by – वीर विनोद छाबड़ा

दो राय नहीं कि ‘पाकीज़ा’ मीना कुमारी की फिल्म है, क़ामयाबी का क्रेडिट भी मीना को जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसमें कमाल अमरोही की मेहनत का कोई मोल नहीं है, निजी ज़िंदगी में मीना से उनकी अनबन रही हो, लेकिन उनसे उनकी मेहनत का हक़ नहीं छीना जा सकता। डेढ़ करोड़ रूपए की इस फिल्म में उन्होंने कितनी दुश्वारियों का सामना किया, पापड़ बेले, ये हिस्ट्री है।

दरअसल, कमाल ने ‘पाकीज़ा’ मीना के साथ 1958 में प्लान की। शूटिंग भी हुई, लेकिन तभी कलर के युग की आहट मिलनी शुरू हो गयी। दोबारा शूटिंग शुरू हुई। इस बीच उन्हें ख्याल आया कि क्यों न सिनेमास्कोप में शूट की जाए। एमजीएम से लेंस मंगाया गया। नए सिरे से शूटिंग शुरू हुई। आधे से ज़्यादा फिल्म बन गयी। लेकिन 1964 कमाल का मीना से अलगाव हो गया। नतीजा ‘पाकीज़ा’ कोल्ड स्टोरेज में चली गयी। 1968 में कमाल अमरोही ने मीना को दर्दभरा ख़त लिखा। ‘पाकीज़ा’ के डूबते जहाज को बचा लो। मीना ने पॉज़िटिव जवाब दिया, ‘पाकीज़ा’ मेरी ज़िंदगी है, खून का एक-एक कतरा हाज़िर है।
लेकिन हिस्ट्री यह भी बताती है कि 1968 में जब सुनील दत्त-नरगिस ने सुना कि ‘पाकीज़ा’ फाईनली स्क्रैप होने जा रही है तो उन्होंने इसके शूट किये हुए हिस्से देखे। उन्हें तकलीफ़ हुई, इतनी खूबसूरत फ़िल्म अधूरी नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने मीना से दरख़्वास्त और मीना फ़ौरन तैयार हो गयी।

इधर मीना के सामने कई दिक्कतें थीं। उन्हें लीवर सिरोसिस हो गया था और वज़न भी बहुत बढ़ गया। लेकिन कमाल ने कहा, ये मुझ पर छोड़ दो, पुरानी मीना और आज की मीना में कोई फ़र्क नज़र नहीं आएगा। और ऐसा हुआ भी। मीना की डुप्लीकेट बनीं पदमा खन्ना, ख़ासतौर पर डांस सीक्वेंसेस में। मगर मुश्किलें कई और भी थीं। शूटिंग के दौरान जर्मन फ़ोटोग्राफ़र जोसेफ़ व्रिन्चिंग का इंतक़ाल हो गया। तब ‘मुगल-ए-आज़म’ के डायरेक्टर फोटोग्राफी आरडी माथुर ने अपनी ख़िदमात पेश कीं। एक और धक्का लगा कि म्युज़िक डायरेक्टर गुलाम मोहम्मद भी इंतक़ाल फ़रमा गए। बचा हुआ काम नौशाद अली ने पूरा किया। उन्होंने कुछ गाने भी रिकॉर्ड कराये। मगर बिलिंग में उन्हें बैक ग्राउंड और टाइटिल म्युज़िक का क्रेडिट मिला। कास्टिंग को लेकर भी काफ़ी परेशानियां आयीं। हीरो अशोक कुमार 1964 जितने जवान नहीं रहे थे। उनका रोल प्रेमी से बदल कर बाप का कर दिया गया। हीरो के लिए राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त और धर्मेंद्र पर विचार किया गया। लेकिन फ़ाईनल राजकुमार हुए। बकौल कमाल उनकी आवाज़ और अहसास में काफ़ी गहराई थी।

जैसे-तैसे फ़िल्म मुकम्मल हुई और 3 फरवरी 1972 को बंबई के मराठा मंदिर में बड़ी शान के साथ ‘पाकीज़ा’ रिलीज़ हुई। बीमार मीना कुमारी ने अपनी ज़िंदगी का आख़िरी प्रीमियर अटेंड किया। राजकुमार ने मीना का हाथ चूमा और कमाल मीना के बगल में बैठे। म्युज़िक डायरेक्टर मोहम्मद ज़हूर ख़य्याम ने मीना को मुबारक़बाद दी, शाहकार फ़िल्म बनी है। आदमी और औरत की मोहब्बत का अंजाम आख़िर चौदह साल बाद रंग लाया। मगर अफ़सोस इसकी बेमिसाल क़ामयाबी मीना के 31 मार्च 1972 को इस दुनिया से उठ जाने के बाद मिली। बेरहम फ़िल्मफ़ेयर मैनेजमेंट ने इस शानदार फ़िल्म को सिर्फ बेस्ट आर्ट डायरेक्शन का अवार्ड दिया। बेस्ट म्युज़िक के लिए गुलाम मोहम्मद और बेस्ट एक्ट्रेस के लिए मीना नॉमिनेट हुए। मगर अवार्ड नहीं दिया गया। तर्क दिया गया, मरे लोगों को अवार्ड नहीं दिया जाता। ट्रेजडी क्वीन के साथ आख़िरी ट्रेजडी।