by — अनिल चमड़िया |

हिन्दुत्व एक राजनीति है और इस राजनीति को तभी अपने लिए भारतीय समाज में घुसने के लिए सुराक मिलता है जब आर्थिक और सामाजिक बुनियादी सवालों को हल करने की प्रतिस्पर्द्धा में सक्रिय संविधानमूलक राजनीतिक पार्टियां चूकने लगती है और हिन्दुत्व को ही सत्ता के लिए जरुरी दवा मानने लगती है। राजीव गांधी ने अपने राजनीतिक संकट का समाधान राम मंदिर के शिलान्यास में देखा था लेकिन उन्हें उसका कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिला बल्कि उसके बजाय हिन्दुत्व की राजनीति की अगुवाई करने वाली ताकतों के लिए पर्याप्त जगह बना दी।इसका एक अर्थ यह है कि हिन्दुत्व की प्रतिस्पर्द्धा में खुद को शामिल करने की कोशिश करने वाली वाली पार्टियां महज और महज हिन्दुत्व की राजनीति को ही बढावा देने में मददगार हो सकती है। दूसरी बात यह भी है कि भारतीय समाज के बीच राजनीति का साम्प्रदायिककरण अकेले किसी धार्मिक मुद्दे को लेकर संभव नहीं है जबकि उसके आधार के लिए आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे मौजूद नहीं हो।

राजनीति के हिन्दुत्वकरण की प्रक्रिया को हमें इस तरह समझना चाहिए। 1980 में भारतीय जनता पार्टी ने गांधी समाजवाद का नारा दिया था। दूसरी तरफ हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले संगठनों में विश्व हिन्दू परिषद ने 1984 में राम जन्म भूमि को अपने मुद्दे के रुप में पेश किया और महज पांच साल के भीतर सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं को हल करने की विफलताओं की वजह से वह भारतीय राजनीति के लिए एक केन्द्रीय मुद्दा बन गया।इंदिरा गांधी की हत्या और सिखों के खिलाफ हिन्दुत्व के हमले का साल भी 1984 ही था।

यदि बोफर्स के प्रकरण को एक 1989 के दौर के संकट के प्रतीक के रुप में देखें तो उस दौर में हिन्दुत्व का विस्तार हुआ। दूसरा सामाजिक और शैक्षणिक रुप से पिछड़े वर्गों के लिए संविधान के अनुसार सरकारी नौकरियों में विशेष अवसर के सिद्धात को पूरा करने के फैसले की प्रतिक्रिया में हिन्दुत्व का विस्तार दिखाई देता है। उसके साथ दूसरी तरफ सामाजिक शक्तियों के बीच भी नये सिरे से ध्रुवीकरण दिखाई देता है।हिन्दुत्व का तीसरा विस्तार 2014 में मनमोहन सिंह के कार्यकाल में पैदा हुए राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संकट के बाद दिखता है जिसका समाधान नरेन्द्र मोदी ने गुजरात मॉडल यानी हिन्दुत्व के साथ आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक संकटों के समाधान के मिश्रण के जरिये करने का वायदा किया है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सत्ता के पीछे साम्प्रदिकता आधार है लेकिन नरेन्द्र मोदी ने सत्ता के लिए यह नारा दिया । सबका साथ सबका विकास।

इस पहलू पर गौर करना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर के मुद्दे को लेकर 1996 के बाद से लगातार अपने चुनावी घोषणा पत्र में कब क्या कहा है। फेस बुक की एक पोस्ट में पत्रकार प्रशांत टंडन ने बताया है कि 1996 में भारतीय जनता पार्टी ने कहा: अयोध्या में भव्य राम मंदिर का वादा । 1998 में चुनावी घोषणा पत्र की यह भाषा थी :रजामंदी और कानून के दायरे में राम मंदिर का निर्माण का रास्ता साफ करने का वादा। 2004 के चुनाव में यह स्वर इस रुप प्रस्तुत किया गया ।अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की प्रतिबद्धता। फिर 2009 में ये कहा गया – बातचीत के और अदालत की कार्यवाही के जरिये अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए रास्ता बनाने का वादा। 2014 में यह स्वर बदला और उसे चुनावी घोषणा पत्र में डालने को लेकर विवाद भी हुआ जिसकी वजह से चुनावी घोषणा पत्र जारी करने में देर हुई और आखिरकार यह तय किया गया- संविधान के दायरे में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की संभावनाएं तलाशने का वादा।

इस तरह हम ये कह सकते हैं कि राम मंदिर का निर्माण संविधान के दायरे में संविधान के अनुसार चलने वाली सरकार के लिए संभव नहीं है और एक राजनीतिक पार्टी के रुप में भारतीय जनता पार्टी उसे अपने चुनावी लाभ के लिए भुनाना भी चाहती है और सत्ता की सीमाओं को लांधने के दुष्परिणाम भी जानती है।

2019 में चुनाव तय है और भारतीय जनता पार्टी अपने बहुमत और सहयोगी पार्टियों के समर्थन के के अपार बहुमत के साथ पांच वर्षों तक सत्ता का संचालन कर चुकी है। वह विपक्ष में नहीं है।1996 में वह विपक्ष में थी और 2004 में सत्ता का संलाचन करने के बाद राम मंदिर के निर्माण के लिए प्रतिबद्धता की भाषा में बात करने लगी थी। इस प्रतिबद्धता का मतलब अपने खिलाफ टूटने वाले भरोसे को बनाए रखने की कोशिश थी। लेकिन वह राम मंदिर के निर्माण के रास्ता साफ करने के वादे की भाषा को प्रतिबद्धता की भाषा में बदलने के बावजूद कांग्रेस को सरकार बनाने से नहीं रोक सकी।2014 के बाद के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संकटों को ध्यान में रखें तो एक बात स्पष्ट हैं कि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने आर्थिक और सामाजिर मुद्दे को हल करने के जो नारे दिए थे वे नीतियों में परिवर्तित नहीं हो सकें। बेरोजगारी पैतालीस वर्षों के दौरान इन पांच वर्षों में सबसे ज्यादा बढ़ी है। सामाजिक असंतोष का विस्फोट थमने का नाम नहीं ले रहा है। युवाओं में भारी असंतोष है और ये बात ध्यान में ऱखनी चाहिए कि इस वक़्त 65 फीसद मतदाता की उम्र 35 वर्ष या इससे कम की है।देश का कोई भी विश्वविद्यालय नहीं है जहां छात्र छात्राओं में गुस्से की गूंज नहीं सुनाई दे रही है।ये युवा नई आर्थिक नीतियों और सूचना तकनीक के अभूतपूर्व विस्तार के माहौल में पले बढ़े हैं। यानी विपरीत स्थितियां है।यदि 2019 के चुनाव के लिहाज से राममंदिर के मुद्दे की प्रांसगिकता को समझना है तो हिन्दी प्रदेश के तीन राज्यों- मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा के चुनाव नतीजों को हम देख सकते हैं जिन चुनावों में राम मंदिर को मुद्दा बनाने से उन राज्यों के नेतृत्व ने इंकार कर दिया।

राम मंदिर का मुद्दा हिन्दुत्व की राजनीति के अस्तित्व से जुड़ा हो सकता है लेकिन भारतीय समाज के सामने जो बुनियादी संकट है वे राम मंदिर के नारों की गूंज से दबते नहीं दिख रहे हैं। यदि जमीनी स्तर पर भी हम जाकर देखें तो यह पाते हैं कि हाल के दौर में डेरा डंडों का जितना भंडाफोड़ हुआ हैं उसमें उनके भक्तों की भीड़ हकीकत से रु बरु होकर उनसे दूर गई हैं। राम मंदिर का मुद्दा राजनीति के हिन्दुत्वकरण का माध्यम एक दौर में बना लेकिन वह अपनी भावनात्मक से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर बुनियादी सवालो से लोगों को दूर ले जाने की कोशिशों में सफल नहीं होता दिखाई दे रहा है बल्कि उसके खिलाफ एक प्रतिक्रिया होने लगी है।कांग्रेस सरकार के खिलाफ आर्थिक, सामाजिक स्तर पर पैदा हुए विक्षोभ को भी अपने स्तर से विपक्ष के रुप में संबोधित कर रही है और राम मंदिर के मुद्दे को भी अपने करीब जताने की मुहिम में लगी है। लोगों को लगता है कि कांग्रेस का यह मिश्रण उनके अनुकूल ज्यादा है।

https://www.thecitizen.in