by — – लव कुमार सिंह

पिछलेकई दशकों से अपने देश में चुनाव के दौरान एक बड़ी दिलचस्प चीज देखने को मिलती रही है। वह यह कि पढ़े-लिखे लोग वोट के मसले पर हिंदुओं और मुसलमानों से बिल्कुल अलग-अलग प्रकार का आह्वान करते हैं।

2019 के चुनाव का ही उदाहरण लें तो हम पाते हैं कि मुस्लिमों से कहा गया कि इस वक्त शिक्षा, रोजगार, विकास आदि की बातें भूल जाओ और भाजपा के खिलाफ एकजुट हो जाओ। जब धर्म ही नहीं रहेगा तो शिक्षा, रोजगार, विकास लेकर क्या करोगे?

उधर, हिंदुओं से कहा गया कि धर्म के चक्कर में पड़कर क्या मिलेगा? अरे शिक्षा की बात करो, रोजगार मिला या नहीं यह देखो, सरकार ने जो वादे किए थे, वे पूरे हुए या नहीं यह देखो। धर्म तो तुम्हें और देश को बर्बाद कर देगा।

यह भारत के लिए बड़ी विकट स्थिति है। एक पक्ष से दशकों से कहा जा रहा है कि धार्मिक आधार पर वोट करो और जब इस पक्ष की देखादेखी दूसरे पक्ष के भी एक हिस्से ने इसी आधार पर वोट करना शुरू कर दिया तो उससे कहा जा रहा है कि धर्म जहर है।

दुखद यह है कि अपने देश के कथित विद्वानों और बुद्धिजीवियों ने धर्म आधारित वोटिंग पैटर्न की कभी आलोचना नहीं की। कभी लोगों को समझाने का प्रयास नहीं किया कि यह गलत पैटर्न है। मीडिया का रुख भी यही रहा। अखबारों, टीवी चैनलों पर वरिष्ठ पत्रकार बड़े सहज ढंग से और कभी-कभी तो प्रशंसा के भाव से मुस्लिमों के वोट देने के विशिष्ट तरीके का जिक्र करते थे। अनेक पत्रकारों, लेखकों ने इसे बढ़ावा देने का काम भी किया है।

मीडिया के धुरंधरों ने कभी नहीं कहा कि भाई उस पार्टी या प्रत्याशी को वोट दो जिसने तुम्हारे लिए काम किया है या जिसमें तुम्हें इस तरह की संभावना नजर आती है। केवल धार्मिक आधार पर वोट करना सही नहीं है। बुद्धिजीवियों की आंखें तब खुलीं जब हिंदुओं में भी उनके बहुत से ठेकेदार उन्हें भविष्य का डर दिखाकर धार्मिक आधार पर वोटिंग करने का आह्वान करने लगे।

सवाल यह है कि क्या मुस्लिमों में भय पैदा करने से या उन्हें गोलबंदी के लिए उकसाने से उनकी समस्याओं का हल हो जाएगा? वास्तव में तो इससे समस्या और ज्यादा बढ़ेगी ही। जवाब में हिंदू भी गोलबंद होंगे और देश में सांप्रदायिकता का जहर फैलता ही जाएगा।

क्या किया जाए?

मैं यह नहीं कहता कि मुसलमान भाजपा को ही वोट दें। उनका जहां मन करे, वहां वोट दें, पर मैं यह जरूर कहना चाहता हूं कि मुसलमान भाजपा के पास जाने से न हिचकें। बल्कि मैं तो कहूंगा कि वे ज्यादा से ज्यादा संख्या में भाजपा में प्रवेश करें और दूर से देखने या डरने के बजाय भाजपा के अंदर जाकर उस बात का विरोध करें जो बात उन्हें गलती लगती है।

एक उदाहरण देखें- मान लीजिए कि मुझे लगता है कि किसी बैठक में मेरे तथाकथित विरोधी मेरे खिलाफ कोई बात कह रहे हैं या कोई योजना बना रहे हैं। इसे लेकर मैं परेशान होता हूं, चिंतित होता हूं और डर से दुबला हुआ जाता हूं कि पता नहीं बैठक में क्या होगा? अब कल्पना करिए कि यदि उस बैठक में मैं स्वयं मौजूद रहूं या मेरे कुछ साथी मौजूद रहें तो क्या होगा? पहली बात तो यही होगी कि मुझे वास्तविकता पता चलेगी। पता चलेगा कि वहां तो कोई योजना बन ही नहीं रही है। यह केवल मेरे मन का डर था जो दूसरे लोगों ने बैठा रखा था। और अगर ऐसी कोई बात मेरे समाज के बारे में होती भी है तो मैं या मेरे साथी उसका विरोध करने के लिए वहां मौजूद रहेंगे। किसी गलत बात को गलत कहने और उसे करने से रोकने के लिए मौजूद रहेंगे। इस प्रकार जब सारा काम मेरे सामने होगा तो न मैं चिंतिंत होऊंगा और न ही डरूंगा।

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को याद करें। कोई मुझे बताए कि यदि किसी प्रधानमंत्री के सामने एक तरफ नीतिश कुमार बैठे हैं, दूसरी तरफ जॉर्ज फर्नांडीस बैठे हैं, सामने रामविलास पासवान बैठे हैं और अन्य कई नेता भी बैठे हैं जिनका सीधे भाजपा से संबंध नहीं है तो ऐसा प्रधानमंत्री अगर किसी समाज के खिलाफ निर्णय लेना भी चाहता तो कैसे ले सकता था?

आप गोवा का उदाहरण देख लीजिए। गोवा में कहां है हिंदुत्व? कहां है गोमांस का मुद्दा? कहां है अल्पसंख्यकों में बेवजह का भय, जबकि वहां पर काफी समय से सत्ता भाजपा के पास है। वहां ऐसा इसलिए है क्योंकि वहां दूसरे समुदायों ने भाजपा को अछूत समझने के बजाय उसमें शामिल होने में हिचक नहीं दिखाई। उन्होंने स्वयं को धर्म के संदर्भ में नहीं बदला, बल्कि भाजपा को ही बदल डाला।

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में कई दशक भाजपा सत्ता में रही, लेकिन वहां ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे मुसलमानों को डर लगे। महाराष्ट्र, हरियाणा, असम आदि में भी भाजपा की सरकारें उसी सामान्य तरीकों से काम कर रही हैं जिस प्रकार अन्य राज्यों में अन्य दलों की सरकारें काम कर रही हैं। तो मुसलमान भाई-बहनें ये डर-वर छोड़ें और किसी पार्टी को अछूत न समझें। भाजपा के नजदीक जाएं, उसमें प्रवेश करें, कोई बात गलत लगे तो अंदर रहकर विरोध करें और इस देश की राजनीति को हमेशा के लिए बदल डालें। इससे न केवल मुसलमानों का भला होगा, बल्कि देश का भी बहुत भला होगा।

आप कहेंगे कि भाजपा ही इच्छुक नहीं है तो वहां कैसे जाएं? यह बात सही नहीं है। भाजपा के पास कद्दावर मुस्लिम नेता इसलिए नहीं जा पाते क्योंकि उन नेताओं को अपने समर्थकों या समाज के नाराज होने का खतरा रहता है। यहां एक उदाहरण बरेली के डॉ एहतेशाम उल हुदा का दिया जा सकता है।

डॉ. हुदा भाजपा से जुड़े हैं और अन्य लोगों को भी भाजपा से जोड़ने का काम करते हैं। लेकिन डॉ. हुदा को अपने इस काम के लिए अपने समाज का भारी विरोध झेलना पड़ा। उन्हें गालियां, जान से मारने की धमकियां, परिवार को खत्म करने की धमकियां, उपहास, कटाक्ष झेलने पड़े। हालांकि वे जुटे रहे और पता चला है कि बरेली क्षेत्र में काफी मुसलमानों ने भाजपा को वोट दिए हैं।…तो आप भले ही भाजपा का विरोध करें, लेकिन अपने समाज के किसी व्यक्ति का भाजपा में जाने पर विरोध तो न करें।

मीडिया रिपोर्ट्स बताती है कि भाजपा में भी टिकट के लिए अनेक मुस्लिम दावेदारी करते हैं, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिल पाता क्योंकि उन दावेदारों को अपने समाज का समर्थन नहीं मिल पाता। अब जब किसी दावेदार को उसके ही समाज का समर्थन नहीं मिलेगा और उसके जीतने की जरा भी संभावना नहीं होगी तो कोई पार्टी उसे क्यों टिकट देगी। जहां जीतने की संभावना होती है, जैसे कि निकाय चुनाव में तो वहां भाजपा ने अनेक मुस्लिम उम्मीदवार बनाए भी हैं।

इस प्रकार मेरा मानना है कि मुसलमान भाई-बहनों को किसी मुस्लिम के भाजपा में जाने का विरोध नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे प्रोत्साहन देना चाहिए। जैसे एक परिवार के सदस्य अलग-अलग दलों में होते हैं और लाभ उठाते हैं, उसी प्रकार मुस्लिम हर दल से जुड़ें और इस सूची में भाजपा को भी शामिल करें।

इससे एक तो भाजपा ऐसा तथाकथित कुछ नहीं कर सकेगी जिसके लिए भाजपा विरोधी पार्टिया मुसलमानों को डराती हैं।

दूसरे भाजपा से इतर दल भी मुस्लिमों को केवल वोट बैंक के रूप में देखना बंद करेंगे। ऐसा होने पर उन दलों को मुस्लिमों को डराने की राजनीति छोड़कर समाज के लिए कुछ काम करना पड़ेगा।

ऐसा होने पर भाजपा का एक हिस्सा भी तब हिंदू-हिंदू नहीं चिल्लाएगा क्योंकि आज कि तारीख में उसे भी यह डर लगा रहता है कि यदि वह हिंदू-हिंदू न चिल्लाए तो उसकी झोली में क्या रह जाएगा, क्योंकि मुसलमान तो उसे वोट देगा नहीं। जब उसके पास भी अन्य दलों की तरह मुस्लिमों का साथ होगा तो फिर ये हिंदू-मुस्लिम बंद होकर वोट का पैमाना किसी सरकार का काम ही होगा।

दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने पर नए सांसदों के समक्ष अपने भाषण में नरेंद्र मोदी ने बहुत जोर देकर कहा है कि वे अल्पसंख्यकों के उस डर के जाले में छेद करके रहेंगे, जिसमें कुछ दलों ने उन्हें बंद करके रखा हुआ है। देखते हैं नरेंद्र मोदी इस जाले में छेद करने के लिए क्या करते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि यदि मुस्लिम भाई-बहन भी इस जाले में छेद करने के लिए आगे बढ़ें तो इस जाले को काटने में ज्यादा आसानी होगी। इसमें नुकसान कुछ भी नहीं है। होगा तो लाभ ही होगा। स्वयं मुस्लिमों का भी, हिंदुओं का भी और इस देश का भी।