by — प्रदीप कुमार
बीबीसी संवाददाता

भारत में चल रहे आम चुनाव के नतीजे आने में अब महज 18 दिन रह गए हैं. आधे से ज़्यादा चुनाव बीत चुका है.

भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वापसी को लेकर भारतीय मीडिया में कई सर्वे आ चुके हैं, चुनाव नतीजों के इंतज़ार किए बिना ‘आएगा तो मोदी ही’ जैसे जुमले खूब प्रचारित हो रहे हैं.

चुनावी सर्वे से लेकर अख़बार और टीवी चैनलों की दुनिया में मोदी के सामने कोई विपक्ष को भाव देता नहीं दिख रहा है, ऐसे समय में पांचवें चरण के चुनाव से ठीक पहले उत्तर प्रदेश के बस्ती में प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी भाषण से विवाद हो गया है.

अपने भाषण में मोदी ने कहा, “आपके पिताजी को आपके राग दरबारियों ने मिस्टर क्लीन बना दिया था. गाजे-बाजे के साथ मिस्टर क्लीन मिस्टर क्लीन चला था. लेकिन देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नंबर वन के रूप में उनका जीवनकाल समाप्त हो गया.”

कहते हैं कि मोहब्बत और जंग में सब जायज़ है. भारत में होने वाले चुनाव भी अब किसी युद्ध में ही तब्दील होते दिख रहे हैं. कम से कम, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने चुनाव को युद्ध के मैदान में तो बदल ही दिया है. और जब सब कुछ जायज़ हो….फिर भले ही एक ऐसे शख़्स पर कीचड़ उछाला जाए तो जवाब देने के लिए मौजूद नहीं है. इसके लिए प्रधानमंत्री पद की गरिमा, सवालों के घेरे में आए तो आए.

नरेंद्र मोदी सरकार में भारतीय लोकतंत्र की प्रभावी संस्थाओं की गरिमा को तार-तार करने के उदाहरण हाल के दिनों में बढ़े हैं. चुनाव आयोग की ओर से एक के बाद एक नरेंद्र मोदी को मिली सात क्लीन चिट पर भी विपक्षी दलों ने सवाल उठाए हैं. इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई, सीवीसी, आईबी इन सबका इस्तेमाल विरोधियों के ख़िलाफ़ करने के आरोप भी मौजूदा मोदी सरकार पर लगते रहे हैं.
राजीव गांधी- मोदी

ऐसे में मोदी के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को लेकर दिए ताजा बयान को आरोप-प्रत्यारोप की लगातार टूटती सीमाओं की एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है.

नरेंद्र मोदी ने राजीव गांधी को जिस तरह से ‘भ्रष्टाचारी नंबर वन’ कहा है, वह भी तथ्यों के साथ खिलवाड़ है. रही बात राजीव गांधी को ‘मिस्टर क्लीन’ के तमगे की तो, ये ठीक वैसी ही बात रही होगी जैसे नरेंद्र मोदी गुजरात में ‘विकास पुरुष’ के तौर पर प्रचारित होते गए.

लेकिन उन्होंने जिस बोफोर्स कांड का आरोप प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर लगाया है, उसकी जांच में क्या कुछ सामने आया है, इसे देखने की ज़रूरत है. 64 करोड़ रुपए की कथित रिश्वत के इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में राजीव गांधी पर कोई आरोप साबित नहीं हो पाया.

इसे इस लिहाज़ से भी देखा जाना चाहिए कि जब 20 मई, 1991 को राजीव गांधी की मौत हुई थी, उस वक्त उन पर बोफ़ोर्स मामले का आरोप लगाने वाले लोग ही सरकार में थे.

लेकिन उस मध्यावधि चुनाव में उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी, उनकी मौत नहीं हुई होती तो इसमें संदेह नहीं कि राजीव फिर से प्रधानमंत्री होते.

नरेंद्र मोदी 1991 में भी सक्रिय राजनीति में थे और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय दफ्तर में लालकृष्ण आडवाणी के नजदीकी सहयोगियों में थे.

बोफोर्स कांड से छवि पर असर

बहरहाल, उनकी मौत के बाद वीपी सिंह वाले जनता दल मोर्चे के क़रीब तीन और उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी के क़रीब पांच साल के शासन में इस मामले में ऐसा कुछ साबित नहीं हो पाया जिससे राजीव गांधी को ‘भ्रष्टाचारी नंबर वन’ कहा जाता. दिलचस्प यह है कि वाजपेयी की सरकार के दौरान ही राजीव गांधी का नाम बोफोर्स की चार्जशीट से हटाया गया था.

राजनीति में परसेप्शन का अहम रोल होता है, राजीव गांधी को इस परसेप्शन की कीमत चुकानी पड़ी, जनता ने उन्हें चुनाव हराया और लंबे तक बोफ़ोर्स का साया उनकी इमेज पर पड़ता रहा.

लेकिन नरेंद्र मोदी के बयान का दूसरा हिस्सा कहीं ज़्यादा निराशा पैदा करने वाला है. वे राजीव गांधी की मौत को उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप के साथ जोड़कर पेश करने की कोशिश की है. राजीव गांधी की हत्या दुनिया के एक सबसे ख़तरनाक चरमपंथी हमले में हुई थी. बाद में भारत सरकार ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न (मरणोपरांत) सम्मानित किया था.
राजीव गांधी

पहले इंदिरा गांधी और उसके बाद राजीव गांधी को जिस तरह से चरमपंथी हिंसा की चपेट में जान गंवानी पड़ी, इसकी मिसाल दुनिया के किसी कोने में देखने को नहीं मिली है.

श्रीलंका में शांति सेना भेजने के चलते ही लिट्टे के आत्मघाती दस्ते में राजीव गांधी की मौत हुई थी. कई विश्लेषक मानते हैं कि राजीव गांधी ने तब अगर श्रीलंका में शांति सेना नहीं भेजी होती तो पाकिस्तान के साथ-साथ श्रीलंका भी अमरीका के एक सामरिक केंद्र के तौर पर स्थापित हो चुका होता.

आत्मघाती हमले में हुई थी मौत

नरेंद्र मोदी केवल भारतीय जनता पार्टी के स्टार प्रचारक होते तो भी उनके चुनाव प्रचार में इस तरह के भाषणों को समझा जा सकता था लेकिन भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने एक पूर्व प्रधानमंत्री की छवि को मलिन करने की कोशिश की है, जिसकी राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया हुई है.

राजीव गांधी को अपनी मां की मौत की सहानुभूति का फायदा हुआ था और महज तीन साल के राजनीतिक अनुभव के भीतर उन्हें भारत जैसे विशाल देश की कमान संभालनी पड़ी थी. 1984 के उस चुनाव में कांग्रेस को 415 सीटें मिली थीं. लेकिन राजनीतिक अनुभवहीनता और आस पास बैठे लोगों की सलाहों के चलते शाहबानो प्रकरण और राम मंदिर दरवाजा खुलवाने जैसे मुद्दे भारत के एक बड़े तबके को आजतक प्रभावित कर रहे हैं.
राजीव गांधी

लेकिन ये तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि उन्हीं राजीव गांधी ने भारत को कंप्यूटरीकृत करने का सपना देखा था, उनके शासनकाल में टेलीफोन और दूर संचार उद्योग में भारत में बुनियादी सुविधाएं बढ़ीं. राजीव गांधी ने भारत को 21वीं सदी में ले जाने का सपना देखा था और उसको लेकर कई ज़रूरी कदम उठाए थे.

लेकिन यह सब बातों का ख्याल नरेंद्र मोदी क्यों करेंगे. जब वो राजीव गांधी को निशाना बना रहे थे तो उन्हें संभवत यह बात भी याद नहीं रही कि उनके अपनी पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण ऑन कैमरा रिश्वत लेते हुए पकड़े गए थे. पार्टी के एक और नामचीन नेता दिलीप सिंह जूदेव ऑन कैमरा कहते हुए पकड़े गए थे- पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं.
क्यों फिसल रही है जुबान

हालाँकि नरेंद्र मोदी के भाषणों में तथ्यों के साथ हेरफेर और व्यक्तिगत हमले करना कोई नहीं बात नहीं है. वे किसी को पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड बता सकते हैं, कभी विपक्ष की सभी नेताओं को जेल भेजने की धमकी दे सकते हैं. बावजूद इन सबके उनके ताजा बयान से दो ही बात जाहिर हो रही है.

पर इसे सत्ता की ठसक कहें या फिर राजनीति का बदलता चेहरा (हर हाल में सत्ता पाने की ललक) मोदी ये भी भूल गए कि राजनीति लोकलाज से चलने वाली चीज़ है. जिस अटल बिहारी वाजपेयी की नरेंद्र मोदी को पहली बार गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका रही, उन्हीं अटल बिहारी वाजपेयी की जानलेवा बीमारी का इलाज राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए कराया था, जिसकी भनक तक उन्होंने किसी दूसरे को लगने नहीं दी थी.

इस बात का खुलासा राजीव गांधी की मौत के बाद खुद अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था कि वे राजीव गांधी की बदौलत ही जीवित हैं.

बहरहाल, नरेंद्र मोदी ने राजीव गांधी पर जिस तरह से निशाना साधा है, उससे प्रियंका गांधी के इस आरोप में दम दिखता है कि मोदी जी के दिमाग़ में उनके परिवार के प्रति एक तरह की सनक है. प्रियंका गांधी ने ट्वीट किया है, शहीदों के नाम पर वोट मांगकर उनकी शहादत को अपमानित करने वाले प्रधानमंत्री ने कल अपनी बेलगाम सनक में एक नेक और पाक इंसान की शहादत का निरादर किया.

वहीं मोदी के बयान पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस तरह से रिएक्ट किया है, उसकी भी तारीफ़ हो रही है. राहुल गांधी ने ट्वीट किया है, “मोदी जी, युद्ध समाप्त हो चुका है. आपके कर्म आपका इंतज़ार कर रहे हैं. खुद को लेकर अपनी सोच को मेरे पिता पर डालने से आप बच नहीं पाएंगे. प्यार और जोरदार झप्पी. राहुल.”

 

—bbc.com