by – Krishna Kant

सामान बेचकर मुनाफाखोरी के लिए रामदेव की पतंजलि पर 75 करोड़ का जुर्माना लगा है.

हरिशंकर परसाई जी ने लिखा था, धर्म धंधे से जुड़ जाए, इसी को ‘योग’ कहते हैं. बाबा रामदेव इसी धर्म को धंधे से जोडने के योगी हैं. आंख मूंद कर अंधाधुंध पैसा बटोरने पर आमादा बाबा कई बार ऐसे जुर्माने अदा कर चुके हैं, लेकिन वे गोरखधंधे से बाज नहीं आते.

नेशनल एंटी प्रॉफिटियरिंग अथॉरिटी (NAA) ने उनपर 75 करोड़ का जुर्माना लगाया है क्योंकि वे जीएसटी में कमी का फायदा ग्राहकों को नहीं दे रहे थे और ज्यादा रेट पर सामान बेच रहे थे. एनएए ने कहा है कि वाशिंग पाउडर पर GST में कटौती के बावजूद पतंजलि ने उसके रेट बढ़ा दिए थे और इस कटौती का फायदा ग्राहकों तक नहीं पहुंचाया.

इसके पहले दिसंबर 2016 में एसडीएम हरिद्वार ने पतंजलि आयुर्वेद की पांच फर्मों पर 11 लाख का जुर्माना ठोंका था. उनके उत्पादों के पांच सैंपल फेल हो गए थे. इसके अलावा आरोप था कि बाबा अपने प्रॉडक्ट्स का गलत तरीके से प्रचार करते हैं यानी मिसब्रांडिंग. भ्रामक विज्ञापन देकर लोगों को लुभाते हैं.

इसके बाद फरवरी 2017 में भी पतंजलि की उत्पाद इकाइयों को गलत प्रचार का दोषी पाया गया और हरिद्वार की अदालत ने इन इकाइयों पर 11 लाख रुपये का जुर्माना लगाया.

पिछले साल अमेरिकी खाद्य विभाग ने भी पतंजलि पर गलत प्रोडक्ट बेचने का आरोप लगाया था और उन पर तीन करोड़ का जुर्माना लगना संभावित था. इसका फॉलोअप मुझे नहीं मिला.

2017 में बाबा उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में पतंजलि आटा नूडल्स का सैंपल फेल हो गया था. इसमें राख की मात्रा ज्यादा पाई गई है जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है. मुझे इसकी जानकारी नहीं है कि इस बारे में क्या कार्रवाई हुई.

जब बाबा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे, उसी दौर में यानी 2013 में उनपर 19 करोड़ का जुर्माना ठोंका गया था. उस समय पतंजलि योग ट्रस्ट पर केन्द्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क विभाग ने उत्पाद शुल्क चोरी करने के लिए 19 करोड़ का जुर्माना ठोंका था. कुछ उत्पादों के शुल्क दे रहे थे, उसी की आड़ में और तमाम प्रोडक्ट बनाकर बेच रहे थे.

3 अक्टूबर, 2014 को जीन्यूज पर छपी एक खबर के मुताबिक, उत्तर प्रदेश व्यापार कर विभाग ने कर न चुकाने के मामले में पतंजलि योगपीठ पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. व्यापार कर विभाग के सहायक आयुक्त संजय सिंह के हवाले से यह खबर छपी है.

रिसर्च करने पर और मामले मिलेंगे. लेकिन सवाल मामलों की संख्या का नहीं है. सवाल है एक ‘योगी’ की नियति का. उन पर बार बार जुर्माना क्यों लगता है? वे अवैध काम करके हजारों करोड़ की संपत्ति किसके लिए बना रहे हैं? अगर वे लोगों को हानिकारक खाद्य पदार्थ खिला रहे हैं तो जाहिर है कि वे समाज सेवा भी नहीं कर रहे हैं. वे योग शिविर में किसी को एंट्री देने का भी ठीकठाक पैसा लेते हैं.

लेकिन सबसे बड़ी बात है कि उनके भगवा चोले की वजह से ही लोग उनपर ज्यादा विश्वास करते हैं. सुबह उन्हें टीवी पर देखते हैं और शाम को बाजार से पतंजलि का सामान खरीद लेते हैं, क्योंकि वे बाबा पर भरोसा करते हैं. बाबा इस धार्मिक भरोसे को धंधे से जोड़कर पैसा ऐंठते हैं और कानून तोड़ने के जुर्म में बार-बार जुर्माना भरते हैं.

आंख मूंदकर विश्वास करने को ही अंधविश्वास कहते हैं. नेता हो या बाबा, धन हो या धर्म, जिन मामलों में आप आंख मूंदकर भरोसा करेंगे, वहीं ठगे जाएंगे.