by – सिकंदर हयात

यु ही थोड़ी ही ना इतनी ज़हरीली सरकार बनी हुई हे हालात ही ऐसे हे और भले लोगो की तरफ से हे तो बुरे लोगो क्यों ना हावी होंगे – मतलब ” भारत रत्न ” ( एक बहुत भले आदमी ) तक के लिए बड़ा संस्थान नौकरी रिपोर्टिंग अवार्ड ही सब कुछ हे यही सब कुछ हे विचार वैचारिकी इनके लिए इनके माध्यम से ही दो पैसे अपने ( और दूसरे भी ) लिए कमाने की कोशिश – सब ठलवागर्दी हे ——– ? नौकरी रिपोर्टिंग की मेहनत इन्हे नज़र आती हे , और वैचारिकी लाखो लाइने लिखी गयी ” पब्लिश ” की गयी ये सब ठलवागर्दी हे टाइमपास हे हे ना । इस सबके पीछे हमारी कितनी मेहनत कितना संघर्ष कितनी ज़हमत कितनी कुर्बानिया कितने खतरे छुपे हे ये ” भारतरत्न ” तक को भी देखने समझने की फुर्सत नहीं हे में दावे के साथ कहता हु की ” वो ” बहुत काबिल हे बहुत हे मगर जीवन में भी कोई ऐसा काम उनसे नहीं होने वाला हे जो कोई गलत लोग इन्हे धमकियां दे इनके दुश्मन हो जाए ऐसा कभी नहीं होगा और हम ————— ? पांच साल पहले ही उर्दू के सबसे अनमोल रत्न ने अपने अख़बार में हमारे खिलाफ ”लुकआउट नोटिस ” जारी करवा दिया था खुला झूठ पब्लिश करवा दिया था ताकि कोई आकर हमारा —- कर दे । अभी भी ”भारत रत्न ” के नीचे हमे धमकिया मिलती हे और ”भारत रत्न ” को पता भी नहीं होगा वो अवार्ड पर खुश हे सर पर हाथ रखना चाहते हे जबकि पहले से ही हे ( कोई शिकायत नहीं ) आप कहेंगे की धमकिया तो सब को मिलती हे कोई खास बात नहीं सही हे मगर हर विचार हर तरह के लोगो के पीछे एक सपोर्ट सिस्टम मौजूद हे इतना आसान नहीं हे किसी को भी टच करना लेकिन हम लोग तो बिलकुल अनाथ लोग हे तो भारत रत्न तक को भी ऐसे लोगो की ही परवाह हे जो लोग पहले से ही मज़बूत हे खुशहाल हे उन्ही को ही और और मज़बूती और हौसला देने में लगे हे और ये बेस्ट आदमी हे बेस्ट , कोई जवाब नहीं इंसानियत में इनका । इनका ये रवैया हे हमारे लिए तो बस ————- ? इससे पहले भी एक अवार्ड पर समझ नहीं आया था की —– हैं जरूर हैं मगर अवार्ड किस बात का ——–? आपका भी काम अच्छा हे मगर अवार्ड ——————-? खेर इसमें कोई शक नहीं की पिछले जन्म अगर होता होगा तो उसमे मे जरूर कोई बहुत बड़ा पापी रहा होऊंगा जो इस जन्म में ये सज़ा मिलती हे की एकतरफ हमारी अपनी ” वैचारिक जात ” तक के कई बंधु आठ और पांच साल से घोर तप कर रहे हे की हमे पाठक ना मिलने पाए जबकि फिल्ड ऐसी हे की कामयाबी मिली तो कामयाबी में भी जूते की माला ही मिलनी हे और कुछ नहीं तब भी ये हाल हे तो हमारे तो अपनों का ये हे । और इनके अपने तो खेर महान और भारत रत्न हे ही हम लाखो लाइने लिखने वाले भले ही इनकी नज़र में ना आये और अगर आये भी होंगे तो इस सबके पीछे इन्हे हमारी कोई वैचारिकी नहीं ठलवागर्दी लगती हो सकती हे क्योकि ये समाज -बड़ा संस्थान नौकरी प्रोफ़ाइल को ही अहमियत देता हे ।

इनका किया हर काम ये ऐसी ऐसी उचित जगह पर पंहुचा देते हैं की अवार्ड देने वाले खुद ही लू हो बरसात हो खुद ही इन्हे ढूंढते हुए आते हैं , यही पर बस नहीं हैं इनके तो विरोधी भी ऐसे ——–सशक्तिकरण पर कमर कसे हुए हे की इनके विरोधी भी चाहते हे की लोग इन्हे पढ़े जरूर पढ़े काम भी अच्छा हैं ही साथ ही लोग भी सब ” बेमिसाल भले ” हैं, और उधर हमारे अपनों की वफ़ा तो बयान की ही हे विरोधी तो ऐसे हे तो ऐसे हे की उनके डर से , खुद ही अपनी trp का गला घोटना पड़ता रहा हैं क्या कर सकते हैं खेर बधाई। इतने साल हो गए हमे भारत रत्न के नीचे लिखते हुए लाखो लाइन लिख मारी होगी या प्रचार की होगी प्रचार जो आज सबसे जरुरी हे हराम हे जो कभी पूछा हो की भाई किस हाल में हो इतना कैसे लिखते हो तुम्हारी दाल रोटी कैसे चलती हे जब सारा दिन तो लिखते रहते हो तो जिन्दा कैसे हो ——— ? हो सकता हे की सोचते होंगे की भाई बंदा पैसे वाला होगा तो भाई पैसे वाले होते तो कौन सा पैसे वाला ऐसा देख लिया हे जो वैचारिक भी हो थोड़ा बहुत , और जिसके पास जमीन से जुड़े इतने अनुभव किस्से भी हो बयान करने के लिए———— ? कौन सा पैसे वाला ऐसा होता हे भाई———- ? बस एक सूफी हे जो ज़्यादा बहुत लिखने वाला भी हे वैचारिक भी हे और पैसे वाला भी नतीजा देख लो जो कभी भी जीवन के किसी अनुभव किसी शोषण किसी संघर्ष का जिक्र करता हो , क्योकि पैसे वाला होने के कारण इनसे वास्ता ही नहीं पड़ा होगा हां वैचारिकी में कोई जवाब नहीं हे और हमारा हाल ये हे की आम आदमी से जुड़े किसी संघर्ष का सिर्फ नाम लो तो मे अपने जीवन के उस संघर्ष से जुड़ा किस्सा बयान कर दूंगा , और बाकी कौन पैसे वाला इन सब लेखन विचार पठन पाठन चेंज की लड़ाई में उलझता हे भाई —- ? उन्होंने जीवन में कोई वयवस्था का शोषण या अत्याचार देखा और झेला ही नहीं होता हे सो वो इस सब चककरो में पड़ते ही नहीं हे ना उनमे इतना दम खम होता हे की लहरों के विपरीत तैर सके। कोई हलवा नहीं होते हे विचार और संघर्ष , इस समाज का रवैया बहुत ही खराब हे विचारो के प्रति , ये बुरे नहीं इस समाज के बेस्ट भले लोगो के रवैये से पता चलता हे——- लाखो लाख की दो दो नौकरियों के बाद भी ”भारत रत्न ” कहते हे की चिरकुट लोग उनके लेख छाप लेते हे पैसे नहीं देते हे ( पैसे नहीं थे तो हमने कभी नहीं छापे ) यानी उनकी लाखो की नौकरियों के बाद भी उनकी ज़बर्दस्त वैचारिकी का एक बजट होता हे एक लागत होती हे उनकी ज़बर्दस्त वैचारिकी की- जिसके लिए वो कह चुके हे की जो लेख ले पैसा दे सही भी हे मगर भारत रत्न साहब जब आपका ये हाल हे तो आपके ठीक नीचे पड़े छुटभय्ये लेखकों विचारको उनकी साइट्स का भी तो सोचो हम लोग कैसे जिन्दा हे कैसे लिखते हे कभी सोचा आपने ——— ? सही हे की आप कहा हम कहा हम आपके पैरों की धूल नहीं लेकिन ये तो आप भी मानोगे की धूल का भी अपना महत्व होता हे कल को हो सकता हे बहुत सारी धूल भी एक जगह सेट होकर मिटटी बन जाती हे और जाने कैसी कैसी विपरीत परिस्थितियों में भी एक पेड़ उग आता हे ऐसा भी तो होता हे तो सर दुसरो का भी तो सोचो या आप अकेले ही अमिताभ बच्चन की तरह घूसे मुक्के लात चलाते हुए समाज से सारी बुराईयो को नॉकऑउट कर देंगे जैसे अमिताभ करता था बीच बीच में आपके साथ कोई ऋषि कपूर या कोई —– भी उछल उछल कर एक दो मुक्के मार —- जिस पर दर्शक खूब खुश होते थे अगर ऐसा हे तो हमे तो उस पर भी कोई ऐतराज़ नहीं हे हम तो फिल्म के लास्ट सीन तरह आपके पीछे जिंदाबाद के नारे लगाते हुए भीड़ में दिखाई दे जाएंगे मगर आप तो जानते हे की रियल लाइफ में ये सम्भव नहीं हे ना— ? लाखो लेखक विचारक चाहिए होंगे जो इस भयंकर संघी भाजपाई फेक न्यूज़ इंडस्ट्री wtsup यूनिवर्सिटी से टक्कर ले सके और वो भी हिंदी में , काम हिंदी हिंदुस्तानी में ही होना हे जिसमे जरा भी पैसा नहीं हे हिंदी उर्दू हिंदुस्तानी आम बोलचाल की भाषा -जिसका पूरा फायदा बुरी ताकतों ने उठाया उनका हर झूठ हर प्रोपेगेंडा हर प्रचार आखिरी आदमी के कानो तक पहुंच रहा हे और आख़िरकार तो उस आखिरी आदमी के पास भी मुकेश अम्बानी के बराबर एक वोट हे तो सर इनकी काट के लिए चार पैसे कैसे आएंगे ———- ? हमने एक टिटहरी प्रयास किया जो बस अभी मरते मरते बचा हे आपने कभी हमारी खैरियत नहीं ली कभी नहीं पूछा और अवार्ड पर आप इतने खुश हे बड़े संसथान सुरक्षा नौकरी रिपोर्टिंग अवार्ड ही सब कुछ हे क्या ———– ?

भारत में समस्याओं से जीना मुहाल हे वहशी लोग आख़िरकार पूरी तरह सत्ता में आ चुके हे जो जान भी लेंगे और माल भी , आबादी डेढ़सौ करोड़ होने वाली हे करवट लेने को जगह नहीं फुटपाथ भी हाउसफुल हो रहे हे रोज़गार खत्म हे संपति एक फीसदी हाथो में सिमट चुकी हे जनता बगावत ना कर दे इसलिए जानबूझ कर ऐसे लोगों को सत्ता में लाया गया जो जनता को बुरी तरह बाँट दे और हर समय तनाव में रखे या किसी सपने की मिर्चे आँखों में झोंके रखे जिससे जनता का ध्यान असमानता की तरफ जाए ही नहीं , वैसा हो भी रहा हे और लोग भले लोग तक बजाए किसी परिवर्तन की लड़ाई के उन्हें भी यही पड़ी हे की शादी शादी शादी इसका पता भी चलता हे भले लोग तक हमारे साथ जो पांच साल तक बुरा वयवहार करते रहे हे उससे —– ? अजीब लगा होगा सुनने में लगा होगा की सिकंदर ने कही भांग तो नहीं खा ली हे नहीं में कोई नशा नहीं करता हु जीवन खुद सबसे बड़ा नशा हे । खैर इससे विवाह के प्रति भारत के लोगो ( भले और समझदार लोगो का भी जब उनका ये हाल हे तो बाकी जनता का समझ ले ) के पागलपन का पता चलता हे इसी पागलपन के कारण भारत में सबसे अधिक आबादी शोषण और असमानता हे सब लोग जुदाई के जॉनी लीवर की तरह पहले पहले अब्बा को पटाना होगा फिर डब्बा सम्भलना होगा फिर झप्पा ——– ? लड़कियों को भी अगर ” जा जी ले अपनी जिंदगी ” कह भी दिया जाए या वो खुद ये हक ले भी ले तो वो भी अपना पहला फ़र्ज़ और हक़ ddlj का शाहरुख या हम आपके हे कौन का सलमान ढूंढने की जद्दोजहद में करती हे या चाहती हे आमतौर पर ————- ? इसी माहौल में एक बात की एक होता हे चेतन मन और एक होता हे अवचेतन मन मन का दबा हुआ हिस्सा जहा कुछ इच्छाये दबी हुई होती हे जिनके बारे में बात करो तो हो सकता हे इंसान कहे की नहीं ऐसा तो कुछ नहीं हे पर होता हे वो होता हे अवचेतन मन- जैसे कोई महिला मायके जाने की साफ़ इच्छा रखती हे उसे जाना हे ये चेतन इच्छा और वो डीप में ये भी चाहती हे की पति उसे रोके कहे की तुम्हारे बिना मेरा काम नहीं चलेगा में बहुत उदास हो जाऊँगा ये हो गयी अवचेतन इच्छा तो क्या ये अवचेतन इच्छा हे की हमारी ही सेकुलर जात के कई लोगो ( भले बहुत भले ) ने हराम हे जो पांच साल में हमे कोई घास डाली हे घर में अकाल मौत इकलौते बेटे को ब्लड कैंसर जैसी भयंकर समस्याएं झेल कर भी में और अफ़ज़ल भाई अपना पैसा समय लाइफ देते रहे और में हैरान हु ( नहीं भी हु क्योकि अवचेतन मन समझता हु ) की हमारे ”अपनों ” को ही कोई फर्क नहीं पड़ा हमे कभी घास नहीं डाली गयी सड़ी सड़ी पोस्ट भी शेयर करने वाले अच्छी भली साइट्स से दूर ही रहे क्या कारण हो सकता हे———- ? ये वही कारण हे विवाह के प्रति हमारे समाज का पागलपन समाज विवाह के प्रति पागल हे और विवाह के बाजार में सबसे अधिक मांग होती हे एक सुरक्षित बढ़िया नौकरियों पद वालो की ( पढ़े खबर की खबर विवाह लेख कमेंट में संजय कुंदन ) तो ये समाज सबसे अधिक घास उन्हें डालता हे सबसे अधिक जयजयकार उनकी करता हे उन्हें ( लड़का हो या लड़की ) जिनके पास एक अच्छी सुरक्षित नौकरी हो मेने नीचे बताया की कैसे भारत रत्न एक ac को बेहद पसंद करते हे जिसके पास अच्छी बड़ी सुरक्षित नौकरी हे जरुरी नहीं की वो उसे ही अपने किसी भाई भतीजे के लिए चाहते हो नहीं जरुरी नहीं हे मगर ये उनकी अवचेतन इच्छा हो सकती हे जो उभर कर दिखती हो इसलिए हमारे लिए जीरो घास हे उनके लिए सौ %. इसी तरह ठीक से याद नहीं क्या हुआ था मगर शायद सूफी संत लाखो लाइन लिखने के बाद भी विचारो की दुनिया में हमारा नाम नहीं ले रहा था बल्कि दो चार महिलाओ का नाम ले रहा था शायद शायद ठीक से याद नहीं जिनहोने दो चार लेख भी नहीं लिखे लेकिन सूफी संत उनका प्रचार कर रहा था क्योकि वो स्मार्ट महिलाये थी क्या ये सूफी संत की अवचेतन इच्छा थी शायद एक कुंवारा भाई भी हे उसका ————भारतीय उपमहाद्वीप में भले लोगो के ही आचरण से तबाही की दो जड़ मिलती हे विवाह के प्रति पागलपन विवाह नहीं तो कुछ नहीं और विवाह के बाद आदमी समाज के लिए कहता हे कुछ नही , एक महिला पत्रिका में एक लेख पड़ा की अविवाहित लोग समाज के लिए किसी वरदान से कम नहीं होते हे मगर भारतीय समाज के भले लोगो तक को वरदान नहीं श्राप चाहिए , अब दो जड़ मिलेगी विवाह के प्रति पागलपन और विचारो के प्रति नफरत खासकर हिंदी में विचार से सख्त नफरत करता हे ये समाज , मतलब भारत रत्न की नाक के नीचे विचारो के लिए हमे आई टी सेल से इतना टॉर्चर किया गया धमकिया मिल रही हे और भारत रत्न मुग्द हे भावुक हे एक ac के प्रति जो जीवन में भी ऐसा कुछ नहीं करने की कोई धमकी हो कोई खतरा हो सुरक्षित नौकरी सुरक्षित काम क्या ये विवाह के लिए बेस्ट होने ( अच्छी सुरक्षित नौकरी सुरक्षित जीवन और काम ) के प्रति उत्साह हे हमारे वेस्ट up के एक बहुत सेकुलर मुस्लिम संपादक लेखक तक पिछले दिनों मुझे भला बुरा कह गए हे सूफी संत दो चार लाइने लिखने वाली स्मार्ट महिलाओ को हमसे ऊपर रख रहा था

”संजीव कुमार ” हमारे लेख में से पोस्ट उड़ा कर खासी वाहवाही लूट कर भी हमारा नाम लेना गवारा नहीं करता हे जबकि ”संजीव कुमार ” उसका नाम प्रचार लेना लोग खूब गवारा करते हे क्योकि उसके पास अच्छी नौकरी हे और ये सब जिनका जिक्र किया ये सब बहुत बहुत बहुत भले लोग हे और भी बहुत नाम हे बहुत भले, पांच साल से हमे पढ़ रहे हे मगर जिक्र नहीं करते हे जानते हे क्यों ————– ? क्यों की ये समाज विवाह के प्रति पागल हे और जैसा की बताया की विवाह मार्किट में नंबर वन डिमांड होती हे अच्छी सुरक्षित नौकरी जॉब पद वाले लड़के लड़कियों की औरतो मर्दो की अब इस माहौल में समझिये की अगर मेरे नाम के साथ जुड़ा होता कोई जबर्दस्त प्रोफ़ाइल तो अब तक ये लोग तारीफ कर कर के चने के झाड़ पर लटका देते हम मना भी करते तो भी ज़बर्दस्ती हमारा प्रचार करते क्योकि अवचेतन मन में वही इच्छा दबी होती वो उभरती उसीसे फिर ये ———- लेकिन में क्योकि जीरो प्रोफ़ाइल का आदमी हु इसलिए पांच सालो नेक इरादे से एक अच्छी हिंदी सरल विचारो की साइट्स चलाने की कोशिश में इन्होने ज़रा भी सहयोग नहीं किया इससे इस समाज के रवैये का पता चलता हे की विवाह के लिए पागलपन हे और विचारो के प्रति नफरत हे सख्त नफरत जब भले वैचारिक लोगो का ये हे तो बाकी समाज क्या करता होगा या हे तभी इतनी तबाही मची हुई हे सिकंदर हयात