार्मिक पुस्तके थी । इन्ही धार्मिक शास्त्रों में लिखे होने के कारण क्षत्रियों के लिए अश्वमेध करने का अति लुभावना व पुण्यप्रद काम करने के लालच और कालिदास के ‘ “यशसे विजिगीषुणाम”( अर्थात रघुवंश के राजा यश प्राप्त करने के लिए आसपडोस के राजाओं को जीतते थे ) , इसका परिणाम ये हुआ की भारत के राजा लोग आपस में लड़ने मरने लगे , उन्हें विदेशी आक्रमणकारियों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया और आपसी फूट होने के कारण आसानी से हारते रहे ।

कई बार तो अपने पड़ोस के राजा को हराने के लिए ये लोग स्वयं ही विदेशियों को बुलाते थे , जैसे की राणा सांगा ने बाबर को बुलाया था।

मित्रों, पिछला लेख ” हिन्दुओं के हारने का कारण धर्मशास्त्र थे” कुछ बाते छूट गयी थी , उस लेख में मैंने धर्म ग्रंथो को दोषी बनाया था परन्तु ठीक ढंग से उदहारण न देने के कारण अधिकतर पाठक मित्रो ने अपत्ति जताई थी , आशा है इस लेख मैं अपनी बात ठीक से कह पाउँगा और हमारे हारने के पीछे धर्म शास्त्रों का कितना बड़ा हाथ था ये भी स्पष्ट कर पाउँगा।

1 – शुद्धिकरण के कठोर नियम

हिन्दुओं के हारने का प्रमुख कारणों में से एक था युद्ध में बंदी बने हिन्दुओं का पुन्: शुद्धिकरण न करना और उनका सामाजिक बहिष्कार करना , दुनिया में सब जगह यदि कोई सैनिक युद्ध बंदी होकर वापस आता है तो उसके देश के लोग, रिश्तेदार और जाती के लोग उसका स्वागत करते थे लेकिन हिन्दू धर्म का मानना था की जो भी विधर्मियों द्वारा कैद में रह ले वह हिन्दू अपवित्र हो जाता है । अत: न उस के हाथ से कोई खायेगा, न ही कोई उस से कोई रोटी-बेटी का संबंध रखेगा , उसे जाती बहिष्कृत हो कर उपेक्षित, घ्रणित और निंदनीय जीवन जीना पड़ेगा ।
देखिये क्या क्रूर नियम बनाये हैं धर्मग्रन्थो में –

अ -गृहीतो यो बालन म्लेच्छ: पंच षट सप्त वा समा:………………….नखलोम तत: शुचि:( देवल स्मृति ,श्लोक 53-56)

अर्थात – जो व्यक्ति म्लेच्छों( मुसलमान आदि ) द्वारा बलपूर्वक पकड़ा गया हो और पांच , छ: या सात वर्षो तक उन के पास रहा हो , लेकिन व्यवहार , आचार्विचार और खान पान में उन से अलग रहा हो वह शुद्ध हो सकता है ( इस से ज्यादा समय बीत जाने पर वह किसी प्रकार से शुद्ध नहीं हो सकता ) , शुद्द होने के लिए उसे प्रजापत्य व्रत रखना पड़ेगा ।

अब प्रजापत्य वर्त क्या है ये देखे – पहले दिन केवल भोजन, दुसरे दिन केवल रात में , तीसरे दिन बिना मांगे मिल जाये तो खाना वर्ना भूखे ही सो जाना , चौथे दिन पूर्ण व्रत, इसी क्रम के मुताबिक तीन बार चलना ( वशिष्ट स्मृति 23/24)
इसके साथ ही उस व्यक्ति की बगलों , गुप्त्येंद्रियाँ , सर, मूंछे , दाढ़ी , भोहों तथा शारीर के अन्य रोओ को काट दिया जाये तभी वह शुद्ध होगा ।

ब- बलाद दासिकृता ये च म्लेच्छ ………………………तद भावमधीगछति( देवल स्मृति , 17-22)

अर्थात -जो म्लेच्छों द्वारा बलवत दास बना लिया जाये और उन से गंदे काम कराये , गो आदि पशुओं की हत्या करवाए , म्लेच्छों द्वारा झूठन को साफ़ करना , ऊंट आदि जानवर का मांस खाना आदि , तो इस अवस्था में एक मास तक रहने वाले द्विज के प्रायश्चित केवल प्राजापत्य व्रत है ।
शुद्र इस स्थिति में एक वर्ष रह ले तो यावक पान ( गोबर से जौ ढूंढ़ कर , उन्हें उबाल कर एक मास तक खाए )।
अगर किसी को एक वर्ष से ज्यादा म्लेच्छो के साथ बीत जाये तो कोई विद्वान ही निर्णय दे सकता की उस हिन्दू के साथ क्या किया जाये ।
और यदि म्लेछो के साथ रहते चार साल से ज्यादा बीत जाये तो वो हिन्दू उन जैसा ही हो जाता है ।

विडंबना देखिये की अगर किसी हिन्दू ने प्रायश्चित कर भी लिया तो भी उसे आजीवन जातिबाहर रहना पड़ता था \
इस बारे में धर्मशास्त्र क्या कहते हैं –

विशुद्धानपि धर्मत: त संवसेतु ( मनु स्मृति 11/190)
अर्थात – जिन्होंने प्रायश्चित कर भी लिया हो उन से भी किसी प्रकार का संपर्क न रखे ।

संवसेन्न तू चीर्णव्रतानापी ( याज्ञवलक्य स्मृति 3-298)
अर्थात – जिन्होंने प्रायश्चित कर लिया है और उनके पाप कमजोर पड़ गए हैं उन से भी कोई सम्बन्ध न रखा जाये

अब क्या कोई कल्पना कर सकता है की जब कोई विधर्मी (मुसलमान आदि ) आक्रमणकरी हिन्दुओं को बंदी बनायेंगे तो उन बंदी हिन्दुओं को शुद्ध , शाकाहारी , चौका किया हुआ भोजन देंगे? बल्कि हिन्दुओं को ये पता होता था की मुस्लिम उसको बंदी बनायेगे तो उसे बुरी तरह अपमानित करेंगे, बाज़ार में बेंच देंगे , अपना झूठन खाने को देंगे और उससे हर गन्दा काम करवाएंगे ।

इसलिए , हिन्दू सैनिक विदेशी आक्रमणकारियों (मुस्लिम आदि ) के विरुद्ध कभी भी जी जान से नहीं लड़ता था , वह चिंतित मन से और हारने के बाद बंदी बनने और अंधे भविष्य की कल्पना से ग्रस्त होक रोबोट की तरह लड़ता जो जरा सा भी मुसलमानों का पलड़ा भरी होते देख युद्ध का मैदान छोड़ के भाग लेता या फिर दुश्मन के हाथ से मरना ज्यादा बेहतर समझता था ।

इसका उधारण इस से घटना से समझा जा सकता है , 997 ईसवी में महमूद गजनवी ने हिन्दू राजा जयपाल को पराजित कर के बंदी बना लिया पर बाद में उसे इस शर्त पर छोड़ दिया की वो गजनवी को वार्षिक कर देगा और उसे अपना मालिक समझेगा , लेकिन विधर्मी के संपर्क से दूषित होने के कारण हिन्दू पुरोहितो ने उसे इतना अपमानित किया की उसने तंग आके आत्मदाह कर लिया ।

एक घटना का जिक्र और करना चाहूँगा , 1080 ईसवी में गजनवी ने वरन शहर के राजा हरदत्त पर हमला किया और हरदत्त हार गया , हलाकि गजनवी का इरादा हरदत्त को इस्लाम में लेने का बिलकुल भी नहीं था उसने तो केवल लूट के इरादे से हमला किया था। परन्तु हारने के बाद हरदत्त ने न केवल स्वयं इस्लाम काबुल किया वरन उसके साथ उसके 1000 सैनिको और उसके परिवार वालो ने भी इस्लाम काबुल कर लिया ( देखे , प्रो. ए के अली , ए स्टडी ऑफ़ इस्लामिक हिस्ट्री पेज १ ० १ )

२- हिन्दुओं का कूप मंडूक बने रहना

हमारी “सर्वज्ञ” धार्मिक पुस्तको की शिक्षाओं ने हिन्दुओं और भारत की के ऐसे टुकड़े किये की कोई भी विदेशी आके हिन्दुओ को लूट के , गुलाम बना के ले जाता और पडोसी राज्य का राजा तमाशा देखता रहता । धार्मिक पुस्तक की शिक्षाओं ने भारत को एक नहीं रहने दिया बल्कि इसे टुकड़े टुकड़े कर दिए , धर्म पुस्तक ने अपने ही देश को “परदेश ” बना दिया जिस कारण किसी भी हिन्दू राजा को “अखंड भारत की चिंता नहीं थी ” बल्कि वो आपस में ही लड़ते मरते रहते ।

धर्मसिंधु नाम के धर्मशास्त्र में देशांतर (विदेश ) की व्याख्या जातियों के आधार से की गयी है,

” देशांतर तु विप्रस्य ……………………….संपादकताया योज्यमिति भाति ( धर्मसिंधु , तीसरा परिच्छेद , पेज 870-871)

अर्थात – ब्रह्मण के लिए अपने निवास स्थान से बीस योजन , क्षत्रिय के लिए चौबीस योजन, वैश्य के लिए तीस योजन , शुद्र के लिए साठ योजन से दूर इलाका विदेश है , यदि बीच में महापर्वत या महा नदी आ जाये और पर्वत या नदी के दोनों और रहने वलो में भाषा का अंतर हो तो दोनों दोनों तरफ के भाग दो अलग अलग देश कहलायेंगे।
यानि कहने का मतलब ये है की ब्राह्मण के लिए 160 मील , क्षत्रिय के लिए 192 मील , वैश्य के लिए 240 और शुद्र के लिए 480 मील के बाद दूसरा देश शुरू हो जाता है ।

अब आप कल्पना कर सकते हैं की भारत में आधुनिक हथियार या जन लाभ वाले अविष्कार क्यों नहीं हुए ? क्यों की लोग विदेश जाने से डरते थे और नयी नयी चीजो की खोजबीन करने , और लोग कैसे आधुनिक हो रहे हैं उनके अविष्कारों के बारे में जानने में बहुत कम रूचि रखते थे ।
इन धर्मशास्त्रो के “परदेश” शब्द की मानसिकता ने एक और सबसे बड़ी हानि पहुचाई , भारत का हर राजा दुसरे राज्य के राजा को “परदेशी’ समझ कर उससे मित्रता रखने में संकोच करने लगा , जिस कारण जब वास्तविक विदेशी किसी भारतीय राजा पर आक्रमण करता तो पडोसी या तो आक्रमणकारी की मदद करता या चुप चाप देखता रहता ।

तो मित्रो , कहने को तो अभी भी बहुत कुछ है पर ब्लॉग लम्बा हो जायेगा इसलिए यही समाप्त करता हूँ , पर लेख का सार यही है की हिन्दुओं को हारने में सबसे ज्यादा जिम्मेदार हिन्दुओं की “धार्मिक शास्त्र ‘ ही थे ।