vigyanअश्वनी कुमार

यूँ तो हमारा देश विज्ञान एवं प्रोधोगिकी के क्षेत्र में नित नए-नए आयामों को छू रहा है. मंगल गृह पर पहुंचना हमारी नवीन उपलब्धि का ही एक उदाहरण है. इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं की यह हमारे वैज्ञानिकों की योग्यता का ही नतीजा है कि हमने कम वित्तीय कोष में भी मंगल जैसे अभियान को अपने अंजाम तक पहुंचा दिया. आज भारत चौथा ऐसा देश बनकर उभरा है जिसने मंगल तक अपने हाथ पहुंचा दिए हैं. इस अभियान की कामयाबी को देखते हुए जाहिर है हमें आने वाले समय में और अधिक योग्य और अनुभवी वैज्ञानिकों की जरुरत है. जो देश को और नए आविष्कारों के साथ दुनिया के सामने खड़ा कर सके, उसकी प्राथमिकता को दुनिया को बता सके, देश का नाम बड़े पैमाने पर रोशन कर सके.

परन्तु आंकड़ों को देखकर तो लगता है कि आने वाले समय में हमारे देश में विज्ञानिकों का अकाल पड़ने वाला है, क्योंकि हमारी लिए अब तक तो केवल शिक्षण संस्थानों का ही अभाव था परन्तु अब जो आंकड़े सामने आये हैं वो तो वाकई चौंकाने वाले हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इस मुद्दे को और हवा दी है, इस समाचार पत्र में एक आलेख छापकर सभी को अचम्भित कर दिया है. आलेख में सेकेंडरी एजुकेशन मैनेजमेंट इनफार्मेशन सिस्टम (SEMIS) 2012-13 के आंकड़ों को लेकर यह दर्शाया है कि भारत भर में केवल 30.7 फीसदी स्कूल्स ही छात्रों को विज्ञान विषय (Science Stream) का अध्ययन करवा रहे हैं. साथ ही अगर राजधानी दिल्ली की बात करें तो केवल 50 फीसदी स्कूलों में ही विज्ञान विषय को 11वीं और 12वीं कक्षा में पढ़ाया जा रहा है. आज जिस देश के लगभग 30 फीसदी वैज्ञानिक दुनिया की सबसे बड़ी अनुसंधान संस्था नासा में अपना जोहर दिखा रहे हैं, वहीँ भविष्य में शायद इसका उलटा होने वाला है. जहां विज्ञान विषय को 11वीं एवं 12वीं कक्षा में हर सरकारी और गैर सरकारी स्कूलों में जरुर होना चाहिए वहां केवल 30 फीसदी. साफ़ तौर पर आंकड़े चौंकाने वाले है. यहाँ सरकार की जिम्मेदारी है सभी छात्रों को विज्ञान विषय पढने का अवसर मिले, यह देखा जाए कि सभी निजी और सरकारी स्कूलों में शोध के लिए लैब बनाए जाए, उन उपकरणों की पर्याप्त मात्रा स्कूलों तक पहुंचाई जाए जिनकी विज्ञान विषय के अध्ययन के लिए जरुरत है.

साफ़ है कि इन वस्तुओं का अभाव है तभी लगभग 70 फीसदी सरकारी और निजी स्कूलों में केवल आर्टस और कॉमर्स विषयों को ही महत्त्व दिया जा रहा है. दिल्ली के आंकड़ों पर फिर एक बार नज़र डालें तो साफ़ हो जाता है यहाँ भी आंकड़े हमारे पक्ष में नहीं हैं, यहाँ भी केवल 51.71 फीसदी स्कूलों में विज्ञान, 86.56 फीसदी स्कूलों में आर्ट्स और 78.39 फीसदी स्कूलों में कॉमर्स विषय का अध्ययन कराया जा रहा है. यहाँ भी विज्ञान विषय के आंकड़े सबसे कम हैं. केवल दो राज्य ही ऐसे है जिनमे आंकड़े संतोष जनक है साथ ही केंद्र शासित लक्षदीप में तो हर हाई स्कूल में विज्ञान विषय पढाया जाता है, इसके अलावा तमिलनाडु में 86.51 फीसदी और पुदुचेरी में 82.58 फीसदी स्कूलों में विज्ञान पढाया जा रहा है. अब यह देखना है कि आने वाले समय में क्या होता है.

इसके अलावा अगर रिसर्च और डेवलपमेंट के कार्यक्रमों पर नज़र डालें तो तो भी आंकड़े एक अँधेरा भरे भविष्य की ओर इशारा कर रहे हैं. अगर रिसर्च और डेवलपमेंट के कार्यक्रमों पर सरकार द्वारा खर्चा देखें तो ये दूसरे देशों के मुकाबले नगण्य है, जहां अमेरिका में 38.2, एशिया में 33.8, जापान में 12.6, चीन में 12.5, यूरोप में 24.5 फीसदी का खर्च रिसर्च और डेवलपमेंट के कार्यक्रमों पर किया जाता है जबकि अगर भारत में इसपर नज़र डालें तो यह केवल 2.1 फीसदी है जो दुनिया के रिसर्च और डेवलपमेंट के कार्यक्रमों पर कुल खर्च 3.1 से भी कम है. वैसे तो हमें तरक्की चाहिए और करना हम कुछ चाहते नहीं हैं.

अगर सरकार इस कार्य में असफल हो रही है या सरकार बाकी क्षेत्रों की भाँती विज्ञान, तकनीकी, रिसर्च और डेवलपमेंट के कार्यक्रमों पर उतना ध्यान नहीं दे पा रही है तो सरकार को निजी क्षेत्रों को ये मौक़ा देना चाहिए, जिससे इन क्षेत्रों को पर्याप्त सहयाता के साथ विकास करने का अवसर मिले. अब तक अगर देखें तो जापान और कोरिया में निजी क्षेत्रों का योगदान सबसे अधिक है. वह इसके विकास के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता दे रहे हैं. जिसका परिणाम साफ़ है कि जापान आज तकनीकी में बहुत अधिक तरक्की कर चुका है. ऐसा ही कुछ चीन में है कुछ रिपोर्ट तो यह भी दर्शाती है कि गूगल ने अपनी टीम को चीन के शिफ्ट करना प्रारंभ कर दिया है क्योंकि हमारे देश में भविष्य में उसे कुछ संभावनाएं नहीं दिख रही हैं. अगर आज हमारे देश से संभावनाएं समाप्त हो रही है दमन कि ओर अग्रसर हैं तो साफ़ है कि हमारा भविष्य क्या होने वाला है.

अगर हमें आने वाले समय में इस क्षेत्र का विकास करना है, विज्ञान के क्षेत्र में तरक्की करनी है, रिसर्च और डेवलपमेंट के कार्यक्रमों के माध्यम से देश में तकनीकी क्रांति को जन्म देना है, साथ ही योग्य और अनुभवी वैज्ञानिकों को अस्तित्त्व में लाने के लिए हमें विज्ञान विषय को हर स्कूल में पहुँचाना होगा, फिर चाहे वह निजी हों या सरकारी. मुख्य तौर पर 11वीं और 12वीं कक्षाओं में ज्यादातर स्कूलों में विज्ञान विषय को प्रारंभ करना होगा, तभी संभव है कि हम एक तकनीकी से परिपूर्ण भविष्य की कामना कर सकते हैं.