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अश्वनी कुमार

आज का हरियाणा 1966 से पहले पंजाब राज्य का हिस्सा हुआ करता था। तब इस भूभाग के किसानों के साथ भेदभाव किया गया। उन्हें वो सुविधाएं नहीं मिलीं, जिसके वो हकदार थे। वैसे भी हरियाणा का बड़ा इलाका अनुउपजाऊ था। लेकिन हरियाणा राज्य की स्थापना के साथ ही यहां हरित क्रांति हुई, यहां के किसानों ने इस अवसर का भरपूर फायदा उठाया। राज्य में हरियाली और खुशहाली का आगाज हुआ। जल्दी ही राज्य देश के प्रमुख कृषि उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाने लगा। लेकिन इस खुशहाली के साथ कई खतरे भी थे। जिसमें समय के साथ बदलाव जरूरी था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आगे आने वाली सरकारों ने नई कृषि तकनीक से उत्पन्न होने वाली समस्याओं को नजरअंदाज किया। जबकी समय रहते जरूरी उपाए किए जाने चाहिए थे।

जबकि इस समस्या को लेकर देश के प्रमुख कृषि वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी। स्वामीनाथन ने तो इस कृषि तकनीक को स्वार्थ साधने की खेती कहा था। अभी भी जो तरीका हरियाणा में इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे जमीन की उर्वरता के क्षरण का खतरा है। जमीन के उर्वराशक्ति का संरक्षण जरूरी है, जिससे लंबे समय तक खेती की जा सके। रासायनिक खाद और कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग हो रहा है। इससे न केवल उत्पादन को खतरा है बल्कि कैंसर सहित कई अन्य बीमारियों के होने की संभावाएं हो भीहै।

हरियाणा के लगभग सभी इलाकों में भूजल स्तर तेजी से गिरता जा रहा है। यह समस्या बिना सोचे-समझे भूजल के दोहन से उत्पन्न हुईहै। इतनाहीनहीं जल की गुणवत्ता पर भी काफीअसर पड़ा है। राज्य सरकार की तरफ से भूजल संरक्षण के पुख्ता उपाए नहीं किए जा रहे हैं। जिससे आने वाले दिनों में पीने के पानी की समस्या विकराल रुप धारण कर सकती है। पानी की इस समस्या का असर अन्न उत्पादन पर भी पड़ेगा। जिससे देश के एक बड़े भाग में समस्या उत्पन्न होने के पूर्ण आसार हैं.

हरियाणा तीन तरफ से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से घिरा है। लेकिन इसका लाभ यहां के निवासियों को नहीं मिल रहा है। विकास के नाम पर केवल कंकरीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। खेतिहर जमीनों कीभी विकास के नाम पर बलि चढ़ाई जा रही है। जहां कल तक उपजाऊ खेत होते थे, जिनमें फसल लहलहाया करतीं थीं, आज वहां इमारतें खड़ी की जा रही हैं। ऐसे में किसानों की मुख्य आजीविका उनके हाथों से छिन रही है।

हरित क्रांत्रि से उपजी समस्याओं को दूर करने के लिए राज्य सरकार कहीं से भीजागरूक याचिंतित नहीं दिखती। जबकि आज न केवल कृषि में सुधार की जरूरत है, बल्कि जलसंरक्षण के लिए भी एक सुनियोजित लंबी योजना तैयार करने की आवश्यकता है। जिससे खेत और किसान दोनों का भला हो सके। और राज्य की पहचान भीजिंदा रह सके।

साथ ही इसबात की जरूरत है कि राज्य से सटे दिल्ली के इलाकों के बाजार का फायदा हरियाणा को मिले। अभी तक हालात यह हैंकिदिल्ली के सब्जियों और फलों के बाजार में राज्य की हिस्सेदारी बहुत कम है। इसका कारण है कि राज्य में बागवानी की शोचनीय स्थिति है। इस क्षेत्र में शोध को बढ़ावा नहीं दिया गया, और न ही राज्य सरकार की ओर से किसानों को उत्पादन व विपणन संबंधी मदद दी गई। जिसके कारण मेहनतकश किसान अपनी मेहनत की सही कीमत नहीं पा सके हैं। फायदा नहीं होने की वजह से नई पीढ़ी कृषि के प्रति उदासीन हो रही है, जो हमारे लिए चिंतनीय है.

राज्य सरकार कृषि आधारित व्यवसाय को संरक्षण और बढ़ावा देने में असफल रही है। “देसां में देश हरियाणा जित दुध दही का खाणा” यह उक्ति बहुत कुछ कह देती है।पशुपालन और डेरी उद्योग का विकास किया जाना बहुत जरूरी है। हरियाणा में पशुपालन की परंपरा रही है। राज्य में पशुधन पर्याप्त संख्या में है। लेकिन उनकी देख-रेख और समुचित प्रबंधन नहीं होने की वजह से इसका उचित लाभ नहीं मिल सका है। दिल्ली में रोजाना बड़ी मात्रा में दूध की आपूर्ति होती है। लेकिन दु:ख की बात है कि यह दूध हरियाणा से दिल्ली के बाजार में नहीं पहुंचता है, बल्कि दिल्ली के लिए दूध राजस्थान के बीकानेर और जैसलमेर जैसे दूर के इलाकों से पहुंचता है। जबकि भौगोलिक तौर पर दिल्ली से सटे होने के कारण इसका फायदा हरियाणा को मिलना चाहिए।

सबसे दुखद पहलू यह है कि हरियाणा सरकार आज राज्य के विकास के लिए विशेष आर्थिक जोन की जरूरत अधिक समझती है, जिसका लाभ कुछ चुनिंदा लोगों को ही मिलने वाला है या यह भी कह सकते हैं कि मिल रहा है, जबकि कृषि और इसपर आधारित अर्थव्यवस्था के विकास से राज्य की 70 फीसदी जनता को फायदा मिलता। इससे गांव से होने वाले पलायन को रोका जा सकता है। हरियाणा की पहचान यहां के कृषि और किसानों से है। आज यहां का किसान और कृषि दोनों संकट में दिखते हैं। अगर समय रहते कदम नहीं उठाया गया तो इसका केवल आर्थिक असर ही नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक असर राज्यभर में दिखेगा, और इसकी भरपाई मुश्किल होगी।