By–

  • ख़ुशहाल लाली और दिलनवाज़ पाशा
  • बीबीसी संवाददाता

 

सरकार के साथ पाँच दिसंबर को हुई बैठक में यूनियन नेताओं ने हाथ में ‘हां या ना’ की तख़्ती लेकर स्पष्ट कर दिया कि वो तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द करने से कम किसी भी बात पर मानने वाले नहीं हैं.

सरकार ने थोड़ा लचीलापन दिखाते हुए संशोधन की बात तो की है लेकिन क़ानून रद्द करने का कोई भरोसा नहीं दिया है.

मंगलवार को किसान संगठन भारत बंद करके अपनी ताक़त दिखाएंगे और फिर बुधवार को अगले दौर की वार्ता होगी. जिसमें सरकार ने ठोस प्रस्ताव लाने का वादा किया है.

इस सबके बीच पंजाब की तीस से अधिक किसान यूनियनों और देशभर के संगठनों के बीच भी बहुत कुछ चल रहा है.

किसान संगठन एकजुट रहकर अपनी माँग पर अड़े रहने पर ज़ोर दे रहे हैं. लेकिन सरकार बैक चैनल से बातचीत शुरू करना चाहती है.

किसान यूनियन के नेता रोज़ सुबह दस बजे सिंघू बार्डर पर मीटिंग करते हैं और उसके बाद शाम को रिव्यू मीटिंग होती है. इन बैठकों में ये सुनिश्चित किया जाता है कि कोई कम्यूनिकेशन गैप नेताओं के बीच ना रहे और सबको पता रहे कि क्या हो रहा है.

इस आंदोलन में पंजाब की 31 किसान यूनियनें शामिल हैं और देश के बाक़ी किसान संगठन भी समर्थन कर रहे हैं.

तीस किसान यूनियनों का एकजुट संगठन है, बाक़ी दो बड़ी यूनियनें भी आंदोलन में साथ हैं और केंद्र सरकार के साथ होने वाली बैठकों में हिस्सा लेती हैं.

ये पहली बार है जब पंजाब की सभी किसान यूनियन एक साथ आई हैं और आंदोलन कर रही हैं. जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ रहा है, यूनियनों की एकजुटता और भी मज़बूत हो रही है. यही वजह है कि किसान यूनयिन अब अपनी माँग पर अड़ गई हैं.

माँग पर अड़ चुकी हैं यूनियनें

इस आंदोलन में सबसे बड़ी भागीदारी पंजाब के किसानों की है, अधिकतर यूनियन भी पंजाब की हैं. ऐसे में जनाक्रोश को देखते हुए यूनियन नेताओं में भी डर है कि यदि वो समझौता करेंगे तो जनता ही उन्हें नकार देगी.

भारतीय किसान मंच एकता के नेता बूटा सिंह कहते हैं, ‘कुछ यूनियन नेताओं ने संशोधन पर राज़ी होने की बात बैठक में कही थी, उन्हें सिरे से ख़ारिज कर दिया गया.’

कीर्ति किसान यूनियन के स्टेट वाइस प्रेसिडेंट राजिंद्र सिंह के मुताबिक़ ‘कुछ यूनियन के नेताओं ने बैठक में मध्यमार्ग अपनाने और संशोधनों को स्वीकार करने की बात कही थी. बाक़ी यूनियन के नेताओं ने इसे ख़ारिज कर दिया.’

वो कहते हैं, ‘यूनियनों के नेता भी जनता के आक्रोश को समझ रहे हैं. यूनियनों का काम ही जनभावना को आगे रखना है. जनभावना यही है कि तीनों कृषि क़ानून पूरी तरह रद्द हों.’

पंजाब की सभी किसान यूनियन चार महीनों से ज़मीन पर आंदोलन की तैयारी कर रहीं थीं और उन्होंने समय भी अपने हिसाब से चुना है. किसान धान की फ़सल काटकर गेहूं बो चुके हैं और अगले कुछ महीने उनके लिए काम कम हैं. ऐसे में किसान कम से कम मार्च तक आंदोलन को खींचने की स्थिति में हैं.

दिल्ली पहुँचने के बाद आंदोलन चलाने के लिए ज़रूरी सामान मुहैया कराने में भी कोई दिक़्क़त नहीं आ रही है. दिल्ली के गुरुद्वारे, पंजाब के गुरुद्वारे लंगर चला रहे हैं जबकि सिविल सोसायटी के लोग भी चंदा दे रहे हैं. एनआरआई भी बड़े पैमाने पर अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के ज़रिए आंदोलनकारी किसानों तक पैसा पहुँचा रहे हैं.

ऐसे में किसान मज़बूत स्थिति में दिखाई देते हैं और यही वजह है कि यूनियनों भी अपनी माँग पर अड़ गई हैं. लेकिन बातचीत में दोनों पक्षों को थोड़ा-थोड़ा पीछे हटना होता है. हमने यही सवाल भारतीय किसान यूनियन उग्राहां ग्रुप के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उग्राहां के समक्ष रखा.

किसानों के अस्तित्व का सवाल

उनका कहना है, ‘ये सिर्फ़ एमएसपी की लड़ाई नहीं है, ये खाद्य सुरक्षा की लड़ाई है. ये किसानों के अस्तित्व की लड़ाई है. इसमें सरकार सुधार करके संशोधन के नाम पर कॉरपोरेट के हितों को बचाना चाहती है लेकिन हम उसकी इजाज़त नहीं दे सकते क्योंकि अब ये किसानों के चूल्हे की लड़ाई है. हम अपने हाथ की रोटी में कॉरपोरेट को हिस्सा नहीं दे सकते हैं.’

वो कहते हैं, ‘एक सड़ा-गला सेब है, सरकार चाहती है कि उसका सड़ा हुआ हिस्सा काटकर जो बाक़ी कुछ सही बचता है हम उसे खा लें, लेकिन हम सड़ा हुआ सेब नहीं खाएंगे. सरकार मान चुकी है कि क़ानून में ख़ामियां हैं, हम इन ख़राब क़ानूनों को स्वीकार नहीं करेंगे.’

भारतीय किसान यूनियन के एक और नेता जगजीत सिंह ढल्लेवाल का कहना है कि किसान पहले से ही लंबी लड़ाई की तैयारी के साथ आए हैं, हमारे साथ जो लोग आए हैं वो भी मानसिक तौर पर लंबी लड़ाई के लिए तैयार हैं.

वो कहते हैं, ‘लोग जानते हैं कि सरकार आसानी से नहीं मानेगी, ऐसे में जब तक सरकार नहीं मानेगी, हम अपना मोर्चा संभाले रखेंगे. क़ानून रद्द करने से कम किसी भी बात पर हम मानने वाले नहीं है.’

वहीं आंदोलन में शामिल विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक़ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने यूनियन के चुनिंदा नेताओं से मुलाक़ात करने की पेशकश की थी लेकिन यूनियन नेता छोटे समूह में केंद्रीय मंत्री से मिलने की हिम्मत नहीं जुटा सके.

रविवार को हुई बैठक में कुछ नेताओं ने संशोधन पर सहमत होने का प्रस्ताव रखा जिसे ख़ारिज कर दिया गया.

एक सूत्र के मुताबिक़, ‘जब कुछ नेताओं ने कहा कि एक छोटे समूह को गृहमंत्री से मुलाक़ात करनी चाहिए तब यूनियन की ओर से कहा गया कि आप चाहें तो मिल सकते हैं. लेकिन सच्चाई ये है कि किसी भी नेता में अब अकेले चलने की हिम्मत नहीं हैं, सब जानते हैं कि यदि कुछ नेता बीच का रास्ता निकालना भी चाहेंगे तो लोग उसे स्वीकार नहीं करेंगे.’

अब केवल किसानों का मुद्दा नहीं रहा

स्वराज इंडिया के संयोजक और किसान संघर्ष समिति से जुड़े योगेंद्र यादव ने जब आंदोलन के तीसरे दिन बुराड़ी मैदान चलने का प्रस्ताव दिया था तो उनका जमकर विरोध हुआ था.

कीर्ति किसान यूनियन से जुड़े राजिंदर सिंह के मुताबिक़, ‘अब यूनयिन नेता भी समझ रहे हैं कि ये सिर्फ़ किसानों के मुद्दों का आंदोलन नहीं रह गया है बल्कि सरकार की जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ जन आंदोलन बन गया है. इस संघर्ष में अब दूसरे संगठन भी शामिल हो रहे हैं.’

राजिंदर कहते हैं, ‘ये क़ानून पूरे देश में लागू होने हैं. सिर्फ़ पंजाब में नहीं, ऐसे में हमारा फोकस है कि देश के सभी संगठनों को एक फ्रंट पर लाया जाए. हम ये भी समझते हैं कि कोई एक संगठन सरकार को नहीं हरा सकता. सबको एक साथ आना ही होगा.’

भारतीय किसान मंच से जुड़े बूटा सिंह भी मानते हैं कि यूनियन नेताओं का ज़ोर इस समय एकजुट रहने और एक आवाज़ में ही संदेश देने पर है.

वो कहते हैं, ‘भले ही अंदरूनी बैठक में कुछ मध्यमार्गी विचार आएं लेकिन बाहर हमारा संदेश स्पष्ट जाता है कि हम तीनों क़ानूनों को रद्द कराने से कम पर मानने वाले नहीं हैं.’

उत्तर प्रदेश के किसान नेता राकेश सिंह टिकैट की किसान यूनियन ने गाज़ीपुर बार्डर पर धरना दिया हुआ है. राकेश सिंह टिकैत का संगठन पहले इस आंदोलन में शामिल नहीं था. लेकिन जब हरियाणा में पंजाब से आ रहे किसानों को रोका गया तो उनके संगठन ने भी मोर्चा संभाल लिया.

टिकैट बताते हैं, ‘उनके संगठन के पास सिंघू बार्डर पर बैठक में शामिल होने का न्यौता रहता है लेकिन वो दूर होने की वजह से व्यक्तिगत स्तर पर नहीं जा पाते हैं बल्कि उनके प्रतिनिधि इसमें शामिल होते हैं.’

सूत्रों के मुताबिक़ सरकार ने राकेश टिकैत के ज़रिए भी बातचीत करने की कोशिश की थी लेकिन राकेश टिकेत का कहना है कि ‘वो पूरी तरह से किसान संगठनों के एजेंडे के साथ हैं.’

बीबीसी हिन्दी