by नीरज वर्मा

भारतीय लोकतंत्र में 2019 का लोकसभा चुनाव कई मायनों में यादगार रहेगा । बेहद मेहनत करने वाले कॉंग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पहली बार बहुत परिपक़्व, ज़िम्मेदार और उम्मीद से भरे दिखे । शायद 2024 में इसका असर दिखे । जबकि 2019 में प्रधानमंत्री मोदी, 2014 से भी, ज़्यादा ‘ख़तरनाक़’ लोकप्रिय नज़र आये । इतनी ‘ख़तरनाक़’ लोकप्रियता भारतीय राजनीति में बहुत कम मौक़ों पर नज़र आई है । अपने जीवन काल में पहली बार भाजपा ने 300 सीट और NDA 350 सीटों के पार । कांग्रेस उसी 50-52 की संख्या और UPA वही 100 के अंदर फ़िर से निराशाजनक स्तर पर ।

2014 के बाद 2019 में फ़िर से दुबारा शर्मनाक बात तो ये रही कि मोदी-विरोध के नाम पर UPA के किसी कुनबे को इतनी भी सीट नहीं मिली कि उसे लोकसभा में विपक्ष का नेता पद मिल सके । आपको बता दें कि विपक्ष के नेता पद के लिए किसी भी पार्टी के पास लोकसभा की कुल 543 सीटों का 1 /10 वां हिस्सा यानि 55 सीटें मिलना ज़रूरी है ।

मुद्दा विहीन रहा ये चुनाव “मोदी बचाओ व् मोदी हटाओ” की तर्ज़ पर लड़ा गया । किसी एक मुद्दे की जगह , सिर्फ़ मोदी हटाओ – सत्ता में आओ के नारे के बल पर कांग्रेस की अगुवाई में UPA के नाम पर पूरा विपक्ष सैद्धांतिक तौर पर एकजुटता का प्रदर्शन तो करता रहा मग़र मिल कर चुनाव नहीं लड़ पाया । इस दोहरी नीति में सहमति थी कि मोदी हटाया जाए , मगर असहमति थी कि नेता कौन होगा ? मतलब मोदी को हटाना है लेकिन किसी एक नेता के नेतृत्व में नहीं , बल्कि अपने-अपने तरीक़े से । यानि मिला-जुला विपक्ष एक सर्वमान्य नेता तक नहीं तैयार कर पाया ।

जनता में साफ़ सन्देश गया कि ये अवसरवाद का बेहद शर्मनाक़ प्रदर्शन है । उधर NDA का कुनबा मोदी के नेतृत्व को लेकर एकजुट रहा । हर जगह मोदी-मोदी । यहां तक कि सहयोगी दल और खुद भाजपा ने अपने-आप को दरक़िनार कर मोदी को मुखौटा बनाकर चुनाव लड़ा । NDA के एकमात्र नेतृत्व और बेहद प्रभावशाली भाषणों से राजनीति के अमिताभ बच्चन बन चुके नरेंद्र दामोदर दास मोदी की छवि जन-नायक की बन गयी । लोगों को लगने लगा कि यही एक नेता है जो आम आदमी की आकांक्षाओं को पूरा करने की क़ूबत रखता है । मज़े की बात ये रही कि मोदी-विरोध की पुरज़ोर वकालत करने वाले कुछ पत्रकार बंधू भी ये नहीं बता पाए कि विपक्ष एक जुट होकर चुनाव क्यों नहीं लड़ पाया और विपक्ष का कोई एक सर्वमान्य नेता कोई क्यों नहीं बन पाया ? ये पत्रकार, ये तक नहीं बता पाए कि (2014 से लेकर 2019 के बीच) मोदी कहाँ चुके और क्या गलती किये और विपक्ष का ऐसा कौन सा ऐसा नेता है जो इसका विकल्प बन कर इसका हल निकाल लेने की हैसियत रखता है ? ये पत्रकार कूटनीतिक पत्रकारिता और अघोषित प्रवक्ता के तौर पर विभिन्न पार्टियों द्वारा सौंपे गए मिशन की पूर्ति-मात्र में लगे रहे और चर्चित-पत्रकार के तौर पर स्थापित होते रहे । कई मुद्दों पर असफ़ल मोदी , इन प्रवक्तानुमा पत्रकारों की इस (मोदी-विरोध) मुहिम को जन-विरोधी चाल के तौर पर पेश कर ज़बरदस्त सहानभूति बटोरते रहे । दिल्ली की राजनीति में मोदी के आने के बाद से पत्रकारिता जगत में एक जुमला बड़ी तेज़ी से लोकप्रिय हुआ कि बड़ा और चर्चित पत्रकार बनना है तो मोदी-विरोध करना शुरू कर दो क्योंकि मोदी के पक्ष में तो इतने पत्रकार हैं कि कोई न जान पाएगा न पहचान पाएगा ।

कुछ बुद्धिजीवियों के साथ देश के टुकड़े करने वाले गैंग की पहचान बन चुके (बिहार के बेगुसराय से बुरी तरह से हारे) कन्हैया कुमार सरीखों के समर्थक व् बहुसँख्यक मुसलमानों की विचारधारा का वोट भाजपा को नहीं मिलना था और मिला भी नहीं । हाँ, कुछ अपवाद भरी ख़बरे इसे झुठलाने का प्रयास करती रहीं । मगर सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों में से ज़्यादातर को मोदी में अपनी उम्मीद नज़र आई । जाँत-पाँत के नाम पर विभाजित हिन्दू धर्म के लोग परिवारवाद और जातिवादी सोच से परेशान होकर मोदी के नेतृत्व में विकास के नाम पर लामबंद होने लगे । जाँत-पाँत व् परिवारवाद की राजनीति से त्रस्त मतदाताओं का एक बड़ा तबक़ा राजनीति में न सिर्फ़ रुचि दिखाने लगा , बल्कि सोशल मीडिया पर मुख़र हो उठा । क्या UPA और क्या NDA ! क्या पढ़ा-लिखा और क्या गंवार ! विकास की बात करने वाला समझदार कहलाने लगा । मुसलामानों और एक निश्चित विचारधारा के एक बड़े तबके को छोड़ दें तो ज़्यादातर मतदाता, धर्म-मज़हब और जाति की दीवार को तोड़ कर विकास , जागरूकता और समझ का तराजू लेकर बैठ गया । हर उम्मीदवार तौला जाने लगा ।

जातिगत राजनीति के साथ दादा-दादी, माँ-बाप, बेटी-बेटा, नाती-पोता, भतीजा-भतीजी की वसीयतनामे वाली राजनीति भी लोगों की आँखों में खटकने लगी । मायावती, नायडू, गांधी फैमिली, यादव फैमिली की “हम राजा-तुम प्रजा” वाली मानसिकता भी आग में घी का काम करने लगी (हालांकि शिवसेना को वोट देने वाला मतदाता इसे जानते हुए भी मोदी के नाम पर शिवसेना को वोट दे बैठा) । लोगों को लगा कि, ग़र कोई प्रतिकूल परिस्थिति न हो तो कांग्रेस में अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद पर सिर्फ़ गांधी फैमिली का हक़ होता है । और कांग्रेस में आगामी पीढ़ी का अध्यक्ष प्रियंका गांधी के बच्चे ही होंगे और बाकी कार्यकर्ता उनके लिए ज़िंदाबाद के नारे लगाने के लिए पार्टी का हिस्सा बनेंगे । इसी तरह समाजवादी पार्टी में अगला पार्टी अध्यक्ष, अखिलेश यादव के बच्चे ही होंगे और बाकी कार्यकर्ता उनके लिए ज़िंदाबाद के नारे लगाने के लिए पार्टी का हिस्सा बनेंगे । बिहार में कई वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर अपने पुत्र तेजस्वी यादव को अपनी पार्टी की कमान सौंपने वाले RJD अध्यक्ष लालू यादव ने साफ़ सन्देश दे दिया कि RJD कार्यकर्ता सिर्फ़ नारे लगाने के लिए हैं, और RJD अध्यक्ष पद पर या जीतने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद पर लालू यादव परिवार के ही किसी सदस्य का ह्क़ होगा ।
दलित समाज को सम्मान भागीदारी और सबकी हिस्सेदारी का पाठ पढ़ाने वाली और अपने भतीजे को बसपा की कमान सौंपने की तैयारी करने वाली मायावती जी और तृणमूल कॉंग्रेस की बागडोर अपने भतीजे को सौंपने का मन बना चुकी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कॉंग्रेस की मुखिया ममता बैनर्जी से भी उनके कार्यकर्ता ख़फ़ा होते जा रहे हैं, इस सवाल के साथ कि …. “मेहनत करे और ज़िंदाबाद के नारे लगाए आम कार्यकर्ता और पार्टी अध्यक्ष या मुख्यमंत्री पद पर बैठे बहनजी, लालू जी, मुलायम जी और ममता बैनर्जी या गांधी परिवार का सदस्य” ।

विपक्ष सोचे सौ बार कि अब लोग राजनीति को परिवार की बपौती मानने के मूड में अब नहीं हैं । मग़र विपक्ष.. परिवार के मोह में आम-कार्यकर्ताओं या पब्लिक का ये मूड भांपने में विफ़ल रहा । ऐसी कई योजनाएं रहीं जिस पर विपक्ष, मोदी सरकार को घेर सकता था, लपेट सकता था, आक्रामक होकर जनता का दिल जीत सकता था मग़र … विपक्ष , मुद्दों पर सोचने के लिए भी राजी नहीं था । विपक्ष का नारा सिर्फ़ एक ही था — मोदी हटाओ और सत्ता पाओ ।

विपक्ष सोचे सौ बार कि — किसी एक व्यक्ति के पद से हटने और 100 व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने या किसी परिवार-विशेष के किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री बनाने से देश की दशा-दिशा कैसे दुरूस्त हो जाएगी ?

इस बात पर भी विपक्ष सोचे सौ बार कि — पब्लिक 20-25 साल पहले वाली नहीं है जो सबूतों की बिना पर मर्यादित बहस करने और राजा-प्रजा के दर्शन-शास्त्र में यकीं करती है । ये इंटरनेट और सोशल मीडिया का ज़माना है , जहां बेडरूम की चारदीवारों के भीतर होती हरकतों से लेकर भ्रष्ट तरीक़ों से निर्मित करोड़ों के बंगले और सैकड़ों करोड़ का जमा बैंक बैलेंस -हर बात पर चर्चा बेबाक़ है । ये चर्चाएं शब्दों का भी लिहाज़ नहीं करती, मर्यादाओं का भी अतिक्रमण करती हैं । ये चर्चाएं अपना हक़ जताती हैं । अपना हक़ मांगती हैं । बे-हिसाब, आपसे, हिसाब मांगने का साहस करती हैं । कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ कर परिवार के सदस्यों को प्राथमिकता देने पर सवाल भी उठाती हैं ।

इस बात पर भी विपक्ष सोचे सौ बार कि — ये चर्चाएं अब महज़ टाइमपास का हिस्सा भर नहीं रह गयी हैं, बल्कि आप (अगर) नहीं सुधरे तो आपको इतिहास बनाने का माद्दा भी रखती हैं ।

2024 तक तो विपक्ष को विपक्ष की भूमिका निभानी ही पड़ेगी मग़र लगातार विपक्ष सोचे सौ बार – फ़िर से क्यों मोदी सरकार ?

नीरज वर्मा
संपादक
‘इस वक़्त’
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