Mideast

वलीउल्लाह इंजीनियर

ब्रिटिश हुकूमत को यकीन हो चला था की इस्लामी व्यवस्था को ख़त्म किए बगैर हमारा साम्राज्य कायम नहीं रह सकता ..इसका बाहर से मुकाबला करने से बेहतर ये है कि इस्लाम को अन्दर से ही ढहा दिया जाए . ये तभी हो सकता था जबकि इस्लाम की मुक़म्मल तालीम हो . ये काम मदरसों के ज़रिये से आसानी से हो सकता था इसलिए सब से पहले ब्रिटेन के दूर दराज़ इलाकों में कुछ मदरसे खोले गए . जिन के तालिब-ए-इल्म [तालिबान] ब्रिटिश जासूस थे जो इन मदरसों से इस्लामी तालीम और तहजीब सीख कर अरब देशों की इस्लामी दर्सगाहों और मदरसों में घुस गए .ये जासूस जहाँ एक ओर अपने मिशन के तौर पर इस्लामी तालीम को तोड़ मरोड़ और बदल कर अपने द्वारा संपादित एक नया मज़हब बना कर दीन ए इस्लाम को उसके अन्दर से ही ख़त्म करने में लग गए दूसरी ओर अरबों में फूट डाल कर उन्हें मिटाने का बीड़ा भी उठाया .

जासूस हम्फ्रे से लेकर कर्नल लारेंस तक ने अपने को सौंपा गया काम बखूबी अंजाम दिया .अरब के नज्द इलाके में इन्हे दो अति महत्वकांक्षी शेख मिल गए . एक , शेख मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब दूसरा मुहम्मद बिन सऊद था .जो कि ‘मुहम्मदीन’ के नाम से जाने गए . ये वही नज्द था जहाँ पैगंबर-ए-इस्लाम [ सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम ] के खिलाफ शत्रुता उनके वक़्त से ही पाई जाती थी . ब्रिटिश जासूसों ने इन दोनों शेखों से अपनी दोस्ती बढ़ाई .और उनका विश्वास जीत लिया . जासूस हम्फ्रे ने मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब को नए मज़हब का अलमबरदार और शेख मुहम्मद बिन सऊद में अरब हुक्मरान बनने की लालच पैदा की और उसे अपनी खुफिया मदद से परवान चढाया और अपने मिशन की हिकमत-ए-अमली के तहत इन दोनों शेखों को एक दुसरे का मददगार बना दिया जिससे आगे चल कर उनकी मंशा के मुताबिक वहाबी मज़हब [नजदी इस्लाम ] और सउदी अरब की नीव पड़ी .इसके बाद इन जासूसों के सामने मुख्य उद्देश्य ये था कि आगे चलकर अरब फिर से उनके [ब्रटिश साम्राज्य के ] खिलाफ संगठित न हो पाएं और फिर से अरब ताक़तवर न बनने पाएं .

इसके लिए अरब की नई पीढी को इस अपने द्वारा संपादित वहाबी मज़हब के ज़रिये जिहाद के नाम पर आतंकवाद के रास्ते पर धकेल दिया .उनकी मंशा के मुताबिक उस्मानी खिलाफत के विरुद्ध शुरू किया गया यह प्रायोजित जिहाद आगे चल कर हिंदुस्तान में सिखों , मराठों एवं पठानों के खिलाफ भी प्रायोजित किया गया और फिर सोवियत रूस को भी इसका निशाना बनाया गया . आज भी अरब के नवजवान बड़े बड़े इस्लामी संगठन बना कर ब्रिटिश , इस्राइल और अमेरिकी जासूसों कि निगरानी में उनकी मंशा के मुताबिक जिहाद करते हैं और नष्ट हो जाते हैं.. येही वजह है कि जब से ये जासूसों के मदरसे और आतंक की नर्सरियां कायम हुयी हैं तब से आज तक [ लगभग तीन सौ साल] से कोई भी अरब देश महाशक्ति बनकर नहीं उभर पाया .यह प्रायोजित जिहाद . जिसे इस्लामी आतंकवाद का नाम दिया जा रहा है नई विश्व व्यवस्था [new world order ] विशेषकर अमेरिका ब्रिटेन और इस्राइल के लिए सेफ्टी वाल्व का काम कर रहा है .क्योंकि उन्हें डर है अरबों की उर्जा को यदि इस तरह से नष्ट नही किया गया तो वे उनके द्वारा बनाई गई नई विश्व व्यवस्था के लिए खतरा बन जायेंगे.