by — Indra Mani Upadhyay

नेल्ली’ असम की राजधानी गुवाहाटी से 70km दूर एक कस्बा है। स्वघोषित भारत में शायद ही लोगों ने इसका नाम सुना हो। आज का दिन यहाँ के लोगों को शायद ही भूलता हो (यद्यपि वे इसे याद करने से बचने की कोशिश करते हैं) आज से 35 साल पूर्व 18 feb 1983 को इस इलाके ने स्वतंत्र भारत की एक सबसे बड़ी हिंसा देखी थी, दिन दहाड़े 6 घंटे के भीतर 14 गावों के 2191 मुसलमानों को बेरहमी से मार डाला गया था।
इस देश में वोटबैंक एक बहुत बड़ी बीमारी है। हर पार्टी को भीड़ चाहिए, ठप्पे चाहिए जिससे वो कुर्सी पर कब्जा कर सके। असम में 1971 के पाकिस्तान विभाजन के बाद अवैध घुसपैठ की संख्या में तेजी से इजाफ़ा हुआ। बहुतेरे इलाकों की जनसंख्यात्मक स्थितियाँ तक बदल गई, स्थानीय लोग अल्पसंख्यक होने लगे। इन्हीं बाहरियों को वोटबैंक के रूप में प्रयोग कर राजनीति कुर्सी हासिल करने का प्रयास करने लगी। फिर इसके प्रतिरोध में जिस राजनीति की शुरुआत हुई…उसका अंजाम ‘Nellie massacre’ के रूप में सामने आया। इसमें 18 feb 1983 को 06 घंटों के व्यापक नरसंहार में 14 गाँवों ‘Alisingha, Khulapathar, Basundhari, Bugduba Beel, Bugduba Habi, Borjola, Butuni, Indurmari, Mati Parbat, Muladhari, Mati Parbat no. 8, Silbheta, Borburi and Nellie’ के 2191 लोगों (अनाधिकारिक आंकड़े 10 हजार से ऊपर) को मार दिया गया।

वैसे तो पचास दशक से ही गैर-कानूनी रूप से बाहरी लोगों का असम में आना एक राजनीतिक मुद्दा बनने लगा था, लेकिन 1979 में यह एक प्रमुख मुद्दे के रूप में सामने आया, जब बड़ी संख्या में बांग्लादेश से आने वाले लोगों को राज्य की मतदाता सूची में शामिल कर लिया गया। 1978 में मंगलदोई लोकसभा क्षेत्र के सांसद हीरालाल पटवारी की मृत्यु के बाद उपचुनाव की घोषणा हुई। उस समय चुनाव आयोग ने पाया कि मतदाताओं की संख्या में अचानक ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हो गया है। इसने स्थानीय स्तर पर लोगों में आक्रोश पैदा किया। यह माना गया कि बाहरी लोगों, विशेष रूप से बांग्लादेशियों के आने के कारण ही इस क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है। घुसपैठियों को बाहर करने के लिए All Assam Students’ Union (AASU) ने व्यापक आंदोलन की शुरुआत की जिसे असमिया भाषा बोलने वाले हिंदुओं, मुसलिमों और बहुत से बंगालियों ने भी खुलकर समर्थन दिया।

केंद्र सरकार ने 1983 में असम में विधानसभा चुनाव कराने का फ़ैसला किया। लेकिन आंदोलन से जुड़े संगठनों ने इसका बहिष्कार किया। इसे देखते हुए चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को रिपोर्ट दी की अभी चुनाव कराने लायक माहौल नहीं है, विशेषकर 23 विधानसभाओं में ‘चुनाव संभव ही नहीं’ की रिपोर्ट दी, नेल्ली उन्हीं में से एक था। लेकिन केंद्र की तत्कालीन इन्दिरा सरकार ने चुनाव आयोग की बात नहीं मानी और चुनाव की घोषणा कर दी। स्थानीय लोगों के बहिष्कार के बाद भी (बंगाली) मुस्लिमों के एक धड़े ने इस चुनाव मे मतदान का निर्णय लिया। इन चुनावों में बहुत कम वोट डाले गये। जिन क्षेत्रों में असमिया भाषी लोगों का बहुमत था, वहाँ तीन प्रतिशत से भी कम वोट पड़े। राज्य में आदिवासी, भाषाई और साम्प्रदायिक पहचानों के नाम पर ज़बरदस्त हिंसा हुई।
नेल्ली नरसंहार के बाद केंद्र सरकार ने जाँच के लिए ‘तिवारी आयोग’ का गठन किया, लेकिन इसकी रिपोर्ट आज तक प्रकाश में नहीं आ सकी है। इस नरसंहार के कुछ दिन बाद हेलिकॉप्टर से आईं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह ने हर तरह की मदद का वायदा किया था. फिर भी तीन दशक में कुछ नहीं हुआ। बसंतोरी गाँव के मुस्लिमुद्दीन कहते हैं, “हम लोगों को हर लाश के लिए 5,000 रुपए और टीन की नालीदार चादरें मिलीं. बस.”…..!

इसके बाद 15 अगस्त 1985 को केंद्र की राजीव गाँधी सरकार और आंदोलन के नेताओं के बीच समझौता हुआ (जिसे असम समझौते के नाम से जाना गया)। इसके बाद विधानसभा को भंग करके 1985 में ही चुनाव कराए गये, जिसमें नवगठित असम गण परिषद को बहुमत मिला। पार्टी के नेता प्रफुल्ल कुमार महंत, जो कि आसू के अध्यक्ष भी थे, मुख्यमंत्री बने। उस समय उनकी उम्र केवल 32 वर्ष की थी (वे शायद तब भारत के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री थे। बाद में नेल्ली नरसंहार से जुड़े सभी मामले वापस ले लिए गए, इसमें से किसी को भी एक दिन की भी सज़ा नहीं हुई (विचार कीजिए कि हजारों हत्याओं का कोई भी दोषी नहीं)।नरसंहार के 35 साल बाद अभी तक इसके पीड़ित न्याय की आस में हैं, अब तो उसमें अधिकांश दुनिया छोड़ चुके हैं। एक नई पीढ़ी मतदान को आ चुकी है, जिसे शायद ही इस घटना की ठीक से जानकारी हो, या वो इसे जानना चाहे। आज भी किसी भी गांव में मारे गए लोगों की याद में स्मारक नहीं बनाया जा सका है।
हालांकि इसके बाद भी हर चुनाव में यहाँ के लोग बड़े बड़े चुनावी वादे सुनते हैं, मतदान करते हैं…देश और लोकतन्त्र की न्यायप्रियता जनपक्षधारिता का ढोल यूँ ही बजता रहता है।

#नेल्ली_नरसंहार की 35वीं बरसी पर…