by — सिकंदर हयात

विवाह समाज विचार से जुड़े तीन लेख लिखे लिखे हे पाठको . इन्ही तीनो लेखो में मोदी की भी ज़बर्दस्त कामयाबी का भी राज़ मिलता हे . ये समाज विचारो से नफरत करता हे , खासकर हिंदी विचारो या हिंदी में विचारो से खास कर हिंदी से बहुत नफरत करता हे . हिंदी से ये समाज और समाज की स्मार्ट लड़कियाँ इतनी नफरत करती हे इतनी नफरत करती हे की वो अनपढ़ को भी कह सकती हे ” वॉव पढ़ना लिखना नहीं जानते बिलकुल अनपढ़ सो क्यूट ” मगर हिंदी से गहरी चिढ हे खुद हिंदी के बड़े बड़े प्रोफाइल्स को हिंदी हिंदी विचारो से गहरी चिढ हे . हिंदी में हिंदी विचारो में पैसा बिलकुल नहीं हे यानी जो अनपढ़ हे वो कोई भी काम करके बीस हज़ार कमा सकता हे मगर हिंदी में पैसा बिलकुल नहीं हे . खुद हिंदी के बड़े बड़े नाम भी अवचेतन में हिंदी और हिंदी विचारो से सख्त नफरत करते हे ( विचार से नफरत विवाह के लिए पागल ) दिल्ली में एक वाम हिंदी लघु पत्रिका के संपादक — कुमार जी जो वैसे बहुत अच्छे लेखक और आदमी भी होंगे मुझे नहीं पता लेकिन शायद होंगे ही ——- इंडस्ट्रियल एरिया में उनके ऑफिस में में जब पत्रिका लेने के लिए गया था तो हिंदी और हिंदी विचार वाले हम जैसे टुच्चो के प्रति गहरी नफरत और तिरस्कार मेने महसूस किया था जबकि में कोई अपने किसी लेख की पेमेंट लेने नहीं बल्कि उनकी लघु हिंदी पत्रिका के बण्डल ही खरीदने आया था तब भी ————- ? .

यानि मज़दूरों से उन्हें प्यार था और हिंदी हिंदी विचार वालो से गहरी नफरत थी वजह वही जिस पर लम्बा लेख लिखा हे तो आप कहेंगे की अक्सर बात होती हे की हिंदी विचार लेखन में इतना दलिद्र क्यों हे कोई सुधार क्यों नहीं होता हे पैसा क्यों नहीं हे लोगो का ये रहता हे की मर जाएंगे मगर हिंदी लेखक को पैसा नहीं देंगे जान मांगो जान दे देंगे मगर जेब में हाथ नहीं डालते हे हिंदी में लोग . जबकि इतनी बड़ी भाषा हे आर्थिकी के बिना कोई वैचारिकी जड़े नहीं जमा सकती हे . इसी विचारशून्यता की पूरी फसल मोदी और राइट विंग ने काट कर घर भर लिया हे हे ———– ?

फिर सोचता हु की क्या एक वजह ये भी हो सकती हे की ”बन्दर कितना भी बूढ़ा हो जाए गुलाटी मारना नहीं भूलता हे ” इसी तरह इंसान महिलाओ को इम्प्रेस करने का मौका नहीं छोड़ता हे भले ही इम्प्रेस करके घंटा कुछ होना हुआना हो तब भी नहीं छोड़ता हे इसमें कोई ऐसा कोई हर्ज़ भी नहीं हे मेने खुद लिखा था की हेल्थ के लिए सबसे अच्छी होती हे हेल्थी फ़्लर्टिंग हेल्थी फ्लर्टिंग मतलब ऐसी फलर्टिंग जिसमे किसी को दुखी ना किया जाए किसी के गले ना पड़ा जाए किसी को परेशान ना किया जाए और एक्सरसाइज़ ये दो चीज़े हेल्थ के लिए बहुत अच्छी होती हे मगर हिंदी और हिंदी लेखन विचारो का बेड़ागर्क हे इसकी सबसे बड़ी वजह मेने ये महसूस की हे की खुद हिंदी के बड़े बड़े प्रोफाइल्स में भी हिंदी से नफरत तिरस्कार की भावना दबी हुई हे क्या वजह हो सकती हे ————- ? क्या ये वजह हे की हर ऑफिस में स्मार्ट लड़कियाँ तो होती ही हे और ये स्मार्ट लड़कियाँ हिंदी से गहरी नफरत करती हे इन्हे पता हे की हिंदी वाला जो होगा दलिद्र ही होगा और ये स्मार्ट लड़कियाँ -हर स्मार्ट लड़की के दस दस दावेदार होना आम बात हे . इसलिए इनका भारी वट और टशन होता हे. उधर इन स्मार्ट लड़कियों की आँखों में करण जोहर आदित्य चोपड़ा सूरज बड़जात्या और बहुत से सीरियल द्वारा झोका गया सपना होता हे की कोई न कोई राजकुमार जरूर मिलेगा हर दूसरे सीरियल में भी यही दिखाया जाता रहा हे की स्मार्ट लड़की जिस ऑफिस में कदम रखती हे फ़ौरन उस कंपनी के मालिक या बेटे से रिश्ता आ जाता था तो खेर इनमे हिंदी के प्रति सख्त हिकारत होती ही हे उधर बड़े बड़े लोग गुलाटी मारना नहीं भूलते हे तो वो भी इनके सामने यही दिखाते हे की आपको क्या हमे भी हिंदी से नफरत हे हिंदी के बड़े बड़े प्रोफाइल्स में भी हिंदी के प्रति नफरत तिरस्कार और इग्नोर करने की मानसिकता छुपी हुई हे कही ना कही इसलिए तो हिंदी हिंदी हिंदी विचार लेखन इस कदर अनाथ और भूखा नंगा तिरस्कृत नहीं हे ————— ?.

इन स्मार्ट लड़कियों महिलाओ का हिंदी विरोधी दबाव इतना ज़बर्दस्त हे की आप सोच भी नहीं सकते हे ( सोचते ही नहीं हे क्योकि चिंतन और विचार हे ही नहीं यहाँ ) मतलब अंदाज़ा लगाइये की कपिल शर्मा जैसे लीजेंड जिसने अपनी प्रवाहमय हिंदी और हिंदी देसी ह्यूमर की वजह से अरबो कमा लिए सारी दुनिया में उसका झंडा गड़ा हुआ हे वो तक पिछले दिनों थोड़ा उदास होकर अपनी कमजोर अंग्रेजी पर सफाइयां सी दे रहा था नहीं कॉमेडी में नहीं सीरियस होकर यही दूसरा सेम लीजेंड राजू श्रीवास्तव भी कर चुके हे इस कदर दबाव रहता हे यही तीसरा लीजेंड नवाज़ुद्दीन भी कर चुके हे अरे भाई इतना कामयाब हो तुम्हे सफाइयां देने की जरुरत क्या हे सच तो ये हे की तीनो को अंग्रेजी नहीं आती इसलिए तीनो इस कदर डीप के शुद्ध देसी हे लहज़ा हे भाषा हे अनुभव संसार हे परवाह हे टोन हे उसी से तुमने करोड़ो अरबो कमा लिए हे फिर भी सफाइयां देते पाए जाते हे ये सफाइयां असल में स्मार्ट महिलाओ के दबाव में दी जाती हे अंदाज़ा लगाइये इस दबाव के इसी से फिर विचारो की हत्या का रास्ता साफ़ होता हे

अब इससे मोदी और राइट विंग को का क्या फायदा हुआ हे ———– ? समझिये की मोदी ने सबसे अधिक फायदा उठाया हिंदी उर्दू हिंदुस्तानी आम बोलचाल की भाषा का , दस साल के मनमोहन ( कुछ सोनिया राहुल भी ) भी जहा अपनी बड़ी से बड़ी उपलब्धि को भी आखिरी आदमी के कानो तक ले जाने असमर्थ थे वही मोदी ने भर भर कर हिंदुस्तानी आम बोल भाषा का फायदा उठाया उनकी हर बकवास हर छोटी मोटी उपलब्धि हर बकार बकार बकार वो वो सब वो भारत छोड़ो पाकिस्तान काबुल ढाका तक के आम आदमी के कानो तक ले जा रहे हे मोदी का तो ये हे , दूसरी तरफ मोदी के सामने कोई एक ऐसा ढंग का नेता तक नहीं हे एक भी नेता ऐसा नहीं हे जो धुआधार रोचक सरल हिंदी में मोदी के हर भाषण हर प्रोपेगण्डे हर झूठ हर प्रचार का ताबड़तोड़ हिंदी में मुहतोड़ जवाब दे सके एक नेता ऐसा नहीं हे थोड़ा बहुत लालू थे उनको जेल से निकलने नहीं दिया केजरीवाल हे मगर वो दिल्ली के पिंजरे में हे कन्हैया को जलन में संसद तक पहुंचने नहीं दिया गया , और भला कौन हे कोई नहीं हे क्योकि ये समाज हिंदी से नफरत करता हे इसलिए न कोई नेता ऐसा हे ना उसका साथ देने को कोई हिंदी लेखक ऐसा हे जो रोचक सरल प्रवाहमय मंत्र मुग्द करने वाली हिंदी में जोरदार भाषण प्रचार तैयार करवा सके कोई हे ही नहीं आप कहेंगे अंग्रेजी में तो बहुत पैसा हे किसी अंगेरजी वाले को पैसा देकर लिखवाओ और अनुवाद करवा लो यही लोग समझते नहीं हे की भाषा क्या चीज़ होती हे उसकी क्या गहराई क्या परवाह होता हे हर चीज़ का अनुवाद सम्भव ही नहीं हे ना कोई प्रेमचंद जैसी महान प्रतिभ हे जो नेहरू की किताब का ऐसा अनुवाद करके दे की विश्वास ही नहीं होता की ये इंग्लिश में लिखी गयी हे ज़ाहिर हे की प्रेमचंद जैसा महान और प्रतिभावान कौन हे भला —– ? तो ये हालात हे ऐसा हे इसलिए कहता हु की इन्ही तीनो लेखो में समाज की तबाही और मोदी जी की कामयाबी का भी राज़ छुपा हुआ हे .

पैसा नहीं हे कोई बात नहीं यहाँ तक भी लोग बर्दाश्त कर लेते हे इसलिए हिंदी में अधिकतर बड़े बड़े नाम सरकारी सुरक्षित नौकरियों के बेकग्राउंड से होते हे सरकारी नौकरी खुद की या किसी की भी- जो उनका अपना हो जैसे y साहब थे या फिर पहले से ही पैसे वाले होते हे या फिर कुछ नामो ने बड़ी छोटी स्क्रीन के लिए लिख कर पैसा कमाया लेकिन सिर्फ यही वजह नहीं हे हिंदी से नफरत की ( खुद हिंदी हिंदुस्तानी के अपनों में भी ) अब क्योकि पैसा नहीं कामयाबी नहीं हे कोई सपनो का संसार नहीं हे कोई उमीदवर नहीं हे इसलिए स्मार्ट खूबसूरत लड़किया जो ddlj के शाहरुख़ या हम आपके हे कौन के सलमान या बहुत सारे घटिया सीरियलों की तरह के जोकर का बेसब्री से इंतजार कर रही होती हे इसलिए उन्हें हिंदी हिंदी वालो से सख्त नफरत होती हे क्योकि पैसा तो हे ही नहीं , ऊपर से खतरा अलग तो इसलिए उन्हें एकबार को अनपढ़ भी बर्दाश्त हे उर्दू शायर हिंदी कवि भी कसम खाने को बर्दाश्त हो सकता हे क्योकि हो भी सकता हे की दुबई के किस मुशायरे या लंदन के किस कवि सम्मलेन से डॉलर पाउंड आ जाए पर हिंदी विचार से सख़्ततरीन नफरत हे अब क्योकि स्मार्ट लड़कियों को नफरत हे और ये समाज स्मार्ट लड़कियों का दीवाना हे एक एक स्मार्ट लड़की के कम से कम पांच दस दावेदार घूम रहे हे इसलिए हिंदी से और भी ज़्यादा नफरत तिरस्कार और चिढ बढ़ती जा रही हे . इन्ही सब बातो और विचारो की हत्या, कफ़न दफ़न , का फायदा घुमाफिराकर आख़िरकार संघ भाजपा मोदी के खाते में जमा हो गया हे आख़िरकार कोई मजाक नहीं हे बिना किसी उपलब्धि के इतनी बड़ी बड़ी राजनितिक उपलब्धि हासिल करना ————– ? .

इसी बात से जुडी एक बात ये भी की क्योकि हिंदी हिंदी विचार लेखन आदि में पैसा ग्लेमर कुछ भी नहीं हे । ऐसे में एक किरण दिखती हे वो हे परदे से फूटती आशा की किरणे बड़े या छोटे परदे में हिंदी लिख कर जरूर आप बहुत कुछ हासिल कर सकते हे , इसलिए जब अविनाश दास और गौरव सौलंकी जैसे हिंदी वालो ने या पहले कमलेश्वर ने परदे की दुनिया में अपनी जगह बनाई तो उनके लिए एक दीवानगी का सा आलम था हिंदी वालों ने फिर जाने कितने लोग ———- जी की तरह देखो मेरा सीना चीरकर देखो उसमे अविनाश दास या गौरव सौलंकी
ही मिलेंगे टाइप माहौल था , काम भी दोनों ने अच्छा किया और हिंदी हालात भी एक फेक्टर काम करता दिखा था साफ़ साफ़ .

सिकंदर हयात 9971712174