अभिषेक श्रीवास्तव

इस देश में कोई नेता मरता है तो हम तुरंत गूगल कर के उसके किए काम और पद देखते हैं. कोई लेखक मरता है तो हम तुरंत उसकी लिखी किताबों के नाम खोजते हैं. कोई अभिनेता गुज़र जाए तो हम उसकी क्लासिक फिल्मों को गिनवाते हैं. कोई वैज्ञानिक नहीं रहता तो हम उसे मिले पुरस्कारों के नाम खोजते हैं. किसी शख्सियत के निधन पर कुछ न कुछ मिल ही जाता है हमें लिखने को. यह दिखाने को, कि हम भी उसके बारे में थोड़ा-बहुत जानते थे.

वशिष्ठ नारायण सिंह की मौत पर महज एक विशेषण और दो किंवदंतियों के अलावा किसी को अब तक कुछ भी नहीं मिला, कि श्रद्धांजलि लिखने में दूसरों से थोड़ा आगे बढ़ सके. उस रचना को सराह सके जिसका पर्याय यह गणितज्ञ रहा. थोड़ा पढ़े, लिखे, समझे और विवेक व करुणा दोनों के साथ लोगों को समझा सके कि जिस शख्स के शव को एंबुलेंस तक मयस्सर नहीं हुई, आखिर वह “महान” क्यों था.

कवि अपनी कविता के बगैर क्या है? रचनाकार अपनी रचना के बगैर क्या है? वैज्ञानिक अपनी खोज के बगैर क्या है? इतिहासकार, इतिहास के बगैर क्या है? मनुष्य अपने काम से महान बनता है. अगर समाज को उसका काम ही समझ में न आवे, समाज में एक भी शख्स उसके काम को जानने-समझने की असफल कोशिश तक न करे और उसके मरने पर एक स्वर में महान-महान चिल्लाने लगे, तो यह श्रद्धांजलि नहीं बेइज्जती कही जाएगी.

वे जिंदा रहे तब भी यही किंवदंतियां उन्हें घेरे हुए थीं. मरने पर भी उतना ही मसाला है लोगों के पास लिखने को. मानवीय स्तर पर उन्हें कुछ लोगों से मिली सेवा, मदद, इलाज को छोड़ दें तो सच यही है कि वशिष्ठ नारायण सिंह बहुत पहले गुज़र चुके थे. बस औपचारिक घोषणा आज हुई है. किसी भी रचनाकार की तब मौत हो जाती है जब उसकी रचना समाज के लिए कारगर नहीं रह जाती. वशिष्ठ नारायण सिंह की रचना को लेकर यह किंवदंती-प्रेमी समाज कब जागरूक था, मुझे गंभीर संदेह है.

क्या आइंस्टीन की थियरी को चुनौती देना या नासा में काम करना “महान” होने की कसौटी है? बार-बार इन अपुष्ट बातों को जिस तरीके से श्रद्धांजलियों में लिखा गया है, वह इस समाज के पेशेवर और गैर-पेशेवर स्मृति-लेखकों की बौद्धिक दरिद्रता व आलस्य को दिखाता है. कुछ लोग अब कह रहे हैं कि समाज ने इस प्रतिभा को नहीं पहचाना. यह बात सरासर गलत है. पलट सवाल है कि क्या ऐसा कहने वालों ने उनके काम को पहचानने की कोशिश की? दरअसल, हमारे समाज को अपनी “प्रतिभाओं” की रचनाओं से कोई सरोकार नहीं है. वरना यह समाज तो प्रतिभाहीनों को भी सिर पर बैठाने का आदी रहा है!

यह सच है कि सिंह ने जो शोध बर्कले में किया था, वह सामान्य आदमी की समझ में आने लायक चीज़ नहीं है. यह बात हालांकि सीवी रमन, रामानुजम, जेसी बसु के साथ भी लागू होगी, पर हमने इन्हें तो पर्याप्त तवज्जो दी? कहीं हमने इन्हें भी तो बिना पढ़े-समझे महान नहीं बना दिया? कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन्हें यह समाज याद रखता है और जिन्हें भूल जाता है, दोनों को महान बनाने के पीछे की मानसिकता एक ही है?

आइये, वशिष्ठ जी को एक बार शांत छोड़कर थोड़ा दूसरी दिशाओं में चलते हैं. कल जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन था. ट्विटर पर अंग्रेज़ी और हिंदी में ‘ठरकी दिवस’ हैशटैग ट्रेंड करता रहा दिन भर. नेहरू को तो हम लोग बचपन से ही पर्याप्त पढ़ते, समझते और जानते हैं. फिर ऐसा क्यों हुआ? क्यों होने दिया गया? महात्मा गांधी को लीजिए. आज उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे की पुण्यतिथि तमाम जगहों पर बड़ी धूमधाम से मनायी जा रही है. गांधीजी को तो हम सब अच्छे से जानते हैं. फिर इस समाज में उनके हत्यारे का महिमामंडन क्यों हो रहा है? उसकी स्वीकार्यता क्यों बढ़ती जा रही है? कल ही स्वामी विवेकानंद की अनावृत्त प्रतिमा के साथ जेएनयू में छेड़छाड़ की घटना सामने आयी. इसकी प्रतिक्रिया में ‘जेएनयू बंद करो’ का नारा कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर उछाल दिया. मामला केवल प्रतिमा के अनादृत होने का है क्या? स्वामी विवेकानंद ने जो कुछ कहा और लिखा, उससे किसी को मतलब है भी या नहीं?

ये तीनों उदाहरण पहली नज़र में राजनीतिक सत्ता और उसके बनाये माहौल से जाकर जुड़ते लगते हैं. थोड़ा भीतर उतरकर देखें तो गांधी और नेहरू के प्रति बढ़ती नफ़रत, गोडसे से बढ़ता प्रेम और मूर्तियों का मोह जो इस बीच उभर कर सामने आ रहा है वह हमारे समाज के अतीत के बारे में आखिर क्या बताता है? अगर किसी राजनीतिक गिरोह का दुष्प्रचार इतना ही ताकतवर होता तो सभी पर समान रूप से असर क्यों नहीं करता? क्यों कुछ मुट्ठी भर लोग- जिन्हें तंज की लोकप्रिय भाषा में आजकल “बुद्धिजीवी” कहा जाता है- अब भी इससे अप्रभावित हैं, जबकि व्यापक समाज अपनी चुनी सरकारों के गढ़े नये नायकों और खलनायकों की ओर झुकता जा रहा है? आप वशिष्ठ नारायण सिंह की मौत पर गिनकर पहचान करें कि किन लोगों ने उनके बारे में सोशल मीडिया या दूसरे मंचों पर सहानुभूति से लिखा है. मोटे तौर पर ये वही लोग हैं जो लगातार गांधी, नेहरू को भी सहानुभूतिपूर्वक डिफेंड करते हैं.

इसका मोटा सा मतलब यह निकलता है कि आज़ादी के बाद हमने जो समाज बनाया, उसने “महान” लोगों के कहे-लिखे का ज्यादा लोड नहीं लिया. उन्हें सुना नहीं, पढ़ा नहीं. पीढ़ी दर पीढ़ी बताया जाता रहा कि फलाने “महान” हैं और अगली पीढ़ी मानती रही. जिन्हें खलनायक बताया गया, वे इस समाज के खलनायक बने रहे. यह श्रुति परंपरा का समाज था जो पढ़ता-लिखता नहीं है. जहां सबसे लोकप्रिय साहित्य रामचरितमानस है, जिसे रटकर बिना समझे गाया जा सकता है. ऐसा समाज मूर्तियां गढ़ता है. जीते जी और मरने के बाद बस माला पहनाता है. महान बनाता है. फ़र्क इतना है कि कोई जीते जी महानता को प्राप्त हो जाता है, कोई मरने के बाद. निज़ाम बदलता है, पीढ़ी बदलती है तो इस कहा-सुनी में समाज के नायक भी बदल जाते हैं, जैसा हमारे यहां आज हो रहा है. एक चीज़ बस नहीं बदलती है- अपढ़ रहने की सामूहिक क्षमता.

ऐसे एक समाज में वशिष्ठ नारायण सिंह का भुला दिया जाना अपने आप में कुछ खास अफ़सोस की बात नहीं होना चाहिए. जिन्हें निजी स्तर पर उनकी सुध लेना थी, उन्होंने ली ही. हां, मरने के बाद उन्हें महान बताया जाना और महानता के पीछे की वजह को नासा और आइंस्टीन से जुड़ती (संदिग्ध) किंवदंतियों में छुपा लिया जाना हमारे समाज के एक अतिरिक्त लक्षण को बताता है- कि यह समाज आलसी भी है. जिस समाज में मनुष्य अपढ़ हो और आलसी भी, वहां विवेक नहीं फलता. ज्ञान-विज्ञान उसे दूर से देखकर भागते हैं. इसीलिए देश का मुखिया साइंस कांग्रेस में इंसान को हाथी की सूंड़ लगा देने को पहली सर्जरी बताता है और जनता अश-अश कर उठती है. वह बादलों में राडार को छुपा लेता है, लोग अभिनंदन करते हैं. मूर्खता के इस गणराज्य में वशिष्ठ बाबू को पागल होना ही बदा था.

इस संकट को आप दो परिघटनाओं में देख सकते हैं, वेरिफाइ कर सकते हैं- विज्ञान के विद्यार्थियों में अवैज्ञानिक विचारों का आकर्षण और गणित शिक्षण के कारण विद्यार्थियों के बीच खुदकुशी की दर. एक परिघटना कुपढ़ता की निशानी है और दूसरी आलस्य की. विज्ञान और मानविकी के छात्रों के अलहदा वैचारिक रुझानों पर काफी शाेध हो चुका है. मेरा एक सहपाठी नासा में बरसों से काम कर रहा है, लेकिन वह महान नहीं है. वह स्थानीय विश्व हिंदू परिषद का संगठकर्ता है. अपवाद हो सकते हैं. हर जगह होते हैं. गणित की स्थिति ज्यादा त्रासद है. वशिष्ठ बाबू स्वस्थ और जीवित होते तो गणित की दरिद्रता से जूझ रहे इस मुल्क का दुख ही मनाते, कुछ कर नहीं पाते. शायद, फिर पागल हो जाते.

एक बार गूगल पर लिखिए “गणित खुदकुशी”. उसके बाद एक के बाद एक ख़बर देखते जाइए. तेलंगाना में इस साल जब दसवीं और बारहवीं की परीक्षा के नतीजे आए तो 18 छात्रों ने गणित में फेल होने के चलते अपनी जान दे दी. प्रतियोगी परीक्षाओं के कोचिंग केंद्रों की राजधानी कोटा में खुदकुशी की लहलहाती कहानियों से हम सब वाकिफ़ हैं. हर गर्मी में वहां लाशों की नयी फसल कमरों के पंखे से उगती है.

छात्र ही क्यों, दुनिया भर में अब तक कुल 22 गणितज्ञों ने खुदकुशी की है. कम लोग जानते हैं कि हमारे महान गणितज्ञ रामानुजम ने भी 37 साल की अवस्था में आत्महत्या की थी. एक गणितज्ञ की आत्महत्या हालांकि एक गणित-भीरू समाज की आत्महत्याओं से गुणात्मक रूप से उलट होती है. गणितज्ञ प्रचुर संख्या में पागल भी हो जाते हैं. रूस के ग्रेगरी पेरेलमैन इसका ताज़ा उदाहरण हैं. वशिष्ठ बाबू भी पागल हो गए थे.

पागल हो जाना तीक्ष्ण प्रतिभा का द्योतक नहीं है, जैसा कि यह समाज समझता है. आदमी पागल इसलिए हो जाता है क्योंकि उसे समझने वाला समाज में उसे कोई नहीं दिखता. विज्ञान पढ़कर अवैज्ञानिकता की सेवा करने वाला और गणित पढ़ने के नाम पर पेट में दर्द के बहाने बनाने वाला समाज अपढ़, कुपढ़ और आलसी और ज्ञानभीरू समाज है. इस समाज में अपने बच्चे का वशिष्ठ नारायण सिंह होना किसी को स्वीकार्य नहीं है. यह सामान्य से एक विचलन है.

इसीलिए उन्हें जीते जी इस समाज की स्वीकार्यता नहीं मिली- वेक्टर स्पेस, हिलबर्ट स्पेस या केर्नल जैसी गणितीय अवधारणाओं को पढ़कर समझना तो इस समाज के लिए माउंट एवरेस्ट चढ़ने से भी घातक काम है, इसलिए वशिष्ठ बाबू की बहुउद्धृत थीसिस को तो भूल ही जाएं. उसके शीर्षक का एक-एक शब्द इस देश के नागरिकों के लिए हिब्रू से कम नहीं है.

वशिष्ठ नारायण सिंह का जाना तो फिर भी एक खास हलके में नोटिस लिया गया. एंबुलेंस के लिए निशाने पर आये प्रशासन और सरकार ने नीतिश कुमार के लिए मैयत में लाल कालीन बिछाकर बेशर्म खानापूर्ति भी कर दी. हो सकता है कल को उनके नाम पर कोई कॉलेज आदि बना दिया जाए. मूर्ति भी लगवा दी जाए. वशिष्ठ बाबू अमर हो जाएंगे. कुछ साल बाद वे लोग भी काल कवलित हो जाएंगे जिन्होंने उन्हें साबुत देखा था. उनकी रचना मने थीसिस शायद इस देश के खत्म होने तक इस समाज को समझ न आवे. महान बनाने के कारखाने में क्या फ़र्क पड़ता है किसी को? जब महान ही बनाना राष्ट्रीय धर्म है तो कल को गोडसे भी महान हो जाएगा!

वैसे, क्या आपने देश के उन 11 न्यूक्लियर वैज्ञानिकों का नाम सुना है जो रहस्यमय परिस्थितियों में 2009 से 2013 के बीच अपनी लैब में मारे गये? परमाणु ऊर्जा विभाग से एक आरटीआइ के जवाब में यह आंकड़ा किसी को मिला था. अब सोचिये, कौन ज्यादा सौभाग्यशाली निकला?

क्या आप अलेक्जेंडर ग्रोथेनडीक को जानते हैं? जिस दौरान वशिष्ठ बाबू बर्कले में जॉन केली के निर्देशन में पीएचडी कर रहे थे, उसी दौरान 1966 में अलेक्जेंडर ग्रोथेनडीक नाम के एक गणितज्ञ को गणित का सबसे बड़ा पुरस्कार फील्ड्स मेडल दिया गया था, लेकिन रूसी सरकार की तानाशाही कार्रवाइयों का विरोध करते हुए उन्होंने मेडल लेने के लिए मॉस्को जाने से इनकार कर दिया. अगले साल जब अमेरिका ने वियतनाम पर हमला किया, तो अमेरिका के इस कृत्य के विरोध में अलेक्जेंडर जबरन हनोई में एक लेक्चर देने बमबारी के बीच चले गए थे. रिटायर होने के बाद यह आदमी भी 1988 में अपने गांव चला गया था. 2014 में अपनी मौत तक यह गणितज्ञ अपने गांव के घर में अकेले पड़ा रहा. लाश उठाने वाला भी कोई नहीं मिला इसे. एंबुलेंस यहां भी नहीं आयी थी.

ग्रेगरी पेरेलमैन, जिनका नाम मैंने पहले लिया, उन्होंने 2006 का फील्ड्स मेडल ठुकरा दिया था. गणित के छह अनसुलझे ऐतिहासिक सवालों में से एक पोआंकरे कंजेक्चर को सुलझाने वाला यह शख्स बरसों से अपने कमरे में बंद पड़ा है. किसी पत्रकार ने कुछ साल पहले उन्हें अपनी मां के साथ टहलते हुए देख लिया था. वह आखिरी बार था. इसके बाद वे नहीं दिखे.

गणित पढ़ने और इसमें रमने वालों की त्रासदी दुनिया की शायद सबसे प्राचीन और सर्वाधिक मानवीय त्रासदियों में एक है. इसकी वजह बस इतनी सी है कि हमारा समाज गणित का मतलब लाभ, हानि और ब्याज मापने तक ही समझना चाहता है. भारत जैसे देश में, जिसके मुखिया के खून में व्यापार दौड़ता है, वशिष्ठ नारायण सिंह का सौभाग्य कहें कि उन्हें याद करने वाले मुट्ठी भर लोग अब भी बचे हुए थे, जिनकी आंख में पानी शेष है. विडम्बना कहेंगे कि यही उनका दुर्भाग्य भी है. उन्हें याद तो किया गया, लेकिन उनकी रचना को याद किए बगैर. केवल किंवदंतियों में. एक घिस चुके विशेषण के साथ.

जीते जी किंवदंती बन चुके इस गणितज्ञ की मौत अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि भारतीय समाज अज्ञानता, तर्कहीनता, मूर्खता, अहंकार, आलस्य और महत्वाकांक्षा के जिस अंधेरे गड्ढे में स्वेच्छा से जा रहा है, उसके ठोस कारण क्या हैं.

मीडिया विजिल से साभार