by – मुहम्मद ज़ाहिद

इस धरती पर “आतंकवाद” नाम का जन्म देने वाला कोई मुसलमान नहीं था , वह था “वी प्रभाकरण” जो एक तमिल हिन्दू था।

“लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम” अर्थात “लिट्टे” की स्थापना 5 मई 1976 में “वी प्रभाकरण” ने की जिसका उद्देश्य इसके सहारे अपने धर्म की रक्षा नहीं बल्कि हिंसक पृथकतावादी अभियान शुरू कर के उत्तर और पूर्वी श्रीलंका में एक स्वतंत्र तमिल राज्य की स्थापना करना था।

आत्मघाती , फिदाईन और सोसाईड बोम्बर जैसे अविष्कार इसी वी प्रभाकरण की देन थे। लिट्टे अपने संगठन में छोटे छोटे बच्चों को सिपाही के रूप में भर्ती करते थे जिससे उनको प्रशिक्षित करके आत्मघाती बम विस्फोट से अन्य कई बडी-बड़ी हस्तियों पर हमला करे सकें और यह ऐसा श्रीलंका में लगभग दो दशक तक कराते रहे तथा श्रीलंका के राष्ट्रपति और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी तक की हत्याएँ कराते रहे।

भारत की बात करूँ तो वी प्रभाकरण को भारत के ही तमिलनाडु से सारी मदद मिलती रही है और वायको से लेकर करुनानिधि तक उसके मददगार रह चुके हैं।

लिट्टे के खत्म होने के बाद उसका परिवार भारत के तमिलनाडु में ही रहता है और देश के प्रमुख नेता “वाईको” का संरक्षण प्राप्त है , मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि तमिलनाडु में आप आज भी जाकर वी प्रभाकरण की आलोचना कर दीजिए , आपका मुँह तोड़ दिया जाएगा।

तब या आजतक किसी ने यह नहीं कहा कि वी प्रभाकरण एक तमिल हिन्दू है , और उसका “सनातन धर्म” उसे आतंकवादी बनने के लिए प्रेरित करता है।

कहना भी नहीं चाहिए क्युँकि उसका उद्देश्य सनातन धर्म के किसी उद्देश्य के कारण नहीं बल्कि राजनैतिक था , और तब सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि हर मामले में कूदता अमेरिका श्रीलंका में चूँ भी नहीं बोला।

इसके बाद आतंकवाद की बात करूँ तो इसका जन्म भारत के ही “पंजाब” में हुआ , और भारत के ही एक राज्य “पंजाब” को देश से अलग करके एक अलग देश “खालिस्तान” बनाने की कोशिश में हिंसा का सहारा लिया गया और सिखों के सबसे पवित्र स्थान “स्वर्ण मंदिर” को आतंकवाद का अड्डा बना दिया गया , इसके परिणामस्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने तुरंत संज्ञान लिया और “हरमिन्दर साहेब” पर तोप चलवाकर “आपरेशन ब्लू स्टार” का सफल समापन किया।

इसी कारण 1984 में सिखों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी , और देश सिख विरोधी दंगों में सुलग पड़ा और पंजाब में तो भारी तबाही और बर्बादी 10 साल तक चलती रही। पंजाब के मुख्यमंत्री समेत तमाम लोग इस आतंकवाद की भेंट चढ़ गये और पंजाब में बिना पगड़ी वाले लोग बस और ट्रेन से उतारकर भूने जाने लगे तो शेष भारत में पगड़ी वाले लोगों पर आफत आती रही और इसमें “शिरोमणि अकाली दल” खुलकर खालिस्तानी आतंकियों का पक्ष लेती रही और आज भी लेती है।

तब भी किसी ने यह नहीं कहा कि भिंडरवाले सिख था और सिख धर्म आतंकवादी बनने के लिए प्रेरित करता है। कहना भी नहीं चाहिए क्युँकि पंजाब का आतंकवाद किसी धार्मिक कारण से नहीं बल्कि देश से अलग एक अलग देश “खालिस्तान” बनाने के लिए था जो धार्मिक ना हो कर राजनैतिक था।

महत्वपूर्ण बात यह कि हर मामले में कूदने और निर्देश देने वाला अमेरिका तब इस मामले में चूँ भी नहीं कर सका बल्कि तमाम खालिस्तानी आतंकियों को अपने यहाँ शरण ही देता रहा।

जानते हैं क्युँ ? क्युँकि तब दुनिया का बैलेंस बना हुआ था और उसका कारण था अमेरिका के विरोध की एक और धूरी USSR जो अमेरिका की मनमानी पर नकेल डालता था और भारत सदैव अमेरिका के विपरीत थूरी के साथ था।

26 दिसंबर 1991को USSR के विघटन के बाद यह धूरी टूट गयी और पूरी दुनिया अमेरिका की ओर झुक गयी तथा अमेरिका की गुंडागर्दी चलने लगी। और यह गुंडागर्दी भी अमेरिका के क्रिश्चियन होने के बावजूद धार्मिक ना होकर राजनैतिक थी।

USSR के विघटित होते ही अमेरिका ने रूस के ठीक बगल अर्थात अफगानिस्तान में हो रही इसी राजनैतिक लड़ाई में दखल देना शुरू करके ओसामा बिन लादेन को वहाँ उथारा और तालिबान को समर्थन दिया। और फिर सबकुछ दुनिया के सामने है।

अफगानिस्तान की लड़ाई भी धार्मिक कारण से नहीं बल्कि राजनैतिक कारण से ही थी , हाँ लड़ने वाले वहाँ दाढ़ी वाले मुसलमान थे। और इसी कारण यहूद नियंत्रित अमेरिका ने ऐसी राजनैतिक लड़ाई को धर्म से जोड़ने का खेल खेलना शुरू किया और इराक , सीरिया , अफगानिस्तान , पाकिस्तान , यमन जैसे देशों की होती राजनैतिक लड़ाईयों को राजनैतिक ना बता कर उसका कारण इस्लामिक बताना शुरू किया और इसके इस खेल में वहाँ की मीडिया का उपयोग किया गया।

इस्लामिक आतंकवाद को एक “टेरर ब्रांड” बनाया गया और इसके ब्रान्ड अंबेसडर बनाए गये “ओसामा बिन लादेन और बगदादी” और इसी रणनीति के सहारे गल्फ देशों के तेल कूओं पर कब्जा करने का उद्देश पूरा किया गया।

भारत के संदर्भ में “काश्मीर” का विवाद भी उसी अमेरिका की शह पर था और कभी खासमखास रहा अमेरिका के ही इशारे पर पाकिस्तान काश्मीर में हिंसा कराता रहा तो इसका कारण भी “लिट्टे” और “खालिस्तानी” की तरह धार्मिक ना होकर राजनैतिक ही है।

बस भारत में आज का राजनैतिक वातावरण इसके कारण देश के मुसलमानों को गाली सुनने का अवसर मुहैय्या कराता है।

काश्मीर का मुद्दा भी राजनैतिक ही है और काश्मीर को भारत से अलग करके एक अलग राष्ट्र बनाने के लिए वैसे ही है जैसै श्रीलंका में था जैसे पंजाब में था।

कहने का अर्थ बस इतना है कि किसी की राजनीति में उलझ कर अंधे ना बनें और देश का आपसी तानाबाना ना तोड़ें , इससे देश सहित हम सबका नुकसान होगा और हो रहा !