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मोहम्मद शरीक

अगर आप किसी ऐसे प्रदेश में कुछ साल बिताकर अपने पैतृक प्रदेश उत्तर प्रदेश आए हों तो आपको ये एहसास बखूबी होगा कि आप जिस धरती पर जन्मे वोह अभी विकास की दौड़ में हांफता हुआ नज़र आएगा. हालाँकि राजनीति की मैराथन में इसका कोई सानी नहीं. भारत ऐसा नहीं की विकास की प्रतिस्पर्धा में कहीं पीछे है. इस देश को कुदरत ने सभी कुछ दिया है जैसे हवा ,पानी, कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैली खेती की ज़मीन, धरती की गर्भ में भरा सोना जिसे हम धातू कहते हैं विशेषकर कोयला . मगर इस लोकतान्त्रिक देश में भगवान् ने किसी एक चीज़ की कमी की है तो वो है राजनितिक इच्छाशक्ति की. इसी इच्छाशक्ति ने हमें अपने वजूद पर शर्म करने पर मजबूर करती है.

हमारे देश में अभी भी बहुत से प्रदेश ऐसे हैं जहाँ के नागरिकों को मूल भूत सुविधाओं जैसे स्वच्छ पानी,पर्याप्त बिजली, मज़बूत कानून व्यवस्था, मज़बूत ट्रांसपोर्ट व्यवस्था,अधिकार की रूप में प्राप्त हैं. और होना भी चाहिए इसके लिए ये लोग विभिन प्रकार के टैक्स अदा करते हैं.

कुछ राज्य ऐसे हैं जहाँ मूलभूत सुविधाओं के नाम पर सिर्फ वादे और आश्वासन हैं जिससे न पेट भरता है और न जीने की ख्वाहिश होती है. इन्हीं प्रदेश में एक ऐसा प्रदेश भी है उत्तम प्रदेश यानि उत्तरप्रदेश . जहाँ बिजली का संकट ऐसा प्रतीत होता है जैसे उत्तरप्रदेश वासियों को किसी का श्राप हो .ऐसा हरगिज़ नहीं है कि यहाँ बिजली उत्पादन के लिए किसी चीज़ का आभाव है, आभाव है तो बस नियत का जो नियति को मुंह चिढाती नज़र आती है. आप इसी से अंदाज़ा लगा सकते है कि इस प्रदेश में बिजली उत्पादन के दर्जनों कारखाने मौजूद हैं मगर इंधन के इंतज़ार में दम तोड़ चुके है. हालात इतने ख़राब हैं कि कोई बिजली उधार देने को तैयार नहीं, इसका ये मतलब हरगिज़ नहीं कि राज्य सरकार के पास पैसे नहीं हैं ,पैसे हैं मगर ग़ैर ज़रूरी योजनाओं के लिए, लाल बत्ती के आवंटन के लिए, विदेश यात्राओं के लिए.

सूबे के रजा अखिलेश यादव ने लोक लुभावन योजनाओं से लोगों का

दिल जीतने की कोशिश ज़रूर की मगर सीट जीतने में नाकाम रहे. जिसका खामियाजा अब ठन्डे बसते में जाती योजनाओं से किया जा सकता है. जिसकी ताज़ा मिसाल छात्रों को लैपटॉप योजना है जो लोक सभा चुनाव के नतीजे के बाद बंद करने के संकेत दिए जा चुके हैं. करोड़ों रुपये का बेमकसद और बेतरतीब खेल का खामियाजा प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ रहा है.

मुलायम सिंह के इतने बड़े सियासी सफ़र में प्रचंड बहुमत के बाद अखिलेश यादव को सत्ता देना एक ग़लत फैसला साबित हो रहा है.भले ही समाजवादी इस हकीकत को नकारें मगर ये भी सच्चाई है कि पालनेमें बैठ कर सरकारें नहीं चला करतीं. अनिश्चितताओं से भरी सियासत में प्रशिक्षण, तजुर्बे , आत्मा विश्वास और जनता के प्रति ईमानदारी जैसी विशेषताएं होनी चाहिए जो शायद सूबे के मुख्यमंत्री में नहीं हैं या सिपहसालारों से जकड़े असहज नज़र आते हैं.

ये कोई इलज़ाम नहीं है, राज्य की कानून व्यवस्था अखिलेश यादव प्रशासन की पोल खोल रही है. इस प्रदेश में जहाँ बलात्कार, प्रताड़ना, मर्डर जैसे बेशुमार जघन्य अपराध रोज़ सुर्खियाँ बनते हैं, जिस में खाकी भी खून के सुर्ख रंग से रंगी मिल रही है. बदायूं से लेकर गोरखपुर तक सभी जगह लड़कियां या तो दरंदगी का शिकार हो रही हैं या आबरू बचाने के लिए मौत को गले लगा रही हैं. ये इस समाज की बदकिस्मती है की जिस औरत से इस सृष्टि का वजूद है आज उसी औरत को सरे आम नोचा जा रहा है. ऐसा नहीं है की सरकार आँख मूंदे बैठी है……हरगिज़ नहीं वो तो बाकी सूबे में हो रहे क्राइम ग्राफ को नापने में लगी है ….मगर मुख्यामंत्री जी दूसरों से प्रतिस्पर्धा करनी है तो बिजली,पानी जैसी सुविधाओं से करिये इंसानी जानों को तो बख्श दीजिये. सूबे में अपराधों की बानगी सिर्फ यहाँ नहीं थमती अब तो बदमाशों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं की खुद पुलिस भी निशाना बन रही है. मुलायम सिंह के गृह जनपद फीरोजाबाद की ताज़ा घटना इस का सबूत है.

कहा जाता है इस देश की आर्थिक स्तिथि कृषि पर निर्भर है और जय जवान जय किसान का नारा इसी धरती के सुपूत ने दिया था, मगर आज किसान अपनी बेरुखी से तंग आकर मौत को गले लगा रहे हैं. सालों से चली आ रही गन्ना किसानों की मांग ने आन्दोलन की शक्ल तो ली मगर राजनीतिज्ञों और दलालों के गठबंधन ने इस आन्दोलन की आवाज़ दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. किसानों का करोड़ों रुपये आज भी चीनी मिल मालिकों के पास बकाया है,जिस की आस में किसान एक एक कर मौत को गले लगा रहे हैं.

टीवी चैनलों के स्टूडियो में लोग रोज़ सुबह शाम उत्तर प्रदेश की चर्चा हो रही है मगर अफ़सोस ये चर्चाएं सकारात्मक नहीं नकारात्मक हैं. ऐसा नहीं है कि उत्तर प्रदेश की इस स्तिथि के लिए सिर्फ समाजवादी सरकार ही ज़िम्मेदार है , प्रदेश में सरकार चाहे बहुजन समाजवादी पार्टी की हो या कांग्रेस की या फिर भारतीय जनता पार्टी की सूरतेहाल वही रहती है , सत्ता बदलती है ,नेता बदलते है अगर कुछ नहीं बदलती तो जनता की किस्मत. खादी और खाकी ने इस प्रदेश को उत्तम प्रदेश से बदतर प्रदेश बना दिया है.

मगर कहते हैं न कि उम्मीद का दमन नहीं छोड़ना चाहिए …चलिए सुनहरे कल के सफ़र के लिए फिर आश्वासनों और उम्मीदों की कश्ती पर सफ़र करते हैं.