by– गुरदीप सिंह सप्पल

आसाम में एनआरसी के तहत १९ लाख नागरिकों को संदिग्ध नागरिक माना है। संविधान के अनुसार उनके जो नागरिक अधिकार मिल सकते हैं उनको ख़तम करने का प्रावधान है और इन संदिग्ध नागरिकों के अधिकार खत्म हो गये हैं।

जो भी नागरिकता खोएगा, उससे और उसके परिवार से बैंक सुविधा, प्रॉपर्टी के अधिकार, सरकारी नौकरी के अधिकार, सरकारी योजनाओं के फ़ायदे के अधिकार, वोट के अधिकार, चुनाव लड़ने के अधिकार नहीं होंगे।

आसाम में १९ लाख नागरिकों में ५ लाख मुसलमान है और १४ लाख ग़ैर मुस्लिम हैं। इन १९ लाख में से लाखों नागरिकों को डिटेंशन कैंप यानी जेल में रखा गया है।

जहां जहां भाजपा सरकार है उन्होंने हर जिले में डिटेंशन कैंप बना लिये हैं और बना भी रहे हैं। मतलब करोड़ों करोड़ों नागरिकों को जेल में बंद रखने की तैयारी हो चुकी है या हो रही है।

इस प्रक्रिया में सबसे ज्यादा परेशानी गरीबों को होगी। जितना ज्यादा गरीब और असहाय उतना ही ज्यादा परेशानी।

आसाम में एनआरसी प्रक्रिया में नागरिकों को परेशान करने के लिए क्या क्या हथकंडे अपनाए थे यह भी जान लीजिए।

१. प्रमाण पत्रों में यदि कोई स्पेलिंग में अंतर है तो डोक्युमेंट को अस्वीकार कर दिया था।
२. नागरिकों के परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ नोटिस नहीं भेजे गए।
३. नोटिस में कई सौ किलोमीटर दूर उपस्थित होने को कहा गया।
४. नोटिस के अनुसार सामान्य रूप में सिर्फ २४ घंटे का समय दिया गया।
५. जो नागरिक समय पर नहीं पहुंच पाए उन्हें संदिग्ध मान लिया गया।
६. इन्हें और उन सभी को जिनके डोक्युमेंट अस्वीकृत किये गये या किसी भी कारण से संदिग्ध माना गया उन सभी को कहा गया कि वे ट्रिब्यूनल में जायें।
७. यह प्रक्रिया बहुत लंबी है कई कई साल लगेंगे और तब तक उनके सभी नागरिक सम्मान और अधिकार नहीं होंगे। और वोट देने का अधिकार नहीं होगा।
८. कई करोड़ नागरिक बिना किसी अधिकार के सालों साल डिटेंशन कैंप में गुलामों की जिंदगी जीने के लिए जबरदस्ती मजबूर किये जायेंगे।
९. वे सभी एनआरसी कर्मी जिनको नागरिकता चैक करने का काम दिया गया था वो लगभग सभी कोंट्रैक्ट के तहत लिए गए थे। इन लोगों के द्वारा डोक्युमेंट अस्वीकृत या स्वीकृत करने के लिए खूब भ्रष्टाचार भी करने का मौका मिला और जो इनको खुश कर पाये उनके डोक्युमेंट ऐसे ही अस्वीकृत कर दिये गये।
१०. जब इन एनआरसी कर्मियों का कोंट्रेक्ट खत्म हुआ तो इनके सेवा विस्तार मतलब कोंट्रेक्ट के एक्सटेंशन की प्रक्रिया में इस बात का ध्यान रखा गया था कि किसने कितने नागरिकों को संदिग्ध करार दिया है।
११. जिसने ज्यादा संदिग्ध नागरिक डिक्लेयर किया उनके कोंट्रैक्ट को ही एक्सटेंशन किया गया।
१२. जितने ज्यादा संदिग्ध नागरिक डिक्लेयर करेंगे उतना ही उनकी सेवा ज्यादा ली जायेगी। वरना बेरोजगार होकर घर बैठेंगे।
१३. यह भी हो सकता है कि उनके नाम उनके परिवार के सदस्यों को एनआरसी प्रक्रिया में संदिग्ध करार दे दिया जाये।

NRC हर भारतीय के लिए मुसीबत क्यों है, जानना हो तो इसे पढ़ें..

बात हिंदू मुसलमान की है ही नहीं। NRC राष्ट्रीय स्तर पर बनेगा,ये बात गृह मंत्री अमित शाह बोल चुके हैं।

इसमें क्या होगा? क्या सिर्फ़ मुस्लिम लोगों को तकलीफ़ होगी?

अभी कोई तारीख़, कोई प्रक्रिया तय नहीं हुई है। हमारे सामने केवल असम का अनुभव है, जहाँ 13 लाख हिंदू और 6 लाख मुस्लिम/ आदिवासी अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए।

सवाल है कि क्यों नहीं कर पाए?

क्योंकि वहाँ सबको NRC के लिए 1971 से पहले के काग़ज़ात, डॉक्यूमेंट सबूत के तौर पर जमा करने थे। ये सबूत थे:

1. 1971 की वोटर लिस्ट मेन खुद का या माँ-बाप के नाम का सबूत; या
2. 1951 में, यानि बँटवारे के बाद बने NRC में मिला माँ-बाप/ दादा दादी आदि का कोड नम्बर

साथ ही, नीचे दिए गए दस्तावेज़ों में से 1971 से पहले का एक या अधिक सबूत:

1. नागरिकता सर्टिफिकेट
2. ज़मीन का रिकॉर्ड
3. किराये पर दी प्रापर्टी का रिकार्ड
4. रिफ्यूजी सर्टिफिकेट
5. तब का पासपोर्ट
6. तब का बैंक डाक्यूमेंट
7. तब की LIC पॉलिसी
8. उस वक्त का स्कूल सर्टिफिकेट
9. विवाहित महिलाओं के लिए सर्किल ऑफिसर या ग्राम पंचायत सचिव का सर्टिफिकेट

अब तय कर लें कि इन में से क्या आपके पास है। ये सबको चाहिये, सिर्फ़ मुस्लिमों को नहीं।

और अगर नहीं हैं, तो कैसे इकट्ठा करेंगे। ये ध्यान दें कि 130 करोड़ लोग एक साथ ये डाक्यूमेंट ढूँढ रहे होंगे। जिन विभागों से से ये मिल सकते हैं, वहाँ कितनी लम्बी लाइनें लगेंगी, कितनी रिश्वत चलेगी?

असम में जो ये डाक्यूमेंट जमा नहीं कर सके, उनकी नागरिकता ख़ारिज होगी 12-13 लाख हिंदुओं की और 6 लाख मुस्लिमों/ आदिवासियों की।

राष्ट्रीय NRC में भी यही होना है।

BJP के हिंदू समर्थक आज निश्चिंत बैठ सकते हैं कि नागरिकता संशोधन क़ानून, जो सरकार संसद से पास करा चुकी है, उससे ग़ैर-मुस्लिम लोगों की नागरिकता तो बच ही जाएगी।

जी, ठीक सोच रहे हैं। लेकिन NRC बनने, अपील की प्रक्रिया पूरी होने तक, फिर नए क़ानून के तहत नागरिकता बहाल होने के बीच कई साल का फ़ासला होगा।

130 करोड़ के डाक्यूमेंट जाँचने में और फिर करोडों लोग जो फ़ेल हो जाएँगे, उनके मामलों को निपटाने में वक़्त लगता है।
असम में छः साल लग चुके हैं, प्रक्रिया जारी है। आधार नम्बर के लिए 11 साल लग चुके हैं, जबकि उसमें ऊपर लिखे डाक्यूमेंट भी नहीं देने थे।

जो लोग NRC में फ़ेल हो जाएँगे, हिंदू हों या मुस्लिम या और कोई, उन सबको पहले किसी ट्रिब्युनल या कोर्ट की प्रक्रिया से गुज़रना होगा। NRC से बाहर होने और नागरिकता बहाल होने तक कितना समय लगेगा, इसका सिर्फ़ अनुमान लगाया जा सकता है। कई साल भी लग सकते हैं।

उस बीच में जो भी नागरिकता खोएगा, उससे और उसके परिवार से बैंक सुविधा, प्रॉपर्टी के अधिकार, सरकारी नौकरी के अधिकार, सरकारी योजनाओं के फ़ायदे के अधिकार, वोट के अधिकार, चुनाव लड़ने के अधिकार नहीं होंगे।

अब तय कर लीजिए, कितने हिंदू और ग़ैर मुस्लिम ऊपर के डाक्यूमेंट पूरे कर सकेंगे, और उस रूप में पूरे कर सकेंगे जो सरकारी बाबू को स्वीकार्य हो। और नहीं कर सकेंगे तो नागरिकता बहाल होने तक क्या क्या क़ीमत देनी पड़ेगी?

बाक़ी बात रही मोदी जी के ऊपर विश्वास की, कि वो कोई रास्ता निकाल कर ऊपर लिखी गयी परेशानियों से बचा लेंगे, तो नोटबंदी और GST को याद कर लीजिए। तब भी विश्वास तो पूरा था, पर जो वायदा था वो मिला क्या, और जो परेशानी हुई, उससे बचे क्या?

NRC में कैसे करेंगे सभी अपनी नागरिकता साबित?

सुनने में बहुत आसान लगता है कि अगर सच्चे नागरिक हो तो NRC से डरते क्यों हो? आख़िर बिना आधार के, बिना राशन कार्ड के, बिना वोटर कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस या घर के काग़ज़ के तो नहीं रह रहे हैं न।

ठीक है, लेकिन तीन बातें समझिए कि फिर भी NRC देश में सबके लिए मुसीबत की आहट क्यों है?

पहली बात:

NRC बनाया ही इसलिये जा रहा है कि सरकार को आशंका है कि विदेशी घुसपैठियों ने फ़र्ज़ी पेपरों के दम पर आधार या वोटर कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस या राशन कार्ड वग़ैरा बना लिया है और भारतीय नागरिकों में वो मिक्स हो गए हैं।

इसीलिये NRC में सिर्फ़ इन मौजूदा डॉक्यूमेंट के आधार पर कोई भी नागरिकता साबित नहीं कर पाएगा। इसके लिए पुराने रिकार्ड चाहिए ही होंगे, जिन्हें जमा करने के लिए सभी को जूझना होगा।

दूसरी बात:

मोदी सरकार ने जनधन स्कीम में 37.66 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं। इनमें से ज़्यादातर खाताधारक NRC के नागरिकता टेस्ट को कैसे पास करेंगे, कैसे अपनी नागरिकता बचाएँगे?

इन 37 करोड़ में ज़्यादातर वो गरीब लोग हैं, जिनके पास आज के समय के मामूली से पहचान पत्र और घर का पता बताने वाले कागज़ भी नहीं हैं। ये लोग नागरिकता साबित करने वाले सालों साल पुराने कागज़ कहाँ से लाएंगे?

याद रहे कि जन धन स्कीम सरकार ने उन गरीब, असहाय लोगों के खाते खोलने के लिए शुरू की थी, जिनके पास बैंक में खाता खोलने के ज़रूरी डॉक्यूमेंट नहीं होते थे। इसीलिए उनके खाते मनरेगा कार्ड या आधार नम्बर से खोले गए हैं। जिनके पास वह भी नहीं थे, उनके ‘छोटे खाते’ बिना किसी पहचान पत्र के, सिर्फ़ दो फ़ोटो के साथ खोले गए हैं।

इन 37 करोड़ लोगों में से कितनों के पास नागरिकता साबित करने के लिए ज़रूरी डॉक्यूमेंट मिलेंगे? उनका आख़िर क्या होगा? NRC में नागरिकता टेस्ट में यदि ये करोड़ों लोग फ़ेल हो गए, तो ट्रायब्यूनल/ कोर्ट में अपील में सालों चक्कर नहीं काटेंगे?
ज़रा सोचिए!

(कहने को जन धन खाते पासपोर्ट, पैन नम्बर, ड्राइविंग लाइसेंस या गज़ेटेड ऑफ़िसर के सर्टिफ़िकेट से भी खुल सकते हैं, लेकिन जिन्होंने कभी बैंक का मुँह नहीं देखा था, उनके पास ये डॉक्यूमेंट होने की कितनी सम्भावना है?)

तीसरी बात:

NRC में हर व्यक्ति की नागरिकता की जाँच करने प्लान है। हर परिवार नहीं, हर व्यक्ति की!

अगर किसी के परिवार में एक व्यक्ति के नाम ज़रूरी डाक्यूमेंट हैं, तब भी उस व्यक्ति के साथ परिवार के साथ हर व्यक्ति का रिश्ता सरकारी काग़ज़ों की मार्फ़त साबित करना होगा।

इसी नियम की वजह से देश के पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के परिवार के लोग असम NRC से बाहर हो गए। इसी नियम के कारण वहाँ एक BJP के MLA की बीवी का नाम, कारगिल युद्ध में शामिल फ़ौजी अफ़सर, कांग्रेस के पूर्व विधायक का नाम जैसे कितने ही जाने माने लोग NRC में नागरिकता साबित नहीं कर पाए।

इसलिए इतने आश्वस्त मत रहिये कि आप तो भारत के सच्चे नागरिक हैं, तो आप को क्या चिंता।

देश भर में NRC हिंदू -मुस्लिम का सवाल नहीं है। हर भारतीय इससे जूझता नज़र आएगा।

गुरदीप सिंह सप्पल
(लेखक राज्यसभा टीवी के पूर्व सीईओ और स्वराज एक्सप्रेस चैनल के एडिटर इन चीफ़ हैं। उनकी फ़ेसबुक दीवार से साभार प्रकाशित