by — – लव कुमार सिंह

मेरी आज भी इच्छा है कि काश कपिल देव भारत की प्लेइंग इलेविन में होते, लेकिन क्या यह संभव है? धोनी फैन्स! आपको भी स्वीकार करना होगा कि धोनी के जाने का समय आ गया है

It’s time to go for Mahendra Singh Dhoni

Dhoni’s retirement is near

किशोरावस्था और जवानी में हमें कपिल देव और उनका खेल बहुत अच्छा लगता था। कपिल देव के रहते भारत के हर मैच में एक श्रोता और दर्शक के तौर पर मन और शरीर में अजीब सा जोश रहता। कपिल देव के योगदान के बिना टीम को मिली जीत, जीत ही नहीं महसूस होती थी। जब टीम को जरूरत होती, कपिल विकेट चटकाते और जब वह बल्लेबाजी कर रहे होते तो रन गति का बढ़ना निश्चित माना जाता था।

हमें याद है रेडियो पर कमेंट्री के दौरान कमेंटेटर कहते- “…और अब कपिलदेव अगली गेंद लेकर आगे बढ़ते हुए…..” कमेंटेटर के आगे कुछ कहने से पहले कमेंट्री सुन रहे पिताजी कहते- “और ये आउट”। कुछ ही क्षण बाद कमेंटेटर की उत्साहित आवाज गूंजती- “क्लीन बोल्ड।”

ऐसा कई बार हुआ जब कमेंटेटर से पहले पिताजी ने कपिलदेव की गेंदबाजी के दौरान ‘आउट’ कहा और फिर कपिल के गेंद फेंकने के बाद कमेंटेटर ने भी आउट ही बोला। हमें नहीं लगता कि प्रिंट मीडिया में आज तक किसी गेंदबाज का गेंदबाजी एक्शन इतना छपा होगा जितना उन दिनों कपिल देव का छपता था। विकेट पर उनकी वो उछाल…हाथों का एक्शन….टेढ़ी गर्दन मगर नजर विकेट पर….सब बहुत कमाल का था।

कपिल देव बल्लेबाज भी कमाल के थे। वे पिंच हिटर थे। जब वे क्रीज पर आते तो रन गति का बढ़ना तय माना जाता था। उनके पांच-दस मिनट तक क्रीज पर रहने के दौरान ही भारत का स्कोर बहुत तेजी से बढ़ जाता था। हमें बल्लेबाजी के दौरान कपिल देव का कोई डिफेंसिव शॉट याद नहीं आता। उनकी कोशिश हर गेंद पर रन लेने की होती थी। डिफेंस करना तो वे जानते ही नहीं थे।कपिल देव ने पहली बार भारत को विश्व विजेता बनाया। इसके अतिरिक्त भी उन्होंने अकेले दम पर भारत को अनगिनत मैच जिताए।

रोमांचभरे उन दिनों के बाद फिर एक दिन ऐसा भी आया जब कपिलदेव स्वयं की छाया नजर आने लगे। बल्लेबाजी में उनका धमाका जारी था, लेकिन टीम उनसे विकेट चाहती थी। वे विकेट लेते, लेकिन उतने नहीं जितनी उनसे उम्मीदें होतीं। वे धीमे हो गए थे।

फिर हमने देखा वे विकेट के काफी पास से गेंदबाजी करने लगे। हमारा दिल यह देखकर रो उठा। कपिल देव पर संन्यास लेने का दबाव बढ़ रहा था। कई युवा खिलाड़ी टीम के दरवाजे पर दस्तक दे रहे थे। हकीकत जानते हुए भी हम नहीं चाहते थे कि कपिल देव संन्यास लें। हम चाहते थे कि वह और खेलें, सालों साल खेलें। यह जानते हुए भी कि कपिल देव टीम के नंबर वन गेंदबाज हैं, हम तर्क देते कि देखो कपिल देव बल्लेबाजी कितनी अच्छी कर रहे हैं। उन्हें अभी टीम में होना चाहिए।

लेकिन वास्तव में हम हकीकत को झुठला रहे थे। हम भावनाओं में बह रहे थे। कपिल देव करीब 20 साल से प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेल रहे थे। भारतीय टीम में आने के बाद वह विरले ही प्लेइंग इलेविन से बाहर रहे थे। उन्होंने बिना चोटिल हुए लगातार क्रिकेट खेला था। वह अपना सर्वश्रेष्ठ दे चुके थे। वे अब थक चुके थे। समय की मांग थी कि उन्हें जाना ही था, भले ही हमारा दिल इसके लिए तैयार नहीं था। हमें तब भी लगता था कि कपिल में अभी बहुत क्रिकेट बाकी है।

यही बात महेंद्र सिंह धोनी के साथ लागू होती है। धोनी अपना सर्वश्रेष्ठ दे चुके हैं। उन्होंने वन डे विश्व कप, चैंपियंस ट्राफी और टी-20 विश्व कप में भारत को विजेता बनाया। ऐसी उपलब्धि किसी खिलाड़ी के पास नहीं है। लेकिन पिछले दो-तीन साल से धोनी, पुराने धोनी की छाया मात्र ही रह गए हैं। मुझ समेत उनके तमाम प्रशंसक कितने भी तर्क दें लेकिन हकीकत यही है। बेशक, धोनी टीम में रहेंगे तो अपने अनुभव के हिसाब से कुछ न कुछ योगदान देते रहेंगे, लेकिन वह उनका सर्वश्रेष्ठ योगदान नहीं होगा। अनेक प्रतिभाशाली खिलाड़ी टीम के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। चयन न होेने पर कई खिलाड़ी क्रिकेट छोड़ रहे हैं। समय की मांग है कि धोनी को अब जाना ही होगा।