2014-fifa-world-cup
  मनोज मिश्र

दुनिया का सबसे बड़ा खेल कुम्भ फीफा वर्ल्ड कप चल रहा हे बोस्निया आइवरी कॉस्ट जैसे हमारे नगरो से भी छोटे देश खेल रहे हे और दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश के निवासी हम हमेशा की तरह बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना यानी हम दूसरे देशो की टीमों के लिए ही रोमांचित होने को अभिशप्त हे बहुत ही अच्छे लेखक मनोज मिश्र जी ने य लेख 2006 के जर्मनी फीफा वर्ल्ड कप के दौरान लिखा था अफ़सोस आज भी हमारे हालात लगभग जस के तस हे मनोज मिश्र जी फुटबॉल और क्रिकेट में हमारे हालात की वजह हमारी सामाजिक संरचना को बताते हे पेश हे ये लेख जिसमे कही गई बातो पर विचार की सख्त जरुरत हे ”कहते हे हारे को हरिनाम पर खेल के मैदान में हम अक्सर हरिनाम के भी हकदार नहीं होते फुटबॉल का विश्वकप हो या ओलम्पिक वितरागियो की तरह दुसरो की हार जीत पर ताली बजाना जैसे हमारी नियति बन गयी हे फुटबॉल के महासमर के दौरान जब घाना और अंगोला जैसे साधनहीन देशो के खिलाड़ी अपना जोहर दिखा रहे हे तब टीवी के आगे तमाशाई बन कर बैठने के सिवा हमारे पास कोई चारा नहीं हे .पर एक ठीस बार- बारउठती रही हे की आखिर इस मैदान में हमारे नौनिहाल क्यों नहीं हे ? अगर वे इस खेल का हिस्सा होते तो फिर तुमुल कोलाहल के बीच हम सन्नाटे में नहीं बैठे होते . गोल दागने पर हमारी आँखे भी ख़ुशी से छलछला आती और चुकने पर हम भी मुट्ठियां भीचते पैर पटकते . हालांकि खेलो की उपलब्धियां किसी व्यक्ति या देश की नहीं पूरी मनुष्यता की होती हे पर श्रेष्ठतम प्रदर्शन करने वाले खिलाडी अपने बीच के हो , किसी के भी भीतर यह इच्छा स्वभाविक हे . जमैका के अस्का पावेल और अमेरिका के जस्टिन गैटलिन जब 100 मीटर की दौड़ 9 : 77 सेकण्ड में पूरी करते हे तो इससे सिर्फ उनका और उनके देश का ही सर गर्व से ऊँचा नहीं होता बल्कि मनुष्यता को भी एक नया मुकाम मिल जाता हे . हर नई जीत , हर नया रिकॉर्ड मनुष्य की शीर्ष शारीरिक क्षमताओ और सीमाओ की सूचना देते हे . ऐसे में कोई भी चाहेगा की श्रेष्ठतम क्षमताओ की सूचना देने वाले रिकॉर्ड उसके अपने लोगो के नाम हो . लेकिन भारत के लोगो की यह अभिलाषा पूरी होने के फिलहाल कोई आसार नज़र नहीं आते

इस सवाल पर भी काम माथापच्ची नहीं हुई हे की शारीरिक क्षमताओ के प्रदर्शन के अवसर पर हमारे प्रतिनिधि तस्वीर में कही क्यों नहीं होते हे ? अगर होते भी हे तो प्रदर्शन में इतना कमजोर क्यों होते हे की पदक तालिका में उनके लिए कोई जगह नहीं बन पाती ? इन सवालो के जवाब में हर बार ठीकरा व्यवस्थागत कमजोरियों और सिमित संसधानो पर फोड़ा जाता हे लेकिन यह पूरा सच नहीं हे . खेलो में पिछड़ेपन की तलाश के लिए हमें अपनी सामाजिक सरंचना में झाकना होगा . फूटबॉल हो या एथलेटिक्स सब दमखम के खेल हे गति और जीवंतता इनके मूल अवयव हे क्रिकेट की तरह आरामतलबी के लिए यहाँ कोई जगह नहीं हे यहाँ एक रन के बाद बल्लेबाज़ को दूसरा छोर पर जाकर सुस्ताने का मौका नहीं मिलता हे यहाँ 6 गेंद फेकने के बाद आराम करने की इज़ाज़त नहीं होती हे क्रिकेट के बरक्स फुटबॉल की बात करे तो शोध बताते हे की अंतरष्ट्रीय स्तर पर मैच के दौरान दो मिनट के भीतर तीन सेकण्ड ही ऐसे आते हे जब खिलाडी कुछ धीमा होता हे मैच के दौरान एक मिड फील्डर औसतन 12. 5 किमी दौड़ता हे ऐसे में किसी औसत फुटबॉल टीम के खिलाफ बड़े से बड़े क्रिकेटर को फिर चाहे वो तेंदुलकर ही क्यों न हो , मैदान में उतार दीजिये तो तय हे की 15 मिनट में वह हांफने लगेगा उसके पास रबर के खिलोने की तरह उछाल कर हेडर करने की कोन कहे सामने आई गेंद पर किक करने की भी ताकत रह जाए तो बहुत हे . यह अनायास नहीं हे की हम क्रिकेट खेलते हे ठीक हे की इसके पीछे हमारा औपनिवेशिक इतिहास एक बड़ा कारण हे लेकिन उससे भी बड़ा कारण हे उस वर्ग को पिछले 5 हज़ार साल से संसाधन से वंचित रखना जिसकी भुजाओ में दम था जिसकी मांसपेशिया इस लायक थी की दबाव सह सके .

हमारी जातीय संरचना ने देश को आर्थिक सामाजिक और सांस्कर्तिक रूप से तो पीछे धेकेला ही खेल के मैदान में भी हमें फिसड्डी बना दिया फ़्रांस हो या अमेरिका हो या फिर इंग्लैंड सारे श्वेत बहुल देशो की टीमो में अश्वेत खिलाडी प्रयाप्त संख्या में पाये जाते हे लेकिन हमारे यहाँ क्या इस्तिति हे आज़ादी के बाद भी अब तक देश के लिए खेलने वाले सभी क्रिकेटरों की सूची बनाई जाए तो उसमे गिनती के ही खिलाडी ऐसे मिलेंगे जो दलित या पिछड़ी जातियों से आते होंगे क्रिकेट ही नहीं सारे खेलो में कमोवेश यही हालात हे . पिछले 5 हज़ार सालो से हमारे यहाँ जो तबके शारीरिक रूप से दमखम रखते थे उन्हें षड्यंत्रपूर्वक आगे बढ़ने से रोक गया . जिन लोगो के पास आर्थिक राजनितिक ताकत थी उन्हें दुसरो पर कोड़े फटकारने अपने जातीय दम्भ में चूर रहने और मुजरा देखने से ही फुर्सत नहीं थी ये लोग मैदान में पसीना बहाना अपनी हेठी समझते थे जाहिर हे ऐसे में खेलो में भारत जहा हे उसी इस्तिति का हकदार बनता हे . दिन भर भट्टी के सामने बैठ कर तपते लोहे को हंसिया खुरपी में डालते लोहार को आगे बढ़ने दिया गया होता तो आज हम खेल के मैदान से मुह नहीं चुरा रहे होते . पर उसे तो रोजी रोटी की जद्दोजहद से कभी उभरने ही नहीं दिया गया . साथ ही उसमे यह बोध भी गहरे तक बिठा दिया गया की वह जो कर रहा हे वहीं उसकी नियति हे . यह उसके पिछले जन्मो के कर्मो का फल हे . प्रभावशाली जातियों ने ये खेल लोहार ही नहीं उन सभी जातियों वर्गों के साथ खेला जो श्रम से ताल्लुक रखते थे . यह ऐतिहासिक तथ्य हे की अंग्रेज़ो ने इस देश की जातीय संरचना के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की . उन्होंने ऊँची जातियों में अपने प्रतिनिधि तैयार किये और उन्हें कामगारों के दमन शोषण की पूरी छूट दी

औद्योगिक विकास अपने साथ स्वभाविक तौर पर कुछ नए मूल्य लाता हे . आज़ादी से पहले जब कुछ हद तक ही सही , औद्योगिक विकास हुआ तो जातीय बंधन ढीले पड़ने शुरू हुए . तब भी सत्ता की शह के कारण ऊँची जटिया अपना वर्चस्व बनाय रखने में कामयाब रही . सवतंत्रता के बाद उस दूरी को पाट कर अन्य क्षेत्रो के साथ साथ खेल के मैदान में भी अपने को होड़ में ला सकते थे लेकिन यह काम ठीक ढंग से हुआ ही नहीं दक्षिण अमेरिका में जब सत्ता से गोर लोगो का प्रभुत्व ख़त्म हुआ तो राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने हर क्षेत्र में अश्वेतों को अतिरिक्त सहूलियतें देने का प्रावधान किया जो अब तक तमाम सुविधाओ से वंचित रहे थे इन क्षेत्रो में खेल भी शामिल था मंडेला के इस कदम का यह कहते हुए विरोध किया की इस तरह से योग्यता को दरकिनार करने से देश पचास साल पीछे चला जाएगा . इस तर्क का मंडेला ने सख्ती से प्रतिरोध किया . उनका कहना था की हमारे समाज का एक हिस्सा हज़ार साल पीछे रहे उससे बेहतर हे की पूरा देश 50 साल पीछे चले हमारे देश में कांग्रेस ने इस तरह का ठोस स्टेंड लिया ही नहीं . कांग्रेस आज़ादी से पहले भी उद्योगपतियों जमींदारो की पार्टी थी और बाद में भी बनी रही . दबाव में आरक्षण का प्रावधान तो किया गया लेकिन बेमन से उससे कुछ लोगो को नौकरी जरूर मिली, पर सामाजिक संरचना में कोई बुनियादी अंतर नहीं आया . विशेषकर ग्रामीण हलको में तो उन्ही तब्को का प्रभुत्व बना रहा जो पिछले ५ हज़ार साल से ताकतवर थे . भारतीय समाज जड़ता का शिकार तो रहा तो एशिया के कई दूसरे देश अन्य कारको से जड़ता के शिकार रहे . जो समाज इस जड़ता को तोड़ने में सफल रहे वो बाकी क्षेत्रो के साथ खेल में भी आगे बढे . चीन का उदहारण हमारे सामने हे हमें एक बात और भी ध्यान में रखनी होगी की बाजार के भरोसे खेलो में आगे बढ़ना संभव नहीं हे बाजार तात्कालिक फायदा देखता हे इसलिए सिर्फ उन्ही खेलो में पैसा लगाता हे जो पर्चालन में होते हे योज़ना बनाकर खेलो का विकास या फिर सामजिक जड़ता तोड़ कर खेलो के विकास के लिए माहोल पैदा करने की उससे उपेक्षा नहीं राखी जा सकती हे यह काम तो सरकार को ही करना होगा लेकिन ऐसी सरकारों से , जो बाजार के आगे नतमस्तक हे , कोई उमीद करना बेमानी नहीं होगा ? तो फिर क्या हमारे पास तमाशाई बने रहने के सिवा कोई रास्ता नहीं हे .

NOTE—- ये लेख मनोज मिश्र अमर उजाला इलाहबाद का लिखा हुआ 2006 में प्रकाशित हुआ था मगर ये लेख आज भी भारत की फुटबॉल टीम की स्थिति देखते हुए आज भी तर्कसंगत है इस लिए खबर की खबर। कॉम के पाठको के लिए पेश है. ( सिकंदर हयात )